Friday, March 6, 2026
फिर आत्मा क्यों मर जाती है?
दूसरे विश्वयुद्ध में बंगाल में बमबारी से कोई नहीं मरा।लाखों लोग भूख से मरे। लेकिन सैकड़ों लोग मुनाफा कमाकर मालामाल हो गए।
तेल की आग से भी मालामाल होंगे लोग। उनके लिए आपदा में वैसा ही मौका है।
ट्रंप के टैरिफ से डरकर घुटना इन्हीं मलमली लोगों के हित में टेकना मजबूरी है। वोट इन्हीं की फंडिंग से मिलती है।
राष्ट्रहित का मतलब उन्हीं का हित। स्वतंत्रता का मतलब बेलगाम मुनाफा उनका। संप्रभुता का मतलब उनका व्यापारक हित। व्यापार तो सबके साथ है।
कहां कहां घुटना टेकेंगे या सर के बल लेटेंगे,यह सब व्यापारिक हित पर निर्भर है।आम लोगों को धर्म के सिवाय किसी बात से कोई लेना देना नहीं।
मरना तो तय है।निरंकुश तानाशाह को भी मौत आती है।हम लोग तो खैर घास फूस हैं। आज कटे या कल, क्या फर्क पड़ता है?
आस्था सर्वोपरि है। आस्था के अनुसार देह मिट्टी है। आत्मा अमर है। मिट्टी में मिलने से पहले ही फिर क्यों आत्मा मर जाती है?
बिना मौत मर मर कर जिए और कबंध बनकर चले, यह कैसी जिंदगी है भाई?
Wednesday, March 4, 2026
छंटनी की खुली छूट
#नौकरी_बचेगी_आपकी?#छंटनी_की_खुली_छूट
एआई से नौकरियों को खतरा बना हुआ है।सभी नौकरियों पर तलवार लटकी हुई है। तकनीकी उपलब्धियों का कुल जमा अब सर्वव्यापी तबाही है।
पहले ही योग्य लोगों को नौकरी नहीं मिल रही है क्योंकि तकनीक में योग्यता जरूरी नहीं है। अब मशीन सबकुछ करेगी तो मनुष्य की भी जरूरत नहीं है।
न्यून तम दिहाड़ी और ठेके पर भी लोग काम कर रहे हैं। कायदा कानून ताक पर है।श्रम कानून खत्म है।सार्वजनिक क्षेत्र और सरकारी क्षेत्र में कौशल विकास और सहकारी समूह, खैरात है।
अब पश्चिम एशिया में युद्ध यूरोप को भी चपेट में लेता हुआ दिख रहा है ।ऊपर से तेल की आग धधक रही है।
नौकरी बचेगी आपकी?
मौका है और दस्तूर भी है।
छंटनी की खुली छूट है।
ईरान-इजरायल तनाव के कारण वैश्विक अनिश्चितता ने नौकरियों पर नकारात्मक असर डालना शुरू कर दिया है। 2026 की शुरुआत के अनुसार, मध्य पूर्व में संघर्ष के चलते भारतीय कंपनियों ने भर्ती (hiring) रोक दी है या छंटनी (layoffs) बढ़ा दी है, विशेषकर तेल और निर्यात क्षेत्रों में। इसके अलावा, एयरलाइंस और लॉजिस्टिक्स जैसे सेक्टर्स पर भी दबाव बढ़ रहा है, जो नौकरियों के लिए चुनौतीपूर्ण है।
मुख्य प्रभाव:
भर्ती पर रोक और छंटनी: अनिश्चितता के कारण कई कंपनियां नई भर्तियां रोक रही हैं और परिचालन लागत कम करने के लिए नौकरियों में कटौती कर रही हैं।
निर्यात और लॉजिस्टिक्स में गिरावट: हैंडीक्राफ्ट, इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य सामानों के निर्यात में बाधाएं आने से इन सेक्टरों में काम करने वालों पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।
तेल की कीमतों में वृद्धि: तनाव से तेल की कीमतें बढ़ने का खतरा है, जिससे महंगाई बढ़ेगी और परिवहन/उत्पादन पर आधारित नौकरियों पर दबाव पड़ेगा।
यह स्थिति भारत सहित वैश्विक स्तर पर अनिश्चितता पैदा कर रही है, जिससे रोजगार के अवसर कम हो सकते हैं।
मध्य पूर्व में कार्यरत भारतीय: तनावपूर्ण क्षेत्रों में काम कर रहे भारतीय कामगारों के लिए सुरक्षा और रोजगार का जोखिम बढ़ गया है, विशेषकर यात्रा और शिपिंग मार्गों के बाधित होने से।
साम्राज्यवाद मुर्दाबाद
1990-91 में बरेली अमर उजाला में इंद्रभूषण रस्तोगी, सुनील साह और मैं खा डेस्क पर थे।साहित्य संपादक कवि #वीरेन_डंगवाल हमारे साथ थे।तब अयोध्या में कार सेवा शुरू नहीं हुई थी और न सोवियत संघ का पतन हुआ था।विश्वबैंक से बुलाकर डॉ मनमोहन सिंह को नरसिम्हा राव ने प्रधानमंत्री बना दिया था। आर्थिक सुधारों की शुरुआत होनी थी और अभी भारत को अमेरिका और इजराइल से नत्थी होना था।
खाड़ी युद्ध के दौरान हर रोज पहले पेज पर हमारा विश्लेषण प्रकाशित होता था। इसके अलावा हम वीरेन डंगवाल के नेतृत्व में राजेश श्रीनेत, दीप अग्रवाल, सुनील साह के साथ साप्ताहिक समकालीन नजरिया बरेली से निकालते थे। इसी दरम्यान मैंने लंबी कहानी लिखी खाड़ी युद्ध पर कहकशां। #सुनील_कौशिक तब कानपुर से कथानक निकालते थे।उनके कहने पर। उन्होंने कहानी पढ़ने के बाद कहा कि यह तो पूरा उपन्यास है।कहानी नहीं, उपन्यास लिखो।
और हमने लिखना शुरू किया उपन्यास अमेरिका से सावधान। बरेली से 1991 में।
अक्टूबर 1991 में हम जनसत्ता कोलकाता चले गए।#धनबाद में तब #दैनिक_आवाज में साहित्य संपादक थे Shyam Bihari Shyamal , उन्होंने 1993 में पहली किश्त अमेरिका से सावधान की प्रकाशित की। दैनिक आवाज में करीब तीन साल तक यह उपन्यास धारावाहिक छपता रहा। फिर #जमशेदपुर से #दैनिक_चमकता_आईना में।
लघु पत्रिकाओं ने बड़े पैमाने पर इस उपन्यास के अंश प्रकाशित किए 1994 से 2003 तक। दर्जनों पत्रिकाओं में। क्योंकि इसका हर अध्याय एक पूरी कहानी के रूप में था और इंटर एक्टिव भी।
दैनिक आवाज में तो संवाद श्यामल जी के नेतृत्व में लगातार चला।
आखरी किश्तें #समकालीन_तीसरी_दुनिया और #अलाव में छपे तो #सुधीर_विद्यार्थी ने #संदर्श का एक अंक इस उपन्यास पर केंद्रित किया।
सबसे पहले लघु पत्रिकाओं में #हरीश_भदानी जी ने #वातायन में #अमेरिका_से_सावधान का धारावाहिक प्रकाशन किया। उनके बाद #सोहन_शर्मा जी ने मुंबई से #समझ में।
,#इराक_युद्ध से #ईरान पर हमला तक एक पूरी परिक्रमा है। इराक युद्ध के समय भी भारत एक #गुट_निरपेक्ष देश था। दोस्त सद्दाम हुसैन का साथ तो #सोवियत_संघ में भी नहीं दिया और खाड़ी युद्ध के बाद सोवियत संघ का विभाजन हो गया।
#नई_विश्व_व्यवस्था में सारा विश्व अमेरिका का उपनिवेश हो गया।भारतीय सत्ता वर्ग अमेरिका के साथ रहा है।लेकिन इतनी बेशर्मी कभी नहीं देखी गई।
हम अब सीधे सीधे #अमेरिका और #इजराइल के साथ हैं।
वातायन की एक प्रति मिल गई। इसमें छपी दो किश्तें चाहे तो आप पढ़ सकते हैं।
साम्राज्यवाद, फासीवाद चेहरा नहीं, पूरी व्यवस्था है।चेहरे के विरोध से क्या होगा?
वियतनाम, इराक और अफगानिस्तान में युद्ध के खिलाफ थी अमेरिकी जनता।वैसे ही अस्सी फीसद अमेरिकी ईरान में युद्ध के खिलाफ है। नतीजा?
साम्राज्यवाद पूंजीवादी व्यवस्था का निरंकुश, फासिस्ट तंत्र है। अमेरिकी जनता का कोई असर नहीं होता।हां, उन्हें विरोध दर्ज करने की आजादी जरूर है।
राष्ट्रपति कैनेडी, राष्ट्रपति निक्सन, राष्ट्रपति बुश, राष्ट्रपति ओबामा,बाइडन और ट्रंप में कोई फर्क है?
ये व्यक्ति नहीं, निरंकुश सत्ता का चेहरा है जो सिर्फ पूंजी का हित देखता है।
क्या भारत की जनता युद्ध और नरसंहार के पक्ष में है?
इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।
यह अमेरिका और इजराइल से नत्थी एक संपूर्ण और निरंकुश व्यवस्था है,जिसकी जड़ें गांव गांव में मजबूत हो गई है।
अमेरिका में फिर भी युद्ध विरोधी आंदोलन होते हैं।
भारत में तो सत्ता की आलोचना, असहमति और अभिव्यक्ति तक की स्वतंत्रता नहीं है।
ईरान के प्रतिरोध और अमेरिका इजराइल की दुर्गति पर तमाशबीन की तरह हम खुश हो सकते हैं, लेकिन साम्राज्यवादी पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ लड़ नहीं सकते।
हमारी आलोचना, व्यंग्य और विरोध तंत्र के चेहरे तक सीमित है।इससे तंत्र को कोई फर्क नहीं पड़ता।
अमेरिकी जनता के प्रचंड विरोध के बावजूद अमरीकी विध्वंसक मनुष्यविरोधी प्रक्रियविरोधी व्यवस्था का नरसंहार अभियान जारी रहेगा।
वैसे ही मोदीजी के विरोध से फ़ासिज़्म का चेहरा देर सवेर बदल सकता है,फ़ासिज़्म का तंत्र नहीं बदलेगा।
अमेरिकी कांग्रेस (संसद) ट्रंप के युद्ध के मामलों, विशेषकर ईरान के खिलाफ, पूरी तरह से एकमत नहीं है, और विपक्षी डेमोक्रेट्स तथा कुछ रिपब्लिकन सदस्य उनकी सैन्य शक्तियों को सीमित करने का प्रयास कर रहे हैं। GOP (रिपब्लिकन) के नेतृत्व वाले सदन में ट्रंप की नीति का समर्थन होने के बावजूद, कांग्रेस के दोनों सदनों में युद्ध शक्तियों पर चर्चा चल रही है।
अमेरिकी कांग्रेस और ट्रंप के युद्ध के पक्ष में मुख्य बातें:
विभाजन: डेमोक्रेट्स और कुछ रिपब्लिकन ईरान के खिलाफ युद्ध के लिए कांग्रेस की मंजूरी को आवश्यक मानते हैं, जबकि अन्य, मुख्य रूप से रिपब्लिकन, ट्रंप के कड़े रुख का समर्थन कर रहे हैं।
युद्ध शक्तियों पर चर्चा: कांग्रेस के सदस्य 'वार पावर्स रेजोल्यूशन' (War Powers Resolution) के माध्यम से राष्ट्रपति की एकतरफा सैन्य कार्यवाही को सीमित करना चाहते हैं।
वीटो की संभावना: यदि कांग्रेस युद्ध को रोकने का कोई प्रस्ताव पारित करती है, तो ट्रंप उसे वीटो करने की धमकी दे चुके हैं, जिसे पलटने के लिए दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होगी।
संक्षेप में, अमेरिकी कांग्रेस में ट्रंप के युद्ध के मामलों पर तीखी बहस चल रही है, जिसमें रिपब्लिकन की पतली बढ़त के कारण कोई भी बड़ा युद्धकालीन निर्णय लेना मुश्किल माना जा रहा है।
समर्थन बनाम विरोध: MAGA (मेक अमेरिका ग्रेट अगेन) के समर्थक और कुछ रिपब्लिकन सदस्य राष्ट्रपति की "अमेरिका फर्स्ट" नीति के हिस्से के रूप में युद्ध का समर्थन कर रहे हैं, जबकि आलोचक कहते हैं कि उन्होंने युद्ध की आवश्यकता को स्पष्ट नहीं किया है।
Friday, February 20, 2026
भारतीय साहित्य में आलोचना विधा आखिर क्या है?
भारतीय साहित्य में आलोचना विधा आखिर क्या है?
पलाश विश्वास
बांग्ला फिल्म चौरंगी बंगाल से बाहर कितने लोगों ने देखी? उत्तम के ग्लैमर का बंगाल से बाहर कितना असर था? सत्यजीत रे की बांग्ला फिल्में सीमाबद्ध और जन अरण्य के दर्शक कितने और कौन थे?
मृत्यु के बाद साहित्यिक के रूप में कुलीन सत्तवर्ग में अवहेलित शंकर की लोकप्रियता सत्यजीत रे और उत्तम कुमार के कारण है,यह फतवा जारी हो गया है।
बंगाल के बाहर बाकी भारत के बारे में क्या कहेंगे?
क्या यही बात तारा शंकर बंदोपाध्याय और शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय के बारे में कह सकते हैं? जिनकी कृतियों पर आधारित सुपर हिट फिल्मों की संख्या कहीं ज्यादा थी।
शंकर भी आखिर मणि शंकर बंदोपाध्याय ही थे। उनका जीवन संघर्ष और उत्थान कम रोमांचक नहीं है।
उनके पाठकों में कितने लोगों को मालूम था कि वे बंदोपाध्याय भी थे?
शंकर के लेखन में कुलीनत्व को हमेशा चुनौती मिली क्योंकि आम जनसामान्य और खास तौर पर युवाओं के संघर्ष ही उनकी कृतियों का मूल तत्व रहा है।
उनकी आशा आकांक्षाओं, उनके संघर्ष, उनके मोहभंग और उनकी त्रासदी की कथा कहने वाले शंकर कभी आलोचकों के प्रिय नहीं थे।
रवींद्र और शरत भी कम उपेक्षित नहीं थे।
खारिज कर दिए गए हिंदी और बाकी भारतीय भाषाओं के महत्वपूर्ण साहित्यकार क्या कम हैं?
क्या भारतीय साहित्य के आलोचक अब भी नाबालिग हैं और बच्चों की पसंद नापसंद एलर्जी की तरह अपना अपना साहित्यकार चुनकर उनको महिमामंडित करने में ही अपनी मेधा समर्पित कर देते हैं?
क्या विधाओं के विकसित होते रहने की इतनी अवधि बीत जाने के बावजूद आलोचना विधा का कोई विकास ही नहीं हुआ या यह विधा खेमों, गिरोहों के ध्वजारोहण के लिए है और साहित्य व जीवन से इसके कोई सरोकार हैं हीं नहीं?
Wednesday, February 18, 2026
विश्व साहित्य पर युवा आलोचक क्यों नहीं लिखते?
अमित प्रकाश सिंह Amit Prakash Singh ,जनसत्ता: मेरा सुझाव है कि जैक लंदन के प्रकाशित लेख के आधार पर हिंदी साहित्य के जनपक्षीय सोच पर एक लेख लिखना चाहिए।इसी में यह बताना चाहिए कि आज तुलनात्मक अध्ययन के खतरे बताएं जिसके चलते पाठक का अभाव आज खासा बढा है।
palash6398418084: जैक लन्दन मेरे प्रिय लेखक हैं। उनपर स्वतंत्र तौर पर लिखा जाना चाहिए।लेकिन मैं न आलोचक हूं और न लेखक। पाठक बमुश्किल अभीतक बना हुआ हूं। कोई समर्थ व्यक्ति लिखें तो बेहतर। प्रेरणा अंशु में ऐसे लेख छापने के लिए स्पेस भी नहीं निकाल सकते।
बहरहाल अमित जी के सुझाव से मैं सहमत हूं।
मैं मूलतः एक सामाजिक कार्यकर्ता हूं।लिखना पढ़ना भी मेरी सामाजिक गतिविधियों में शामिल है। विमर्श, चिंतन मंथन में मैं कतई अभ्यस्त नहीं हूं।
खुद कभी मेधावी छात्र नहीं रहा।हालांकि अंग्रेजी साहित्य से डीएसबी कॉलेज नैनीताल से MA किया है। जीआईसी नैनीताल से इंटर किया है।
हाईस्कूल तक मैं अपनी मातृभाषा बांग्ला में लिखता था। सिर्फ इसलिए कि पढ़ने लिखने की बहुत बुरी लत में फंस गया था बचपन से।तब घर में और बंगाली विस्थापित समाज में पढ़ने लिखने का जबरदस्त माहौल था। हम बांग्ला, हिंदी और अंग्रेज़ी कुछ भी पढ़ता था।
स्कूल में अंग्रेजी और हिंदी ठीकठाक थी। बस। लेकिन किताबें खरीदने के पैसे पर्याप्त नहीं होते थे। आंदोलनों और जनसमस्याओं पर पिताजी की सामाजिकता के कारण हिंदी में लिखना जरूर पड़ता था।लेकिन यह लिखने का शौक कतई नहीं था।
रोज पढ़ने के लिए नई किताबें के कैसे मिले? आइडिया यह निकला कि खुद लिखें और एक दूसरे को पढ़ाया जाए। बांग्ला यानी मातृभाषा में लिखने की प्रेरणा माइकल मधुसूदन दत्त से मिली।
जीआईसी में गुरुजी ताराचंद्र त्रिपाठी ने पकड़ लिया।कहा, हर भाषा मातृभाषा होती है। हिंदी में भी लिखों। अंग्रेजी माध्यम से इसलिए पढ़ा,क्योंकि त्रिपाठी जी का कहना था कि सत्ता और सत्ता वर्ग की भाषा अंग्रेजी है।सत्ता से टकराने के लिए अंग्रेजी जानना ही होगा।
लेखक पत्रकार बना डीएसबी के माहौल से। बनना चाहता था प्राध्यापक लेकिन झारखंड जाकर पत्रकार बन गया और शिक्षा अधूरी हो गई। पढ़ना लिखना भी क्रमशः बाधित होते होते बंद हो गया।
अब एक तो नए सिरे से लिखना पढ़ना रिटायर करने के दस साल बाद संभव नहीं है।इसके लिए राशन पानी भी नहीं है और माहौल सिरे से बदल गया है।संवाद भी लगभग बंद हो गया है।घूमना फिरना भी।
फिर साहित्य पर लिखने के लिए संबंधित विधा में सृजन का अनुभव भी होना चाहिए,जो मेरा नहीं है।पत्रकारिता की तर्ज पर साहित्य पर लिखा नहीं जा सकता।
फिरभी विश्व साहित्य पर काम बेहद जरूरी है। बांग्ला और अंग्रेजी में युवा आलोचक यह कम करते हैं।
हिंदी में डॉ उर्वशी, Indra Rathore , Sushil Kumar जैसे समर्थ और युवा आलोचकों को यह कम करना चाहिए। Zahid Khan भी अपने तरीके से शानदार काम कर रहे हैं।
शरत की रवींद्र से तुलना क्यों?
देश पत्रिका के पुस्तक विशेषांक हमेशा बहुत खास होता है। जनसत्ता के अग्रज साथी अमित जी ने इस बार के पुस्तक विशेषांक की पीडीएफ फाइल भेजी है। हिंदी में समयांतर के पुस्तक विशेषांक निकलते हैं।
अमित Amit Prakash Singh जी का आभार।
पत्रिका के पतन को देखते हुए करीब दस साल बाद इतने अच्छे अंक की उम्मीद नहीं थी।
अभी पढ़ रहा हूं।
शरत पर लेख अच्छा है। रवींद्र से तुलना की परंपरा बनी हुई है।जबकि शरत रवींद्र से एकदम अलहदा है।
शरत के लेखन में सिर्फ जीवन और मनुष्य है।सामाजिक यथार्थ है।कुछ भी अमूर्त, आध्यात्मिक नहीं है। अलग से दर्शन भी नहीं है। जो रवींद्र साहित्य की गीतात्मकता के साथ सबसे बड़ी विशेषता है।
अब भी बांग्ला साहित्य में साहित्य के मूल्यांकन के लिए टैगोर सबसे बड़ी कसौटी है।यह आलोचना की सीमा है।
जैक लन्दन पर लिखा आलेख पठनीय है और इसमें जैक की तुलना किसी से नहीं की गई।
हिंदी में भी प्रेमचंद, निराला,मुक्तिबोध को किसी भी रचनाकार के सामने खड़ा कर दिया जाता है।सापेक्षिक यह मूल्यांकन साहित्य का वस्तुनिष्ठ विवेचन नहीं है।
Monday, February 16, 2026
क्या हमारे बच्चे लावारिश हैं?
#क्या_हमारे_बच्चे_लावारिश_हैं_?
पलाश विश्वास
ईलॉन मस्क कह रहे हैं कि AI के दौर में मेडिकल की पढ़ाई करने की ज़रूरत नहीं है। आने वाले सालों में AI ही सारे इलाज करेगा। AI कंपनियों के मालिक कहते हैं कि वकालत का काम भी AI ही करेगा। मैनेजमेंट और बाक़ी नौकरियाँ भी AI के सामने नहीं टिक पाएंगी। अगर इस दुनिया में कोई काम ही नहीं बचेगा, सब कुछ AI ही करेगा, तो फिर यह दुनिया किस काम की रह जाएगी? मानव इतिहास एक लाख साल पुराना है। क्या AI की रफ़्तार के सामने मानवता के वजूद पर ही सवाल खड़ा हो जाएगा?
Ravish Kumar
इसके बाद शत प्रतिशत अंक और शत प्रतिशत रिजल्ट, गला का प्रतिस्पर्धा और कामयाबी की आंधी दौड़ से क्या हासिल होगा? सभ्यता और मनुष्यता के अस्तित्व का सवाल है यह,सिर्फ रोजगार का सवाल नहीं है।
मशीनें सबकुछ कर देंगी तो मनुष्य के जीने का क्या मतलब रह जाएगा?
बुनियादी जरूरत है भोजन, जो जमीन से मिलता है। जमीन पर अब सीमेंट का जंगल है।
फिर घर, परिवार और समाज,देश मनुष्य को मनुष्य बनाता है।भाषा और संस्कृति, विरासत, इतिहास और पर्यावरण से सभ्यता का विकास होता है। ये अब जरूरी नहीं रह गई है।सब कुछ टूट बिखर रहा है।
प्रकृति से संबंध विच्छेद हो गया है। न अमन चैन है और न मुहब्बत है।जो हाल है,निकट भविष्य में बच्चे भी मशीनें पैदा करेंगी।
चुनौती इतनी बड़ी है। आज विचार, संवेदना, विवेक, नैतिकता, रचनात्मकता और नेतृत्व, शोध और आविष्कार, अमन चैन और मुहब्बत की सबसे ज्यादा जरूरत है। लेकिन हो क्या रहा है?
घर परिवार समाज देश और शिक्षा संस्थानों में पढ़ने लिखने की संस्कृति क्या है? हम कितने संवेदनशील हैं,कितने नैतिक और विवेकशील हैं? विचारों की कितनी स्वतंत्रता है? बिना संवेदना, बिना प्रेम, बिना विवेक कहीं रचनात्मकता और नेतृत्व संभव है?
हमारे बच्चे क्या सीख रहे हैं?
हमारे बच्चे क्या लिख पढ़ रहे हैं?
कामयाबी के लिए तेज और मेधावी बच्चे,वे भी कुलीन वर्ग के बच्चे सबको प्रिय हैं। औसत बच्चों, पिछड़े और कमजोर बच्चों,हाशिए के बच्चों की हम कितनी मदद करते हैं।
अब बहुत जल्दी उनके हाथ और पैर काट दिए जाएंगे।
उनसे उनकी सारी इंद्रियां छीन ली गई हैं। प्रकृति से वे बेदखल हैं।जमीन छीन ली गई है।मौसम छीन लिया गया है।जलवायु बदल दिया गया है।
उनके सपनों और विचारों पर सख्त पहरा है।
अभी तक नहीं सोचा है तो जरूर सोचिए।
वक्त बहुत कम है।
Monday, February 9, 2026
हिंदी के रचनाकार क्या नर्सरी के बच्चे हैं?
हिंदी के रचनाकार क्या नर्सरी के बच्चे हैं?
पलाश विश्वास
जीवन के व्यावहारिक अनुभव के बिना सिर्फ भाषाई दक्षता, दूसरों के अनुकरण, विमर्श और अस्मिता के तहत लिखी गई रचनाएं हमें कतई नहीं चाहिए। हर रचना में प्राण होना चाहिए।हर शब्द में संवेदना की गहराई और सघनता अनिवार्य है रचना के रचना होने के लिए।
सिर्फ छपने के लिए कृपया रचना कतई न भेजें। हम बेहद स्पष्ट तौर हर अंक के लिए विषय और अपेक्षित सामग्री के बारे में निरंतर संवाद करते रहते हैं।
ज्यादातर रचनाओं का विषय से कोई मतलब नहीं होता और न ही उनमें रचनात्मकता जैसी कोई चीज होती है। आपको जिसके बारे में कोई जानकारी नहीं है और न कोई व्यवहारिक अनुभव है ,उसपर लिखना क्या जरूरी है? हर अंक में आपकी रचना छपेगी तो नए रचनाकारों के लिए जगह कैसे बनेगी?
अपने मन मुताबिक कुछ भी लिखकर हर अंक में छपने की उम्मीद करना क्या सही है?
विषय के मुताबिक जो सामग्री हमें चाहिए, वह बेहद कम मिल पाती है। यह बेहद दुखद है।
हमने मेहनतकश स्त्रियों पर एक स्त्री विशेषांक निकाला था,आपको याद होगा। मेहनतकश स्त्री कहां नहीं है? स्त्री की मेहनत से ही दुनिया बनती है।लेकिन अस्मिता,वाद, विचार और विमर्श का झंडा उठाने वालों का अपने आस पास की मेहनती स्त्री और खासतौर पर निचले तबकों की,सतह की नीचे की औरतों से कोई सरोकार है या नहीं,नहीं मालूम,लेकिन उनके जीवन के बारे में व्यवहारिक अनुभव लगभग नहीं है। यह अंक बहुत मुश्किल से निकला।
हम चाहते हैं कि मार्च में छप रहे प्रेरणा अंशु के स्त्री विशेषांक में किशोरियों की रचनात्मकता और उनकी समस्याओं पर फोकस बने। लेकिन ज्यादा रचनाओं का किशोरियों से कोई लेना देना नहीं है। स्त्री पर स्त्री होने से ही सार्थक लिखना संभव नहीं है क्योंकि स्त्रियां भी दूसरी स्त्रियों के भोगे हुए यथार्थ को न जीवन में और न रचना में जी सके,इसकी कोई गारंटी नहीं। पुरुष भी बिना वास्तविक अनुभव के स्त्री पर लिख रहे हैं जबकि अंक किशोरियों की समस्याओं पर केंद्रित है।
क्या हिंदी भाषा और साहित्य में किशोरियों के मन, मानस,जीवन यापन, उड़ान और समस्याओं पर कभी लिखा ही नहीं गया है? तो विषय आपको समझ में क्यों नहीं आता।क्या हिंदी के रचनाकार अभी नर्सरी के बच्चे हैं? जिन्हें किसी विषय की समझ ही नहीं होती?
किस घर में तीन एजर बेटी नहीं है? हमने सबसे खा था कि आपका लिखना जरूरी नहीं है, बेटियों से जरूर लिखवाएं। सबने अपनी अपनी रचनाएं भेज दी,बेटियों से रचनाएं किसी ने नहीं भिजवाई।
क्यों? बेटियों को क्या लिखने की इजाजत नहीं है?
क्यों? बेटियों क्या लिखना नहीं जानती या नहीं चाहती?
इस अंक में आप न लिखते,बेटी को लिखने देते तो क्या महाभारत अशुद्ध हो जाता?
हमीं लोग हैं जो लिंग भेद की बात करते हैं, आजादी, अस्मिता और विमर्श के नारे उछालते हैं लेकिन कतई नहीं चाहते कि हमारी बेटियां अपनी बात लिखें, कहानी कविता आलेख भी लिखें, समस्याओं पर चर्चा करें?
मुझे बहुत दुख हो रहा है।
क्या बेटियों के मन मानस उड़ान को कैद करके माताएं खुद उड़ान पर हैं?
Tuesday, January 27, 2026
किताब खरीदते हैं, पढ़ते भी हैं क्या?
किताबें खरीदना स्टेटस की बात है। संपन्न लोग घर की सजावट के लिए बेशुमार किताबें खरीदते हैं। बंगाल में रवींद्र रचनावली, शरत रचना समग्र, सत्यजीत राय समग्र, बंकिम रचनावली, ताराशंकर रचनावली ड्राइंग रूम की अलमारियों में बंद पड़ी रहती है आगंतुकों को यह दिखाने के लिए कि वे लोग संपन्न हैं और साहित्य भी पढ़ते हैं। लेकिन पढ़ना तो दूर, किताबों पर धूल की परतें भी साफ नहीं होतीं।
जो महंगी किताबें खरीदते हैं,वे क्या पढ़ते भी हैं? पाठ्यक्रम की किताबें सारी खरीद भी ली जाए तो क्या विद्यार्थियों में उन्हें पढ़ने की आदत होती है? गाइड और नोट्स, डिजिटल लिटरेचर के जमाने में कितने लोग टेक्स्ट पढ़ते हैं?
किताबों को पढ़ने की जिन्हें सबसे ज्यादा जरूरत है, महंगी किताबें खरीदने के लिए उनके पास पैसे होते हैं क्या? खरीद भी ली तो वे क्या पढ़ते हैं?
साहित्य और संस्कृति से कितने जुड़े हैं हाशिए के लोग?
सतह और सतह के नीचे के लोग,यानि बहुसंख्य जनता?
जिनके बिना साहित्य और संस्कृति की कोई प्रासंगिकता नहीं बचती।
सैकड़ों किताबें जिनकी छपती हैं या जिनकी किताबों की लाखों प्रतियां बिकती हैं या जिन किताबों की खूब चर्चा होती है, या जो किताबें पुरस्कृत और सम्मानित होती हैं,क्या उन्हें आम लोग पढ़ते हैं?
अगर पढ़ते हैं तो आम लोग और खास लोग भी ज्ञान विज्ञान से इतने दूर क्यों हैं?
क्यों हम डिजिटल दुनिया में अंध आदिम बर्बर जीवन यापन करते हैं?
क्या यही प्रगति है?
यही है विकास?
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Tuesday, January 20, 2026
हमारी विदेश नीति क्या ट्रंप की सनक है?
हमारी विदेश नीति क्या ट्रंप की सनक है?
हमारी कोई विदेश नीति है या राष्ट्रपति ट्रंप की सनक तय करती है हमारी विदेश नीति?अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने ट्रुथ सोशल अकाउंट पर एक तस्वीर साझा की जिसमें ग्रीनलैंड, कनाडा और वेनेजुएला को अमेरिकी क्षेत्र बताया गया है।इस पोस्ट के बाद यूरोपीय देशों में चिंता बढ़ गई है और क्षेत्र का तनाव भी गहरा गया है।
इसी बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने फ्रांस के साथ तीखी नोकझोंक शुरू कर दी है। उन्होंने फ्रेंच वाइन और शैंपेन पर 200 प्रतिशत टैरिफ लगाने की धमकी दी है। यह सब इसलिए क्योंकि फ्रांस ने ट्रंप के प्रस्तावित 'बोर्ड ऑफ पीस' में शामिल होने का न्योता ठुकरा दिया।
भारत को भी बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने का न्यौता है।क्या करेगी भारत सरकार।
भगोड़ों की दादागिरी मानने से साफ इनकार कर दिया है यूरोप, लैटिन अमेरिका के देश, रूस और चीन ने। नाटो टूटने के कगार पर है।इजराइल के सिवाय इस दुनिया में अमेरिका का सबसे जिगरी दोस्त है अमेरिका।
टैरिफ के साथ भारत विरोधी ट्रंप की सनक के बावजूद।
क्या मजबूरी है?
अमेरिका के हितों के साथ किनके हित जुड़े हैं?
फोटो:आजतक
Monday, January 19, 2026
खुद को बदलकर देखें
दिनेशपुर हाईस्कूल से नैनीताल में डीएसबी कॉलेज परिसर में जीआईसी में 1973 में जब हमने प्रवेश किया तो पढ़ने लिखने का जबरदस्त माहौल था। डीएसबी रीडिंग रूम और लाइब्रेरी के अलावा मालरोड के दुर्गा साह पुस्तकालय हमारे लिए ज्ञान के खजाने थे।सारे सहपाठी,मित्र और प्रोफेसर भी पढ़ने लिखने वाले थे।
हम चूंकि शुरू से करियरिस्ट नहीं थे, हम अपने पाठ्यक्रम के अलावा दुनियाभर के साहित्य और ज्ञान विज्ञान की जरूरी किताबें पढ़ते थे।हम सभी। इसपर कॉलेज और मालरोड पर हिमपात के मध्य भी हमारी निरंतर चर्चा होती थी। किताबें तब मोटी होती थी। लेकिन हम कोई किताब शुरू करके अंत तक जरूर पढ़े थे।खाना पीना नहाना सोना सबकुछ छोड़कर। हमारी पीढ़ी ही ऐसी थी।
लिखना नियमित शुरू हुआ नैनीताल समाचार से। जस का तस कितना ही लंबा लिखने की आदत बन गई। Rajiv Lochan Sah दा कहते रहते,थोड़ा छोटा लिखो।हम कभी नहीं माने।
1980 में दैनिक आवाज धनबाद से पेशेवर पत्रकारिता शुरू की।छह पेज के अखबार में हर रोज एक डेढ़ पेज मेरे होते थे। कोयला खानों, आदिवासियों और मजदूरों के बारे में मेरे लिखे के पाठक भी पूरे झारखंड में थे।जो अब भी हमारे साथ हैं।
दैनिक जागरण और दैनिक अमर उजाला में तो पहले ही पेज पर लगभग रोज मेरे लंबे लंबे लेख छपते थे।
जनसत्ता में चूंकि संपादकीय के लोग न रिपोर्टिंग करते थे और न उन्हें लिखने का मौका था। अखबारों में लंबा लिखने का पटाक्षेप हो गया।
डीएसबी से ही कहानियां कविताएं छपने लगी थीं। मेरी लगभग सभी कहानियां लंबी या बहुत लंबी होती थी।
उनका मिशन, नई टिहरी पुरानी टिहरी कहानी के रूप में लघु उपन्यास ही थे।
कविताएं भी लंबी छपती थीं।जैसे तराई कथा पूरे बत्तीस पेज की। अमेरिका से सावधान इंटरैक्टिव नोवेल था,जो दस साल तक छपता रहा।इतना लंबा छपा कि समेटना असंभव हो गया।
अंग्रेजी में लेख चूंकि दुनियाभर में छपते थे, उनकी लंबाई अंग्रेजी पत्र पत्रिकाओं के मुताबिक होती थी।लेकिन मेरे ब्लॉग बहुत लंबे होते थे।हिंदी और अंग्रेजी में।
बांग्ला में मेरे पाठक कम हैं,इसलिए बांग्ला में लिखे सारे ब्लॉग छोटे थे। बांग्ला में प्रकाशित आलेख भी।
यूट्यूब पर चैनल चलाया अंग्रेजी में तो वीडियो तीन तीन घंटे के बनते गए।
कुल हासिल क्या हुआ?
लगभग शून्य।
नब्बे के दशक में ही इंटरनेट और गूगल से पहले की दुनिया में अंग्रेजी अखबार हिंदू ने शेषांश छापना बंद कर दिया। अखबारों को बदलती दुनिया का सच पहले समझ में आया। फिर बाजार के मुकाबले अखबारों को वैचारिक सामग्री की जरूरत नहीं रही।
जरूरी लेखन के बजाय ट्रेडिंग लेखन शुरू हो गया और हम तब भी अपनी शर्तों पर लिखना चाह रहे थे। प्रिंट से बाहर हो गए। अब प्रासंगिक और जरूरी जैसी कुछ बात है भी नहीं।सबकुछ ट्रेडिंग है।
प्रेरणा अंशु का संपादन करते हुए आर्थिक संकट के साथ साथ कंटेंट संकट का सामना किया।लेकिन पठनीयता और पाठकीय संकट सबसे ज्यादा गहरा हो गया।
जो पत्रिकाएं बौद्धिक और शोध सामग्री प्रकाशित करती हैं या प्रतिष्ठित लोगों को ही छापती हैं,उनके लिए कोई संकट है या नहीं, हम नहीं जानते। उनके पाठक निश्चित तौर पर होंगे।
हमारे पाठक ऐसे आम लोग हैं,जो पढ़ने लिखने की दुनिया से बाहर हाशिए के लोग हैं।
हमारे ज्यादातर रचनाकार नए और युवा हैं और इनमें भी ज्यादातर वंचित वर्गों और समूह के लोग हैं।
पत्रिका जनता के लिए और जन सहयोग से ही चलती है तो जनता को पत्रिका से जोड़े रखना हमारी मजबूरी है,जबकि हम जनता के मुद्दों पर ही पत्रिका निकाल रहे हैं।बाजार के तौर तरीके हम अपना नहीं सकते।
लोग पढ़ नहीं रहे। अपने मुद्दों में भी उनकी रुचि नहीं है। दृष्टि नहीं है।समझ नहीं है। ऐसे पाठकों को जोड़ने के लिए बेहद रचनात्मक होने की जरूरत है। ये सभी लोग डिजिटल हो गए हैं।
जितना समय वे दें,उतने में ही सटीक,तथ्यपूर्ण,प्रभावी और संक्षिप्त लिखने की जरूरत है।
इसलिए अब हम ठोस लेखन की दिशा में बढ़ना चाहते हैं। यह हम सबके लिए चुनौती है। कमोबेश सबको लंबा लिखने की आदत है।
हम 1973 से अब तक लंबा ही लिखते रहे हैं। हमें अपनी आदत बदलनी पड़ रही है।लोग पढ़े ही नहीं तो पत्रिका हो या किताब, छापने का क्या मतलब है?
प्रेरणा अंशु में अब मैं एक पेज से लंबा कुछ नहीं लिखूंगा।
कोशिश और प्रयोग करके देखने में हर्ज क्या है?
यह सही है कि जो पढ़ते नहीं हैं,उनके लिए काला अक्षर भैंस बराबर हैं। लंबा हो या छोटा, बहुसंख्य पाठकों को पढ़ने लिखने की संस्कृति से जोड़ने की चुनौती उंगली पर हिमालय उठाने की जैसी है।
हम हिमालय के लोग हैं। हार कैसे मान लें?
कुछ नया करके ही देख लें।
सत्तर साल की जिंदगी में हम कामयाब कभी नहीं रहे।
एकबार फिर नाकाम ही तो होंगे।
आप हमारे साथ हैं?
Tuesday, January 13, 2026
बच्चों के विवेकानंद
#युवा_दिवस, #बसंतीपुर
#बच्चों_के_स्वामी_विवेकानंद
#नवीन_संघ
Nityanand Mandal की पहल पर बसंतीपुर के नन्हे मुन्ने बच्चों ने युवा दिवस पर काव्यपाठ के माध्यम से स्वामी विवेकानंद को याद किया।
बड़े बच्चों के साथ डोडो ने अपने दोस्तों राम, कनिष्क, रुद्रांश,सिद्धार्थ, कौशिक, काव्या,हिमानी,शिवन्या, जया, शिवा,पुनीत, धनराजऔर कुछ बड़े बच्चों भावना, हर्षिता,प्रतिभा और गांव के तमाम बच्चों के साथ कविताओं के माध्यम से स्वामी विवेकानंद को स्मृति प्रणाम किया।
इस अवसर पर डॉक्टर Gurubachan Lal Khurana , डॉक्टर सुधीर अधिकारी, गुरुजी भृगुनाथ मौर्य और बसंतीपुर के लोग उपस्थित थे।
कार्यक्रम में कवितापाठ के मध्य ही स्वामीजी के बारे में बच्चों से सवाल किए गए और तत्काल उन्हें अपने जवाब के लिए पुरस्कृत किया गया।
कार्यक्रम उसी नवीन संघ के बैनर के तहत आयोजित किया गया,जिस हम जब बच्चे थे और प्राइमरी के छात्र थे,हमने यानि बसंतीपुर में जन्मे पहली पीढ़ी के बच्चों ने संगठित किया था। नवीन संघ के माध्यम से आज से साठ साल पहले हमने बसंतपुर में विवेकानंद पुस्तकालय खोला था।हम सभी पढ़ते थे और अपनी किताबों से यह पुस्तकालय शुरू किया था।
नवीन संघ के संस्थापक कृष्णपद मंडल बंगाल में अपने ननिहाल में कक्षा दो तक पढ़कर आए थे।नवीन संघ इनका इडिया आइडिया था।वे बहुत अच्छे खिलाड़ी थे। नवीन संघ के माध्यम से हम खेल कूद भी करते थे।पुस्तकालय का आइडिया मेरा और टेक्का यानि नित्यानंद का था।कार्यक्रम में तबके नवें संघ के मेरे और नित्यानंद के अलावा विवेक दास, गोविंद मंडल और कई सदस्य उपस्थित थे।
अफसोस यह है कि नवीन संघ के हमारे ज्यादातर साथी अब दिवंगत है,जिनमें कृष्णपद भी शामिल है।कृष्णपद का पोता प्रियांशु राष्ट्रीय स्तर का एथलीट है।
हमने स्वामीजी के बारे में बताते हुए मनुष्यता के धर्म और नर नारायण के उनके विचारों के साथ रामकृष्ण मिशन की भी चर्चा की और बच्चों को नवीन संघ की कथा भी सुनाई। बच्चों से पढ़ने लिखने की संस्कृति बहाल करने और नवें संघ का काम आगे बढ़ाने की अपील की।
यह बच्चों का कार्यक्रम था।उन्हें बहुत मजा आया।
डोडो और उसके सभी दोस्तों को खूब मजा आया।
क्या ऐसे कार्यक्रम हर गांव में आयोजित करना संभव नहीं है?
Sunday, January 11, 2026
आखिरी मुलाकात:सबकुछ याद रखने वाली 108 साल की मनमोहनी देवी
सबकुछ याद रखने वाली मनमोहनी देवी अब नहीं हैं। उनसे दूसरी मुलाकात नहीं हो सकी।
यह आखिरी मुलाकात की कथा है।
एक सौ आठ साल की जिंदगी की हम अकाल मृत्यु और बेमौत लाखों मौतों,एक के बाद एक आपदा,महामारी और घनघोर बेरोजगारी,महंगाई के दुस्सामाय में कल्पना भी नहीं कर सकते।हमारे आस पास कितने ही लोग बहुत कम उम्र में दुनिया को रोज अलविदा कह रहे हैं।
रामपुर जिले के बिलासपुर तहसील के अंतर्गत 1959 में बसाए गए पूर्वी बंगाल के विभाजन पीड़ितों के गांव मानपुर ओझा यानी सूरज फार्म की मनमोहनी बैरागी 108 साल की हैं।
सात पीढ़ियों को देख चुकी हैं वे।बिल्कुल स्वस्थ हैं। न शुगर, न प्रेशर और न कोई दूसरी बीमारी।
गांव से एक मिल दूर अपनी जमीन में बने घर से रोज भी गांव टहलने निकलती हैं लाठी ठक ठक करती हुई।
खूब बोलती है और अब भी बिना चश्मे को दुनिया को आंख खोलकर देखती हैं।सिर्फ उनके दांत नहीं रहे।बोली,शाकाहारी हूं क्योंकि दांत नहीं रहे।
उन्होंने बंगाल की भुखमरी देखी,दूसरा विश्वयुद्ध देखा,प्लेग और हैजा चेचक का कहर देखा,गुरुचांद ठाकुर का मतुआ आंदोलन देखा,भारत विभाजन देखा, बारह रिफ्यूजी कैंपों की जिंदगी देखी,रोज सैकड़ों लोगों की मौतें देखी,सामूहिक चिताओं पर जलती सैकड़ों लाशे देखी, कोलकाता और हावड़ा शहर को बनते देखा,सुंदरवन और बंगाल की नदियों को देखा,जंगल महल और यूपी उत्तराखंड की तराई का जंगल देखा और उन्हें सबकुछ याद है।
आजकल के नौजवानों के कंधे लटक जाते हैं।
पचास पार करते न करते जिजीविषा मर जाती हैं।लेकिन पूर्वी बंगाल में जन्मी इस एक सौ आठ साल की अपढ़ स्त्री कभी थकती नहीं है।
प्रेरणा अंशु की टीम पूर्वी बंगाल के विभाजनपीड़ितों की आपबीती दर्ज करने जिला जिला गांव गांव बुजुर्गों की खोज में भटक रही हैं।
बहुत कम लोग आप बीती सुनाने लायक बचे हैं और उनमें से ज्यादातर लोग बहुत कुछ भूल चुके हैं। लेकिन मनमोहनी देवी को सबकुछ याद है।
परीक्षा में बैठ रहे युवाओं को उनसे सीख लेनी चाहिए।
कल हम अपनी बड़ी दीदी के पोते को देखने सूरज फार्म गए थे। मैं,सविता,रूपेश और शालिनी।
बंटी ने कल हमारे घर वापस पहुंचने से पहले दम तोड दिया।उसकी हालत देखी नहीं जा रही थी।सिर्फ सविता परिजनों के साथ अंदर थी।
हम बाहर बैठे थे तो अनसुनी आवाज के दर्शकों ने कहा कि 108 साल की मन्मोहिनी देवी हमारे आने से पहले बंटी को देखकर घर चली गई और उनकी स्मृतियां बची हुई है।
हमें यकीन नहीं आया।
हम तुरंत पैदल ही उनके घर निकल गए।
उनके बेटों और पोतों ने मुझे पहचान लिया।
करीब 45 साल पहले उनसे मुलाकात हुई होगी और वे हमारे रिश्तेदार भी नहीं हैं।
उनके बेटे ने आवाज लगाई, मां,पलाश एसेचे।
मनमोहनी देवी बाहर निकल आई।
बोली,पलाश पलाश। तुम इतने बूढ़े हो गए।
फिर हंसने लगी।उनकी वह हंसी विश्वसुंद्रियो की हंसी से ज्यादा मोहक थी। फिर उन्हें मेरे पिता पुलिन बाबू की याद आई। उनकी बात करने लगी।
फिर पूछा,तुम्हारे ताऊ अनिल कब गुजर गए?
चाचा डॉक्टर सुधीर जो शक्तिफर्म चले गए थे और उनका बेटा सुभाष जो कोलकाता में है,कैसे हैं?
तुम्हारी ताई,मां और चाची का क्या हुआ?
तुम्हारे तहेरे भाई अरुण की पत्नी तो अब नहीं रही?
तुम तीन भाई हो,पलाश,paddo और पंचानन
फिर हमने पूछना शुरू किया।
भुखमरी की याद है?
जापानी बमबारी?
गुरू चांद ठाकुर का आंदोलन
प्लेग
भारत जब आजाद हुआ तब क्या हुआ था
क्यों पूर्वी बंगाल छोड़कर आए
बोली, पूर्वी बंगाल पाकिस्तान बन गया था और हम हिंदू थे,इसलिए हिंदुस्तान आ गए।
क्या हिंदू मुसलमानों में दंगा हुआ था?
उन्होंने कहा,हिंदू मुसलमान का कोई झगड़ा नहीं था।झगड़ा हिंदुस्तान पाकिस्तान का था।
उन्हे सारी नदियों के नाम याद हैं ब्योरा समेत।
फिर उन्होंने 12 कैंपों की नर्क कथा सुनाई।
साल्टलेक और उल्टाडांगा,बालीगंज और हावड़ा, संतरागाछी,मेदिनीपुर, कैनिंग और 50के दशक के कोलकाता का दर्शन कराया।
खूब बोली,रुक जाओ। कितने सालों बाद आए हो।
हमने कहा, हम आकर आपका इंटरव्यू रिकार्ड करेंगे।चार पांच घंटे लगेंगे।तब रुकेंगे।चाय भी पियेंगे और खाना भी खायेंगे।
फिर मनमोहनी देवी की मनमोहक मुस्कान।उनसे जवान कौन है?
कोई स्त्री ही 108 साल क्या 108 हजार साल की कथा सुना सकती है शायद।
पलाश विश्वास
23 मई 2022
Wednesday, January 7, 2026
पुस्तकमेला:विस्थापन और पुनर्वास
हमारे लिए खुशी की बात यह है कि बंगाली विस्थापितों की आपबीती पर लिखी Rupesh Kumar Singh की किताब #छिन्नमूल का बांग्ला संस्करण कोलकाता पुस्तकमेला में प्रकाशित होने जा रहा है। दिल्ली और कोलकाता दोनों पुस्तकमेला में विस्थापन और पुनर्वास पर चर्चा हो, यह उम्मीद रहेगी।
न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन का आभार।
हम कोलकाता में होते तो दिल्ली भी चले आते विश्व पुस्तक मेले में। हम हों न हों, पुलिनबाबू होंगे विश्व पुस्तक मेले में। एक एक इंच दिल्ली को उन्होंने अपने पैरों से नापा है पुनर्वास की लड़ाई में। उन्हें होना भी चाहिए।
गांव में हूं। रिटायर्ड हूं। अब कहीं निकलना मुश्किल है।
जाने की इच्छा है जरूर,क्योंकि साहित्यकार मित्रों से कोलकाता छोड़ने के बाद कहीं मुलाकात नहीं होती और दिनेशपुर बहुत छोटी जगह है,जिसे हम भी बड़ी जगह बना नहीं सके कि लोग दौड़े चले आएं।
Rupesh Kumar Singh की सेहत थोड़ी सुधर जाए और शीत लहर का कहर कम हो तो शायद न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन के स्टाल पर किसीदीन मुलाकात हो ही जाए।
नब्बे के दशक तक दिल्ली जाने पर अक्सर जेएनयू में ठहरते थे। अब वहां अपना कोई मित्र नहीं है। दिल्ली में ठहरने का कोई जुगाड नहीं है। फिरभी..
वैसे कोलकाता पुस्तक मेला जाना सिंगुर नंदीग्राम आंदोलन के दौरान छोड़ दिया था साहित्यकारों की प्रतिबद्धता के खिलाफ। दिल्ली अब साहित्य,संस्कृति और सत्ता का केंद्र है।
पुलिनबाबू जनता की लड़ाई में संवाद को हथियार के रूप में खूब इस्तेमाल कर लेते थे। इस मामले में उदारता शायद उनकी मजबूरी रही हो। दौलत उनके पास नहीं थी और राजनीतिक ताकत भी नहीं। पुनर्वास लड़कर ले नहीं सकते थे।जहां लड़ सकते थे, वहां खूब लड़े। सत्ता के गलियारे में भी खूब दौड़े।
मैं उनकी तरह उदार कभी नहीं हो सका। चालीस साल तक बड़े अखबारों में पत्रकारिता के बावजूद सत्ता और सत्ता के गलियारे से हमेशा दूरी बनाए रखी। शायद सत्ता की बेरूखी और अमानवीय चेहरे के कारण।दिल्ली दिलवालों की हो न हो, देश की राजधानी है।दमन का सर्वोच्च कमान है वह।इसलिए दिल्ली मुझे रास नहीं आई। तबसे जब मैं पिताजी के साथ दिल्ली और नई दिल्ली की दूरी पैदल तय कर रहा था।
अब उन्हीं पुलिनबाबू के लिए शायद फिर दिल्ली जाना ही एकबार फिर और करीब दो दशक बाद पुस्तक मेले में भी।
Sunday, January 4, 2026
तेल युद्ध:भारत सरकार क्यों चुप है?
#अमेरिका_से_सावधान
#भारत_सरकार_क्यों_चुप है?
अमेरिका साम्राज्यवाद का उपनिवेश है यह ग्लोबल विश्व। खाड़ी युद्ध और सोवियत संघ के पतन के बाद अमेरिकी साम्राज्यवाद निरंकुश हो गया।
गुलाम भारत में साम्राज्यवाद और पूंजीवाद के खिलाफ लड़ाई भारतीय जनता के दो सौ साल के स्वतंत्रता संग्राम की सबसे बड़ी विशेषता रही है।
स्वतंत्रता के बाद भारत अंग्रेजी हुकूमत से आजाद तो हो गया,लेकिन आहिस्ते आहिस्ते अमेरिकी साम्राज्यवाद का उपनिवेश बनता गया। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद यह प्रक्रिया पूरी हो गई।
मैंने बरेली अमर उजाला के दिनों में 1990 में लघु पत्रिका कथानक, संपादक सुरेश कौशिक के लिए अमेरिका से सावधान लिखना शुरू किया था। 1991 में मैं जनसत्ता कोलकाता चला गया और हरीश भदानी संपादित वातायन, सोहन शर्मा संपादित समझ में इस उपन्यास का धारावाहिक प्रकाशन शुरू हुआ।
इसी बीच मेरे पुराने अखबार धनबाद में दो खास मित्र आ गए। Chaturved Arvind अरविंद चतुर्वेद और साहित्य संपादक Shyam Bihari Shyamal , इन दोनों की पहल पर दैनिक आवाज में 1993 से अमेरिका से सावधान धारावाहिक प्रकाशित होता रहा और देश भर की लघु पत्रिकाओं में इसके अंश छपते रहे।
सुधीर विद्यार्थी ने संदर्श का एक पूरा अंक अमेरिका से सावधान पर केंद्रित किया।हिंदी के आम पाठक से लेकर सामाजिक कार्यकर्ता, कवि, लेखक सब उपन्यास के धारावाहिक प्रकाशन के दौरान साम्राज्यवाद के विरुद्ध राष्ट्रव्यापी संवाद में शामिल हुए।
उसके बाद छत्तीस साल हो गए।
हमारे देश में आम जनता का निर्मम दमन की जनसंहार संस्कृति की राजसत्ता अमेरिका और इजराइल के साथ है। देश की स्वतंत्रता और संप्रभुता गिरवी पर है। प्राकृतिक राष्ट्रीय संसाधनों की खुली लूट है।देशभर में बुलडोजर राज है। अरावली से लेकर हिमालय तक को ध्वस्त करने का अभियान तेज है।
इसी के मध्य साम्राज्यवादी अमेरिका ने वेनेजुएला की अकूत तेलसंपदा पर कब्जा कर लिया।
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति मादुरो की गिरफ्तारी के बाद कहा कि यह तेल का मामला है। उन्होंने अमेरिकी कंपनियों को वेनेजुएला भेजकर तेल उत्पादन बढ़ाने और अन्य देशों को बेचने की बात कही। वेनेजुएला के पास विश्व का सबसे बड़ा तेल भंडार है, लेकिन वह केवल एक प्रतिशत ही निकाल पाता है।
खड़ी युद्ध भी तेल युद्ध था।
ट्रंप ने पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि हम बड़ी-बड़ी अमेरिकी तेल कंपनियों को वेनेजुएला भेजेंगे। वे अरबों डालर खर्च करेंगी। वे बुरी तरह क्षतिग्रस्त बुनियादी ढांचे को ठीक करेंगी और देश के लिए मुनाफा कमाना शुरू करेंगी। तेल की खरीद चाहने वाले अन्य देशों की बात करें तो, हम तेल के कारोबार में हैं। हम उन्हें तेल बेचेंगे। हम उन्हें बहुत अधिक मात्रा में तेल बेचेंगे। वेनेजुएला का बुनियादी ढांचा इतना खराब था कि वह पर्याप्त उत्पादन नहीं कर पा रहा था। अब हम अन्य देशों को बड़ी मात्रा में तेल बेचेंगे।
क्या भारत में खनिज और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के लिए कोई अमरीकी राष्ट्रपति भविष्य में ऐसा नहीं कर सकता?
पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल में भारत विरोधी गतिविधियों को अमेरिकी समर्थन को आखिर कब तक नजरअंदाज करेगी भारत सरकार।
भारत सरकार चुप है।
अमेरिकी सेना ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोर्स को 30 मिनट के अंदर गिरफ्तार कर लिया। 'ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व' नामक यह मिशन 2-3 जनवरी की रात को अंजाम दिया गया, जिसमें 150 से अधिक एयरक्राफ्ट शामिल थे।
भारत सरकार चुप है।
चीन बोला- अमेरिका मादुरो को तुरंत रिहा करे:राष्ट्रपति को अगवा करना गलत; उत्तर कोरिया भी वेनेजुएला के समर्थन में, कहा- अमेरिका गुंडागर्दी कर रहा।
रूसी राष्ट्रपति पुतिन और यूरोपीय देश भी विरोध में हैं।
भारतीय अमेरिकी सांसदों ने वेनेजुएला में सैन्य बलों का इस्तेमाल करने के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कदम और उनके इस बयान की कड़ी आलोचना की है कि उस देश को अमेरिका चलाएगा। छह भारतीय अमेरिकी सांसदों (सभी विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी के) ने चेतावनी दी कि इस कार्रवाई में संसद को दरकिनार किया गया है और राष्ट्रपति के अधिकारों की संवैधानिक सीमाओं का अतिक्रमण किया गया है।
भारत सरकार चुप है।
अमेरिका की विदेश नीति जिस तरह से बदलती हुई दिख रही है, उससे कई देशों पर खतरा मंडराने लगा है। अमेरिका का रणनीतिक बदलाव न केवल उसकी भूमिका को नए सिरे से परिभाषित कर रहा है, बल्कि उसके पड़ोसी देशों और दुश्मनों में सुरक्षा और कूटनीतिक चुनौतियों को जन्म दे रहा है।
दुनिया भर में यह सवाल उठने लगा है कि अमेरिका के टार्गेट पर अगला कौन सा देश होगा? ट्रंप का यह कदम केवल वेनेजुएला तक सीमित रहने वाला है, या फिर वो आगे बढ़कर वैश्विक शक्ति विस्तार की रणनीति बन रहा है? ईरान में जिस तरह से प्रदर्शनों को अमेरिका का समर्थन मिल रहा है, उसे लेकर आशंकाएं और गहरा रहा है।
गार्डियन की रिपोर्ट के मुताबिक वेनेजुएला में मादुरो की गिरफ्तारी को कई विश्लेषकों ने अवैध तख्तापलट तक बताया है, क्योंकि यह कार्रवाई बिना स्थानीय कानूनी या अंतरराष्ट्रीय संधियों के बल्कि सैन्य बल के इस्तेमाल से की गई दिखती है।यह कदम केवल ड्रग्स की अवैध तस्करी या अवैध प्रवास को रोकने के बहाने के तहत नहीं, बल्कि व्यापक सैन्य और राजनीतिक दबाव की शुरुआत भी माना जा रहा है।इस कार्रवाई के जरिये अमेरिका ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह किसी भी देश में सैन्य और राजनीतिक बदलाव लाने के लिए सीधे हस्तक्षेप करने से नहीं डरता, ऐसे में यह चिंता करना जायज लगता है कि अगला निशाना कौन हो सकता है?
फिरभी भारत सरकार चुप है।
अमेरिका के ऑपरेशन के बाद फिलहाल वेनेजुएला की सत्ता डेल्सी रॉड्रिगेज के पास है। उपराष्ट्रपति रॉड्रिगेज को देश का कार्यवाहक राष्ट्रपति बनाया गया है। इधर, उनके पद संभालते ही अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चेतावनी जारी कर दी है। ‘द अटलांटिक’ पत्रिका को रविवार को टेलीफोन पर दिए साक्षात्कार में ट्रंप ने कहा कि रोड्रिग्ज अगर लातिन अमेरिकी देश के लिए सही काम नहीं करतीं तो उन्हें ‘बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है’।’
फिरभी भारत सरकार चुप है।
Friday, January 2, 2026
बच्चे जितना समझते हैं, बड़े क्यों नहीं समझते?
#बच्चे_जितना_समझते_हैं, #बड़े_क्यों_नहीं_समझते_?
बच्चों से मैं रोज कुछ न कुछ सीखता हूं।
दर्शित सहदेव(बिट्ट),
नायरा,
जिया,
के साथ नव वर्ष की ये पहली तस्वीरें हैं।
#प्रेरणा_अंशु के जनवरी अंक फाइनल करने में वर्ष के पहले दिन देर रात तक रुद्रपुर दफ्तर में बने रहने के कारण बच्चों के साथ #नववर्ष मना नहीं सका।
कोहरा और शीत लहर के कारण स्कूलों में छुट्टी है।
डोडो, शिवन्या, उत्कर्ष, छनछन, श्रेया, निष्कर्ष और सूर्यांश मेरे सबसे अच्छे दोस्त हैं।
#समाजोत्थान_स्कूल और #बसंतीपुर के सारे बच्चे मेरे दोस्त हैं।
आज साथी J.M. Sahdev Sonu इन बच्चों के साथ हमसे मिलने आए। मजा आ गया।
Rekha Sahdev नहीं आई।अरसे से लिख भी नहीं रही है।
बच्चे जितना समझते हैं,बड़े क्यों नहीं समझते?
जीवन में धन संपत्ति, सुंदरता, जवानी, ताकत, स्वास्थ्य, पद प्रतिष्ठा, मान सम्मान, रिश्ते नाते और यह जीवन अस्थाई हैं। लेकिन प्रेम स्नेह अमूल्य, अमर है।
बच्चे जितना #प्रेम_स्नेह को अनुभव करते हैं, बड़े क्यों नहीं करते?
मसलन राह चलते, बाजार या ऑटो में एक दो साल के बच्चे भी हर स्पर्श, हर शब्द की प्रतिक्रिया मीठी मुस्कान के साथ देते हैं।बोल सके या नहीं।
हम आपसी सद्भाव और प्रेम बनाए रखने के पक्ष में है। किसी भी कीमत पर पीढ़ियों के रिश्ते बने रहने चाहिए।
दो पैसे के लिए, दो इंच जमीन के लिए या धर्म, राजनीति के लिए दुश्मन बच्चे नहीं बनाते।
मेरे पिताजी #पुलिनबाबू हमेशा यही कहते थे कि रिश्ते निभाने के लिए सबकुछ दांव पर लग जाए तो कम है।
कल पड़ोस में सड़क के लिए जमीन को लेकर पड़ोसियों में झड़प हो थी ।#डोडो बेचैन हो गया।
घर से चिल्लाया, चुप करो। चुप कोरबे? ना,आमी लाठी निये आसबो?
एकदम पुलिनबाबू की तरह!
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मैं नास्तिक क्यों हूं# Necessity of Atheism#!Genetics Bharat Teertha
হে মোর চিত্ত, Prey for Humanity!
मनुस्मृति नस्ली राजकाज राजनीति में OBC Trump Card और जयभीम कामरेड
Gorkhaland again?আত্মঘাতী বাঙালি আবার বিভাজন বিপর্যয়ের মুখোমুখি!
हिंदुत्व की राजनीति का मुकाबला हिंदुत्व की राजनीति से नहीं किया जा सकता।
In conversation with Palash Biswas
Palash Biswas On Unique Identity No1.mpg
Save the Universities!
RSS might replace Gandhi with Ambedkar on currency notes!
जैसे जर्मनी में सिर्फ हिटलर को बोलने की आजादी थी,आज सिर्फ मंकी बातों की आजादी है।
#BEEFGATEঅন্ধকার বৃত্তান্তঃ হত্যার রাজনীতি
अलविदा पत्रकारिता,अब कोई प्रतिक्रिया नहीं! पलाश विश्वास
ভালোবাসার মুখ,প্রতিবাদের মুখ মন্দাক্রান্তার পাশে আছি,যে মেয়েটি আজও লিখতে পারছেঃ আমাক ধর্ষণ করবে?
Palash Biswas on BAMCEF UNIFICATION!
THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS ON NEPALI SENTIMENT, GORKHALAND, KUMAON AND GARHWAL ETC.and BAMCEF UNIFICATION!
Published on Mar 19, 2013
The Himalayan Voice
Cambridge, Massachusetts
United States of America
BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE 7
Published on 10 Mar 2013
ALL INDIA BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE HELD AT Dr.B. R. AMBEDKAR BHAVAN,DADAR,MUMBAI ON 2ND AND 3RD MARCH 2013. Mr.PALASH BISWAS (JOURNALIST -KOLKATA) DELIVERING HER SPEECH.
http://www.youtube.com/watch?v=oLL-n6MrcoM
http://youtu.be/oLL-n6MrcoM
Download Bengali Fonts to read Bengali
Imminent Massive earthquake in the Himalayas
Palash Biswas on Citizenship Amendment Act
Mr. PALASH BISWAS DELIVERING SPEECH AT BAMCEF PROGRAM AT NAGPUR ON 17 & 18 SEPTEMBER 2003
Sub:- CITIZENSHIP AMENDMENT ACT 2003
http://youtu.be/zGDfsLzxTXo
Tweet Please
THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS BLASTS INDIANS THAT CLAIM BUDDHA WAS BORN IN INDIA
THE HIMALAYAN TALK: INDIAN GOVERNMENT FOOD SECURITY PROGRAM RISKIER
http://youtu.be/NrcmNEjaN8c
The government of India has announced food security program ahead of elections in 2014. We discussed the issue with Palash Biswas in Kolkata today.
http://youtu.be/NrcmNEjaN8c
Ahead of Elections, India's Cabinet Approves Food Security Program
______________________________________________________
By JIM YARDLEY
http://india.blogs.nytimes.com/2013/07/04/indias-cabinet-passes-food-security-law/
THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS TALKS AGAINST CASTEIST HEGEMONY IN SOUTH ASIA
THE HIMALAYAN VOICE: PALASH BISWAS DISCUSSES RAM MANDIR
Published on 10 Apr 2013
Palash Biswas spoke to us from Kolkota and shared his views on Visho Hindu Parashid's programme from tomorrow ( April 11, 2013) to build Ram Mandir in disputed Ayodhya.
http://www.youtube.com/watch?v=77cZuBunAGk
THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS LASHES OUT KATHMANDU INT'L 'MULVASI' CONFERENCE
अहिले भर्खर कोलकता भारतमा हामीले पलाश विश्वाससंग काठमाडौँमा आज भै रहेको अन्तर्राष्ट्रिय मूलवासी सम्मेलनको बारेमा कुराकानी गर्यौ । उहाले भन्नु भयो सो सम्मेलन 'नेपालको आदिवासी जनजातिहरुको आन्दोलनलाई कम्जोर बनाउने षडयन्त्र हो।'
http://youtu.be/j8GXlmSBbbk
THE HIMALAYAN DISASTER: TRANSNATIONAL DISASTER MANAGEMENT MECHANISM A MUST
We talked with Palash Biswas, an editor for Indian Express in Kolkata today also. He urged that there must a transnational disaster management mechanism to avert such scale disaster in the Himalayas.
http://youtu.be/7IzWUpRECJM
THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS CRITICAL OF BAMCEF LEADERSHIP
[Palash Biswas, one of the BAMCEF leaders and editors for Indian Express spoke to us from Kolkata today and criticized BAMCEF leadership in New Delhi, which according to him, is messing up with Nepalese indigenous peoples also.
He also flayed MP Jay Narayan Prasad Nishad, who recently offered a Puja in his New Delhi home for Narendra Modi's victory in 2014.]
THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS CRITICIZES GOVT FOR WORLD`S BIGGEST BLACK OUT
THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS CRITICIZES GOVT FOR WORLD`S BIGGEST BLACK OUT
THE HIMALAYAN TALK: PALSH BISWAS FLAYS SOUTH ASIAN GOVERNM
Palash Biswas, lashed out those 1% people in the government in New Delhi for failure of delivery and creating hosts of problems everywhere in South Asia.
http://youtu.be/lD2_V7CB2Is
THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS LASHES OUT KATHMANDU INT'L 'MULVASI' CONFERENCE
अहिले भर्खर कोलकता भारतमा हामीले पलाश विश्वाससंग काठमाडौँमा आज भै रहेको अन्तर्राष्ट्रिय मूलवासी सम्मेलनको बारेमा कुराकानी गर्यौ । उहाले भन्नु भयो सो सम्मेलन 'नेपालको आदिवासी जनजातिहरुको आन्दोलनलाई कम्जोर बनाउने षडयन्त्र हो।'
http://youtu.be/j8GXlmSBbbk





























