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Monday, March 16, 2026
दो सौ साल से आदिवासी, मुसलमान दलितों के साथ
Matua आंदोलन में अब भी मुसलमान शामिल हैं बांग्लादेश में।यह चित्र बांग्लादेश के matua मुख्यालय गोपालगंज जिले के ओड़ाकांदी से आया है।
हरिचांद ठाकुर ने दो सौ साल पहले यह आंदोलन शुरू किया था पुरोहित तंत्र के अंत के लिए।नारा था खेत जो जोते, उसी का खेत।अंग्रेजी हुकूमत, जमींदारी और पुरोहित तंत्र के खिलाफ लाल निशान के साथ इस आंदोलन में शुरू से बंगाल की सभी अस्पृश्य जातियों, पिछड़ों और मुसलमानों की हिस्सेदारी थी।
1878 में पांच महीने की हड़ताल में वे सारी जातियां शामिल थीं, जिनकी गिनती 1935 की जनगणना में भी हिंदुओं में नहीं होती थी।
संन्यासी विद्रोह, नील विद्रोह और बंगाल के सारे किसान विद्रोह में इन जातियों के अलावा मुसलमानों और आदिवादियों की भागीदारी थी।
इस इतिहास को झुठलाने की शुरुआत बंकिम चंद्र के आनंद मठ, शेखर बंदोपाध्याय के नमोशुद्र आंदोलन से लेकर बंगाल की दक्षिणपंथी राजनीति में जारी है।
नमोशूद्र कोई जाति नहीं है, किसानों, आदिवादियों और बहुजनों के अधिकारों का अलग आंदोलन था। इस आंदोलन में सारा बहुजन समाज था।
यह आंदोलन सवर्ण हिंदू समाज से बहिष्कृत बहुजन समाज की अस्मिता और अलग पहचान का आंदोलन था। जिसमें मुसलमानों और आदिवादियों की बड़ी भागीदारी थी।
यह चित्र मतुआ समाज के बारूनी महोत्सव के लिए रवाना होते मुसलमानों के जत्थे का है और इतिहास का जीवंत दस्तावेज भी।

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