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Saturday, March 14, 2026
नमोशूद्र आंदोलन:क्या दलित अपना इतिहास जानते हैं
1873 में बंगाल के पांच जिलों में अस्पृश्यता के खिलाफ अपनी पहचान के लिए दलितों ने पांच महीने तक हड़ताल की। भारत में दलितों की पहचान और आरक्षण का यही आधार है।
क्या आज दलित अपना इतिहास जानते हैं?
फॉरवर्ड प्रेस के मुताबिक
पहली ‘आम हड़ताल’
ऊँची जातियों के दमनचक्र और शोषण ने चांडालों को उन्हें सताने वालों के खिलाफ आवाज़ उठाने के लिए प्रेरित किया। फरीदपुर के जिला मजिस्ट्रेट सीए कैली ने 8 अप्रैल, 1873 को ढाका के संभागीय आयुक्त को चिट्ठी लिखकर सूचित किया कि उस साल चांडालों ने ”जिले में आम हड़ताल की और यह निर्णय किया कि वे उच्च वर्ग के किसी भी सदस्य की किसी भी हैसियत से सेवा नहीं करेंगे, जब तक कि उन्हें हिंदू जातियों में उससे बेहतर स्थान प्राप्त न हो जाए, जो उन्हें वर्तमान में प्राप्त है।”
एक समकालीन इतिहासविद ने इस हड़ताल को ऊँची जातियों का सामाजिक बहिष्कार निरूपित किया।
चांडालों ने तय किया कि वे न तो ऊँची जातियों के लोगों की ज़मीनें जोतेंगे और ना ही उनके घरों की छतों को फुंस से ढकेंगे। यह हड़ताल चार से पांच महीने चली। यह भारत की पहली ऐसी आम हड़ताल थी, जिसके संबंध में आधिकारिक अभिलेख उपलब्ध हैं। अन्य जिलों जैसे बारीसाल, ढाका, जैसोर, मैमनसिंह व सिलहट के चांडालों ने भी फरीदपुर के अपने साथियों से हाथ मिला लिया। सन 1871 की जनगणना के अनुसार, बंगाल में 16,20,545 चांडाल थे। इन पांच विशाल जिलों के हड़ताली चांडालों की संख्या 11,91,204 (कुल आबादी का 74 प्रतिशत) थी। भद्रलोक (ब्राह्मणों, बैद्यों और कायस्थों का जाति सिंडीकेट) को निशाना बनाने वाली इस विशाल हड़ताल की सफलता, निरक्षर चांडालों की संगठनात्मक और परस्पर एकता कायम करने की क्षमता की द्योतक थी।
चांडालों ने यह संकल्प किया कि वे शिक्षा के ज़रिए अपनी सामाजिक हैसियत में सुधार लायेंगे और अपना विकास करेंगे। इस सामाजिक-शैक्षणिक आंदोलन के केंद्र, फरीदपुर के चांडालों की शैक्षणिक स्थिति दयनीय थी। ऊँची जातियां, पददलित वर्गों को किसी भी प्रकार की शिक्षा प्राप्त करने देने के सख्त खिलाफ थीं। ब्राह्मण और कायस्थ यह मानते थे कि शिक्षा उनकी बपौती है। चांडाल और मुसलमान इस पूर्वग्रह के सबसे बड़े शिकार थे। फरीदपुर में 1,56,000 चांडाल रहते थे परंतु केवल 200 चांडाल बच्चे स्कूल जाते थे।
हरी चंद ठाकुर (1812-1877) व उनके प्रतिभाशाली पुत्र गुरूचंद ठाकुर (1847-1937) ने इस निरक्षर व अज्ञानी समुदाय को शिक्षित करना अपना मिशन बनाया। हरी चंद ठाकुर ने मातुआ पंथ की स्थापना की, जो कापाली, पोंड्रा, मालो व मूची जातियों में बहुत लोकप्रिय हुआ। दोनों ने पिछड़ों की उन्नति के लिए शिक्षा को एक अस्त्र के रूप में इस्तेमाल किए जाने पर ज़ोर दिया। इस सामाजिक न्याय आंदोलन को आस्ट्रेलियाई बैप्टिस्ट मिशनरी डॉ. सीएस मीड ने अपना पूरा सहयोग और समर्थन दिया। फरीदपुर जिले में ठाकुर के पैतृक गांव ओराकंडी में नामशूद्र, अंग्रेजी माध्यम का स्कूल खोलना चाहते थे ताकि निरक्षर व अज्ञानी किसानों को लगान और ऋण चुकाने में उच्च जातियों के ज़मींदारों और साहूकारों द्वारा उनके साथ की जा रही धोखाधड़ी से उन्हें बचाया जा सके। इस प्रस्ताव का स्थानीय ऊँची जातियों के कायस्थों ने कड़ा विरोध किया क्योंकि उन्हें डर था कि शिक्षित हो जाने के बाद, बटाई पर खेती करने वाले किसान और उनके सेवक काम नहीं करेंगे। भद्रलोकों के विरोध के चलते, गुरूचंद ठाकुर ने डॉ. मीड से सहायता मांगी। मीड ने उन्हें न केवल स्कूल के लिए आर्थिक मदद उपलब्ध करवाई वरन अंग्रेज़ अफसरों से उनका परिचय भी करवाया। यह नामशूद्रों के सशक्तिकरण की ओर एक प्रभावी कदम था।
मील का पत्थर
सन 1881 में खुलना जिले के दत्ताडंगा में अखिल-बंगाल नामशूद्र सम्मेलन हुआ। पूरे बंगाल से हजारों नामशूद्रों ने इस सम्मेलन में भाग लिया। सम्मेलन की अध्यक्षता गुरूचंद ठाकुर ने की। इस सम्मेलन में शिक्षा के संबंध में जो संकल्प पारित किए गए, वे सामाजिक उत्थान की राह में मील के पत्थर साबित हुए। इसके बाद से, हर वर्ष सामाजिक और हर वर्ष सामाजिक और शैक्षणिक मुद्दों पर विचार-विनिमय के लिए अलग-अलग जिलों में नामशूद्र सम्मेलनों का आयोजन शुरू हो गया। हर नामशूद्र गांव में एक समिति गठित की गई। पंद्रह ग्रामीण समितियों का एक संकुल बनाया गया और हर जिले में जिला समिति का गठन हुआ। ग्रामीण, संकुल व जिला समितियों को यह अधिकार दिया गया कि वे ”नामशूद्र अंशदान कोष” के लिए चंदा इकट्ठा कर सकें। हर परिवार अपना भोजन शुरू करने के पहले मुट्ठीभर चावल अलग रख देता था, जो गांव की समिति को जाता था। गांव की समिति का हर सदस्य एक आना प्रतिमास का चंदा देता था, संकुल समिति के सदस्य दो आने और जिला समिति के सदस्य चार आने प्रतिमास चंदे के रूप में देते थे। श्राद्ध, विवाह और अन्य मौकों पर होने वाले खर्च का तीन प्रतिशत इस कोष में दान दिया जाता था। जो परिवार अपने 20 साल से कम उम्र के लड़कों या 10 साल से कम उम्र की लड़कियों का विवाह करते थे, उन्हें जात बाहर कर दिया जाता था।
https://www.forwardpress.in/2016/11/bangal-ka-vismrit-namshudr-aandolan/

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