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Wednesday, January 7, 2026

पुस्तकमेला:विस्थापन और पुनर्वास

हमारे लिए खुशी की बात यह है कि बंगाली विस्थापितों की आपबीती पर लिखी Rupesh Kumar Singh की किताब #छिन्नमूल का बांग्ला संस्करण कोलकाता पुस्तकमेला में प्रकाशित होने जा रहा है। दिल्ली और कोलकाता दोनों पुस्तकमेला में विस्थापन और पुनर्वास पर चर्चा हो, यह उम्मीद रहेगी। न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन का आभार। हम कोलकाता में होते तो दिल्ली भी चले आते विश्व पुस्तक मेले में। हम हों न हों, पुलिनबाबू होंगे विश्व पुस्तक मेले में। एक एक इंच दिल्ली को उन्होंने अपने पैरों से नापा है पुनर्वास की लड़ाई में। उन्हें होना भी चाहिए। गांव में हूं। रिटायर्ड हूं। अब कहीं निकलना मुश्किल है। जाने की इच्छा है जरूर,क्योंकि साहित्यकार मित्रों से कोलकाता छोड़ने के बाद कहीं मुलाकात नहीं होती और दिनेशपुर बहुत छोटी जगह है,जिसे हम भी बड़ी जगह बना नहीं सके कि लोग दौड़े चले आएं। Rupesh Kumar Singh की सेहत थोड़ी सुधर जाए और शीत लहर का कहर कम हो तो शायद न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन के स्टाल पर किसीदीन मुलाकात हो ही जाए। नब्बे के दशक तक दिल्ली जाने पर अक्सर जेएनयू में ठहरते थे। अब वहां अपना कोई मित्र नहीं है। दिल्ली में ठहरने का कोई जुगाड नहीं है। फिरभी.. वैसे कोलकाता पुस्तक मेला जाना सिंगुर नंदीग्राम आंदोलन के दौरान छोड़ दिया था साहित्यकारों की प्रतिबद्धता के खिलाफ। दिल्ली अब साहित्य,संस्कृति और सत्ता का केंद्र है। पुलिनबाबू जनता की लड़ाई में संवाद को हथियार के रूप में खूब इस्तेमाल कर लेते थे। इस मामले में उदारता शायद उनकी मजबूरी रही हो। दौलत उनके पास नहीं थी और राजनीतिक ताकत भी नहीं। पुनर्वास लड़कर ले नहीं सकते थे।जहां लड़ सकते थे, वहां खूब लड़े। सत्ता के गलियारे में भी खूब दौड़े। मैं उनकी तरह उदार कभी नहीं हो सका। चालीस साल तक बड़े अखबारों में पत्रकारिता के बावजूद सत्ता और सत्ता के गलियारे से हमेशा दूरी बनाए रखी। शायद सत्ता की बेरूखी और अमानवीय चेहरे के कारण।दिल्ली दिलवालों की हो न हो, देश की राजधानी है।दमन का सर्वोच्च कमान है वह।इसलिए दिल्ली मुझे रास नहीं आई। तबसे जब मैं पिताजी के साथ दिल्ली और नई दिल्ली की दूरी पैदल तय कर रहा था। अब उन्हीं पुलिनबाबू के लिए शायद फिर दिल्ली जाना ही एकबार फिर और करीब दो दशक बाद पुस्तक मेले में भी।

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