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Tuesday, January 27, 2026

किताब खरीदते हैं, पढ़ते भी हैं क्या?

किताबें खरीदना स्टेटस की बात है। संपन्न लोग घर की सजावट के लिए बेशुमार किताबें खरीदते हैं। बंगाल में रवींद्र रचनावली, शरत रचना समग्र, सत्यजीत राय समग्र, बंकिम रचनावली, ताराशंकर रचनावली ड्राइंग रूम की अलमारियों में बंद पड़ी रहती है आगंतुकों को यह दिखाने के लिए कि वे लोग संपन्न हैं और साहित्य भी पढ़ते हैं। लेकिन पढ़ना तो दूर, किताबों पर धूल की परतें भी साफ नहीं होतीं। जो महंगी किताबें खरीदते हैं,वे क्या पढ़ते भी हैं? पाठ्यक्रम की किताबें सारी खरीद भी ली जाए तो क्या विद्यार्थियों में उन्हें पढ़ने की आदत होती है? गाइड और नोट्स, डिजिटल लिटरेचर के जमाने में कितने लोग टेक्स्ट पढ़ते हैं? किताबों को पढ़ने की जिन्हें सबसे ज्यादा जरूरत है, महंगी किताबें खरीदने के लिए उनके पास पैसे होते हैं क्या? खरीद भी ली तो वे क्या पढ़ते हैं? साहित्य और संस्कृति से कितने जुड़े हैं हाशिए के लोग? सतह और सतह के नीचे के लोग,यानि बहुसंख्य जनता? जिनके बिना साहित्य और संस्कृति की कोई प्रासंगिकता नहीं बचती। सैकड़ों किताबें जिनकी छपती हैं या जिनकी किताबों की लाखों प्रतियां बिकती हैं या जिन किताबों की खूब चर्चा होती है, या जो किताबें पुरस्कृत और सम्मानित होती हैं,क्या उन्हें आम लोग पढ़ते हैं? अगर पढ़ते हैं तो आम लोग और खास लोग भी ज्ञान विज्ञान से इतने दूर क्यों हैं? क्यों हम डिजिटल दुनिया में अंध आदिम बर्बर जीवन यापन करते हैं? क्या यही प्रगति है? यही है विकास? https://www.facebook.com/share/p/181j9EgjdP/

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