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Sunday, November 16, 2025

The Child is the father of the Man

#The_Child_is_the_father_of_the_Man #मैं_दादा_आप_डोडो #बच्चों को उनका #साहित्य दें,तो #मोबाइल छोड़ेंगे दिनेशपुर के एक रिटायर्ड अध्यापक हैं सत्यरंजन जी। डॉ जी एल खुराना समाजोत्थान समिति के अध्यक्ष हैं। हम उनके चैंबर में प्रेरणा अंशु का बाल विशेषांक प्रथम देने गए थे।तभी सत्यरंजन जी के तीन साल के पोते का अपनी मां और पापा के साथ चैंबर में प्रवेश हुआ। प्रेरणा अंशु की प्रति डॉ साहब की मेज पर पड़ी थी। बच्चा अपने पिता की गोद में था। उसकी नजर पड़ी और हजाओं फूल खिल गए। सुगंध से हम भी महक उठे। जिराफ! कहते हुए बच्चे ने हाथ बढ़ाया और हमने उसके हाथों में प्रेरणा अंशु दे दी। इससे पहले घर पहुंचते ही पत्रिका पर नजर पड़ते ही डोडो ने ऐलान कर दिया था, ये किताब मेरी है। वह चार साल का है।मन मोबाइल में है। इधर वह रोज कहने लगा है: मैं दादा, आप डोडो। आप डोडो बन जाओ।मुझे बनना पड़ता है। सविता कहती है, दादा तो डोडो बन जाएंगे लेकिन डोडो क्या दादा बनेंगे। पढ़ना लिखना सीखो पहले।फिर दादा बनना। डोडो का मन चंचल है।कार्टून देखते देखते बातूनी हो गया है।हाथ पैर खूब चलते हैं।लेकिन पेंसिल नहीं चलती। हम बार बार उसे पेंसिल पकड़ना सिखाते और वह पकड़ ढीली कर देता।अक्षर आखिर आकृतियां हैं।चित्र हैं। हम चित्र बनाने के लिए उसे प्रोत्साहित करते। लेकिन पकड़ कमजोर होने और पेंसिल पर जोर न पड़ने से आकृतियां नहीं बनती। प्रेरणा अंशु का बाल विशेषांक देखने के बाद डोडो अब गंभीरता से दादा बनने के प्रयास में है।खुद अपना बसता ले आता है। किताब कॉपियां ले आता है। फिर लिखने बैठता है। हम कहते रहते #पेंसिल_पकड़ो_मजबूती_से #लिखो_दबाकर अब वह मोबाइल छोड़कर लिखने की खूब कोशिश कर रहा है। अक्सर मां बाप या भाई बहन बच्चों का कम खुद कर देते हैं। जबकि बच्चे के लिए खुद लिखने पढ़ने का प्रयास करना जरूरी है। वक्त लगेगा, लेकिन सीख जाएगा। साहित्य दें उस उसका। जिसमें खूब रंग हों, चित्र हों, पढ़ना सीख जाए तो अच्छा और आकर्षक बाल साहित्य हो।क्या हम अपने बच्चों के लिए इतना भी नहीं कर सकते? हमारे मां बाप गरीब थे। उनके पास कुछ नहीं था। कागज़ बहुत था।लेकिन उनका प्यार बहुत था।हमारे लिए वक्त बहुत था।हम भारी भरकम फीस देकर बच्चों को सजा धजाकर सुविधाओं से लैस करके हाथों में मोबाइल देकर लावारिश छोड़ देते हैं।थोड़ा लिखना पढ़ना सीख जाए तो पैसा कमाने की दौड़ में प्रतिस्पर्धा की आग में झोंक देते हैं। हम बच्चों से कितना प्यार करते हैं? हम बच्चों को कितना वक्त देते हैं? हम उन्हें अच्छी से अच्छी ड्रेस देते हैं।महंगे खिलौने दे देते हैं।उनकी हर जिद पूरी करते हैं। हर बच्चे के हाथ में मोबाइल दे सकते हैं। क्या हम बच्चों के हाथ में उनका साहित्य नहीं दे सकते? उनकी रचनात्मकता, उनके सपनों और उनकी कल्पना से क्या हमारा कोई सरोकार नहीं है? मनुष्यता,सभ्यता और प्रकृति से काटकर हम बच्चों से क्या क्या चाहने लगे हैं? My heart leaps up when I behold A rainbow in the sky: So was it when my life began; So is it now I am a man; So be it when I shall grow old, Or let me die! The Child is father of the Man; And I could wish my days to be Bound each to each by natural piety. - William Wordsworth

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