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Monday, February 9, 2026

हिंदी के रचनाकार क्या नर्सरी के बच्चे हैं?

हिंदी के रचनाकार क्या नर्सरी के बच्चे हैं? पलाश विश्वास जीवन के व्यावहारिक अनुभव के बिना सिर्फ भाषाई दक्षता, दूसरों के अनुकरण, विमर्श और अस्मिता के तहत लिखी गई रचनाएं हमें कतई नहीं चाहिए। हर रचना में प्राण होना चाहिए।हर शब्द में संवेदना की गहराई और सघनता अनिवार्य है रचना के रचना होने के लिए। सिर्फ छपने के लिए कृपया रचना कतई न भेजें। हम बेहद स्पष्ट तौर हर अंक के लिए विषय और अपेक्षित सामग्री के बारे में निरंतर संवाद करते रहते हैं। ज्यादातर रचनाओं का विषय से कोई मतलब नहीं होता और न ही उनमें रचनात्मकता जैसी कोई चीज होती है। आपको जिसके बारे में कोई जानकारी नहीं है और न कोई व्यवहारिक अनुभव है ,उसपर लिखना क्या जरूरी है? हर अंक में आपकी रचना छपेगी तो नए रचनाकारों के लिए जगह कैसे बनेगी? अपने मन मुताबिक कुछ भी लिखकर हर अंक में छपने की उम्मीद करना क्या सही है? विषय के मुताबिक जो सामग्री हमें चाहिए, वह बेहद कम मिल पाती है। यह बेहद दुखद है। हमने मेहनतकश स्त्रियों पर एक स्त्री विशेषांक निकाला था,आपको याद होगा। मेहनतकश स्त्री कहां नहीं है? स्त्री की मेहनत से ही दुनिया बनती है।लेकिन अस्मिता,वाद, विचार और विमर्श का झंडा उठाने वालों का अपने आस पास की मेहनती स्त्री और खासतौर पर निचले तबकों की,सतह की नीचे की औरतों से कोई सरोकार है या नहीं,नहीं मालूम,लेकिन उनके जीवन के बारे में व्यवहारिक अनुभव लगभग नहीं है। यह अंक बहुत मुश्किल से निकला। हम चाहते हैं कि मार्च में छप रहे प्रेरणा अंशु के स्त्री विशेषांक में किशोरियों की रचनात्मकता और उनकी समस्याओं पर फोकस बने। लेकिन ज्यादा रचनाओं का किशोरियों से कोई लेना देना नहीं है। स्त्री पर स्त्री होने से ही सार्थक लिखना संभव नहीं है क्योंकि स्त्रियां भी दूसरी स्त्रियों के भोगे हुए यथार्थ को न जीवन में और न रचना में जी सके,इसकी कोई गारंटी नहीं। पुरुष भी बिना वास्तविक अनुभव के स्त्री पर लिख रहे हैं जबकि अंक किशोरियों की समस्याओं पर केंद्रित है। क्या हिंदी भाषा और साहित्य में किशोरियों के मन, मानस,जीवन यापन, उड़ान और समस्याओं पर कभी लिखा ही नहीं गया है? तो विषय आपको समझ में क्यों नहीं आता।क्या हिंदी के रचनाकार अभी नर्सरी के बच्चे हैं? जिन्हें किसी विषय की समझ ही नहीं होती? किस घर में तीन एजर बेटी नहीं है? हमने सबसे खा था कि आपका लिखना जरूरी नहीं है, बेटियों से जरूर लिखवाएं। सबने अपनी अपनी रचनाएं भेज दी,बेटियों से रचनाएं किसी ने नहीं भिजवाई। क्यों? बेटियों को क्या लिखने की इजाजत नहीं है? क्यों? बेटियों क्या लिखना नहीं जानती या नहीं चाहती? इस अंक में आप न लिखते,बेटी को लिखने देते तो क्या महाभारत अशुद्ध हो जाता? हमीं लोग हैं जो लिंग भेद की बात करते हैं, आजादी, अस्मिता और विमर्श के नारे उछालते हैं लेकिन कतई नहीं चाहते कि हमारी बेटियां अपनी बात लिखें, कहानी कविता आलेख भी लिखें, समस्याओं पर चर्चा करें? मुझे बहुत दुख हो रहा है। क्या बेटियों के मन मानस उड़ान को कैद करके माताएं खुद उड़ान पर हैं?

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