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Wednesday, October 29, 2025

अंडमान में छह महीने बारिश का मौसम,वहां बसाए गए बंगाली शरणार्थी

पूर्वी बंगाल के भारत विभाजन के शिकार लोगों की आपबीती, विस्थापन के यथार्थ और पुनर्वास की लड़ाई, मारीचझांपि नरसंहार, उत्तराखंड, दंडकारण्य और अंडमान निकोबार द्वीप समूह में बसे विस्थापितों की कथा थोड़ी बहुत आई है। लेकिन यह संख्या में पीड़ितों की करोड़ों की संख्या देखते हुए गिनती लायक भी नहीं है। हिंदी में Rupesh Kumar Singh और मेरी किताबें तो अभी अभी आई हैं और पाठकों, खासकर भुक्तभोगियों तक ठीक से पहुंची भी नहीं है। बांग्ला में Kapil Krishna Thakur, Madhumay Pal , anshuman kar, Nakul Bairagi जैसे कुछ ही लोग लिख रहे हैं। जन इतिहास इक्का दुक्का लोगों का कम नहीं है। इतिहास लिखना सहज है। यह मूलतः शासकों की कथा है।सत्ता संघर्ष की कथा है।जिनके अनेक स्रोत हैं। संदर्भ प्रचुर है। प्रमाण और तथ्य भी बहुत है। पीड़ित प्रजाजनों, वंचितों, उत्पीड़ितों, विस्थापितों, नरसंहार के शिकार लोगों के पक्ष में कोई नहीं होता। न साहित्यकार, न इतिहासकार, न पत्रकार और न ही पढ़े लिखे लोग।सबूत मिटा दिए जाते हैं।सत्ता पक्ष का नैरेटिव इतना प्रबल होता है कि पीड़ितों का पक्ष सामने नहीं आता।वे लिखते पढ़ते भी नहीं हैं कि अपनी आपबीती, अपना इतिहास दर्ज कर सके। सच कहने और लिखने की लिए बड़ी कुर्बानी देनी पड़ती है। कामयाबी और सुविधाएं, यश और सम्मान सत्ता के पक्ष में है।पीड़ितों के पक्ष में खड़े होने का भारी जोखिम है। न कोई स्रोत है और न कोई दस्तावेज, न ही संदर्भ। लिखने की बड़ी चुनौती है। यह एक सामाजिक जिम्मेदारी और प्रतिबद्धता का ही मामला नहीं है, संवेदना, मनुष्यता, सभ्यता, साहित्य, मातृभाषा, कला और संस्कृति का मामला है। सही पद्धति और वस्तुनिष्ठ दृष्टि भी जरूरी है। नए शिल्प और विधा की जरूरत है। एक काम भाषाई दक्षता के अलावा व्यापक ग्राउंड वर्क की भी मांग करता है। संसाधन भी चाहिए। जुनून के अलावा यह संभव नहीं है। इसलिए बहुत कम लोग लिख रहे हैं। मसलन अंडमान निकोबार द्वीप समूह में इन द्वीपों को आबाद करने के लिए झारखंड के आदिवासियों को बड़ी संख्या में अठारहवीं सदी से ले जाया जाता रहा है। भारत विभाजन के बाद बड़ी संख्या में वहां पूर्वी बंगाल के विस्थापितों को बसाया गया। बांग्ला अंडमान की सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है। लेकिन आदिवासी झारखंड के सभी भाषा समूह के हैं।वे संथाली, कुड़मी, खोरठा, मुंडारी, सादरी, हो, उरांव आदि भाषा बोलते हैं। नजरुल सैयद के फेसबुक पोस्ट से पता चला कि अंडमान में पूर्वी बंगाल के विस्थापितों के पुनर्वास की देख देख करने वाले एक पुनर्वास अधिकारी विकास चक्रवर्ती ने आन्दामाने पुनर्वासन नामक एक किताब बांग्ला में लिखी है। उन्होंने वहां गए चार हजार बंगाली विस्थापितों को 1955 से बसाने और द्वीपों को आबाद करने का काम किया। चक्रवर्ती के अनुसार बंगाल और पंजाब से अंडमान में शरणार्थियों को बसाने के लिए सर्वे करने दो टीमें गई थी। अंडमान के द्वीपों में पहाड़ और जंगल,दलदल हैं। छह महीने बारिश का मौसम रहता है। मौसम, जलवायु और जमीन वहां पंजाबियों को बसाने लायक नहीं है,कहकर पंजाब की टीम वापस चली आई। बंगाली विस्थापितों को ही वहां बसाना तय हुआ। तमाम द्वीपों को झारखंडी आदिवासियों के बाद बंगाली विस्थापितों ने आबाद किया। तमिल भी बड़ी संख्या में इन द्वीपों में बसे। अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह की जलवायु उष्णकटिबंधीय और आर्द्र है, जिसमें कोई विशिष्ट शीत ऋतु नहीं होती है। यहाँ का औसत तापमान \(23\degree C\) से \(31\degree C\) के बीच रहता है, और वर्ष भर गर्मी और आर्द्रता बनी रहती है, जिसमें औसतन \(79\%\) सापेक्ष आर्द्रता होती है। मानसून का मौसम मई के अंत से शुरू होकर लगभग 180 दिनों तक रहता है, जिसमें मध्यम से भारी वर्षा होती है। मानसून: मई के अंत से शुरू होकर, दक्षिण-पश्चिम मानसून (जून से सितंबर) और उत्तर-पूर्वी मानसून (अक्टूबर से दिसंबर) के कारण लगभग 180 दिनों तक बारिश होती है। औसत वार्षिक वर्षा लगभग \(3,000\) मिमी है। नजरुल सैयद ने लिखा है: দেশভাগ নিয়ে আমার পড়াশোনার দৌড় বেশিদূর না। আমার আগ্রহ তার পরের সময়টায়। সেজন্য যতটুকু প্রাসঙ্গিক, এর বাইরে পড়ার সুযোগ হয়ে ওঠেনি তেমন। অতটুকু পড়ার বিপুল বিষাদময় অনুভূতির মধ্যে সবচেয়ে চমকে দিয়েছিলো মরিচঝাঁপির ইতিহাস, আর দু’দন্ড শান্তি দিয়েছিলো বিকাশ চক্রবর্তীর ”আন্দামানে পুনর্বাসন: এক বাঙাল অফিসারের ডায়েরি”। দেশভাগের করুণ ইতিহাসের কথা আমরা সবাই কমবেশি জানি। এবাংলা থেকে ওবাংলায় যাঁরা গিয়েছিলেন, তাঁদের একটা বড় অংশকে পাঠানো হয়েছিলো দণ্ডকারণ্যের পাষাণভূমিতে। সেখান থেকে ফিরে সুন্দরবনের মরিচঝাঁপিতে ঘর বাঁধা এবং তারপর নারকীয় হত্যাযজ্ঞের ইতিহাস আমাদের সামনে তুলে এনেছেন মধুময় পাল। কিন্তু আর একটা অংশকে পাঠানো হয়েছিলো আন্দামানে, তাঁদের সম্পর্কে জানা ছিলো না একদম। সেই অভাবটা পূরণ করলেন বিকাশ চক্রবর্তী। বৃটিশ আমলে ‘আন্দামান’ নামটাই ছিলো ভয় জাগানিয়া। ‘কালাপানি’ পেরিয়ে বিপ্লবীদের পাঠানো হতো সেই নির্জন দ্বীপে, কুখ্যাত সেলুলার জেলে, নির্বাসনে, মৃত্যুর অপেক্ষায়। দেশভাগের পর পূর্ববঙ্গের উদ্বাস্তুদের কোথায় জায়গা দেওয়া হবে তা খুঁজতে উচ্চ ক্ষমতাসম্পন্ন কমিটি গঠন করলো ভারত সরকার। পঞ্জাব প্রদেশের একটি সরকারি দল এবং পশ্চিমবঙ্গের উদ্বাস্তু পুনর্বাসনমন্ত্রী নিকুঞ্জবিহারী মাইতি গেলেন আন্দামান পরিদর্শনে। সেখানকার জলা জঙ্গল, বিস্তৃত সমুদ্রতট আর বছরের অর্ধেকেরও বেশি সময় বর্ষাকাল বলে সেখানে পাঞ্জাবি উদ্বাস্তুদের পুনর্বাসন সম্ভাবনা বাতিল হলো। কিন্তু এই পরিবেশটাই পূর্ববঙ্গের চাষিদের জন্য ভালো হবে বিবেচনায় তাঁদের একটা অংশকে আন্দামানে পাঠানোর সিদ্ধান্ত হলো। প্রকল্পের নাম হলো ‘কলোনাইজেশন স্কিম’। ১৯৩৩ সালে পূর্ববঙ্গের সিলেটে জন্মেছিলেন বিকাশ চক্রবর্তী। পিতা ছিলেন গান্ধীবাদী রাজনীতিক, সাংবাদিক এবং সাহিত্যসেবী। মা ছিলেন ভারতের স্বাধীনতা আন্দোলনের সশস্ত্র বিপ্লবী পরিবারের। দেশভাগের ফলে এই পরিবারকেও ভিটেমাটি ছেড়ে পশ্চিমবঙ্গে চলে যেতে হয়। ১৯৫৫ সালে বিকাশ চক্রবর্তী কলোনাইজেশন অ্যাসিস্ট্যান্টের সরকারি চাকুরি নিয়ে বদলী হন আন্দামানে। নিজেই দেশভাগের উদ্বাস্তু, তিনিই পেলেন পূর্ববঙ্গ থেকে আগত উদ্বাস্তুদের আন্দামানে পুনর্বাসনের কঠিনতম দায়িত্ব। তারপর দীর্ঘ পনেরোটি বছর... সে এক ইতিহাস! বাঙালির দেশভাগ আর উদ্বাস্তু সংকটের প্রসঙ্গ মানেই যে বিষাদের আখ্যান; অপমান, অপদস্ত, নির্যাতন, নিপীড়ন, যন্ত্রণা আর অমানবিকতার মর্মবিদারী অধ্যায়... জঞ্জালের মতো আস্তাকুঁড়ে নিক্ষিপ্ত মানুষের ইতিহাস... সেখানে আন্দামানে বাঙালি পুনর্বাসন এক ব্যতিক্রম অধ্যায়। নিম্নবর্ণের শ্রমজীবী উদ্বাস্তু বাঙালি সেখানে পেয়েছে সম্নান ও সুযোগ, পেয়েছে নতুন করে বেঁচে থাকার, স্বপ্ন দেখার সাহস, পেয়েছে সহানুভূতি আর সহমর্মিতা, তৈরি করেছে নিজের দেশ- নববঙ্গ। আন্দামানে পুনর্বাসনের ইতিহাস উদ্বাস্তু বাঙালির স্বাবলম্বনের ইতিহাস, লড়ে যাওয়া খেটে খাওয়া মানুষের শোষণহীন উচ্চনীচ ভেদাভেদহীন সমাজ স্থাপনের ইতিহাস। অথচ কী আশ্চর্য, দেশভাগ পরবর্তী আন্দামানে বাঙালি পুনর্বাসনের ইতিহাস বইয়ের ভাণ্ডারে নগন্য! সেই খড়ের গাদায় সুঁচের মতো একখানি বই এই ”আন্দামানে পুনর্বাসন: এক বাঙাল অফিসরের ডায়েরি”। আর এটি লিখেছেন এমন একজন বাঙাল অফিসার, এই সম্পূর্ণ প্রক্রিয়ায় যাঁর রয়েছে গুরুত্বপূর্ণ প্রত্যক্ষ অংশগ্রহণ এবং যিনি নিজেই একজন উদ্বাস্তু! হয়তো দেশভাগের বেদনা আন্তরিকভাবে উপলব্ধি করতে পেরেছিলেন বলেই ১৫ বছর অক্লান্ত পরিশ্রম করে, জঙ্গল সাফ করে, সমস্ত প্রতিকূলতাকে জয় করে তিনি উদ্বাস্তুদের জীবনকে সুখময় করে দিতে পেরেছিলেন। কয়েক বছর আগেই যে দ্বীপ ছিলো ‘সভ্য’ মানুষ বিবর্জিত, যে দ্বীপান্তর ছিলো মৃত্যুদণ্ডসম শাস্তি, সেই দ্বীপ হয়ে উঠলো সুখের শান্তির দ্বীপ। পৃথিবীর আর কোনো শরণার্থী সংকট এরকম শান্তির হয়েছে বলে আমার জানা নেই। অথচ এ নিয়ে লেখা হলো না তেমন। এ বইয়ের সূত্রেই আরেকটা বইয়ের নাম পাই, ড. স্বপনকুমার বিশ্বাস প্রণীত ‘কলোনাইজেসন অ্যান্ড রিহ্যাবিলিটেশনস ইন আন্দামান অ্যান্ড নিকোবর আইল্যান্ডস’ নামে। কিন্তেু সে বই পড়ার সুযোগ হয়নি এখনও। এ বই যে তবু পড়ার সুযোগ হলো, তাও এক ঘটনা বটে। দেশভাগ নিয়ে যারাই পড়েন, Madhumay Pal নামটা কারোই অচেনা বা অজানা না। মরিচঝাঁপির মর্মান্তিক ইতিহাসও তাঁর মাধ্যমেই জানতে পেরেছিলাম। তিনিই একটা বই সম্পাদনা করছিলেন ‘দেশভাগ: বিনাশ ও বিনির্মাণ’ নামে। আর সেখানে আন্দামানে উদ্বাস্তু পুনর্বাসনের একটি অধ্যায় সংযোজনের চিন্তা এলো তাঁর মাথায়। কিন্তু লিখবেন কে? তখনই নাম আসে বিকাশ চক্রবর্তীর। আর সেই সুবাদেই লেখা হয় মাত্র ৭২ পাতার এই বই। কলেবর সামান্য হলেও, লেখায় সাহিত্যের মাধুর্য না থাকলেও বিকাশ চক্রবর্তীর “আন্দামানে পুনর্বাসন: এক বাঙাল অফিসারের ডায়েরি” ইতিহাসের অন্যতম গুরুত্বপূর্ণ এক বই। যা প্রকাশ করেছে গাঙচিল।

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