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Monday, January 19, 2026

खुद को बदलकर देखें

दिनेशपुर हाईस्कूल से नैनीताल में डीएसबी कॉलेज परिसर में जीआईसी में 1973 में जब हमने प्रवेश किया तो पढ़ने लिखने का जबरदस्त माहौल था। डीएसबी रीडिंग रूम और लाइब्रेरी के अलावा मालरोड के दुर्गा साह पुस्तकालय हमारे लिए ज्ञान के खजाने थे।सारे सहपाठी,मित्र और प्रोफेसर भी पढ़ने लिखने वाले थे। हम चूंकि शुरू से करियरिस्ट नहीं थे, हम अपने पाठ्यक्रम के अलावा दुनियाभर के साहित्य और ज्ञान विज्ञान की जरूरी किताबें पढ़ते थे।हम सभी। इसपर कॉलेज और मालरोड पर हिमपात के मध्य भी हमारी निरंतर चर्चा होती थी। किताबें तब मोटी होती थी। लेकिन हम कोई किताब शुरू करके अंत तक जरूर पढ़े थे।खाना पीना नहाना सोना सबकुछ छोड़कर। हमारी पीढ़ी ही ऐसी थी। लिखना नियमित शुरू हुआ नैनीताल समाचार से। जस का तस कितना ही लंबा लिखने की आदत बन गई। Rajiv Lochan Sah दा कहते रहते,थोड़ा छोटा लिखो।हम कभी नहीं माने। 1980 में दैनिक आवाज धनबाद से पेशेवर पत्रकारिता शुरू की।छह पेज के अखबार में हर रोज एक डेढ़ पेज मेरे होते थे। कोयला खानों, आदिवासियों और मजदूरों के बारे में मेरे लिखे के पाठक भी पूरे झारखंड में थे।जो अब भी हमारे साथ हैं। दैनिक जागरण और दैनिक अमर उजाला में तो पहले ही पेज पर लगभग रोज मेरे लंबे लंबे लेख छपते थे। जनसत्ता में चूंकि संपादकीय के लोग न रिपोर्टिंग करते थे और न उन्हें लिखने का मौका था। अखबारों में लंबा लिखने का पटाक्षेप हो गया। डीएसबी से ही कहानियां कविताएं छपने लगी थीं। मेरी लगभग सभी कहानियां लंबी या बहुत लंबी होती थी। उनका मिशन, नई टिहरी पुरानी टिहरी कहानी के रूप में लघु उपन्यास ही थे। कविताएं भी लंबी छपती थीं।जैसे तराई कथा पूरे बत्तीस पेज की। अमेरिका से सावधान इंटरैक्टिव नोवेल था,जो दस साल तक छपता रहा।इतना लंबा छपा कि समेटना असंभव हो गया। अंग्रेजी में लेख चूंकि दुनियाभर में छपते थे, उनकी लंबाई अंग्रेजी पत्र पत्रिकाओं के मुताबिक होती थी।लेकिन मेरे ब्लॉग बहुत लंबे होते थे।हिंदी और अंग्रेजी में। बांग्ला में मेरे पाठक कम हैं,इसलिए बांग्ला में लिखे सारे ब्लॉग छोटे थे। बांग्ला में प्रकाशित आलेख भी। यूट्यूब पर चैनल चलाया अंग्रेजी में तो वीडियो तीन तीन घंटे के बनते गए। कुल हासिल क्या हुआ? लगभग शून्य। नब्बे के दशक में ही इंटरनेट और गूगल से पहले की दुनिया में अंग्रेजी अखबार हिंदू ने शेषांश छापना बंद कर दिया। अखबारों को बदलती दुनिया का सच पहले समझ में आया। फिर बाजार के मुकाबले अखबारों को वैचारिक सामग्री की जरूरत नहीं रही। जरूरी लेखन के बजाय ट्रेडिंग लेखन शुरू हो गया और हम तब भी अपनी शर्तों पर लिखना चाह रहे थे। प्रिंट से बाहर हो गए। अब प्रासंगिक और जरूरी जैसी कुछ बात है भी नहीं।सबकुछ ट्रेडिंग है। प्रेरणा अंशु का संपादन करते हुए आर्थिक संकट के साथ साथ कंटेंट संकट का सामना किया।लेकिन पठनीयता और पाठकीय संकट सबसे ज्यादा गहरा हो गया। जो पत्रिकाएं बौद्धिक और शोध सामग्री प्रकाशित करती हैं या प्रतिष्ठित लोगों को ही छापती हैं,उनके लिए कोई संकट है या नहीं, हम नहीं जानते। उनके पाठक निश्चित तौर पर होंगे। हमारे पाठक ऐसे आम लोग हैं,जो पढ़ने लिखने की दुनिया से बाहर हाशिए के लोग हैं। हमारे ज्यादातर रचनाकार नए और युवा हैं और इनमें भी ज्यादातर वंचित वर्गों और समूह के लोग हैं। पत्रिका जनता के लिए और जन सहयोग से ही चलती है तो जनता को पत्रिका से जोड़े रखना हमारी मजबूरी है,जबकि हम जनता के मुद्दों पर ही पत्रिका निकाल रहे हैं।बाजार के तौर तरीके हम अपना नहीं सकते। लोग पढ़ नहीं रहे। अपने मुद्दों में भी उनकी रुचि नहीं है। दृष्टि नहीं है।समझ नहीं है। ऐसे पाठकों को जोड़ने के लिए बेहद रचनात्मक होने की जरूरत है। ये सभी लोग डिजिटल हो गए हैं। जितना समय वे दें,उतने में ही सटीक,तथ्यपूर्ण,प्रभावी और संक्षिप्त लिखने की जरूरत है। इसलिए अब हम ठोस लेखन की दिशा में बढ़ना चाहते हैं। यह हम सबके लिए चुनौती है। कमोबेश सबको लंबा लिखने की आदत है। हम 1973 से अब तक लंबा ही लिखते रहे हैं। हमें अपनी आदत बदलनी पड़ रही है।लोग पढ़े ही नहीं तो पत्रिका हो या किताब, छापने का क्या मतलब है? प्रेरणा अंशु में अब मैं एक पेज से लंबा कुछ नहीं लिखूंगा। कोशिश और प्रयोग करके देखने में हर्ज क्या है? यह सही है कि जो पढ़ते नहीं हैं,उनके लिए काला अक्षर भैंस बराबर हैं। लंबा हो या छोटा, बहुसंख्य पाठकों को पढ़ने लिखने की संस्कृति से जोड़ने की चुनौती उंगली पर हिमालय उठाने की जैसी है। हम हिमालय के लोग हैं। हार कैसे मान लें? कुछ नया करके ही देख लें। सत्तर साल की जिंदगी में हम कामयाब कभी नहीं रहे। एकबार फिर नाकाम ही तो होंगे। आप हमारे साथ हैं?

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