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Friday, October 24, 2025
नरसंहार के पक्ष में क्यों लिखा जाता है संपादकीय
#संपादकीय_को_ क्या_ हुआ?
#संपादकों के सफाए के बाद कैसा संपादकीय?
नरसंहार के समर्थन में लिखे जा रहे हैं संपादकीय।
मेरे चाचाजी छोटोकाका #डॉ_सुधीर_विश्वास ने हमें बताया बताया था कि सबसे महत्वपूर्ण होता है संपादकीय। पत्र पत्रिका की नीतियों के मुताबिक सबसे महत्वपूर्ण और प्रासंगिक मुद्दे पर लिखा जाता है संपादकीय।संपादकीय अखबार का पक्ष होता है।उसका स्टैंड।
पिताजी #पुलिनबाबू की सख्त हिदायत थी कि संपादकीय जरूर पढ़ना चाहिए।हमारे लिए रवींद्र, नजरुल की कविताओं और बंकिम शरत के उपन्यासों, विश्व के क्लासिक साहित्य से ज्यादा महत्वपूर्ण था पत्र पत्रिकाओं का संपादकीय।
तब हम प्राइमरी स्कूल में पढ़ते थे।घर में बांग्ला, हिंदी और अंग्रेजी के अलावा मराठी पत्र पत्रिकाएं आती थी।जैसे हम बांग्ला, अंग्रेजी और हिंदी की कविताओं का सस्वर,भावपूर्ण पाठ करते थे, ठीक वैसे ही पत्र पत्रिकाओं के संपादकीय का पाठ करना होता था।
जब हमने 1980 में धनबाद के दैनिक आवाज के संपादकीय में कम शुरू किया तब गुरुजी ब्रह्मदेव सिंह शर्मा ने कहा कि संपादन तो कोई भी कर लेगा, रिपोर्टिंग भी हो जाती है,लेकिन सबसे बड़ी चुनौती है संपादकीय लिखना। वे मुझसे संपादकीय लिखवाते थे।
महाश्वेता देवी कहती थी, पत्र पत्रिकाएं चूंकि जनता के पक्ष में होती हैं,तो उनका पक्ष भी जनता का पक्ष होना चाहिए।इसलिए पत्रकारिता का चरित्र सत्ता विरोधी होता है।
कोलकाता में जब जनसत्ता निकलता था, तब भी संपादकीय पेज चार साथी देखते थे। जबकि पेज दिल्ली से बनकर आता था।
Chaturved Arvind और राजेश त्रिपाठी जैसे वरिष्ठ लोगों को दिनभर दिल्ली के संपादकीय पेज का संपादन करना होता था।
#प्रभाष_जोशी जब कोलकाता में होते थे, संपादकीय या #कागद_कारे लिखने से पहले सभी मुद्दों पर संपादकीय बैठक में संवाद करते थे।
आज क्या हो रहा है?
पहले न्यूज एडिटर संवादाताओं को असाइनमेंट देते थे।अमृत प्रभात में माथुर जी और जनसत्ता में #अमित_प्रकाश_सिंह बहुत मुस्तैदी से यह कम करते थे।
अब संपादक मैनेजर की भूमिका में हैं और विज्ञापन प्रबंधक संपादक हैं। असाइनमेंट विज्ञापन प्रबंधक तय करते हैं और संपादकीय भी विज्ञापनों के मद्देनजर लिखा जाता है।
पत्र पत्रिका का चरित्र अब सत्ता समर्थक हो गया है।राजकाज की किसी तरह की आलोचना नहीं होती। सरकारी नीतियों को जायज ठहराने के लिए लिखा जाता है यह संपादकीय।
घृणा, हिंसा, दमन और उत्पीड़न के खिलाफ पहले संपादकीय लिखा जाता था, सरकारी नीतियों की समीक्षा, आलोचना और विरोध पर भी संपादकीय लिखे जाते थे। लेकिन अब घृणा, हिंसा, दमन और उत्पीड़न का महिमा मंडन राष्ट्रवाद के नाम किया जाता है।
विदेशी मामलों में यह राष्ट्रवाद सिरे से गायब हो जाता है।राष्ट्रीय हित के विरुद्ध विदेश नीति को सही ठहराया जाता है।सरकारी फैसलों और नीतियों में बदलाव के साथ वैदर कॉक की तरह हर नीति और फैसले के मुताबिक संपादकीय लिखा जाता है।
टैरिफ के मामले में ट्रंप के बदलते तेवर के बावजूद अमेरिकी हितों की परवाह यानी कॉरपोरेट हितों के मद्देनजर संपादकीय लिखा जाता है। रूस से तेल खरीदते रहने की नीति के पक्ष में जैसे लिखा गया, न खरीदने के पक्ष में भी उसी तरह लिखा जाता है।
गाजा में नरसंहार को जायज ठहराने वाले संपादकीय और संपादकीय पेज के लेखों का क्या कहेंगे?
आस्था,धर्म और धार्मिक एजेंडे की राजनीति और राजकाज का समर्थन तो सर्वत्र है।
जल जंगल जमीन से बेदखली के समर्थन से भी किसी को शर्म नहीं आती।
हमारे लिए लेकिन यह शर्मनाक है क्योंकि हम इन्हीं अखबारों में जिंदगी गुजार चुके हैं। जनसत्ता में जब सती प्रथा का समर्थन, कर्मकांड पर संपादकीय लेख लिखे गए, उस दौर में भी हममें से अनेक लोगों ने जनसत्ता में रहते हुए विरोध किया। बनवारी और प्रभाष जोशी की सार्वजनिक आलोचना की और इसकी कीमत भी चुकाई।

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