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Wednesday, October 14, 2026

डेटलाइन कोलकाता सात

कभी कभी इच्छा होती है की कुछ सृजनात्मक लिखूं। लेकिन हिम्मत नहीं होती। 1973 से 2003 तक लगभग हर विधा में लिखा। तीस साल का सृजनात्मक लेखन कम नहीं हैं। सैकड़ों कविताएं प्रकाशित हुईं। इनमें काम से काम सौ लम्बी कविताएं हैं।लेकिन मेरा कोई कविता संग्रह नहीं है। कहानियां 50 से ज्यादा छपी। दो कहानी संग्रह भी आए। मेरे लिखे की हिंदी में कोई चर्चा कभी नहीं हुई। नए संग्रह का इसलिए भी कोई औचित्य नहीं है।वैसे मैंने जो भी लिखा, कहीं सहेजा नहीं। न अब सहेजने की कोई जरूरत है। 2003 से में विशुद्ध सामाजिक कार्यकर्ता हूं। प्रेरणा अंशु से जुड़ने के बाद 2018 से साहित्य और साहित्यकारों से नए सिरे से संबंध बन रहे हैं। लेकिन सृजनात्मक लेखन करीब दो दशक बाद नए सिरे से शुरू करने की कोई वजह नजर नहीं आती। 2003 से लगातार हिंदी,बांग्ला और अंग्रेजी में जरूरी मुद्दों पर हस्तक्षेप करने की दिनचर्या बन गई थी। कोलकाता छोड़ने के बाद अंग्रेजी और बांग्ला में लेखन छूट गया है। अब विशुद्ध हिंदी का लेखक हूं। 2023 में मेरे निरंतर हिंदी में लिखने के 50 साल पूरे हो जाएंगे। इतनी लंबी अवधि से किसी भाषा में निरंतर लेखन के बावजूद मुझे लेखकों में गिना नहीं जाता। लिखने के लिए कभी व्यवस्थित होने की नहीं सोची। जब तक नौकरी थी, दाल रोटी चल जाती थी। अब सोचता हूं कि छीजती हुई बचत को देखते हुए दो चार साल और जिंदा रह गए तो रीढ़ की हड्डी सही सलामत रहेगी या नहीं। पिछले दिनों मामूली सर्दी के इलाज में इतना खर्च हो गया कि अब डर भी लगता है कि सामाजिक असुरक्षा के इस घनघोर संकट में गंभीर रूप में बीमार पड़ गए तो क्या होगा। फिर संपादन का का काम पूर्णकालिक है। इसमें सृजनात्मक लेखन की गुंजाइश नहीं बचती। इधर उधर लिखने के अवसर भी काम हैं। विडंबना यही है कि पूरे 50 साल के निरंतर लेखन के बावजूद मैं हिंदी का लेखक नहीं हूं। यही नियति और कर्मफल के सिद्धांत का सामाजिक सच है।इसलिए हाशिए के हर हस्ताक्षर को सामने लाना अब मेरा एक मात्र काम और उत्तरदायित्व है। जिस अस्पृश्यता और बहिष्कार के दंश मैने पूरे पांच दशक तक झेले,उनसे मुक्त होकर कुछ नए लोग लिखें तो अपनी जिंदगी सार्थक मानूंगा। पलाश विश्वास 09.12.2022

डेटलाइन कोलकाता छह

इसे कहते हैं ज़िंदा दफनाना पलाश विश्वास आज फिर कोलकाता से गुरुजी जयनारायण का फोन आया। कोलकाता जनसत्ता में सिर्फ मार्केटिंग विभाग है। दो इंजीनियर हैं। बिल्डिंग है,सम्पादकीय नहीं है।प्रेस लखनऊ चला गया।दिल्ली से पीडीएफ आता है। कोलकाता महानगर ने हिंदी,बांग्ला,ओड़िया, उर्दू, गुरमुखी और उर्दू,किसी भी भाषा के अखबार में किसी की स्थायी नौकरी नहीं है।सभी पत्रकार संविदा पर है। योग्य,प्रशिक्षित और पढ़े लिखे पत्रकारों में कोलकाता में दिहाड़ी मजदूरी तो क्या बीस रुपये का भी काम नहीं है। जिंदगीभर किसी और पेशा या नौकरी की कोशिश न करके 5 दशक पत्रकारिता को मिशन मानकर सबकुछ दांव पर लगाकर सबकुछ हारने के बावजूद अपने फैसले पर कभी अफसोस नहीं रहा। जनसत्ता में या किसी भी अखबार में डेस्क पर काम करने वाले दिहाड़ी मजदूर से बुरी हालत में होते हैं। सम्पादक ऐसे लोग बनाये जाते हैंजिन्होने एक दिन भी अखबार नहीं निकला। उपसम्पादक के लिए आईएएस जैसी परीक्षा,लेकिन तमाम बड़े पदों के लिए बिना परीक्षा,बिना अनुभव वर्चस्ववादी तबके के खास जाति के लोग सीधे सम्पादक बना दिये जाते हैं। यही जीवन के हर क्षेत्र का किस्सा है। मीडिया में बचे हुए साथियों की इस दुर्गति और आदरणीय प्रभाष जोशी के अखबार जनसत्ता की इस दशा पर बहुत दुखी हूं। ओम थानवी ने हमारी कभी सुनी नहीं। लेकिन उनके जमाने में भी यह हाल नहीं हुआ। जाति, वर्ण और नस्ल देखकर सम्पादक चुनने की परंपरा ने जनसत्ता जैसी संस्था, नई दुनिया जैसे अखबार और पूरी हिंदी पत्रकारिता का बेड़ा गर्क कर दिया। कोलकाता में जिस तरीके से मुझे मेरी औकात में रखने की तिकड़में भिड़ाई गई और हार न मानते हुए प्रभाष जी से और बाकी सम्पादकों और मैनेजरों से लड़ते भिड़ते हुए हम जनपक्षधर पत्रकारिता का विकल्प बनाने की कोशिश करते रहे, उसकी कथा कम रोमांचक और कम दुःखद नहीं है। हमने कभी किसीको बख्शा भी नहीं है। इंडिया इंटरनेशनल सेंटर दिल्ली हो या हंस का पन्ना या कोलकाता,हम पिछले बीस साल से हिंदी समाज से अपनी गौरवशाली विरासत सहेजने की अपील करते रहे हैं। बांग्ला समाज से तो हम बहिस्कृत थे ही। वहां का कूलित वर्चस्व तो निरंकुश है ही। बदलाव की उम्मीद तो फिर भी गाय पट्टी से ही थी क्योंकि यहां सामाजिक ताकतें और लोक अभी ज़िंदा है।बस,यही पूंजी है,जिसके भरोसे न सिर्फ ज़िंदा हूँ, हाशिये पर होबे के बावजूद सक्रिया हूँ। पत्रकारिता के मिशन और साहित्य का क्या हुआ,कहने की जरूरत नहीं है,लेकिन हमारा मिशन जारी है। मुख्यधारा की पत्रकारिता में जो पेशेवर लोकतंत्र रहा है, उसका असल चेहरा यही है। इसमें काम करना पहले कठिन था,अब असम्भव। इसीलिए हम लोग सत्तर के दशक से वैकल्पिक मीडिया बनाने का प्रयास करते रहे हैं। जनसत्ता में देशभर के जनपक्षधर जुझारू पत्रकारों को बुलाकर उन्हें अच्छे वेतन देकर फ्रिज में डालने की रीति रही है। व न किसी दूसरे अख़बर्बमें लिख सकते थे अपने अखबार में। समझौता दूसरे अखबारों में न लिखने का होता था और अपने अखबार में सिर्फ रिपोर्टर और प्रधान संपादक लिख सकते थे।डेस्क के लोगों से कहा जाता था कि सम्पादक लिख नहीं सकता।डेस्क से रिपोर्टर बनते नहीं। उनकी दक्षता से अखबार चलता,लेकिन उन्हें हर हाल में लिखने का कोई मौका भी नहीं दिया जाता।पहले से बनी उनकी पहचान और हैसियत खत्म कर दी जाती। हम वैकल्पिक मीडिया और ब्लॉगिंग से अब तक जिंदा हैं और हमारी जनपक्षधरता बची हुई है।लेकिन इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी। वेटनबन्द होते ही सामाजिक आर्थिक असुरक्षा के अंधकार के सिवाय कुछ नहीं बचता। आपके शहर और सूबे में पत्रकारों और पत्रकारिता के क्या हाल हैं?सबकुछ ठीक ठाक? अच्छे दिनों की तरह?

डेटलाइन कोलकाता पांच

चालीस साल अखबारों के संपादन में जो बिताए, वे अब बेमायने हो गए। फिर भी वे भी दिन थे कभी। खासकर जनसत्ता के संपादकीय में 25 साल के अनुभव के मद्देनजर मेरा मानना है कि चूंकि साहित्य की विभिन्न विधाओं में रचना करने वाले लोग समाज में सबसे संवेदनशील प्राणी होते हैं और चूंकि सामाजिक यथार्थ,वक्त की चुनौती,दृष्टि,इतिहासबोध और प्रतिबद्धता के बिना कोई रचना रचना नहीं होती,सबसे बेहतर और ईमानदार,संप्रेषणीय रपट और कथा रिपोर्ताज भी वे ही लिख सकते हैं। पुराने जनसत्ता के पन्ने इसके गवाह हैं।इसलिए कभी जनसत्ता इतना प्रमाणिक और लोकप्रिय भी रहा है। आज के साहित्यकार विशुद्ध साहित्यकार क्यों बने रहना चाहते हैं? क्या समाज,समय,इतिहास,भूगोल,लोकतंत्र,मनुष्यता सभ्यता और लोकजीवन,जनता की तकलीफों,बेदखली, शोषण,अत्याचार,उत्पीड़न,हिंसा,घृणा,हत्या, बलात्कार, नरसंहार के इस समय से उनका कोई सरोकार नहीं है? कवि वही है जो मनुष्य है और किसी भी चीख में,किसी की भी पीड़ा में,किसी भी आपदा में,जलप्रलय में भी कविता का जन्म होता है। कथाकार तो भूत भविष्य और वर्तमान का सबसे प्रामाणिक इतिहासकार होता है? इस दुस्समय के चक्रव्यूह से निकलने के लिए रचनात्मकता सबसे जरूरी है। अभिमन्यु इसलिए मारा गया क्योंकि उसकी शिक्षा रचनात्मकता से नहीं जुड़ी थी। रचनात्मकता नहीं होगी तो मनुष्यता बचेगी नहीं, न पृथ्वी बचेगी और न प्रकृति। पृथ्वी और प्रकृति को भी रोज रचना होता है। कवि और कथाकार को सबसे ज्यादा जिम्मेदार होना चाहिए।हर जिम्मेदार मनुष्य को अपने हिस्से का सच कहने के लिए पत्रकारिता भी करनी चाहिए। प्रेरणा अंशु के आगामी अंकों में हमें कवियों और क्थाकारों से रपटों और कथा रिपोर्ताज का इंतजार रहेगा।इससे उनके साहित्यिक छवि मजबूत होगी और प्रमाणिक भी। यह तस्वीर जनसत्ता के संपादकीय विभाग की है। कोलकाता की। जनसत्ता के अलावा दैनिक आवाज, प्रभात खबर, दैनिक जागरण और दैनिक अमर उजाला के संपादकीय में मैने काम किया है। सैकड़ों युवा पत्रकारों को संपादक भी बनाया है। Bhuvendra Tyagi , Vivek Shukla , Alok Verma जैसे हमारे पुराने मित्र गवाह हैं। पलाश विश्वास कार्यकारी संपादक,प्रेरणा अंशु

डेटलाइन कोलकाता चार

#मुक्तबाजार और #ऑटोमेशन ने बदल दी #पत्रकारिता #आरएसएस की ताकत भी मुक्तबजार की #पूंजी है। #Dateline_kolkata कोलकाता में हमने बाहैसियत पेशेवर पत्रकार पूरे सत्ताइस साल बिताए।1991 से 2018 तक। 2016 में जनसत्ता से रिटायर हो जाने के बाद भी महानगर में टिके रहने की कोशिश में दो साल और बीत गए। जैसा कि हमारे अनेक पत्रकार मित्रों के साथ होता है कि रिटायर होने के बाद उनके लिए दूसरे मीडिया संस्थानों या विश्वविद्यालयों में नए अवसर पैदा हो जाते हैं,हमारे साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ। रिटायर होते ही गृहस्थी चलाने लायक आय का कोई स्रोत नहीं बचा। मुक्तबाजार में बाजार के हिसाब से लिखना बंद कर दिया था,इसलिए नई सदी में पत्र पत्रिकाओं में लिखना बंद हो गया।लेकिन सोशल मीडिया के माध्यम से से घटनाक्रम में जरूरी हस्तक्षेप और अपना पक्ष साफ रखने का सिलसिला शुरू से रहा है।जनसत्ता में संपादकीय साथियों का लिखा कम ही छपता है, इसलिए आवाज, जागरण और अमर उजाला की तरह अपने अखबार में नियमित लिखना पहले ही बंद था। फिर कॉर्पोरेट राज के खिलाफ 1991 से नियमित लिखते रहने के कारण काली सूची में आ गया था। जाहिर है कि नौकरी से रिटायर होने के बाद पत्रकारिता से घर नहीं चल सकता था और प्रकाशकों से संबंध न होने से अनुवाद से भी आय की संभावना कम थी। इससे घर लौटने का फैसला करना आसान हो गया। 1973 में दैनिक पर्वतीय से लिखना शुरू किया था जीआइसी नैनीताल में दाखिले के साथ ही। 1978 में नैनीताल समाचार से नियमित लेखन शुरू हो गया।इस हिसाब से पत्रकारिता में 53 साल जिंदगी के बीत गए। सत्तर के दशक में जब लिखना शुरू किया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया दूरदर्शन और आकाशवाणी तक सीमित थी,जो सरकारी थी।प्रिंट मीडिया ही एकमात्र स्वतंत्र मीडिया थी। उस दौर में पत्रकारिता में ज्यादातर लोग वामपंथी थे।वामपंथी न भी हो प्रगतिशील जरूर थे। बड़ी संख्या में गांधीवादी और समाजवादी पत्रकार थे। जनता पार्टी की सरकार में लाल कृष्ण आडवाणी के सूचना प्रसारण मंत्री बनने के बाद दक्षिणपंथियों की आवक शुरू हुई। चूंकि पत्रकारिता में दलित,पिछड़े आदिवासी अब भी कम हैं और उनमें भी अम्बेडकरवादी नहीं के बराबर है,पत्रकारिता में बहुजन विचारधारा का कोई असर नहीं था। पिछली सदी के अंत तक पत्रकारिता पर दक्षिणपंथ का असर बहुत कम था। जबकि आरएसएस से जुड़े हुए पत्रकार बहुत बड़े और निर्णायक पदों पर तब भी विराजमान थे। दरअसल सही मायने में बाजार की पत्रकारिता शुरू होने के बाद हिंदुत्व के कारपोरेट एजेंडे के साथ अखबारों का कायाकल्प दक्षिणपंथी वर्चस्व के साथ शुरू हो गया। अनेक वामपंथी, गांधीवादी और समाजवादी पत्रकारों का भी कायाकल्प हो गया और मेरे ख्याल से इस परिवर्तन का श्रेय आरएसएस को नहीं देना चाहिए। हिंदुत्व भी मुक्तबजार का एजेंडा है और आस्था मार्केटिंग का सबसे बड़ा माध्यम है। कोलकाता को प्रगतिशील और वामपंथी लेखकों,कवियों, कलाकारों, रंगकर्मियों,चित्रकारों,फिल्मकारों और पत्रकारों का गढ़ माना जाता रहा है। उनका कायाकल्प क्या आरएसएस ने किया।जब कोलकाता में दक्षिणपंथ का कोई असर नहीं था,उन्हीं दिनों मेरे कोलकाता प्रवास के 27 सालों में उनमें से ज्यादातर का दक्षिणपंथी कायाकल्प हो गया। ये ही लोग बाद में आरएसएस से जुड़ गए जबकि आरएसएस ने उन्हें नहीं जोड़ा। एक्सप्रेस समूह में भी आरएसएस से जुड़े लोग बड़े पदों पर थे। यहां तक कि ज्यादातर अखबार मालिक संघी थे।लेकिन अखबार के मामले में वे पेशेवर थे।जैसे वामपंथी पत्रकारों ने कभी पार्टीलाइन पर पत्रकारिता नहीं की और न समाजवादियों ने,न गांधीवादियों ने।खासकर समाचारों के मामले में तटस्थता बनी हुई थी 1991 तक। जनसत्ता के ब्यूरो प्रमुख थे रामबहादुर राय,जो सीधे आरएसएस से जुड़े थे, लेकिन उनकी संघी विचारधारा के मुताबिक अखबार नहीं चलता था। बाद में भाजपा सरकार में विनिवेश मंत्री बने अरुण शौरी इंडियन एक्सप्रेस के कार्यकारी संपादक थे। लेकिन खबरों के ब्रेक करने का सिलसिला जारी रखने में उनकी बड़ी भूमिका थी। तकनीक और ऑटोमेशन से पत्रकारिता रेडीमेड और प्रायोजित हो गई।बाजार के हिसाब से लिखा छापा जाने लगा तो वामपंथी हो या गांधीवादी या समाजवादी या दक्षिणपंथी पेशेवर पत्रकार संपादक की जरूरत ही खत्म हो गई।योग्य और समर्थ लोगों की जरूरत खत्म हो गई। तकनीक और ऑटोमेशन से प्रायोजित रेडीमेड अखबार अपने आप छप जाते हैं। चेहरा सुंदर,हैंडसम व्यक्तित्व,अच्छी आवाज हो जाए तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को भी पेशेवर पत्रकार नहीं चाहिए। चूंकि पेशेवर पत्रकार की जनप्रतिबद्धता उसकी पार्टी लाइन से हमेशा बड़ी होती है। कोलकाता डेटलाइन का एडवांटेज बहुत बड़ा है। सबस बड़ा ऑडियंस, फिर दुनियाभर की नजर, फिर एक्सप्रेस समूह के संपादकीय में नौकरी। देश दुनिया को जानने समझने के मौके खूब मिले। सत्ता से मुठभेड़ भी हुई। कोलकाता में ही पेशेवर पत्रकारिता के बदले बाजार की पत्रकारिता का उत्थान देखा। आरएसएस का उत्थान भी इसी बाजार के सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान उत्कृष्ट के साथ हुआ। बाजार ही अब आस्था का पर्याय है। अब तक पत्रकारिता के अनुभवों पर बहुत कम लिखा है। मेरी किताब छपती भी है तो कहीं पहुंचती नहीं है और न अब मेरे लिए किताब लिखना संभव है। अब सोच रहा हूं कि कम से कम फेसबुक पर अपने कुछ अनुभव साझा करने चाहिए। आपकी क्या राय है

डेटलाइन कोलकाता तीन

तीन राष्ट्रवाद, देशभक्ति, धर्म, आस्था सबकुछ उसके लिए नस्ली घृणा, हिंसा और नरसंहार का हथियार है।वैचारिक, बौद्धिक पाखंड और कर्मकांड, महिमामंडन जो भी हो रंगभेद, लिंगभेद और पितृसत्ता में ही उसकी जड़ें हैं। नस्ली वर्चस्व की व्यवस्था बने रहने से जिन तबकों को विषमता, अन्याय और उत्पीड़न में अवसर,समृद्धि, वैभव और आनुवंशिकी लाभ होता है, उनके हितधारक सारे लोग उसके समर्थक हैं।चाहे वे कुछ भी बोले, कुछ भी लिखें, किसी भी रंग में दिखे। हमने जनसत्ता कोलकाता के लिए समयसीमा के भीतर आवेदन नहीं किया था। उन दिनों कारसेवा चल रही थी।अनेक अखबार मालिक तब कारसेवक हो गए थे। जिनकी कारसेवा अब इतिहास, मनुष्यता और सभ्यता की इमारतों को, लोकतंत्र,विविधता और बहुलता के विध्वंस के लिए उस समय की तुलना में अब और तेज है। ऐसे ही एक कारसेवक से लड़ाई हो गई थी,जब उन्होंने मेरे बनाए पहले पन्ने को उखाड़ फेंका और उन्माद के तीन तीन बैनर लगा दिए। मैंने उसी वक्त ऐलान कर दिया कि आपकी नौकरी नहीं करनी। पूरे छत्तीस साल हमने हर रात अखबार का संस्करण निकाला है। हर रात खबरों की प्राथमिकता मैं तय करता था। मेरे लिए आगे उस अखबार में कारसेवकों के साथ काम करना असंभव था।लिहाजा जनसत्ता के प्रधान संपादक प्रभाष जोशी जी को मैंने एक निजी पत्र लिखकर जनसत्ता कोलकाता के लिए आवेदन करते हुए लिखा कि मुझे हिसाब बराबर करने के लिए कोलकाता जाना है। इसी एक वाक्य पर जोशी जी ने मुझे अपनी टीम में शामिल कर लिया। विडंबना यह है कि 2014 से पहले जनसत्ता भी कारसेवकों के हवाले हो गया। शुरू से ही सती प्रथा, कर्मकांड और जाति नस्ल वर्चस्व के समर्थक तत्व जनसत्ता में थे। 19977 में एक कारसेवक के सूचना प्रसारण मंत्री बनने के बाद से अखबारों में कारसेवकों की भर्ती तेज हो गई थी। जो अंदरखाने चड्डी थे। वे 2014 से काफी पहले 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार के जमाने से चड्डी को सार्वजनिक करने की जद्दोजहद में थे।मुक्तबाजार में बाजार के लिए कला,साहित्य, पत्रकारिता की आधुनिकता और तकनीक के लिए वे सभी चड्डी पहनकर अवतरित हो गए। अब वे सर्वव्यापी हैं। लेकिन अब भी वे न सर्वज्ञानी हैं और न सर्वशक्तिमान।उनका तिलिस्म जादुई है। जादू का खेल खत्म हुआ तो मिथक टूटेंगे और तिलिस्म भी टूटेगा। जो हिसाब हजारों साल से बराबर नहीं हो सका, उसे बराबर करने के लिए लिखता हूं, लिखता रहूंगा,लिखता बोलता रहा है। क्योंकि इस मुनाफे के इंतजाम में मेरा कोई दांव नहीं है। हम उस तबके से हैं जो नस्ली नरसंहार के शिकार हैं और नरसंहार संस्कृति इनकी अस्मिता है। हजारों साल से हमारे पुरखे पीढ़ी दर पीढ़ी बराबरी की इस लड़ाई में खेत हुए।हमारा जन्म उसी खेत में हुआ। हम खुद खेत हो गए तो क्या हिसाब बराबर की लड़ाई जेन जी या जेन अल्फ़ा या जेन बीटा या फिर हजारों साल बाद कोई पीढ़ी जरूर जीतेगी। इसीलिए समता और न्याय पर आधारित समाज के निर्माण के लिए लिखना,पढ़ना,बोलना और कला,साहित्य और पत्रकारिता जरूरी है। इस लड़ाई को हर विधा और माध्यम में जारी रखने के लिए। चूंकि हम अब भी जिंदा हैं तो हिसाब बराबर करने की लड़ाई हमारे स्तर पर जारी जरूर रहेगी,चाहे उसकी कीमत जो हो।ई

डेटलाइन कोलकाता दो

दो समाज और पत्रकारिता चूंकि मेरा जन्म हाशिए के समाज में हुआ,इसलिए समाज की मेरी अवधारणा में हाशिए के तमाम सामाजिक आर्थिक समूह और समुदाय हैं।यह अवधारणा बनने में पूरी जिंदगी खप गई। पिताजी कम्युनिस्ट थे,तेभागा के लड़ाके थे पिता और पुरखे तमाम आदिवासी किसान विद्रोह के बागी, इसलिए आजादी की जिद और जज्बा मेरे खून में है।इसलिए जाने अनजाने पत्रकारिता ही मेरी जिंदगी बन गई। अपनी व्यवहारिक और वैचारिक भावभूमि, सामाजिक पृष्ठभूमि, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और जीवनदृष्टि के कारण पत्रकारिता का कोई विकल्प नहीं था मेरे लिए। आज भी नहीं है तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद क्योंकि समाज की मेरी अवधारणा और पत्रकारिता आहिस्ते आहिस्ते कब एक दूसरे के पर्याय बन गए, मुझे नहीं मालूम। बार बार पत्रकारिता के मौजूदा हालात, मालिक प्रबंधन और संपादकों के रवैये से पत्रकारिता से मोहभंग जरूर होता रहा,लेकिन मैने अंततः मैदान नहीं छोड़। यह आजादी का जज्बा है और जिद है। मेरे पिताजी कहते थे कि हम हाशिए के लोग हैं।हमारे लोगों की अनकही कथा, अनसुनी आवाज हम नहीं बुलंद करेंगे,तो कौन करेगा।वे बाबा साहब भीमराव अंबेडकर के विचार,संघर्ष और जीवन का हवाला देते थे। लेकिन पिताजी की मौत से पहले मैंने कम्युनिस्टों के असर में आंबेडकर को नहीं पढ़ा,जिनके संपर्क में स्कूल के जमाने से मैं था।चूंकि पिताजी कम्युनिस्ट थे,आंदोलनकारी थे और तराई शुरू से कम्युनिस्टों और आंदोलन के केंद्र में थी। चूंकि वसंत का वज्रनिनाद हो चुका था।चूंकि हम भी क्रांति का सपना देखते थे और वर्ग संघर्ष में हमारी आस्था थी।भारतीय समाज, जाति व्यवस्था और तत्संबंधी जटिलताओं को हमने वामपंथियों की तरह सिरे से नजरअंदाज किया। इसीलिए समाज की मुकम्मल अवधारणा बनने में पूरी जिंदगी खप गई और जाति उन्मूलन की चुनौती, न्याय और समता की लड़ाई क्रमशः कठिन होती गई। पूंजीवादी समाज के भी अपने लोकतांत्रिक मूल्य थे,आदर्श थे और पूंजी का विकास श्रम के बिना असंभव था,लेकिन मुक्तबाजार के साम्राज्यवाद ने शर्म और मनुष्य के साथ समाज को भी ध्वस्त कर दिया।लोकतंत्र के साथ साथ समाज, मनुष्यता,सभ्यता, प्रकृति और पर्यावरण, इतिहास, विचारधारा, ज्ञान विज्ञान को तिलांजलि दे दी। पत्रकारिता भी गोदी मीडिया में तब्दील होकर निरंकुश शतक की गुलाम और जनता और समाज के विरुद्ध हो गई। पिताजी कहते थे कि सड़क पर उतरने से संसाधन अपने आप तैयार हो जाते हैं।पुनर्वास की लड़ाई में आधी सदी उनकी जिंदगी की धोती और कुर्ते में बीत गई।अपनों के लिए कभी कुछ नहीं जोड़ा। कभी हिसाब नहीं किया लाभ,नुकसान और अवसर का।जिंदगी भर नंगे बड़ा,भूखों प्यासे सरहद के आर पर पीड़ितों के हक में दौड़ते रहे।कैंसर ने उनकी रीढ़ में घोसला बना लिया और आखिरकार उनकी जान ले ली। इस विरासत की जमीन से मुझे जिंदगी से क्या लेना था जबकि हजारों साल से हमारे पुरखे लड़ते ही रहे और लड़ते लड़ते खेत हो गए।बिना कुछ हासिल किए। फिर मेरी महत्वाकांक्षा क्या हो सकती थी? करिअर क्या हो सकता था? पिताजी कहते थे हाशिए की लड़ाई की जिम्मेदारी हमारी है और हम इसे किसी और के भरोसे टाल नहीं सकते।बेहतर जिंदगी के लिए भी नहीं। इस लड़ाई के लिए अंबेडकर जैसी योग्यता होनी चाहिए। यह योग्यता अर्जित करनी होगी। हाईस्कूल चूंकि दिनेशपुरबके जिला परिषद स्कूल से प्रथम श्रेणी में पास किया तो नैनीताल के जीआईसी में दाखिला हो गया।जहां हमें ताराचंद्र त्रिपाठी जैसे गुरुजी मिले।जो कहते थे कि जनभाषा में ही जनता से संवाद संभव है,लेकिन सत्ता से टकराना है तो अंग्रेजी सीखनी होगी।सभी विधाओं,माध्यमों और विषयों का ज्ञान हासिल करना होगा।क्रमबद्ध विधिबद्ध अध्ययन करना होगा। कदम कदम पर सीखना होगा।समाज और जनता से जुड़े रहना होगा। हमने आज तक कदम दर कदम उनके दिशा निर्देशों के पालन करने की कोशिश की है। उत्तराखंड में तब भी शक्ति,अल्मोड़ा अखबार और समता की विरासत जिंदा थी।चिपको आंदोलन की विरासत के साथ नैनीताल समाचार का प्रकाशन शुरू हुआ, मेरी पत्रकारिता का प्रस्थानबिंदु यही है, जो पुनः हिमालय है जो स्वयं दलित और अस्पृश्य है यह अस्पृश्य देश और समाज,इतिहास और भूगोल का सबसे बड़ा सच है।साहित्य,कला और पत्रकारिता का भी। पत्रकारिता में मेरे मिजाज,तेवर और पक्ष, मालिक प्रबंधन और संपादकों से टकराव को देखते हुए मुझे जिद्दी, बदमिजाज और बदतमीज़ बागी कहा जाता रहा। क्योंकि मेरे लिए समाज और समाजिक यथार्थ के साथ साथ पत्रकारिता की जड़ें भी हाशिए के समाज में थीं, लेकिन हाशिए के लिए,आम लोगों के लिए मीडिया में कितनी जगह होती है? एक एक मिमी जगह के लिए खूंखार लड़ाई लड़ने की नौबत आती रही और मैं निरंतर लहूलुहान होता रहा,लेकिन हार कभी नहीं मानी और हर कीमत पर रीढ़ सीधी रखी। मेरे लिए समाज और पत्रकारिता का मायने कुल मिलाकर यही है। साहित्य, कला और मीडिया में हाशिए के लोग कितने हैं? जो हैं उनकी हैसियत क्या हैं? इस वर्चस्ववादी व्यवस्था से टकराना सत्ता और व्यवस्था के ख़िलाफ़ खड़े होने की अनिवार्य शर्त है। लेकिन मुक्त बाजार ने देश,नागरिकता,इतिहास, भूगोल,समाज और परिवार को भी सिरे से बदल दिया।बदला ही नहीं, मिटा दिया। 1991 में जनसत्ता के संपादकीय में दाखिल होते न होते साहित्य,कला, विधाएं, माध्यम, राष्ट्र व्यवस्था, धर्म,आस्था, प्रेम,भाईचारा, समान चैन सबकुछ बाजार के नाम स्वाहा हो गया।कॉर्पोरेट प्रायोजित हिंसा और घृणा का दौर शुरू हो गया।असामाजिक तत्व राजनीति,सत्ता, अर्थव्यवस्था में काबिज हो गए।मनुष्य, उसका समाज, उसका देश,उसका जीवन सबकुछ बाजार के हवाले होती गई।पूंजी के वर्चस्व के जमाने में भी साहित्य,कला और पत्रकारिता के साथ पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था के केंद्र में मनुष्य था, इस मनुष्यता में कम से कम समाज और हाशिए के समाज का एक चेहरा भी था, जो सिरे से गायब है।उस चेहरे की वापसी आज बड़ी चुनौती है। जड़ों से कटी, मनुष्य और समाज से बेपरवाह और हाशिए के प्रति संवेदनाशून्य बाजार और सत्ता को समर्पित पत्रकारिता आज मीडिया है, जिसका न कोई चेहरा है और न कोई रीढ़। यह आज का कटु सामाजिक यथार्थ है। समाप्त पलाश विश्वास कार्यकारी संपादक प्रेरणा अंशु, दिनेशपुर, उत्तराखंड 06398418084

डेटलाइन कोलकाता एक

जन्मजात पत्रकार हूं क्योंकि पत्रकारिता समाज के लिए होती है पलाश विश्वास मैं जन्मजात पत्रकार हूं।भारत विभाजन के शिकार पूर्वी बंगाल के एक दलित शरणार्थी परिवार में जब मेरा जन्म हुआ,तो अपने ही देश में रातोंरात शरणार्थी बन गए उखड़े हुए लोग नई जड़ों की तलाश में जीवन मरण की लड़ाई लड़ रहे थे। अपनी नागरिकता, जल जंगल जमीन और नागरिकता से वंचित लोग अपनी मातृभाषा से भी बेदखल हो गए थे।जन्म से ही मैने अपने पिता से सुना हमारी लड़ाई जीतने के लिए मातृभाषा समेत सभी भाषाओं पर दखल होना जरूरी है। मेरे पिता कक्षा दो तक ही पढ़ सके थे। हमारे अधिकांश लोग या तो अपढ़ थे या अधपढ़।मैट्रिक पास कोई नहीं था। तब हिमालय की तलहटी में उत्तराखंड की तराई के घने जंगल में बाघों का चारा बनाकर हमारे लोगों को दलदल के मध्य फेंका गया था।पुनर्वास की लड़ाई विभाजन की त्रासदी और आजादी के लिए स्वतन्त्रता संग्राम से बड़ी थी।हमारे लोग इतिहास भूगोल से बेदखल थे।उनकी कथा,आपबीती कहीं दर्ज नहीं हुई। उनके अपने अस्तित्व,अस्मिता के दस्तावेज तैयार करने थे।मेरे जन्म से पहले यह मेरी जिम्मेदारी हो गई।क्योंकि सिर्फ तराई में ही नहीं, देशभर में मेरे पितापुलिनबाबू पुनर्वास की लड़ाई का नेतृत्व कर रहे थे।उन्हें हिंदी आती नहीं थी।अक्षर पहचानने के साथ ही मुझे उनकी चिट्ठी पत्री, देश के सभी नेताओं,भारत सरकार, राज्य सरकारों,,प्रशासन को लिखे जाने वाले ज्ञापन लिखने थे।वह विस्थापितों का ही नहीं किसान आंदोलन का दौर था। मेरे जन्म के दो साल बाद 1958 में ढिमरी ब्लॉक किसान विद्रोह के भी वे नेता थे।छात्र जीवन में अंग्रेजी माध्यम से पढ़ते हुए भी चिपको आंदोलन के दौरान मुझे हिंदी में पत्रकारिता करनी पड़ी। 1980 में धनबाद के दैनिक आवाज से पेशेवर पत्रकारिता शुरू की तो झारखंड आंदोलन, आदिवासी दुनिया और कोयला खानों पर लिखना पड़ा। दैनिक प्रभात खबर,दैनिक जागरण, दैनिक अमर उजाला होकर 1991 से 2016 तक दैनिक जनसत्ता में पेशेवर अखबार हर रात निकालते हुए हमने हमेशा एक सामाजिक कार्यकर्ता की तरह हर खबर पर स्टैंड लिया,हर खबर के लिए लड़ा और लिखा। रिटायर होने के बाद भी आज तक अपने शरणार्थी उपनिवेश से लगातार चालीस साल से निकल रही प्रेरणा अंशु में भी मेरी जन्मजात पत्रकारिता जारी है। पिताजी जन आंदोलनों के नेता थे। मुकदमे और कचहरी की लड़ाई भी जरूरी थी। इसलिए वकीलों और पत्रकारों से वे प्रभावित थे।शरणार्थियों के आंदोलन के दौरान 1956 में पीटीआई और पायनियर अखबार के बरेली संवाददाता एनएम मुखर्जी से उनकी अंतरंगता थी। इसलिए रोज मुझे हिंदी,बांग्ला,अंग्रेजी के अखबारों के संपादकीय जरूर पढ़ने होते थे। रवींद्र,नजरुल,सत्येंद्र नाथ दत्त,सुकांत की कविताएं स्वर रोज आवृत्ति करनी होती थी।हिंदी अंग्रेजी बांग्ला साहित्य पढ़ना हमारे लिए अनिवार्य था। मराठी,पंजाबी और असमिया अखबार जब मिल जाते थे,उन्हें भी पढ़ना था।ताकि अपने हाशिए के लोगों की लड़ाई के लिए भाषाओं पर मेरा दखल हो। ताकि विस्थापितों और किसानों की आवाज बुलंद हो और उनकी सुनवाई हो,उन्हें उनका हक मिले। पिताजी की 2001 में मृत्यु के बाद उनकी लड़ाई मेरी जिम्मेदारी बन गई और मैं सामाजिक कार्यकर्ता बन गया। दरअसल मैं लिखते पढ़ते हुए होश संभालने के बाद आज तक एक सामाजिक कार्यकर्ता ही हूं। सत्तर पार हूं,इसलिए साहित्य कला और पत्रकारिता को हमने हमेशा समाज में सामाजिक प्राणी की रचनात्मक सामाजिकता के रूप में ही देखा। आज के पत्रकारों की तरह हमारे पास पत्रकारिता की कोई डिग्री नहीं है। पेशेवर पत्रकारिता ने हालांकि तकनीक सीखा दी। जिंदगी हिंदी में बीता दी, लेकिन पढ़ाई मेरी अंग्रेजी साहित्य और भाषा की हुई।सिर्फ एक पोस्ट ग्रेजुएट डिग्री अंग्रेजी भाषा और साहित्य की है। सामाजिक गतिविधियों के कारण डिग्रियां बटोरने की मुझे फुर्सत नहीं मिली।लेकिन विभिन्न विषयों में अध्ययन जरूर किया है। शोध किए हैं लेकिन पी एच दी या एम फिल नहीं किया। वैचारिक रूप में हमेशा सत्ता और व्यवस्था के विरोध में खड़ा रहा,क्योंकि समाज और समय की चुनौतियों से निबटने के लिए इसके सिवाय कोई दूसरा रास्ता मुझे नहीं दिखा। एक विषय है,जिसमें मैने कुछ नहीं पढ़ा। वह है पत्रकारिता।वैसे भी जनता का आदमी होने के कारण विमर्श से मेरा कभी लेना देना नहीं है। मैने पत्रकारिता अपने समय, समाज से और अपने लोगों के रोजमर्रा की लड़ाई से सीखा।मेरे सवाल और मुद्दे हमेशा जनता,समाज और समय के सवाल और मुद्दे रहे हैं। साहित्य,कला और पत्रकारिता का भी यही मूल आधार है।यह मेरे सत्तर साल के जीवन का अनुभव है।सारांश भी। आज जब मैं यह लेख शुरू कर रहा हूं,तब मूसलाधार बारिश हो रही है। प्रकृति और पर्यावरण को भी मैं निहायत जरूरी समाजिक मामला मानता रहा हूं और हिमालय से जुड़े होने के कारण मेरी पत्रकारिता का मुख्य स्वर और तेवर भी यही है। पंच तत्व में विलीन हो गए बिरंची बाबू, तराई को बसाने वाले हमारे महायोद्धाओं में से एक,जिनसे हमने पत्रकारिता सीखी। कल अपराह्न जब उन्होंने अंतिम साँस ली, उसके बाद बारिश शुरू हो हुई।तब से लगातार मूसलाधार वर्षा हो रही है।जब तराई बस रही थी,तब भी ऐसी ही मूसलाधार बारिश होती थी।लगातार सात दस दिनों तक। हिमालय की तलहटी में तब कोई नदी बंधी नहीं थी।न पहाड़ में नदियां कहीं कैद थी। तराई में तब घना जंगल था। असंख्य नदियां थी और सर्व व्यापी दलदल था। इस तराई को जिन लोगों ने आबाद किया,उनकी पीढ़ी के शायद आखिरी आदमी की अंतिम विदाई का मौसम कम से कम वही बन गया। उसी दौरान हमारा चूंकि जन्म हुआ था भारत विभाजन की त्रासदी के जख्म जब हरे और लहूलुहान थे, नए सिरे से जड़ें खोजने की जद्दोजहद जब बहुत भयानक थी,विभाजन की त्रासदी से भयानक,आत्मघाती घृणा और हिंसा से भी भयानक, इसलिए जंगल की उस आदिम गंध और दलदल के मौसम से अब भी आजाद नहीं हूं। मूसलाधार बारिश में भाई मनोरंजन साना के साथ करीब पांच किमी दूर उनके दुर्गापुर नंबर दो स्थित गांव पहुंचा।यह सबसे पुराने गांवों में से एक है। मोहनपुर नंबर एक, विजयनगर और दुर्गापुर नंबर दो में तब अस्थायी शरणार्थी शिविर थे। जंगल आबाद नहीं हुए थे।जंगली जानवर बहुत थे। पुनर्वास उपनिवेश के गांवों को दलदल और जंगल में बसाने की कवायद चल रही थी बिना सरकारी मदद के। जंगल में ट्रकों से फेंक दिए गए थे हमारे लोग। जंगल के मध्य इन तीन गांवों में तंबू में ठहराए गए थे लोग। मोहनपुर नंबर एक, दुर्गापुर नंबर दो और विजयनगर थोड़ी ऊंचाई पर थे,जहां दलदल नहीं था।जैसे जैसे बाकी गांव बसते गए,लोग इन तीनों गांवों से अपने अपने गांव में जा बसे। मूसलाधार बारिश के बीच भी लोग आते रहे। आम मोटर साइकिल और कार बहुत आम हैं।सड़कें जैसी भी हो,पक्की है। जिन्हें आना था,वे सभी आए। उनका पार्थिव शरीर रिवाज के मुताबिक माटी पर रखा था। शामियाना टंगा था। लेकिन मूसलाधार बारिश में लगा तराई के दलदल में बिरंची बाबू गहरी नींद में हैं। न खुलने वाली नींद में।मुझे लगा कि चारों तरफ धुआंधार सीमेंट के जंगल के मध्य फिर बचपन के उस दलदल में हूं। जिन महायोद्धाओं के सान्निध्य में बचपन बीता, उनमें से शायद यह अंतिम महायोद्धा की अंतिम विदाई है। पुनर्वास की लड़ाई स्वतंत्रतासंग्राम से कहीं ज्यादा मुश्किल है। बारिश कुछ रुकी भी।उस विराम के अभ्यांतर में अंतिम यात्रा जब तक दिनेशपुर श्मशान घाट पहुंची, फिर मूसलाधार शुरू हो गई बारिश। वर्षा के मध्य ही उन्हें चिता पर रखा गया और मुखाग्नि दी गई। दिनेशपुर की आबादी अब पचास के आसपास है। 15 किमी दूर रुद्रपुर की आधी आबादी बंगाली है। मोटर साइकिलें और कारें अब असंख्य हैं। लेकिन अपने महायोद्धा को विदा करने वाले गिनती के ही थे। जिन्हें आना था,वे नहीं आए।शोक से यह दुख बड़ा है।

मैं नास्तिक क्यों हूं# Necessity of Atheism#!Genetics Bharat Teertha

হে মোর চিত্ত, Prey for Humanity!

मनुस्मृति नस्ली राजकाज राजनीति में OBC Trump Card और जयभीम कामरेड

Gorkhaland again?আত্মঘাতী বাঙালি আবার বিভাজন বিপর্যয়ের মুখোমুখি!

हिंदुत्व की राजनीति का मुकाबला हिंदुत्व की राजनीति से नहीं किया जा सकता।

In conversation with Palash Biswas

Palash Biswas On Unique Identity No1.mpg

Save the Universities!

RSS might replace Gandhi with Ambedkar on currency notes!

जैसे जर्मनी में सिर्फ हिटलर को बोलने की आजादी थी,आज सिर्फ मंकी बातों की आजादी है।

#BEEFGATEঅন্ধকার বৃত্তান্তঃ হত্যার রাজনীতি

अलविदा पत्रकारिता,अब कोई प्रतिक्रिया नहीं! पलाश विश्वास

ভালোবাসার মুখ,প্রতিবাদের মুখ মন্দাক্রান্তার পাশে আছি,যে মেয়েটি আজও লিখতে পারছেঃ আমাক ধর্ষণ করবে?

Palash Biswas on BAMCEF UNIFICATION!

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS ON NEPALI SENTIMENT, GORKHALAND, KUMAON AND GARHWAL ETC.and BAMCEF UNIFICATION! Published on Mar 19, 2013 The Himalayan Voice Cambridge, Massachusetts United States of America

BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE 7

Published on 10 Mar 2013 ALL INDIA BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE HELD AT Dr.B. R. AMBEDKAR BHAVAN,DADAR,MUMBAI ON 2ND AND 3RD MARCH 2013. Mr.PALASH BISWAS (JOURNALIST -KOLKATA) DELIVERING HER SPEECH. http://www.youtube.com/watch?v=oLL-n6MrcoM http://youtu.be/oLL-n6MrcoM

Imminent Massive earthquake in the Himalayas

Palash Biswas on Citizenship Amendment Act

Mr. PALASH BISWAS DELIVERING SPEECH AT BAMCEF PROGRAM AT NAGPUR ON 17 & 18 SEPTEMBER 2003 Sub:- CITIZENSHIP AMENDMENT ACT 2003 http://youtu.be/zGDfsLzxTXo

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