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Saturday, March 14, 2026
भारत का नवजागरण नमोशूद्र आंदोलन
भारत का नवजागरण, नमोशुद्र आंदोलन
पलाश विश्वास
भारत में नवजागरण दलित नवजागरण था, जिसकी बुनियाद जल,जमीन और जंगल, नागरिक मानव अधिकार, अस्मिता और आत्मसम्मान के मुद्दों में थी। इसका आधार दलितों में व्यापक शिक्षा आंदोलन था। भारत के आदिवासी किसान आंदोलनों की विरासत से यह जुड़ा है, जो जाति आधारित मनुस्मृति की व्यवस्था, पुरोहित तंत्र, अस्पृश्यता के खिलाफ समानता और न्याय का आंदोलन था। यह कोई समाज सुधार आंदोलन न था,जो ब्रिटिश संरक्षण में चला।बल्कि यह आंदोलन राजसत्ता और धर्म सत्ता दोनों के खिलाफ था।
इस पर शेखर बंदोपाध्याय का बहुचर्चित पुस्तक है, जो शोधात्मक तो है, लेकिन इतिहास नहीं है। इस आंदोलन की चर्चा बंगाल से बाहर बहुत कम हुई है। अंबेडकर, ज्योतिबा फुले, नारायण गुरु और पेरियार के आंदोलनों से बहुत पहले दो सौ साल पहले यह अंडों उन्नीसवीं सदी में शुरू हुआ। लेकिन बीसवीं सदी में इस आंदोलन का चरित्र राजसत्ता और धर्मसत्ता से अनुकूलित हो गया।
Sekhar Bandyopadhyay's work on the Namasudra movement focuses on the history of this untouchable caste in colonial Bengal, particularly in his book, Caste, Protest and Identity in Colonial India: The Namasudras of Bengal, 1872–1947. He analyzes their struggles for social and political recognition, the internal differentiation and changing aspirations within the community, and their eventual, complex relationship with Hindu nationalism and the Partition of India.
बंगाल के दलितों और खासतौर पर नमोशुद्रों को भारत विभाजन के जरिए बंगाल से खदेड़ने, उन्हें छिन्नमूल बना दिए जाने और उनकी मातृभाषा, इतिहास, भूगोल, नागरिकता, संस्कृति, विरासत, सामाजिक,राजनीतिक हैसियत खत्म कर दिए जाने से इस आंदोलन का भगवाकरण हो गया,भारत में समता और न्याय, जल जंगल जमीन के आंदोलनों के भगवाकरण की तरह।
इस आंदोलन को समझे बिना भारत के विस्थापितों की समस्या और उनके सफाए के इंतजाम को समझा नहीं जा सकता। अंबेडकर ने 1916 में अपना आंदोलन शुरू किया,लेकिन इससे पहले नमोशुद्र आंदोलन के फलस्वरूप 1911 में ही बंगाल में नमोशुद्र आंदोलन के कारण अस्पृश्यता निषिद्ध हो गई।
उन्नीसवीं सदी के हरिचांद ठाकुर के मतुआ आंदोलन के बारह सूत्री अनुशासन और आज्ञा पुरोहित तंत्र और अस्पृश्यता, जाति आधारित भेदभाव, कर्मकांड और पाखंड के खिलाफ गृहस्थ धर्म पर केंद्रित है। जिसमें शिक्षा और जमीन के अधिकार मुख्य है।
कविगुरु रवींद्र नाथ टैगोर इस आंदोलन के समर्थक थे।
1920 में हुए नमोशुद्र सम्मेलन में उन्होंने भाग लिया था।
पहली ‘आम हड़ताल’
तब नमोशुद्रों को चांडाल कहा जाता था और उनकी जनगणना में गिनती अलग होती थी।
फॉरवर्ड प्रेस के अनुसार:
ऊँची जातियों के दमनचक्र और शोषण ने चांडालों को उन्हें सताने वालों के खिलाफ आवाज़ उठाने के लिए प्रेरित किया। फरीदपुर के जिला मजिस्ट्रेट सीए कैली ने 8 अप्रैल, 1873 को ढाका के संभागीय आयुक्त को चिट्ठी लिखकर सूचित किया कि उस साल चांडालों ने ”जिले में आम हड़ताल की और यह निर्णय किया कि वे उच्च वर्ग के किसी भी सदस्य की किसी भी हैसियत से सेवा नहीं करेंगे, जब तक कि उन्हें हिंदू जातियों में उससे बेहतर स्थान प्राप्त न हो जाए, जो उन्हें वर्तमान में प्राप्त है।”
एक समकालीन इतिहासविद ने इस हड़ताल को ऊँची जातियों का सामाजिक बहिष्कार निरूपित किया। चांडालों ने तय किया कि वे न तो ऊँची जातियों के लोगों की ज़मीनें जोतेंगे और ना ही उनके घरों की छतों को फुंस से ढकेंगे। यह हड़ताल चार से पांच महीने चली। यह भारत की पहली ऐसी आम हड़ताल थी, जिसके संबंध में आधिकारिक अभिलेख उपलब्ध हैं। अन्य जिलों जैसे बारीसाल, ढाका, जैसोर, मैमनसिंह व सिलहट के चांडालों ने भी फरीदपुर के अपने साथियों से हाथ मिला लिया। सन 1871 की जनगणना के अनुसार, बंगाल में 16,20,545 चांडाल थे।
इन पांच विशाल जिलों के हड़ताली चांडालों की संख्या 11,91,204 (कुल आबादी का 74 प्रतिशत) थी। भद्रलोक (ब्राह्मणों, बैद्यों और कायस्थों का जाति सिंडीकेट) को निशाना बनाने वाली इस विशाल हड़ताल की सफलता, निरक्षर चांडालों की संगठनात्मक और परस्पर एकता कायम करने की क्षमता की द्योतक थी।
चांडालों ने यह संकल्प किया कि वे शिक्षा के ज़रिए अपनी सामाजिक हैसियत में सुधार लायेंगे और अपना विकास करेंगे। इस सामाजिक-शैक्षणिक आंदोलन के केंद्र, फरीदपुर के चांडालों की शैक्षणिक स्थिति दयनीय थी। ऊँची जातियां, पददलित वर्गों को किसी भी प्रकार की शिक्षा प्राप्त करने देने के सख्त खिलाफ थीं। ब्राह्मण और कायस्थ यह मानते थे कि शिक्षा उनकी बपौती है। चांडाल और मुसलमान इस पूर्वग्रह के सबसे बड़े शिकार थे। फरीदपुर में 1,56,000 चांडाल रहते थे परंतु केवल 200 चांडाल बच्चे स्कूल जाते थे।
हरिचांद ठाकुर (1812-1877) व उनके प्रतिभाशाली पुत्र गुरू चांद ठाकुर (1847-1937) ने इस निरक्षर व अज्ञानी समुदाय को शिक्षित करना अपना मिशन बनाया। हरी चंद ठाकुर ने मातुआ पंथ की स्थापना की, जो कापाली, पोंड्रा, मालो व मूची जातियों में बहुत लोकप्रिय हुआ। दोनों ने पिछड़ों की उन्नति के लिए शिक्षा को एक अस्त्र के रूप में इस्तेमाल किए जाने पर ज़ोर दिया। इस सामाजिक न्याय आंदोलन को आस्ट्रेलियाई बैप्टिस्ट मिशनरी डॉ. सीएस मीड ने अपना पूरा सहयोग और समर्थन दिया।
फरीदपुर जिले में ठाकुर के पैतृक गांव ओड़ाकांदी में नामशूद्र, अंग्रेजी माध्यम का स्कूल खोलना चाहते थे ताकि निरक्षर व अज्ञानी किसानों को लगान और ऋण चुकाने में उच्च जातियों के ज़मींदारों और साहूकारों द्वारा उनके साथ की जा रही धोखाधड़ी से उन्हें बचाया जा सके। इस प्रस्ताव का स्थानीय ऊँची जातियों
सके। इस प्रस्ताव का स्थानीय ऊँची जातियों के कायस्थों ने कड़ा विरोध किया क्योंकि उन्हें डर था कि शिक्षित हो जाने के बाद, बटाई पर खेती करने वाले किसान और उनके सेवक काम नहीं करेंगे। भद्रलोकों के विरोध के चलते, गुरूचंद ठाकुर ने डॉ. मीड से सहायता मांगी। मीड ने उन्हें न केवल स्कूल के लिए आर्थिक मदद उपलब्ध करवाई वरन अंग्रेज़ अफसरों से उनका परिचय भी करवाया। यह नमोशूद्रों के सशक्तिकरण की ओर एक प्रभावी कदम था।
डॉ. आंबेडकर को संविधान सभा का सदस्य बनाने को लगा दिया एड़ी-चोटी का जोर
भारतीय संविधान में अनुसूचित जातियों, जातियों और स्त्रियों के लिए जो संवैधानिक प्रावधान किए गए, अगर आंबेडकर न होते तो क्या वे संभव थे?
डॉ. आंबेडकर को संविधान सभा में पहुंचाने का श्रेय जोगेंद्रनाथ मंडल को ही जाता है। उनका मानना था कि अगर डॉ. आंबेडकर संविधान सभा में नहीं गए तो दलित समाज को सबसे ज्यादा नुकसान होगा। दरअसल, उस समय अनेक लोग चाहते थे कि डॉ. आंबेडकर को संविधान सभा में जगह नहीं मिले। इसके लिए तमाम प्रपंच किए जा रहेथे। इस संदर्भ में दिलीप गायेन ने जोगेंद्रनाथ मंडल के प्रयासों के बारे में लिखा है कि उस समय के बंगाल में सुहरावर्दी सरकार सत्ता में थी। उनके अनुसूचित जाति के विधायकों को लेकर साहस के साथ जोगेंद्रनाथ मंडल आगे बढ़े थे। बंगाल से डॉ. आंबेडकर को खड़ा कर उन्हें संविधान सभा का सदस्य बनाया गया था। उन्हें कांग्रेस के दो एमएलए गयानाथ बिस्वास और द्वारिकानाथ राय, निर्दलीय मुकुंद बिहारी मल्लिक, रंगपुर के क्षत्रिय समिति के नागेंद्रनारायण राय और अनुसूचित जाति फेडरेशन के एकमात्र एमएलए जोगेंद्रनाथ मंडल ने वोट दिया।
विडंबना यह है कि बंगाल के जिन दलितों ने आंबेडकर को संविधानसभा में पहुंचाने की कीमत बंगाल के इतिहास भूगोल,मातृभाषा, जल जंगल जमीन ,नागरिकता और मानवाधिकारों से बेदखली के रूप में चुकाया, उनके लिए कोई संवैधानिक प्रावधान नहीं है और न कोई कानूनी ढांचा उनके लिए है।वे अब भी विदेशी कानून के दायरे में कैद बंधुआ वोट बैंक बनकर सत्तादकों की अनुकम्पा से जीते मरते हैं।
विडंबना है कि इतिहास हमें बताता है कि समाज सुधार आंदोलन और सामाजिक न्याय के संघर्ष, एक दूसरे के पूरक नहीं होते बल्कि वे परस्पर-विरोधी और असंगत होते हैं। औपनिवेशिक बंगाल में 19वीं और 20वीं सदी में सामाजिक सुधार और सामाजिक न्याय के आंदोलन एक-दूसरे के समानांतर चले। जहां सामाजिक सुधार आंदोलन का उद्देश्य ऊँची जातियों के घिसे-पिटे दकियानूसी कर्मकांडों और परंपराओं जैसे सती, बहुपत्नी प्रथा, भारी-भरकम दहेज़, बाल-विवाह, बच्चों को गंगा सागर में फेंकना, अंतरजली यात्रा इत्यादि को उखाड़ फेंकना था, वहीं सामाजिक न्याय आंदोलन का लक्ष्य अशिक्षा का नाश और समाज के निचले वर्गों में मानवीय गरिमा की अलख जगाना था। जहां सामाजिक सुधार आंदोलनों की भारतीय इतिहासविदों ने भूरी-भूरी प्रशंसा की, वहीं सामाजिक न्याय आंदोलन को इतिहास के अंधेरे में गुम हो जाने दिया।
इस आंदोलन पर अभी सिलसिलेवार कम करने की जरूरत है। कौन करेगा?
The Namasudra movement was a socio-religious and political movement of the Namasudra (formerly Chandal) people of Bengal, primarily in the late 19th and early 20th centuries, that sought to challenge social discrimination, gain dignity, and secure education and political power. Key components included early protests against oppressive practices, such as the 1872-73 strike over forced labor, and the development of a community identity through the Matua religion founded by Harichand Thakur and developed by his son Guruchand Thakur.
Key aspects of the movement
Social and political origins: The movement arose from centuries of social inequality and economic hardship faced by the Namasudras, who were treated as "untouchables".
Early protest: A major early event was the "general strike" of 1872-73, where Namasudras protested being forced to perform conservancy services in jails while other castes were exempt. This strike lasted for several months and pressured authorities to take action against mistreatment. and a spiritual foundation for their struggles.
Goals: The movement's objectives evolved over time, shifting from seeking equal status to focusing on concrete goals like acquiring education, securing employment, achieving economic prosperity, and gaining political representation.
Education movement: Under Guruchand Thakur, the movement launched a specific drive for education among the Namasudras, who had little to no access to educational institutions at the time.
Political organization: The Namasudras began to form their own political organizations and caste associations, successfully influencing government policies and gaining sympathetic support, as seen in the Poona Pact of 1932.
Terminology: The term "Namasudra" gained official recognition in the 1911 census, solidifying the community's identity and paving the way for further political mobilization.
The Matua Movement: The socio-religious and political awakening of the community was strongly influenced by the Matua movement, which was founded by Harichand Thakur and guided by his son Guruchand Thakur. The Matua faith provided the Namasudras with a strong sense of community, self-respect, and a spiritual foundation for their struggles.
Key aspects of Bandyopadhyay's analysis:
Identity formation: Bandyopadhyay examines how the Namasudras developed a shared identity due to oppression and marginalization, using the Matua sect, founded by Harichand Thakur, as a key example of resistance and a new spiritual identity.
Caste consciousness: He highlights the varied levels of consciousness and aspirations within the Namasudra movement, noting that despite a shared identity, different goals and ideologies coexisted.
Political engagement: The movement's political trajectory is analyzed, including its involvement in anti-colonial movements and the significant role of leaders like Jogendranath Mandal.
Integration with dominant hegemony: Bandyopadhyay critically discusses the Namasudras' gradual alignment with upper-caste ideologies, which complicated their relationship with the anti-colonial movement.
Internal differentiation: A key point of his work is recognizing the internal differentiation within the Namasudra community, which shaped its responses to social and political changes.
https://www.amazon.in/Caste-Protest-Identity-Colonial-India/dp/0198075960
By Shekhar Bandopadhyay
संदर्भ:
https://www.forwardpress.in/2016/11/bangal-ka-vismrit-namshudr-aandolan/
https://www.forwardpress.in/2021/01/remembering-jogendranath-mandal-hindi/#:~:text=%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%A8%2011%20%E0%A4%85%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A5%82%E0%A4%AC%E0%A4%B0%2C%201948%20%E0%A4%95%E0%A5%8B,%E0%A4%AE%E0%A4%82%E0%A4%A1%E0%A4%B2'%2C%20%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%96%E0%A4%95%20%E0%A4%9C%E0%A4%97%E0%A4%A6%E0%A5%80%E0%A4%B6%20%E0%A4%9A%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%20%E0%A4%AE%E0%A4%82%E0%A4%A1%E0%A4%B2

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