Pages

Sunday, October 26, 2025

साहित्यकार की आँखें क्यों नहीं हैं?

साहित्यकार की आँखें क्यों नहीं हैं? पलाश विश्वास
हिंदी के वरिष्ठ साहित्यकार Ashok Bhatia जी ने #उत्तराखंड के 36 कथाकारों की 72 लघुकथाओं के संग्रह का संपादन किया है। वे लघुकथा विधा पर चार दशकों से महत्वपूर्ण काम कर रहे है। इस पुस्तक के लोकार्पण के अवसर पर #सृजन_पुस्तकालय में Usha Tamta और उनकी टीम क्रिएटिव उत्तराखंड की ओर से लघुकथा और साहित्य पर सार्थक गोष्ठी हुई। सूरज प्रकाश, राजकुमार गौतम, हरि मृदुल, महावीर rawanlta, कस्तूरी लाल तागरा,आशा शैली, हरि मृदुल, सुरेश उनियाल,किरण अग्रवाल जैसे वरिष्ठ रचनाकारों के साथ उत्तराखंड के युवा कथाकारों की लघुकथाएं का सालन और उस पर केंदित संगोष्ठी में प्रेरणा अंशु अनसुनी आवाज़ Ansuni Awaaz परिवार की भी भागीदारी रही। गोष्ठी की अध्यक्षता वरिष्ठ कवि शैलेय ने की और संचालन युवा कवि डॉ खेम करम सोमन ने की। ऐसे कार्यक्रम आयोजित होने चाहिए। आयोजकों का आभार। अशोक जी से मुलाकात बेहद सुखद रही है।इससे पहले दो बार कार्यक्रम बनाकर भी वे आ नहीं सके। अनेक पुराने मित्रों से मुलाकात हो गई। कुमायूंनी पत्रिका के संपादक खड़क सिंह रावत से पांच दशक बाद मुलाकात हुई। वे एक बहुत महत्वपूर्ण अखबार हिलांस निकालते थे और हम लोग नैनीताल समाचार। अल्मोड़ा से शक्ति, अल्मोड़ा अखबार और समता का प्रकाशन होता था। उत्तराखंड के कोने कोने से जनता की आवाज बुलंद करने वाले अखबारों में से नैनीताल समाचार के अलावा और कौन अखबार छप रहा है,मुझे नहीं मालूम। जिन साहित्यकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं से नैनीताल समाचार से परिचय हुआ,उनसे संबंध हमेशा बने हुए हैं। लेकिन जनसत्ता की चौथाई सदी के संबंध उतने टिकाऊ साबित नहीं हुए।क्यों? 1979 में हम केवल कृष्ण ढल संपादित साप्ताहिक अखबार लघु भारत में भी थे,जो सितारगंज से नियमित प्रकाशित होता था। चार पेज के अखबार में एक तो कभी दो पेज साहित्य का होता था। इस अखबार से अमृतलाल नागर, विष्णु प्रभाकर और उपेंद्रनाथ अश्क जी से हमारा नियमित पत्र व्यवहार होता रहा है। यह संबंध उनके पूरे जीवनकाल में चला। केवल कृष्ण ढल नैनीताल समाचार के स्थाई स्तंभ पावन राकेश के भाई हैं। उनके भाई राकेश जीआईसी नैनीताल और डीएसबी कॉलेज में हमारे सहपाठी थे। इनकी दीदी हैं आशा शैली। केवल को गए अरसा बीता।लघु भारत के समय आशा दीदी हिमाचल के रामपुर बुशहर में रहती थीं और अक्सर लिफाफे में रुपए भेजती थीं। आज अस्सी पार होने के बाद भी उनकी सक्रियता देखते ही बनती है। याद आए नागर जी, विष्णु प्रभाकर जी, अश्क जी, Annada shankar ray ji, Nirad c Chowdhari, Dr Ashok Mitra, Mahashweta Devi, शेखर जोशी, महादेवी वर्मा, विष्णुचंद्र शर्मा, विद्यासागर नौटियाल जैसे साहित्यकार जो साहित्य,संवाद के सेतु रहे हैं। अब भी ममता कालिया, सुधा अरोड़ा, नीलम कुलश्रेष्ठ, नासिरा शर्मा,सूर्यबाला जैसी वरिष्ठ लेखिकाओं की सक्रियता और प्रतिबद्धता देखते ही बनती है। लिखना सामाजिक जिम्मेदारी है। साहित्य सामाजिक उत्पाद है तो साहित्यकारों की सामाजिकता और समाज व समय के प्रति उनके उत्तरदायित्व, उनकी प्रतिबद्धता पर इतने सवाल क्यों उठते हैं? एक आम पाठक की हैसियत से यह हमारी जिज्ञासा है। इन दिनों विष्णु प्रभाकर जी का लिखा आवारा मसीहा पढ़ रहा हूं। शरत साहित्य से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है उनकी पीड़ा, उनका संघर्ष और उनकी रचना प्रक्रिया। लिखने की निरंतरता के साथ संघर्ष और संवेदना, संयम, सामाजिकता और दृष्टि का अभाव क्यों है?

No comments:

Post a Comment