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Friday, October 31, 2025

अंतिम किताब

मेरे पहले कहानी संग्रह अंडे सेंते लोग की दो सौ प्रतियां मुझे प्रकाश ने दी थी।हमने पुस्तक बेचने के बजाय अपने साहित्यकार मित्रों और आलोचकों को दी। बहुत कम चर्चा हुई किताब की। दूसरा कहानी संग्रह ईश्वर की गलती 2001 में आदरणीय शलभ श्रीराम सिंह ने प्रकाशित किया विदिशा से अपने प्रकाशन से।मुझे बीस प्रतियां मिलीं।हमने पुराने अनुभव के तहत किसी को किताब नहीं दी। इस किताब पर मध्य प्रदेश में खूब चर्चा हुई,यह महाश्वेता देवी का कहना था। मेरी तीसरी किताब 24 साल बाद आई विस्थापन के यथार्थ,पुनर्वास की लड़ाई पर केंद्रित किताब। मुझे पांच प्रतियां मिलीं,जिनसे लोकार्पण हुआ।मेरे पास अपनी प्रति भी नहीं है।किताब अमेजन ऑनलाइन स्टोर से वितरित हो रही है। न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन ने यह किताब प्रकाशित की। https://amzn.in/d/5HLqF5j न मैंने किताब बेची और न किसीको भेंट की। कितनी किताबें लोगों ने ली,मुझे मालूम नहीं है। लेकिन जिन्होंने भी किताब खरीदी,सबने पढ़ा और सबकी प्रतिक्रिया सार्वजनिक है। जिनको भी किताब सही लगेगी।खरीदकर पढ़ेंगे। फिर उनकी जैसी प्रतिक्रिया होगी,उसका स्वागत है। मैंने मित्रों को साफ कह दिया है कि इस किताब की कोई समीक्षा न प्रेरणा अंशु में छपेगी और न किसी को अन्यत्र लिखने के लिए कहूंगा। किताब अगर महत्वपूर्ण है तो लोग खरीदकर जरूर पढ़ेंगे। किताब अमेजन पर उपलब्ध है,इसकी सूचना और लिंक जरूर शेयर की है। बाकी पाठकों की मर्जी। दरअसल पिताजी की मृत्यु के बाद 2001 में ही मैंने विस्थापितों की लड़ाई में शामिल होने का फैसला किया तो सृजनात्मक लेखन को भी तिलांजलि दे दी।इसलिए मैंने अप्रकाशित या प्रकाशित कविताओं,कहानियों के संकलन,उपन्यास, यात्रा वृत्तांत इत्यादि के प्रकाशन न करना ही तय किया। पुलिनबाबू विस्थापन पर लिखी किताब है। साहित्य नहीं है। मैंने सिर्फ अपनी सामाजिक जिम्मेदारी निभाने की कोशिश की और लिखते ही मेरी भूमिका खत्म हो गई। इस किताब का प्रकाशन आरिफा avis और Rupesh Kumar Singh की जिद के कारण संभव हुआ। सच तो यह है कि अब मेरे लिए कोई किताब लिखना असंभव है। न समय है, न ऊर्जा और न संसाधन। लिख पाता तो भी सृजनात्मक साहित्य नहीं लिखता। पहाड़, आदिवासी भूगोल, कोयलांचल या पूर्वोत्तर पर लिखने की कोशिश करता। इसलिए हिंदी में यह मेरी अंतिम किताब है। फिरभी कोलकाता में मेरे सत्ताईस साल और बंगाल में विस्थापितों के हाल और आदिवासी भूगोल , सबकुछ मिलाकर इस अवधि के अनुभव पर एक किताब जरूर लिखना चाहता हूं। यह हिंदी में लिखने और छपने से कहीं बहुत ज्यादा कठिन है। उत्तराखंड में बांग्ला में पांडुलिपि तैयार करना मुश्किल है तो बांग्ला में मेरी किताब के लिए प्रकाशक मिलना और भी मुश्किल है। सो,निश्चिंत रहे कि मेरी लिखी किसी और किताब पढ़ने की तकलीफ किसीको नहीं उठाने की जरूरत है। जब तक संभव है और टीम को मेरी जरूरत होगी, प्रेरणा अंशु के काम जरूर करता रहूंगा।

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