कितने लोगों को खाड़ी से निकालेंगे मोदीजी, कितनों को रोजगार देंगे?
एक करोड़ खाड़ी के बेरोजगार और
तेल गैस से बड़ा रोजगार का संकट
कोच्चि में मोदीजी ने दावा किया,आज का भारत संकट में अपने नागरिकों को कभी अकेला नहीं छोड़ता। पश्चिम एशियन फंसे भारतीयों को निकालने के लिए पूरी ताकत लगा दी है। खाड़ी से तेल और गैस भारत लाने में नाकाम सरकार लोगों को निकाल लें तो बहुत बड़ी बात होती। लेकिन हो क्या रहा है? जहां तहां फंसे हैं लोग और मदद की गुहार लगा रहे हैं।वीडियो वायरल हैं।क्यों
खाड़ी देशों (GCC) में लगभग 90 लाख से 1 करोड़ के बीच भारतीय प्रवासी रहते हैं, जो वहां की अर्थव्यवस्था और तेल उद्योग में बड़ी भूमिका निभाते हैं। सबसे अधिक संख्या संयुक्त अरब अमीरात (UAE) में (34 लाख से अधिक) है, इसके बाद सऊदी अरब (25-27 लाख) दूसरे स्थान पर है। विकिपीडिया और संयुक्त अरब अमीरात के मुताबिक अमीरात में 45 लाख भारतीय हैं। कितनों को निकल सके मोदी जी?
अपने ऊधम सिंह नगर जिले के 424 लोग खाड़ी के 11 देशों में फंसे हैं।खाड़ी में फंसे एक करोड़ लोगों की छोड़िए, इन सवा चार सौ लोगों को ही निकल लाते!
केरल में बोल रहे थे मोदी जी।केरल के लगभग 22 लाख से अधिक लोग खाड़ी देशों (GCC) में रहते हैं, जबकि कुल प्रवासी मलयाली समुदाय लगभग 50 लाख (वैश्विक स्तर पर) होने का अनुमान है। सेंटर फॉर डेवलपमेंट स्टडीज के अनुसार, केरल के कुल निवासियों का लगभग 10% हिस्सा राज्य से बाहर रहता है, जिसमें खाड़ी देशों का योगदान सबसे अधिक है।
उनके लिए या देश के किसी भी राज्य में लोगों के रोजगार के लिए सरकार क्या कर रही है?
उत्तराखंड की आबादी एक करोड़ है और पहाड़ के गांव वीरान हैं। खाड़ी के देशों में उत्तराखंड के कितने लोग हैं इसके आंकड़े नहीं हैं। उत्तराखंड से पलायन के आंकड़े हैं?
दुनिया भर में पंजाबी प्रवासी (Diaspora) की कुल संख्या लगभग 3 से 5 मिलियन (30-50 लाख) के बीच मानी जाती है, जो मुख्य रूप से कनाडा, ब्रिटेन, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और मध्य पूर्व में बसे हैं। पिछले कुछ वर्षों में, पंजाब से हर साल लगभग 1.25 से 1.5 लाख युवा पढ़ाई और बेहतर भविष्य के लिए विदेश जा रहे हैं। देश में रोजगार हो तो लोग क्यों जाते विदेश?
तेल और गैस का संकट गहराता ही जा रहा है।कल कारखाने उद्योग बंद होने को हैं। देश में भारी रोजगार संकट तेल गैस संकट से बड़ा है। तेल गैस के बिना भी जी लेंगे।रोजगार के बिना कैसे जिएंगे।
खाड़ी में कमाने गए करीब एक करोड़ भारतीय वाहन फंसे हुए हैं।जिन्हें देर सवेर लौटना है।उनकी वापसी की संभावना कम है क्योंकि खाड़ी देशों की अर्थ व्यवस्था को इजराइल अमेरिका ने ध्वस्त कर दिया है।
देश में बढ़ती बेरोजगारी के साथ इन एक करोड़ विस्थापित बेरोजगारों की बेरोज़गारी देश की बड़ी समस्या बनने वाली है।
प्रमुख खाड़ी देशों में भारतीयों की अनुमानित संख्या:
संयुक्त अरब अमीरात (UAE): ~34-35 लाख से अधिक (दुबई, अबू धाबी में सबसे ज्यादा)।
सऊदी अरब: ~25-27 लाख।
कुवैत: ~9-10 लाख।
कतर: ~7-8 लाख।
ओमान: ~6-7 लाख।
बहरीन: ~3 लाख।
अन्य मध्य पूर्वी देश:
इजराइल: ~20,000
ईरान: ~10,000
इराक: ~17,000
मुख्य बिंदु:
इन छह देशों (UAE, सऊदी, कुवैत, कतर, ओमान, बहरीन) को GCC देश कहा जाता है।
भारत को इन देशों से सबसे अधिक रेमिटेंस (विदेशी मुद्रा) मिलती है।
भारतीय मूल के लोग वहां निर्माण, सेवा और तेल क्षेत्रों में काम करते हैं।

ईरान खत्म और सारा तेल अमेरिका का
अमेरिकी रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने ट्रंप समर्थक अमेरिकी टीवी चैनल फॉक्स न्यूज में दावा किया है कि सिर्फ 14 दिनों इराक खत्म हो जाएगा।दुनिया के नक्शे से मिट जाएगा ईरान।फिर सारा तेल अमेरिका का।
युद्ध का असली मकसद यही है।
ग्राहम ने दावा किया है कि ईरान और वेनेजुएला में दुनिया का कुल 31 प्रतिशत तेल है।यह सारा तेल अब अमेरिका का हुआ।
“ইরানের মেয়াদ আর মাত্র ১৪ দিন… এরপর দেশটি শেষ।”
সোমবার ফক্স নিউজে এমনই বাজি ধরে বললেন মার্কিন রিপাবলিকান সিনেটর লিন্ডসে গ্রাহাম।
মাত্র ৫ মিনিট ১ সেকেন্ডের একটি সাক্ষাৎকার।
কিন্তু সেই কয়েক মিনিটেই এমন কিছু কথা বলেছেন তিনি যা শুনে স্তম্ভিত অনেকেই।নিজেও ফেঁসেছেন, বিপদে ফেলেছেন ট্রাম্পকেও।
কি এমন মন্তব্য করেছিলেন তিনি? কয়েকটা অংশ দেখুন:
লিন্ডসে গ্রাহাম বলেছিলেন,
“বিশ্বের মোট তেলের ৩১ শতাংশ মজুত রয়েছে ভেনেজুয়েলা ও ইরানে। আমরা এই ৩১ শতাংশ তেলের মালিকানা পেতে যাচ্ছি। এটি চীনের জন্য দুঃস্বপ্ন। আমেরিকার জন্য ভালো বিনিয়োগ।”
“ ইরানের ‘শাসকগোষ্ঠী এখন মৃত্যুর পথে। আগামী দুই সপ্তাহ পর তারা হাঁটু গেড়ে বসতে বাধ্য হবে। তাদের এমন শাস্তি হবে, যা আগে কখনো হয়নি। যুক্তরাষ্ট্র এমন সমৃদ্ধি পেতে যাচ্ছে, যা কেউ কখনো কল্পনা করেনি।”
“ হ্যা, যুদ্ধে প্রথম চারদিনে যুক্তরাষ্ট্রের ২০০কোটি ডলার খরচ হয়েছে, পরের দুদিনে আরও বেশী। তবে এতে চিন্তার কিছু নেই, এসবই আসলে বিনিয়োগ। যুদ্ধ শেষে ইরানের যে পরিমান তেলের মালিকানা পাওয়া যাবে তাতে তিনমাসেই এই অর্থ উঠে আসবে। ”
“ আমি চাই সৌদি ও কাতার ইরানের বিরদ্ধে যুদ্ধে যোগ দিক। আমরা তাদের কাছে অস্ত্র বিক্রি করি। তাদের ভালো সক্ষমতা আছে।”
মার্কিন সিনেটর লিন্ডসে গ্রাহামের বক্তব্য শুনে গা জ্বলে উঠছে?
তাহলে জানা যাক কে এই লোক।
বিশ্লেষকরা বলছেন,
যেসব ব্যক্তি ট্রাম্প প্রশাসনের ইসরায়েলপ্রীতি এবং ইরানের বিরুদ্ধে যুদ্ধের পক্ষে সরব, তাদের মধ্যে অন্যতম এই গ্রাহাম।
তার প্রথম পরিচয়, তিনি ইরানের ওপর হামলার মূল উদ্যোক্তা।
দ্য ওয়াল স্ট্রিট জার্নাল বলছে, শুরুতে ইরানে হামলার পরিকল্পনা ছিল না ট্রাম্পের।
কিন্তু গ্রাহাম ইসারাইল সফর করে নেতানিয়াহুকে বোঝান ইরান আক্রমণ করা কতটা লাভজনক হবে। নেতানিয়াহু সাথে সাথে আগ্রহী হলেন।
এরপর কীভাবে প্রেসিডেন্ট ট্রাম্পকে যুদ্ধের জন্য রাজি করানো যায়, সে বিষয়ে নেতানিয়াহুকে পরামর্শ দেন গ্রাহাম।
নেতানিয়াহু এরপর ট্রাম্পকে এমন কিছু গোয়েন্দা তথ্য দেখান, যা দেখে ট্রাম্পও ইরানের বিরুদ্ধে যৌথ যুদ্ধ শুরু করতে রাজি হয়।
সুতরাং বুঝতেই পারছেন, লিন্ডসে গ্রাহাম হয়তো সেই লোক, যার ‘প্ররোচনায়’ ইরান যুদ্ধটা হচ্ছে।
এবার আরেকটি ভয়ানক তথ্য শুনুন। ভেনেজুয়েলার প্রধানমন্ত্রী নিকোলা মাদুরোকে যুক্তরাষ্ট্রের অপহরণ এবং ইরানে হামলা এই দুটো কাজই করা হয়েছে, গ্রাহামের পরামর্শে, তেলসম্পদের নিয়ন্ত্রণ নিতে।
গ্রাহামের পোর্টফলিও আরও লম্বা।
২০০৩ সালের ইরাক যুদ্ধের কথা মনে আছে নিশ্চয়। এই যুদ্ধটা শুরুর জন্য তিনি মার্কিন প্রেসিডেন্ট বুশকেও প্ররোচিত করেন এবং সফল হন। গ্রাহামের সাজানো পরিকল্পনায় ইরাক ধ্বংসস্তূপে পরিণত হয়, প্রাণ হারান ইরাকের ৩ লাখ বেসামরিক নাগরিক ।
গাজায় হামলা চালিয়ে জায়গা ফাঁকা করে ট্রাম্পের স্বপ্নের শহর তৈরি করার বুদ্ধিটাও কিন্তু গ্রাহামের।
সিরিয়া ও লিবিয়ায় সামরিক হস্তক্ষেপেরও পরামর্শক ছিলেন লিন্ডসে গ্রাহাম। এই দুটো দেশ এখন বিপর্যস্ত।
এভাবে গত দুই দশক ধরে নিরলস ভাবে মধ্যপ্রাচ্যে যুদ্ধ বাঁধিয়ে যাচ্ছেন গ্রাহাম।
ও হ্যা! সেই ফক্স নিউজ সাক্ষাৎকারের শেষদিকে গ্রাহাম আরেকটি ইঙ্গিতও দেন।
উপস্থাপককে নিজের ক্যাপ দেখিয়ে তিনি বলেন,
“দেখছেন? এতে লেখা Free Cuba।
অপেক্ষা করুন… কিউবার মুক্তিও আসছে।
আমরা বিশ্বজুড়ে অভিযান চালাচ্ছি।
খারাপ লোকদের সরিয়ে দিচ্ছি।
এরপর কিউবার পালা।”
এবার আপনাকে একটা প্রশ্ন করি ?
পৃথিবীতে যারা অশান্তি সৃষ্টি করে, আগ্রাসন দিয়ে অজস্র নিরীহ মানু্ষকে হ*ত্যা করে,
শেষ পর্যন্ত
ইতিহাস তাদের কী নামে ডাকে?
#iran #war #Israel #Trump

ट्रंप के करीबी सहयोगी लिंडसे ग्राहम ईरान युद्ध को अमेरिका के लिए एक बढ़िया निवेश बता रहे हैं। उन्होंने एक टीवी चैनल से बात करते हुए कहा, 'वेनेजुएला और ईरान के पास दुनिया के तेल भंडार का 31 फीसदी हिस्सा है। इस 31 फीसदी हिस्से के साथ हमारा पार्टनरशिप होना चीन के लिए बुरे सपने के समान है। यह युद्ध एक अच्छा निवेश है।' उनके इस बयान का साफ और सीधा मतलब है कि अमेरिका की नजर ईरान के तेल पर है और तेल भंडारों पर कब्जे के लिए ही अमेरिका ने यह युद्ध शुरू किया है।
Lindsey Graham Says $1B a Day on Iran War Is “Best Money Ever Spent”
Lindsey Graham, the veteran Republican senator who has been pushing for war against Iran for decades, has issued a dire warning to the Iranian government, saying it was worth spending money to “take this regime down”.
Good Investment" Argument: In March 2026, Graham stated that the U.S. and its partners could control 31% of the world's oil reserves by dealing with a post-regime Iran and Venezuela, calling it a "good investment".
Regime Change Strategy: Graham has pushed for the fall of the current Iranian government, arguing it would lead to a new, peaceful Middle East and significant financial gains.
Focus on Resources: He has highlighted the importance of securing Iran's oil infrastructure for future economic advantage.

Tel Aviv this morning 👇👇👇
अमेरिका का वर्चस्व ट्रंप के बाद भी बना रहेगा। युद्ध अमेरिका में नहीं है।बाकी दुनिया में है। अमेरिकी हित हर कहीं हैं। अमेरिकी सेना हर कहीं है।युद्ध हर कहीं है।
खाड़ी में तबाही से तेल पर अमेरिका का कब्जा।
तेल रूस भी बेचेगा।
इजराइल को क्या मिलेगा?
होलोकास्ट के बाद ऐसा विध्वंस?
इजराइल के निर्माण का संघर्ष बेमतलब हो गया अमेरिकी हित साधने में।
इजराइल और ईरान के अस्तित्व पर सबसे ज्यादा खतरे का जिम्मेदार वही,जो दुनियाभर में युद्ध गृहयुद्ध और आतंकवाद के जिम्मेदार है।
यह इस पृथ्वी, मनुष्यता और सभ्यता के खिलाफ युद्ध अपराध है।
युद्ध नहीं चाहिए
प्रेरणा अंशु का युद्ध विरोधी अंक अप्रैल में प्रकाशित होगा।
पश्चिम एशिया में युद्ध की निरंतरता बनी हुई है। फिलिस्तीन के सवाल पर अरब इजराइल युद्ध की निरंतरता रही है।
अब भी फिलिस्तीन युद्ध के भूगोल का केंद्र बना हुआ है।
पश्चिम एशिया के तेल पर कब्जा अमेरिका का शुरू से लक्ष्य रहा है, जो खाड़ी युद्ध और सद्दाम हुसैन की फांसी के बाद भी पूरा नहीं हुआ।
तेल के लिए ही आतंकवाद को जन्म दिया अमेरिका ने।आतंकवादी संगठनों की हर संभव मदद की। अफगानिस्तान को तालीबान को सौंपा रूस को खदेड़कर।फिर उसी तालिबान के खिलाफ आतंक के विरुद्ध अमेरिका का युद्ध शुरू हुआ।
इससे भी पहले ईरान और इराक के मध्य दस साल तक युद्ध रहा।
भारतीय उपमहाद्वीप में भी हम लगातार युद्ध के शिकंजे में है।
अगर इजराइल और अमेरिका का ईरान के खिलाफ युद्ध जारी रहा तो कब्जे के लिए शायद ही तेल बचे।दुनिया अमेरिका और रूस पर निर्भर होगा तेल के लिए। वेनेजुएला पर अमेरिकी कब्जा और अमेरिकी शिकंजे में अरब देश। तेल का भूगोल अब अमेरिकी है।
भारतीय उपमहाद्वीप में युद्ध और गृहयुद्ध, आतंकवाद के पीछे भी अमेरिका है।
हमने अमेरिका से सावधान 1990 में इराक पर अमेरिकी हमले के बाद लिखना शुरू किया और 2006 में सद्दाम हुसैन को फांसी के बाद सिर्फ पश्चिम एशिया नहीं, पूरी दुनिया अमेरिकी शिकंजे में है।सारी सरकारें अमेरिका की सरकारें हैं और सारे देश अमेरिकी उपनिवेश।
यह बात हमारे लिए शुरू से सबसे बड़ी चिंता है।
हर युद्ध मनुष्यता और सभ्यता, प्रकृति और पृथ्वी के खिलाफ है।
इसलिए हमें युद्ध नहीं चाहिए।
यह कहानी 1988 में प्रकाशित हुई वर्तमान साहित्य में।

दूसरे विश्वयुद्ध में बंगाल में बमबारी से कोई नहीं मरा।लाखों लोग भूख से मरे। लेकिन सैकड़ों लोग मुनाफा कमाकर मालामाल हो गए।
तेल की आग से भी मालामाल होंगे लोग। उनके लिए आपदा में वैसा ही मौका है।
ट्रंप के टैरिफ से डरकर घुटना इन्हीं मलमली लोगों के हित में टेकना मजबूरी है। वोट इन्हीं की फंडिंग से मिलती है।
राष्ट्रहित का मतलब उन्हीं का हित। स्वतंत्रता का मतलब बेलगाम मुनाफा उनका। संप्रभुता का मतलब उनका व्यापारक हित। व्यापार तो सबके साथ है।
कहां कहां घुटना टेकेंगे या सर के बल लेटेंगे,यह सब व्यापारिक हित पर निर्भर है।आम लोगों को धर्म के सिवाय किसी बात से कोई लेना देना नहीं।
मरना तो तय है।निरंकुश तानाशाह को भी मौत आती है।हम लोग तो खैर घास फूस हैं। आज कटे या कल, क्या फर्क पड़ता है?
आस्था सर्वोपरि है। आस्था के अनुसार देह मिट्टी है। आत्मा अमर है। मिट्टी में मिलने से पहले ही फिर क्यों आत्मा मर जाती है?
बिना मौत मर मर कर जिए और कबंध बनकर चले, यह कैसी जिंदगी है भाई?
#नौकरी_बचेगी_आपकी?#छंटनी_की_खुली_छूट
एआई से नौकरियों को खतरा बना हुआ है।सभी नौकरियों पर तलवार लटकी हुई है। तकनीकी उपलब्धियों का कुल जमा अब सर्वव्यापी तबाही है।
पहले ही योग्य लोगों को नौकरी नहीं मिल रही है क्योंकि तकनीक में योग्यता जरूरी नहीं है। अब मशीन सबकुछ करेगी तो मनुष्य की भी जरूरत नहीं है।
न्यून तम दिहाड़ी और ठेके पर भी लोग काम कर रहे हैं। कायदा कानून ताक पर है।श्रम कानून खत्म है।सार्वजनिक क्षेत्र और सरकारी क्षेत्र में कौशल विकास और सहकारी समूह, खैरात है।
अब पश्चिम एशिया में युद्ध यूरोप को भी चपेट में लेता हुआ दिख रहा है ।ऊपर से तेल की आग धधक रही है।
नौकरी बचेगी आपकी?
मौका है और दस्तूर भी है।
छंटनी की खुली छूट है।
ईरान-इजरायल तनाव के कारण वैश्विक अनिश्चितता ने नौकरियों पर नकारात्मक असर डालना शुरू कर दिया है। 2026 की शुरुआत के अनुसार, मध्य पूर्व में संघर्ष के चलते भारतीय कंपनियों ने भर्ती (hiring) रोक दी है या छंटनी (layoffs) बढ़ा दी है, विशेषकर तेल और निर्यात क्षेत्रों में। इसके अलावा, एयरलाइंस और लॉजिस्टिक्स जैसे सेक्टर्स पर भी दबाव बढ़ रहा है, जो नौकरियों के लिए चुनौतीपूर्ण है।
मुख्य प्रभाव:
भर्ती पर रोक और छंटनी: अनिश्चितता के कारण कई कंपनियां नई भर्तियां रोक रही हैं और परिचालन लागत कम करने के लिए नौकरियों में कटौती कर रही हैं।
निर्यात और लॉजिस्टिक्स में गिरावट: हैंडीक्राफ्ट, इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य सामानों के निर्यात में बाधाएं आने से इन सेक्टरों में काम करने वालों पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।
तेल की कीमतों में वृद्धि: तनाव से तेल की कीमतें बढ़ने का खतरा है, जिससे महंगाई बढ़ेगी और परिवहन/उत्पादन पर आधारित नौकरियों पर दबाव पड़ेगा।
यह स्थिति भारत सहित वैश्विक स्तर पर अनिश्चितता पैदा कर रही है, जिससे रोजगार के अवसर कम हो सकते हैं।
मध्य पूर्व में कार्यरत भारतीय: तनावपूर्ण क्षेत्रों में काम कर रहे भारतीय कामगारों के लिए सुरक्षा और रोजगार का जोखिम बढ़ गया है, विशेषकर यात्रा और शिपिंग मार्गों के बाधित होने से।
