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Monday, November 24, 2025
विस्थापित अपने पुरखों को भूल गए,डोडो को याद हैं पुलिनबाबू
कोई याद करें, न करें, #डोडो #पुलिनबाबू को याद ही नहीं करता,उनसे मिलता भी है
डोडो का जन्म महामारी के दौरान 6 जून 2022 को हुआ तो मेरे पिताजी पुलिनबाबू का निधन इससे ठीक इक्कीस साल पहले 14 जून 2001 को हो गया था।
डोडो ने पुलिनबाबू को नहीं देखा, फिर भी वह अक्सर पुलिनबाबू को याद करता है।
स्मृति व्यक्तिगत नहीं है।
स्मृति एक सतत् प्रवाहमान अनंत नदी है जो अनंतकाल से बहती है।यही विरासत है। यही इतिहास है। यही मनुष्यता है।यही सभ्यता है।
देश भर में और सरहद के उसपार भी इस महादेश के करोड़ों विस्थापितों के पुनर्वास की लड़ाई आखिरी सांस तक लड़ते रहे पुलिनबाबू।विस्थापन के खिलाफ हमेशा लड़ते रहे। हमेशा सोचा कि हम रहें या न रहें, हम सही सलामत रहे या न रहे, हमारे लोग हमेशा सही सलामत रहे।हमारे करोड़ों आत्मीय जन। कभी अपने लिए नहीं सोचा। हर विस्थापित की चिंता उन्हें थी।
इसीलिए उत्तराखंड की कड़ाके की सर्दी में बिना कमीज धोती और चादर में उन्होंने आधी सदी का पुनर्वास संग्राम किया। रुद्रपुर से रानाघाट, बंगाल, ओडिशा से लेकर समूचे दंडकारण्य और अंडमान तक हजारों लोगों के पुनर्वास की व्यवस्था संवाद और संघर्ष के रास्ते की।
पूर्वोत्तर भारत से मध्यभारत में विस्थापितों के संकट के दौरान उनके साथ खड़े रहे।जैसे असम में।किसान आंदोलनों का नेतृत्व करते रहे।
हमने उनके संबंधों को नकदी नहीं बनाया और न उन्होंने अपने लिए कुछ किया या बनाया।
उत्तराखंड और उत्तरप्रदेश के विस्थापितों के साथ तो वे हर वक्त रहे।उन्हें कितने लोग याद करते हैं?
परिजनों और नाते रिश्तेदारों को हमेशा अफसोस रहा कि उन्होंने उनके लिए कुछ नहीं किया। इन लोगों में से किसी की पुलिनबाबू की संघर्ष महागाथा, विभाजनपीड़ितों के नए जीवन के महासंग्राम में वैसे ही कोई दिलचस्पी नहीं है,जैसे शक्तिफार्म और दिनेशपुर के विस्थापित समाज की नहीं है।विस्थापितों के किसी नेता ने पुलिनबाबू पर लिखी मेरी किताब देखने तक की जहमत नहीं उठाई।
डोडो ने पुलिनबाबू को नहीं देखा।लेकिन उन पर लिखी किताब पढ़ना चाहता है।वह बेहद चंचल है। मेरे साथ बैठकर लिखने पढ़ने की कोशिश जरूर करता है। उसके माता पिता के पास वक्त नहीं है। स्कूल में शिक्षक भी उसकी कोई मदद नहीं करते।
लेकिन डोडो को मेरा लिखा पढ़ना जरूर है। उसे जैसा भी हूं मैं मुझ जैसा बनना है और अपने बूढ़े बाबा का जैसा बनना है।उन्हें जानना समझना है।
यह उसका कहना है।
उसने मुझसे वायदा किया है कि वह खूब लिखेगा।खूब पढ़ेगा।खूब सीखेगा। लेकिन उसका साथ कौन देगा? मुझे सबसे बड़ी चिंता यह है।
स्मृतियां की हजारों सालों की अनंत नदी जो उसके मांस में उमड़ घुमड़ रही है,हिंसा,घृणा और स्वार्थ के जहरीले परिवेश में कब तक बची रहेगी?
स्मृतियां उनके लिए सहेजने, अपने पुरखों की विरासत से उन्हें जोड़ने और आगे की लड़ाई के योग्य बनाने के लिए क्या हम कुछ कर पाते हैं।
रविवार को मैं घर पर हुआ तो वह नदी या खेतों के पास जाने की जिद करता है।
कल दोपहर बाद चार बजते न बजते उसने कहा,दादा,चलो घूरे आसी।
मेरे तैयार होने से पहले वह घर से निकलकर सड़क पर जाकर खड़ा हो गया।ठंड हो रही थी।इसलिए मेरी टोपी भी पहन रखी थी।
मैं उस तक पहुंचा तो फौरन मुझसे कहा, चलो बूढों बाबर काछे जाई।पुलिनबाबूर साथे देखा कोरबो।
गांव के श्मशान घाट में आंदोलनों और संघर्ष के अपने बसंतीपुर के साथियों के साथ पुलिनबाबू विश्राम कर रहे हैं। वहां उनका स्मृति स्थल है।जैसे दिनेशपुर में उनकी मूर्ति है।दिनेशपुर में वह अक्सर जाता है। मूर्ति से मिलकर आता है।
गांव का श्मशान घाट भूमिहीन नदी किनारे के मोहल्ले के अंत में अर्जुनपुर गांव के इस पर घर से एक किमी दूर है। जहां वह दो तीन बार गया है हमारे साथ।
आज वह मुझे रास्ता दिखाते हुए उस स्मृति स्थल ले गया। वहां पानी की बड़ी टंकी है।पिताजी की समाधि के आस पास कीचड़ है। उस कीचड़ के पार जाकर उसने मत्था टेका।आहिस्ते से पुलिनबाबू को संबोधित करते हाय पूछा, बूढ़ों बाबा, भालो आछो?
श्मशान घाट से सटा हुआ नया आंगनबाड़ी भवन बना है। हम पहली बार देख रहे थे।श्मशान घाट पर एक वट वृक्ष है।उसकी दलों पर मोहल्ले के बच्चे खेल रहे थे। डोडो ने उस पर पहले चढ़ने की कोशिश की।चढ़ नहीं सका तो मैने नीचे की डाल पर उसे बैठा दिया।
उसने ऐलान किया,अपने घर में ट्री हाउस बनाएंगे।असीम हम रहेंगे।
बाहर निकलकर आंगनबाड़ी के सामने खेलने लगा डोडो।मुझे नदी के पास ले गया जो मरणासन्न है और श्मशान के क्रिया कर्म, कर्मकांड के लिए ही शायद जिंदा रखी गई है।डोडो ने पूछा, नदी क्यों मर रही है?
मुहल्ले के एक बुजुर्ग का घर ठीक आंगनबाड़ी के सामने है तो उन्होंने हमें बैठा लिया।डोडो नहीं बैठा। वह चिड़ियोंसे बतियाने लगा।
तभी बुजुर्ग के आर्किटेक्ट बेटा ने कहा कि थोड़ा रुकिए, चाय पीकर जाए। मैने कहा,फीकी।
बहू ने कहा, खजूर के गुड़ की बना रहे हैं।उन्होंने खजूर का गुड़ अलग से डोडो को दी।
बुजुर्ग को एस आई आर और दूसरी समस्याओं पर चिंता है तो इन सभी मुद्दों पर बात होने लगी।
चाय मिली तो डोडो ने कहा,बिस्किट भी चाहिए।
बिस्किट के साथ चाय पीकर डोडो ने घर की राह पकड़ी।तब तक अंधेरा हो गया।
फिरभी हर रोज सूरज उगता है।
घने कोहरे में भी सूरज उगता है।
क्या सूरज के उगने से ही अंधेरा दूर होता है?
फिर हमारे दिल और दिमाग में इतना अंधेरा क्यों है?,
बच्चों की आंखों में समूचे ब्रह्मांड का प्रकाश है।
लेकिन हम यह प्रकाश मिटाकर उन्हें अंधेरे में क्यों धकेल रहे हैं?
नोट:
कुछ साथी विस्थापन के यथार्थ,पुनर्वास की लड़ाई पर केंद्रित मेरी किताब लेना चाहते हैं। यह किताब Amazon स्टोर में उपलब्ध है और दिल्ली से वितरित हो रही है।इच्छुक साथ इस लिंक पर जाकर किताब के लिए सीधे ऑर्डर कर सकते हैं।
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