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Wednesday, February 18, 2026
विश्व साहित्य पर युवा आलोचक क्यों नहीं लिखते?
अमित प्रकाश सिंह Amit Prakash Singh ,जनसत्ता: मेरा सुझाव है कि जैक लंदन के प्रकाशित लेख के आधार पर हिंदी साहित्य के जनपक्षीय सोच पर एक लेख लिखना चाहिए।इसी में यह बताना चाहिए कि आज तुलनात्मक अध्ययन के खतरे बताएं जिसके चलते पाठक का अभाव आज खासा बढा है।
palash6398418084: जैक लन्दन मेरे प्रिय लेखक हैं। उनपर स्वतंत्र तौर पर लिखा जाना चाहिए।लेकिन मैं न आलोचक हूं और न लेखक। पाठक बमुश्किल अभीतक बना हुआ हूं। कोई समर्थ व्यक्ति लिखें तो बेहतर। प्रेरणा अंशु में ऐसे लेख छापने के लिए स्पेस भी नहीं निकाल सकते।
बहरहाल अमित जी के सुझाव से मैं सहमत हूं।
मैं मूलतः एक सामाजिक कार्यकर्ता हूं।लिखना पढ़ना भी मेरी सामाजिक गतिविधियों में शामिल है। विमर्श, चिंतन मंथन में मैं कतई अभ्यस्त नहीं हूं।
खुद कभी मेधावी छात्र नहीं रहा।हालांकि अंग्रेजी साहित्य से डीएसबी कॉलेज नैनीताल से MA किया है। जीआईसी नैनीताल से इंटर किया है।
हाईस्कूल तक मैं अपनी मातृभाषा बांग्ला में लिखता था। सिर्फ इसलिए कि पढ़ने लिखने की बहुत बुरी लत में फंस गया था बचपन से।तब घर में और बंगाली विस्थापित समाज में पढ़ने लिखने का जबरदस्त माहौल था। हम बांग्ला, हिंदी और अंग्रेज़ी कुछ भी पढ़ता था।
स्कूल में अंग्रेजी और हिंदी ठीकठाक थी। बस। लेकिन किताबें खरीदने के पैसे पर्याप्त नहीं होते थे। आंदोलनों और जनसमस्याओं पर पिताजी की सामाजिकता के कारण हिंदी में लिखना जरूर पड़ता था।लेकिन यह लिखने का शौक कतई नहीं था।
रोज पढ़ने के लिए नई किताबें के कैसे मिले? आइडिया यह निकला कि खुद लिखें और एक दूसरे को पढ़ाया जाए। बांग्ला यानी मातृभाषा में लिखने की प्रेरणा माइकल मधुसूदन दत्त से मिली।
जीआईसी में गुरुजी ताराचंद्र त्रिपाठी ने पकड़ लिया।कहा, हर भाषा मातृभाषा होती है। हिंदी में भी लिखों। अंग्रेजी माध्यम से इसलिए पढ़ा,क्योंकि त्रिपाठी जी का कहना था कि सत्ता और सत्ता वर्ग की भाषा अंग्रेजी है।सत्ता से टकराने के लिए अंग्रेजी जानना ही होगा।
लेखक पत्रकार बना डीएसबी के माहौल से। बनना चाहता था प्राध्यापक लेकिन झारखंड जाकर पत्रकार बन गया और शिक्षा अधूरी हो गई। पढ़ना लिखना भी क्रमशः बाधित होते होते बंद हो गया।
अब एक तो नए सिरे से लिखना पढ़ना रिटायर करने के दस साल बाद संभव नहीं है।इसके लिए राशन पानी भी नहीं है और माहौल सिरे से बदल गया है।संवाद भी लगभग बंद हो गया है।घूमना फिरना भी।
फिर साहित्य पर लिखने के लिए संबंधित विधा में सृजन का अनुभव भी होना चाहिए,जो मेरा नहीं है।पत्रकारिता की तर्ज पर साहित्य पर लिखा नहीं जा सकता।
फिरभी विश्व साहित्य पर काम बेहद जरूरी है। बांग्ला और अंग्रेजी में युवा आलोचक यह कम करते हैं।
हिंदी में डॉ उर्वशी, Indra Rathore , Sushil Kumar जैसे समर्थ और युवा आलोचकों को यह कम करना चाहिए। Zahid Khan भी अपने तरीके से शानदार काम कर रहे हैं।

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