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Sunday, November 2, 2025

खबरों की पितृसत्ता

खबरों की वरीयता में भी लिंगभेद? पलाश विश्वास
बेटियों का विश्वचैंपियन बनने की खबर भी लीड लायक नहीं। पुरुष टीम की आम जीत ही प्रमुख। खेलों में महिलाओं के दुनिया जीतने की खबर इसी तरह नजरअंदाज कब तक होती रहेगी? बेटियों को अब अंतरिक्ष भी जीतना होगा। हमने 1980 में जब दैनिक आवाज में काम शुरू किया तो खबरें कंपोज करने और अखबार छापने की मशीनें पुरानी होती थी।फिरभी आधी रात तक की खबरें वरीयता और महत्व के अनुसार छापते थे। पेज नए सिरे से बनाते थे। धनबाद में रहते हुए शायद 1981 में बांग्ला अखबार आजकल और टेलीग्राफ फोटो टाइप सेटिंग के साथ ऑफसेट मशीन से शुरू हुआ। 1991 में जब हम जनसत्ता में थे, तब किसी भी बड़ी घटना, उपलब्धि की खबर के लिए पूरा अखबार हम आधे घंटे में नए सिरे से तैयार करके समुचित को कवरेज के साथ प्रेस में देकर छाप लेते थे। 1984 में दैनिक जागरण और 1990में दैनिक अमर उजाला में हमने पहाड़ जाने वाले अखबारों को भी अखबार छाप रहे प्रेस को रोककर छापा है। भोर साढ़े चार बजे या यहां तक कि सुबह पांच बजे की घटनाओं को भी फील्ड रिपोर्टिंग के साथ नई तकनीक से अखबार का लीड या बैनर बनाकर छापा है। हमें रिटायर हुए दस साल होने को हैं।तीस साल की तकनीक अब बहुत ज्यादा आधुनिक हो गई। रात डेढ़ बजे तक महिलाओं के चैंपियन बनने की खबर ग्लोबल थी। फिरभी पुरुष टीम की खबर प्रमुखता से छापने और महिलाओं के चैंपियन बनने की खबर एक कोने में छापने की रस्म अदायगी बताती है कि पितृसत्ता अब भी कितनी मजबूत है। श्रीमती इंदिरा गांधी जब प्रधानमंत्री बनी, तो देश की पहली और एकमात्र महिला प्रधानमंत्री को स्वीकार करने में पितृसत्ता की राजनीति तैयार नहीं थी।उन्हें कठपुतली कहा गया। जब उन्होंने बैंकों,खनिजों का राष्ट्रीयकरण किया और प्रिवी पर्स खत्म कर दिया, तभी से उनका विरोध तेज होता गया। क्या यह पितृसत्ता ही नहीं हैं जो इंदिरा को इतिहास से मिटाने पर आमादा है? स्त्री मुक्ति की लड़ाई के बिना मनुष्यता और सभ्यता का बर्बर युग कभी खत्म नहीं होगा।विज्ञान और तकनीक की चकाचौंध में भी हम दरअसल आदिम अंधकार में हैं। हमारी बेटियों को इस पितृसत्ता को ध्वस्त करना ही होगा।

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