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Friday, March 6, 2026

फिर आत्मा क्यों मर जाती है?

दूसरे विश्वयुद्ध में बंगाल में बमबारी से कोई नहीं मरा।लाखों लोग भूख से मरे। लेकिन सैकड़ों लोग मुनाफा कमाकर मालामाल हो गए। तेल की आग से भी मालामाल होंगे लोग। उनके लिए आपदा में वैसा ही मौका है। ट्रंप के टैरिफ से डरकर घुटना इन्हीं मलमली लोगों के हित में टेकना मजबूरी है। वोट इन्हीं की फंडिंग से मिलती है। राष्ट्रहित का मतलब उन्हीं का हित। स्वतंत्रता का मतलब बेलगाम मुनाफा उनका। संप्रभुता का मतलब उनका व्यापारक हित। व्यापार तो सबके साथ है। कहां कहां घुटना टेकेंगे या सर के बल लेटेंगे,यह सब व्यापारिक हित पर निर्भर है।आम लोगों को धर्म के सिवाय किसी बात से कोई लेना देना नहीं। मरना तो तय है।निरंकुश तानाशाह को भी मौत आती है।हम लोग तो खैर घास फूस हैं। आज कटे या कल, क्या फर्क पड़ता है? आस्था सर्वोपरि है। आस्था के अनुसार देह मिट्टी है। आत्मा अमर है। मिट्टी में मिलने से पहले ही फिर क्यों आत्मा मर जाती है? बिना मौत मर मर कर जिए और कबंध बनकर चले, यह कैसी जिंदगी है भाई?

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