दो
समाज और पत्रकारिता
चूंकि मेरा जन्म हाशिए के समाज में हुआ,इसलिए समाज की मेरी अवधारणा में हाशिए के तमाम सामाजिक आर्थिक समूह और समुदाय हैं।यह अवधारणा बनने में पूरी जिंदगी खप गई। पिताजी कम्युनिस्ट थे,तेभागा के लड़ाके थे पिता और पुरखे तमाम आदिवासी किसान विद्रोह के बागी, इसलिए आजादी की जिद और जज्बा मेरे खून में है।इसलिए जाने अनजाने पत्रकारिता ही मेरी जिंदगी बन गई। अपनी व्यवहारिक और वैचारिक भावभूमि, सामाजिक पृष्ठभूमि, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और जीवनदृष्टि के कारण पत्रकारिता का कोई विकल्प नहीं था मेरे लिए। आज भी नहीं है तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद क्योंकि समाज की मेरी अवधारणा और पत्रकारिता आहिस्ते आहिस्ते कब एक दूसरे के पर्याय बन गए, मुझे नहीं मालूम। बार बार पत्रकारिता के मौजूदा हालात, मालिक प्रबंधन और संपादकों के रवैये से पत्रकारिता से मोहभंग जरूर होता रहा,लेकिन मैने अंततः मैदान नहीं छोड़। यह आजादी का जज्बा है और जिद है।
मेरे पिताजी कहते थे कि हम हाशिए के लोग हैं।हमारे लोगों की अनकही कथा, अनसुनी आवाज हम नहीं बुलंद करेंगे,तो कौन करेगा।वे बाबा साहब भीमराव अंबेडकर के विचार,संघर्ष और जीवन का हवाला देते थे। लेकिन पिताजी की मौत से पहले मैंने कम्युनिस्टों के असर में आंबेडकर को नहीं पढ़ा,जिनके संपर्क में स्कूल के जमाने से मैं था।चूंकि पिताजी कम्युनिस्ट थे,आंदोलनकारी थे और तराई शुरू से कम्युनिस्टों और आंदोलन के केंद्र में थी। चूंकि वसंत का वज्रनिनाद हो चुका था।चूंकि हम भी क्रांति का सपना देखते थे और वर्ग संघर्ष में हमारी आस्था थी।भारतीय समाज, जाति व्यवस्था और तत्संबंधी जटिलताओं को हमने वामपंथियों की तरह सिरे से नजरअंदाज किया। इसीलिए समाज की मुकम्मल अवधारणा बनने में पूरी जिंदगी खप गई और जाति उन्मूलन की चुनौती, न्याय और समता की लड़ाई क्रमशः कठिन होती गई।
पूंजीवादी समाज के भी अपने लोकतांत्रिक मूल्य थे,आदर्श थे और पूंजी का विकास श्रम के बिना असंभव था,लेकिन मुक्तबाजार के साम्राज्यवाद ने शर्म और मनुष्य के साथ समाज को भी ध्वस्त कर दिया।लोकतंत्र के साथ साथ समाज, मनुष्यता,सभ्यता, प्रकृति और पर्यावरण, इतिहास, विचारधारा, ज्ञान विज्ञान को तिलांजलि दे दी। पत्रकारिता भी गोदी मीडिया में तब्दील होकर निरंकुश शतक की गुलाम और जनता और समाज के विरुद्ध हो गई।
पिताजी कहते थे कि सड़क पर उतरने से संसाधन अपने आप तैयार हो जाते हैं।पुनर्वास की लड़ाई में आधी सदी उनकी जिंदगी की धोती और कुर्ते में बीत गई।अपनों के लिए कभी कुछ नहीं जोड़ा। कभी हिसाब नहीं किया लाभ,नुकसान और अवसर का।जिंदगी भर नंगे बड़ा,भूखों प्यासे सरहद के आर पर पीड़ितों के हक में दौड़ते रहे।कैंसर ने उनकी रीढ़ में घोसला बना लिया और आखिरकार उनकी जान ले ली।
इस विरासत की जमीन से मुझे जिंदगी से क्या लेना था जबकि हजारों साल से हमारे पुरखे लड़ते ही रहे और लड़ते लड़ते खेत हो गए।बिना कुछ हासिल किए। फिर मेरी महत्वाकांक्षा क्या हो सकती थी? करिअर क्या हो सकता था? पिताजी कहते थे हाशिए की लड़ाई की जिम्मेदारी हमारी है और हम इसे किसी और के भरोसे टाल नहीं सकते।बेहतर जिंदगी के लिए भी नहीं। इस लड़ाई के लिए अंबेडकर जैसी योग्यता होनी चाहिए।
यह योग्यता अर्जित करनी होगी।
हाईस्कूल चूंकि दिनेशपुरबके जिला परिषद स्कूल से प्रथम श्रेणी में पास किया तो नैनीताल के जीआईसी में दाखिला हो गया।जहां हमें ताराचंद्र त्रिपाठी जैसे गुरुजी मिले।जो कहते थे कि जनभाषा में ही जनता से संवाद संभव है,लेकिन सत्ता से टकराना है तो अंग्रेजी सीखनी होगी।सभी विधाओं,माध्यमों और विषयों का ज्ञान हासिल करना होगा।क्रमबद्ध विधिबद्ध अध्ययन करना होगा। कदम कदम पर सीखना होगा।समाज और जनता से जुड़े रहना होगा। हमने आज तक कदम दर कदम उनके दिशा निर्देशों के पालन करने की कोशिश की है।
उत्तराखंड में तब भी शक्ति,अल्मोड़ा अखबार और समता की विरासत जिंदा थी।चिपको आंदोलन की विरासत के साथ नैनीताल समाचार का प्रकाशन शुरू हुआ, मेरी पत्रकारिता का प्रस्थानबिंदु यही है, जो पुनः हिमालय है जो स्वयं दलित और अस्पृश्य है यह अस्पृश्य देश और समाज,इतिहास और भूगोल का सबसे बड़ा सच है।साहित्य,कला और पत्रकारिता का भी।
पत्रकारिता में मेरे मिजाज,तेवर और पक्ष, मालिक प्रबंधन और संपादकों से टकराव को देखते हुए मुझे जिद्दी, बदमिजाज और बदतमीज़ बागी कहा जाता रहा। क्योंकि मेरे लिए समाज और समाजिक यथार्थ के साथ साथ पत्रकारिता की जड़ें भी हाशिए के समाज में थीं, लेकिन हाशिए के लिए,आम लोगों के लिए मीडिया में कितनी जगह होती है?
एक एक मिमी जगह के लिए खूंखार लड़ाई लड़ने की नौबत आती रही और मैं निरंतर लहूलुहान होता रहा,लेकिन हार कभी नहीं मानी और हर कीमत पर रीढ़ सीधी रखी। मेरे लिए समाज और पत्रकारिता का मायने कुल मिलाकर यही है।
साहित्य, कला और मीडिया में हाशिए के लोग कितने हैं? जो हैं उनकी हैसियत क्या हैं? इस वर्चस्ववादी व्यवस्था से टकराना सत्ता और व्यवस्था के ख़िलाफ़ खड़े होने की अनिवार्य शर्त है। लेकिन मुक्त बाजार ने देश,नागरिकता,इतिहास, भूगोल,समाज और परिवार को भी सिरे से बदल दिया।बदला ही नहीं, मिटा दिया।
1991 में जनसत्ता के संपादकीय में दाखिल होते न होते साहित्य,कला, विधाएं, माध्यम, राष्ट्र व्यवस्था, धर्म,आस्था, प्रेम,भाईचारा, समान चैन सबकुछ बाजार के नाम स्वाहा हो गया।कॉर्पोरेट प्रायोजित हिंसा और घृणा का दौर शुरू हो गया।असामाजिक तत्व राजनीति,सत्ता, अर्थव्यवस्था में काबिज हो गए।मनुष्य, उसका समाज, उसका देश,उसका जीवन सबकुछ बाजार के हवाले होती गई।पूंजी के वर्चस्व के जमाने में भी साहित्य,कला और पत्रकारिता के साथ पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था के केंद्र में मनुष्य था, इस मनुष्यता में कम से कम समाज और हाशिए के समाज का एक चेहरा भी था, जो सिरे से गायब है।उस चेहरे की वापसी आज बड़ी चुनौती है।
जड़ों से कटी, मनुष्य और समाज से बेपरवाह और हाशिए के प्रति संवेदनाशून्य बाजार और सत्ता को समर्पित पत्रकारिता आज मीडिया है, जिसका न कोई चेहरा है और न कोई रीढ़।
यह आज का कटु सामाजिक यथार्थ है।
समाप्त
पलाश विश्वास
कार्यकारी संपादक प्रेरणा अंशु, दिनेशपुर, उत्तराखंड
06398418084