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Friday, February 20, 2026
भारतीय साहित्य में आलोचना विधा आखिर क्या है?
भारतीय साहित्य में आलोचना विधा आखिर क्या है?
पलाश विश्वास
बांग्ला फिल्म चौरंगी बंगाल से बाहर कितने लोगों ने देखी? उत्तम के ग्लैमर का बंगाल से बाहर कितना असर था? सत्यजीत रे की बांग्ला फिल्में सीमाबद्ध और जन अरण्य के दर्शक कितने और कौन थे?
मृत्यु के बाद साहित्यिक के रूप में कुलीन सत्तवर्ग में अवहेलित शंकर की लोकप्रियता सत्यजीत रे और उत्तम कुमार के कारण है,यह फतवा जारी हो गया है।
बंगाल के बाहर बाकी भारत के बारे में क्या कहेंगे?
क्या यही बात तारा शंकर बंदोपाध्याय और शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय के बारे में कह सकते हैं? जिनकी कृतियों पर आधारित सुपर हिट फिल्मों की संख्या कहीं ज्यादा थी।
शंकर भी आखिर मणि शंकर बंदोपाध्याय ही थे। उनका जीवन संघर्ष और उत्थान कम रोमांचक नहीं है।
उनके पाठकों में कितने लोगों को मालूम था कि वे बंदोपाध्याय भी थे?
शंकर के लेखन में कुलीनत्व को हमेशा चुनौती मिली क्योंकि आम जनसामान्य और खास तौर पर युवाओं के संघर्ष ही उनकी कृतियों का मूल तत्व रहा है।
उनकी आशा आकांक्षाओं, उनके संघर्ष, उनके मोहभंग और उनकी त्रासदी की कथा कहने वाले शंकर कभी आलोचकों के प्रिय नहीं थे।
रवींद्र और शरत भी कम उपेक्षित नहीं थे।
खारिज कर दिए गए हिंदी और बाकी भारतीय भाषाओं के महत्वपूर्ण साहित्यकार क्या कम हैं?
क्या भारतीय साहित्य के आलोचक अब भी नाबालिग हैं और बच्चों की पसंद नापसंद एलर्जी की तरह अपना अपना साहित्यकार चुनकर उनको महिमामंडित करने में ही अपनी मेधा समर्पित कर देते हैं?
क्या विधाओं के विकसित होते रहने की इतनी अवधि बीत जाने के बावजूद आलोचना विधा का कोई विकास ही नहीं हुआ या यह विधा खेमों, गिरोहों के ध्वजारोहण के लिए है और साहित्य व जीवन से इसके कोई सरोकार हैं हीं नहीं?
Wednesday, February 18, 2026
विश्व साहित्य पर युवा आलोचक क्यों नहीं लिखते?
अमित प्रकाश सिंह Amit Prakash Singh ,जनसत्ता: मेरा सुझाव है कि जैक लंदन के प्रकाशित लेख के आधार पर हिंदी साहित्य के जनपक्षीय सोच पर एक लेख लिखना चाहिए।इसी में यह बताना चाहिए कि आज तुलनात्मक अध्ययन के खतरे बताएं जिसके चलते पाठक का अभाव आज खासा बढा है।
palash6398418084: जैक लन्दन मेरे प्रिय लेखक हैं। उनपर स्वतंत्र तौर पर लिखा जाना चाहिए।लेकिन मैं न आलोचक हूं और न लेखक। पाठक बमुश्किल अभीतक बना हुआ हूं। कोई समर्थ व्यक्ति लिखें तो बेहतर। प्रेरणा अंशु में ऐसे लेख छापने के लिए स्पेस भी नहीं निकाल सकते।
बहरहाल अमित जी के सुझाव से मैं सहमत हूं।
मैं मूलतः एक सामाजिक कार्यकर्ता हूं।लिखना पढ़ना भी मेरी सामाजिक गतिविधियों में शामिल है। विमर्श, चिंतन मंथन में मैं कतई अभ्यस्त नहीं हूं।
खुद कभी मेधावी छात्र नहीं रहा।हालांकि अंग्रेजी साहित्य से डीएसबी कॉलेज नैनीताल से MA किया है। जीआईसी नैनीताल से इंटर किया है।
हाईस्कूल तक मैं अपनी मातृभाषा बांग्ला में लिखता था। सिर्फ इसलिए कि पढ़ने लिखने की बहुत बुरी लत में फंस गया था बचपन से।तब घर में और बंगाली विस्थापित समाज में पढ़ने लिखने का जबरदस्त माहौल था। हम बांग्ला, हिंदी और अंग्रेज़ी कुछ भी पढ़ता था।
स्कूल में अंग्रेजी और हिंदी ठीकठाक थी। बस। लेकिन किताबें खरीदने के पैसे पर्याप्त नहीं होते थे। आंदोलनों और जनसमस्याओं पर पिताजी की सामाजिकता के कारण हिंदी में लिखना जरूर पड़ता था।लेकिन यह लिखने का शौक कतई नहीं था।
रोज पढ़ने के लिए नई किताबें के कैसे मिले? आइडिया यह निकला कि खुद लिखें और एक दूसरे को पढ़ाया जाए। बांग्ला यानी मातृभाषा में लिखने की प्रेरणा माइकल मधुसूदन दत्त से मिली।
जीआईसी में गुरुजी ताराचंद्र त्रिपाठी ने पकड़ लिया।कहा, हर भाषा मातृभाषा होती है। हिंदी में भी लिखों। अंग्रेजी माध्यम से इसलिए पढ़ा,क्योंकि त्रिपाठी जी का कहना था कि सत्ता और सत्ता वर्ग की भाषा अंग्रेजी है।सत्ता से टकराने के लिए अंग्रेजी जानना ही होगा।
लेखक पत्रकार बना डीएसबी के माहौल से। बनना चाहता था प्राध्यापक लेकिन झारखंड जाकर पत्रकार बन गया और शिक्षा अधूरी हो गई। पढ़ना लिखना भी क्रमशः बाधित होते होते बंद हो गया।
अब एक तो नए सिरे से लिखना पढ़ना रिटायर करने के दस साल बाद संभव नहीं है।इसके लिए राशन पानी भी नहीं है और माहौल सिरे से बदल गया है।संवाद भी लगभग बंद हो गया है।घूमना फिरना भी।
फिर साहित्य पर लिखने के लिए संबंधित विधा में सृजन का अनुभव भी होना चाहिए,जो मेरा नहीं है।पत्रकारिता की तर्ज पर साहित्य पर लिखा नहीं जा सकता।
फिरभी विश्व साहित्य पर काम बेहद जरूरी है। बांग्ला और अंग्रेजी में युवा आलोचक यह कम करते हैं।
हिंदी में डॉ उर्वशी, Indra Rathore , Sushil Kumar जैसे समर्थ और युवा आलोचकों को यह कम करना चाहिए। Zahid Khan भी अपने तरीके से शानदार काम कर रहे हैं।
शरत की रवींद्र से तुलना क्यों?
देश पत्रिका के पुस्तक विशेषांक हमेशा बहुत खास होता है। जनसत्ता के अग्रज साथी अमित जी ने इस बार के पुस्तक विशेषांक की पीडीएफ फाइल भेजी है। हिंदी में समयांतर के पुस्तक विशेषांक निकलते हैं।
अमित Amit Prakash Singh जी का आभार।
पत्रिका के पतन को देखते हुए करीब दस साल बाद इतने अच्छे अंक की उम्मीद नहीं थी।
अभी पढ़ रहा हूं।
शरत पर लेख अच्छा है। रवींद्र से तुलना की परंपरा बनी हुई है।जबकि शरत रवींद्र से एकदम अलहदा है।
शरत के लेखन में सिर्फ जीवन और मनुष्य है।सामाजिक यथार्थ है।कुछ भी अमूर्त, आध्यात्मिक नहीं है। अलग से दर्शन भी नहीं है। जो रवींद्र साहित्य की गीतात्मकता के साथ सबसे बड़ी विशेषता है।
अब भी बांग्ला साहित्य में साहित्य के मूल्यांकन के लिए टैगोर सबसे बड़ी कसौटी है।यह आलोचना की सीमा है।
जैक लन्दन पर लिखा आलेख पठनीय है और इसमें जैक की तुलना किसी से नहीं की गई।
हिंदी में भी प्रेमचंद, निराला,मुक्तिबोध को किसी भी रचनाकार के सामने खड़ा कर दिया जाता है।सापेक्षिक यह मूल्यांकन साहित्य का वस्तुनिष्ठ विवेचन नहीं है।
Monday, February 16, 2026
क्या हमारे बच्चे लावारिश हैं?
#क्या_हमारे_बच्चे_लावारिश_हैं_?
पलाश विश्वास
ईलॉन मस्क कह रहे हैं कि AI के दौर में मेडिकल की पढ़ाई करने की ज़रूरत नहीं है। आने वाले सालों में AI ही सारे इलाज करेगा। AI कंपनियों के मालिक कहते हैं कि वकालत का काम भी AI ही करेगा। मैनेजमेंट और बाक़ी नौकरियाँ भी AI के सामने नहीं टिक पाएंगी। अगर इस दुनिया में कोई काम ही नहीं बचेगा, सब कुछ AI ही करेगा, तो फिर यह दुनिया किस काम की रह जाएगी? मानव इतिहास एक लाख साल पुराना है। क्या AI की रफ़्तार के सामने मानवता के वजूद पर ही सवाल खड़ा हो जाएगा?
Ravish Kumar
इसके बाद शत प्रतिशत अंक और शत प्रतिशत रिजल्ट, गला का प्रतिस्पर्धा और कामयाबी की आंधी दौड़ से क्या हासिल होगा? सभ्यता और मनुष्यता के अस्तित्व का सवाल है यह,सिर्फ रोजगार का सवाल नहीं है।
मशीनें सबकुछ कर देंगी तो मनुष्य के जीने का क्या मतलब रह जाएगा?
बुनियादी जरूरत है भोजन, जो जमीन से मिलता है। जमीन पर अब सीमेंट का जंगल है।
फिर घर, परिवार और समाज,देश मनुष्य को मनुष्य बनाता है।भाषा और संस्कृति, विरासत, इतिहास और पर्यावरण से सभ्यता का विकास होता है। ये अब जरूरी नहीं रह गई है।सब कुछ टूट बिखर रहा है।
प्रकृति से संबंध विच्छेद हो गया है। न अमन चैन है और न मुहब्बत है।जो हाल है,निकट भविष्य में बच्चे भी मशीनें पैदा करेंगी।
चुनौती इतनी बड़ी है। आज विचार, संवेदना, विवेक, नैतिकता, रचनात्मकता और नेतृत्व, शोध और आविष्कार, अमन चैन और मुहब्बत की सबसे ज्यादा जरूरत है। लेकिन हो क्या रहा है?
घर परिवार समाज देश और शिक्षा संस्थानों में पढ़ने लिखने की संस्कृति क्या है? हम कितने संवेदनशील हैं,कितने नैतिक और विवेकशील हैं? विचारों की कितनी स्वतंत्रता है? बिना संवेदना, बिना प्रेम, बिना विवेक कहीं रचनात्मकता और नेतृत्व संभव है?
हमारे बच्चे क्या सीख रहे हैं?
हमारे बच्चे क्या लिख पढ़ रहे हैं?
कामयाबी के लिए तेज और मेधावी बच्चे,वे भी कुलीन वर्ग के बच्चे सबको प्रिय हैं। औसत बच्चों, पिछड़े और कमजोर बच्चों,हाशिए के बच्चों की हम कितनी मदद करते हैं।
अब बहुत जल्दी उनके हाथ और पैर काट दिए जाएंगे।
उनसे उनकी सारी इंद्रियां छीन ली गई हैं। प्रकृति से वे बेदखल हैं।जमीन छीन ली गई है।मौसम छीन लिया गया है।जलवायु बदल दिया गया है।
उनके सपनों और विचारों पर सख्त पहरा है।
अभी तक नहीं सोचा है तो जरूर सोचिए।
वक्त बहुत कम है।
Monday, February 9, 2026
हिंदी के रचनाकार क्या नर्सरी के बच्चे हैं?
हिंदी के रचनाकार क्या नर्सरी के बच्चे हैं?
पलाश विश्वास
जीवन के व्यावहारिक अनुभव के बिना सिर्फ भाषाई दक्षता, दूसरों के अनुकरण, विमर्श और अस्मिता के तहत लिखी गई रचनाएं हमें कतई नहीं चाहिए। हर रचना में प्राण होना चाहिए।हर शब्द में संवेदना की गहराई और सघनता अनिवार्य है रचना के रचना होने के लिए।
सिर्फ छपने के लिए कृपया रचना कतई न भेजें। हम बेहद स्पष्ट तौर हर अंक के लिए विषय और अपेक्षित सामग्री के बारे में निरंतर संवाद करते रहते हैं।
ज्यादातर रचनाओं का विषय से कोई मतलब नहीं होता और न ही उनमें रचनात्मकता जैसी कोई चीज होती है। आपको जिसके बारे में कोई जानकारी नहीं है और न कोई व्यवहारिक अनुभव है ,उसपर लिखना क्या जरूरी है? हर अंक में आपकी रचना छपेगी तो नए रचनाकारों के लिए जगह कैसे बनेगी?
अपने मन मुताबिक कुछ भी लिखकर हर अंक में छपने की उम्मीद करना क्या सही है?
विषय के मुताबिक जो सामग्री हमें चाहिए, वह बेहद कम मिल पाती है। यह बेहद दुखद है।
हमने मेहनतकश स्त्रियों पर एक स्त्री विशेषांक निकाला था,आपको याद होगा। मेहनतकश स्त्री कहां नहीं है? स्त्री की मेहनत से ही दुनिया बनती है।लेकिन अस्मिता,वाद, विचार और विमर्श का झंडा उठाने वालों का अपने आस पास की मेहनती स्त्री और खासतौर पर निचले तबकों की,सतह की नीचे की औरतों से कोई सरोकार है या नहीं,नहीं मालूम,लेकिन उनके जीवन के बारे में व्यवहारिक अनुभव लगभग नहीं है। यह अंक बहुत मुश्किल से निकला।
हम चाहते हैं कि मार्च में छप रहे प्रेरणा अंशु के स्त्री विशेषांक में किशोरियों की रचनात्मकता और उनकी समस्याओं पर फोकस बने। लेकिन ज्यादा रचनाओं का किशोरियों से कोई लेना देना नहीं है। स्त्री पर स्त्री होने से ही सार्थक लिखना संभव नहीं है क्योंकि स्त्रियां भी दूसरी स्त्रियों के भोगे हुए यथार्थ को न जीवन में और न रचना में जी सके,इसकी कोई गारंटी नहीं। पुरुष भी बिना वास्तविक अनुभव के स्त्री पर लिख रहे हैं जबकि अंक किशोरियों की समस्याओं पर केंद्रित है।
क्या हिंदी भाषा और साहित्य में किशोरियों के मन, मानस,जीवन यापन, उड़ान और समस्याओं पर कभी लिखा ही नहीं गया है? तो विषय आपको समझ में क्यों नहीं आता।क्या हिंदी के रचनाकार अभी नर्सरी के बच्चे हैं? जिन्हें किसी विषय की समझ ही नहीं होती?
किस घर में तीन एजर बेटी नहीं है? हमने सबसे खा था कि आपका लिखना जरूरी नहीं है, बेटियों से जरूर लिखवाएं। सबने अपनी अपनी रचनाएं भेज दी,बेटियों से रचनाएं किसी ने नहीं भिजवाई।
क्यों? बेटियों को क्या लिखने की इजाजत नहीं है?
क्यों? बेटियों क्या लिखना नहीं जानती या नहीं चाहती?
इस अंक में आप न लिखते,बेटी को लिखने देते तो क्या महाभारत अशुद्ध हो जाता?
हमीं लोग हैं जो लिंग भेद की बात करते हैं, आजादी, अस्मिता और विमर्श के नारे उछालते हैं लेकिन कतई नहीं चाहते कि हमारी बेटियां अपनी बात लिखें, कहानी कविता आलेख भी लिखें, समस्याओं पर चर्चा करें?
मुझे बहुत दुख हो रहा है।
क्या बेटियों के मन मानस उड़ान को कैद करके माताएं खुद उड़ान पर हैं?




