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Sunday, November 16, 2025
नमोशूद्र कोई जाति नहीं है,यह पूरे बहुजन समाज के आंदोलन का नाम
#नमोशूद्र कोई #जाति नहीं है। और न ही #नमोशुद्र_आंदोलन किसी एक जाति का आंदोलन है।
नमो शूद्र का शाब्दिक अर्थ है शूद्र को प्रणाम। मनुस्मृति कानून में सभी अधिकारों से वंचित सभी शूद्रों, अति शूद्रों, अस्पृश्यों और मनुस्मृति के अनुसार दासी,सभी अधिकारों से वंचित स्त्रियों को प्रणाम।
नमोशुद्र, नमोशूद्र आंदोलन और मतुआ आंदोलन पर लिखने बोलने वाले इसे चांडालों के मुक्ति आंदोलन के रूप में चिन्हित करते हैं।
शूद्रों की जय से तात्पर्य है कि मेहनतकश जनता की जय। इस आंदोलन का झंडा है लाल। यह मनुस्मृति कानून, वैदिकी सभ्यता, पुरोहित तंत्र के साथ साथ सामंतवाद, पूंजीवाद और साम्राज्यवाद के विरुद्ध मुक्ति संग्राम, युद्ध घोषणा है, कानूनी लड़ाई है जो दो सौ साल पहले शुरू हुआ।
नमोशुद्र आंदोलन के परिणाम स्वरूप भारतीय राजनीति में डॉ आंबेडकर के पदार्पण से पहले 2011 में अविभाजित बंगाल में अस्पृश्यता निषिद्ध कर दी गई। सभी शूद्रों, अतिशुद्रों और अस्पृश्यों की मुक्ति का द्वार खुला, जिसे भारत के संविधान निर्माता डॉ बाबासाहेब आंबेडकर ने सारे देश में अनुसूचित जातियों, जनजातियों, पिछड़ों और स्त्रियों के लिए समता,न्याय और स्वतंत्रता का कार्यक्रम बना दिया।
गुरुचांद ठाकुर ने नमोशुद्र शब्द का प्रयोग किसी एक जाति, या धर्म के लोगों के लिए नहीं किया। आंदोलन में शामिल सभी शूद्र अछूत जातियों के अलावा आदिवासी और मुसलमान भी नमोशुद्र थे उनके लिए। कुल बत्तीस अछूत जातियों को गोलबंद किया था गुरुचांद ठाकुर ने।
1875 में ग्रामीण बंगाल में अस्पृश्यों, किसानों की अभूतपूर्व हड़ताल से इस आंदोलन की शुरुआत हुई।
बहुजन राजनीति के जन्मदाता थे गुरूचांद ठाकुर।
इससे भी पहले आज से दो सौ साल पहले बहुजनों यानी दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों,मुसलमान किसानों और स्त्रियों के सभी कानूनी अधिकारों की बहाली के लिए मतुआ आंदोलन शुरू किया गुरुचांद ठाकुर के पिता हरिचांद ठाकुर ने।
यह मेहनतकश कृषिजीवी वंचितों के कानूनी अधिकार का आंदोलन के रूप में शुरू हुआ मतुआ आंदोलन जो भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में किसान आदिवासी विद्रोह का अविच्छिन्न अंग था।
जैसे सन्यासी विद्रोह सिर्फ संन्यासियों का विद्रोह नहीं था और न ही यह म्लेच्छ मुसलमान शासकों के खिलाफ कोई आंदोलन था,जैसा कि आनंदमठ की कथा है,जिसे इतिहास बना दिया गया है। सन्यासी विद्रोह दरअसल आदिवासी, किसान, शूद्र, साधु, संत बाउल फकीर विद्रोह है, जिसमें 1857 की क्रांति की तरह मुसलमानों की व्यापक हिस्सेदारी थी।
सन्यासी विद्रोह मुसलमानों के खिलाफ नहीं, भूमि सामंतों, राजाओं,नवाबों और ब्रिटिश हुकूमत के विरुद्ध भारतीय मेहनतकश वंचित तबकों का सामंतवाद्विरोधी, पूंजीवादविरोधी, साम्राज्यवाद्विरोधी आंदोलन है।
किसी जाति,समूह,संप्रदाय या धर्म अनुयायियों का आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का आदिवासी किसान आंदोलन या भारत में आज तक हुआ कोई भी किसान आंदोलन नहीं था।
हरिचांद ठाकुर ने इस दुनिया में पहलीबार जमीन पर किसानों के कानूनी अधिकार के लिए युद्ध घोषणा की थी, ऐलान किया था हल जिसका चले जमीन पर,जमीन उसी का।स्त्री शिक्षा और स्त्री मुक्ति आंदोलन की शुरुआत भी उन्होंने कानूनी लड़ाई बतौर की। समता, न्याय और स्वतंत्रता उनका लक्ष्य था। वे और उनके अनुयायी शूद्र, पिछड़े, अस्पृश्य, आदिवासी,स्त्रियां और मुसलमान किसान नील विद्रोह, ढाका, राजशाही, पबना के किसान विद्रोह समेत सभी किसान विद्रोह में शामिल थे।
यह न जाति विशेष और न किसी धार्मिक समुदाय या समूह का आंदोलन नहीं है। यह भारत के वंचित किसानों और सभी स्त्रियों के हक हुकूक के लिए कानूनी अधिकार प्राप्त करने का महासंग्राम है।
मतुआ राजनीति और ठाकुर वंशजों ने इस आंदोलन को निजी हितों का आंदोलन बना दिया है, लेकिन हरिचांद गुरुचांद की कानूनी लड़ाई, उनके विचारों की लड़ाई लड़ने वाले करोड़ों लोग सरहदों के आर पार हैं।
कोलकाता छोड़ने के बाद आज करीब नौ साल में किसी मतुआ सम्मेलन को संबोधित करने का मौका मिला। आमतौर पर ऐसे सम्मेलनों को राजनेता, मंत्री, केंद्रीय मंत्री और मुख्यमंत्री ही संबोधित करते हैं।
इतिहास को सत्तापक्ष इसी तरह बदलता है।
आयोजकों का आभार मुझे अपनी बात रखने का अवसर देने के लिए और युवा साथियों का आभार मेरा पूरा संबोधन टुकड़ों में लाइव प्रसारित करने के लिए।
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