शरत की रवींद्र से तुलना क्यों?
देश पत्रिका के पुस्तक विशेषांक हमेशा बहुत खास होता है। जनसत्ता के अग्रज साथी अमित जी ने इस बार के पुस्तक विशेषांक की पीडीएफ फाइल भेजी है। हिंदी में समयांतर के पुस्तक विशेषांक निकलते हैं।
अमित Amit Prakash Singh जी का आभार।
पत्रिका के पतन को देखते हुए करीब दस साल बाद इतने अच्छे अंक की उम्मीद नहीं थी।
अभी पढ़ रहा हूं।
शरत पर लेख अच्छा है। रवींद्र से तुलना की परंपरा बनी हुई है।जबकि शरत रवींद्र से एकदम अलहदा है।
शरत के लेखन में सिर्फ जीवन और मनुष्य है।सामाजिक यथार्थ है।कुछ भी अमूर्त, आध्यात्मिक नहीं है। अलग से दर्शन भी नहीं है। जो रवींद्र साहित्य की गीतात्मकता के साथ सबसे बड़ी विशेषता है।
अब भी बांग्ला साहित्य में साहित्य के मूल्यांकन के लिए टैगोर सबसे बड़ी कसौटी है।यह आलोचना की सीमा है।
जैक लन्दन पर लिखा आलेख पठनीय है और इसमें जैक की तुलना किसी से नहीं की गई।
हिंदी में भी प्रेमचंद, निराला,मुक्तिबोध को किसी भी रचनाकार के सामने खड़ा कर दिया जाता है।सापेक्षिक यह मूल्यांकन साहित्य का वस्तुनिष्ठ विवेचन नहीं है।
No comments:
Post a Comment