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Wednesday, November 12, 2025

अवधेश प्रीत, रुद्रपुर से पटना और फिर

#अवधेश_प्रीत, #खेड़ा_रुद्रपुर से #पटना तक के सफ़र का अंत,विनम्र श्रद्धांजलि पटना में बस गए रुद्रपुर के प्रसिद्ध साहित्यकार,पत्रकार अवधेश प्रीत नहीं रहे। अभी मीडिया ने धर्मेंद्र के बारे में गलत खबर डालकर हमें भ्रमित कर दिया था। फिल्मी सितारों और राजनेताओं के बारे में तो ऐसी खबरें वायरल है।हमारे दोस्त अवधेश हिंदी के शीर्षस्थ कहानीकारों में रहे हैं और एक राष्ट्रीय दैनिक के संपादकीय में लंबे अरसे तक पटना में कम करते रहे,उनके निधन की खबर पर यकीन नहीं आया। अब हिंदी के प्रसिद्ध कवि और प्राचीन मित्र ने खबर की पुष्टि कर दी है तो लिख रहा हूं।हम जब 1997 में आरा नागरी प्रचारणी सभा के आयोजन में रामनिहाल गुंजन जी और अरविंद कुमार जी के बुलावे पर गए थे तो पटना में कथाकार नरेन और अवधेश के घर ठहरे थे। संजीव नरेन के घर से अपहरण पर केंद्रित उपन्यास के ग्राउंड वर्क के लिए सीधे निकल गए थे।मुझे साथ चलने को कहा था।तब पटना में ही रहते थे मदन कश्यप। श्रीकांत, नवेंदु और जनसत्ता के हमारे गंगा प्रसाद भी वहीं थे। अवधेश की पत्नी डॉक्टर हैं। अवधेश के घर से कवयित्री मौसमी चटर्जी के साथ सुरेन्द्र स्निग्ध के घर गए थे। बहुत जल्दी नरेन और सुरेन्द्र स्निग्ध चले गए। हम डीएसबी कॉलेज नैनीताल में पढ़ते थे। पहाड़ में ही ज्यादा रहते थे।तब नैनीताल हमारा होम टाउन था। लेकिन रुद्रपुर में उसी दौरान Laxman Singh Bisht Batrohi जी आ गए थे।इनके सान्निध्य में चार साहित्यकार रुद्रपुर के बहुत चर्चित हुए। हमें batrohi जी का सान्निध्य नैनीताल में उतना नहीं मिला क्योंकि हम तभी एक्टिविस्ट बन चुके थे। गिर्दा,शेखर पाठक और राजीव लोचन साह, पवन राकेश, हरीश पंत, चंद्रेश शास्त्री, सखा दाजू ,भगत दा, शमशेर बिष्ट, विपिन त्रिपाठी की लंबी चौड़ी नैनीताल समाचार टीम थी और batrohi जी थे विशुद्ध साहित्यकार। तराई में बल्कि batrohi जी का ज्यादा जलवा रहा। अपने कम से कम चार छात्रों ज्ञानेंद्र पांडे, अवधेश प्रीत, गंभीर सिंह पालनी और शशि भूषण द्विवेदी को उन्होंने साहित्यकार बना दिया। Kastoor Lal Tagra , @ मुकुलजी और शंभू दत्त पांडेय यानि शैलेय जी के साथ चारों की जबरदस्त टीम थी। यह तस्वीर सृजन पुस्तकालय रुद्रपुर की चर्चित रंगकर्मी Usha Tamta जी के सौजन्य से। इस तस्वीर में बीच में अवधेश,एक तरफ तागरा जी और दूसरी तरफ शैलेय जी। उस जमाने की एक झलक है,जो रुद्रपुर की साहित्यिक सांस्कृतिक सक्रियता बताती है। कोलकाता में जनसत्ता के साथियों की पहल पर गीतेश शर्मा जी की मेजबानी में मेरे इंटर एक्टिव धारावाहिक प्रकाशित हो रहे उपन्यास अमेरिका से सावधान पर हुई संगोष्ठी की ज्यादा चर्चा हुई क्योंकि मुख्य वक्त आलोचक मैनेजर पाण्डेय थे। अवधेश और ज्ञानेंद्र पांडे, शशि ने मेरे दिनेशपुर आने के मौके पर रुद्रपुर की टीम की ओर से इस उपन्यास पर एक संगोष्ठी आयोजित की थी। तब खेड़ा में इतनी आबादी नहीं थी। वहां हम सिर्फ ज्ञानेंद्र पांडे और अवधेश को जानते थे। स्मृतियां नदियों की तरह बहती है और वक्त रेत की तरह फिसलता है। दिलोदिमाग होता है लहूलुहान और न जाने क्या क्या होता है। साथी एक एक कर छूट रहे हैं और हम अब भी लहरें गिन रहे हैं।

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