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Monday, July 17, 2017

क्लासिक साहित्य जनपक्षधर होता तो हिंदी में अज्ञेय से बड़ा जनपक्षधर कोई नहीं होता। संघी विचारधारा और एजंडे के लिए काम करनेवाले शाखाओं में निक्कर पहनकर प्रशिक्षित हों,यह जरुरी नहीं।आयातित हाइब्रिड जल जगंल जमीन से कटी प्रजाति के साहित्यकार बुद्धि्जीवी शाखाओं में गये बिना ही मुक्तबाजारी हिंदुत्व एजंडे के तहत साहित्य संस्कृति पर सवर्ण एकाधिकार वर्चस्व बनाये हुए हैं।ये लोग ही स

क्लासिक साहित्य जनपक्षधर होता तो हिंदी में अज्ञेय से बड़ा जनपक्षधर कोई नहीं होता।

संघी विचारधारा और एजंडे के लिए काम करनेवाले शाखाओं में निक्कर पहनकर प्रशिक्षित हों,यह जरुरी नहीं।आयातित हाइब्रिड जल जगंल जमीन से कटी प्रजाति के साहित्यकार बुद्धि्जीवी शाखाओं में गये बिना ही मुक्तबाजारी हिंदुत्व एजंडे के तहत साहित्य संस्कृति पर सवर्ण एकाधिकार वर्चस्व बनाये हुए हैं।ये लोग ही संघ परिवार के केसरिया अश्वमेध के गुप्त, घातक सिपाहसालार हैं। जो राजनेताओं से ज्यादा खतरनाक हैं क्योंकि ये ब्रेनवाशिंग रंगरेज हैं।


पलाश विश्वास

संदर्भः


  


Anil Janvijay

July 17 at 3:26am





तारा बाबू का कुछ पढ़ा हो किसी ने तब तो कुछ कहेंगे। पलाश विश्वास ने बिना पढ़े ही सबको संघी घोषित कर दिया, इसीलिए मैंने इनके इस लेख पर कोई जवाब देना ज़रूरी नहीं समझा। इन्होंने गुरुदत्त को भी नहीं पढ़ा है। बस, नाम लिख दिया है

कर्मेंदु शिशिर बंकिम चंद्र के आनंदमठ का हिंदुत्व से कुछ लेना देना नहीं मानते और वे ताराशंकर को क्सालिक मानते हैं और उनके सामंती मूल्यों पर चर्चा से उन्हें आपत्ति हैं।कर्मेंदु एक जमाने में हिंदी के सशक्त प्रतिबद्ध कथाकार माने जाते रहे हैं।इधर के उनके मंतव्यों को देख लें तो समझ में आ जायेगा कि कैसे हमारे तमाम प्रिय लोगों का पक्ष प्रतिपक्ष बदल गया है।मानुषी का स्त्रीपक्ष भी बदल गया है।हम साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में इस कायाकल्प की बात कर रहे थे।

मीडिया के केसरियाकरण पर आम सहमति के बावजूद साहित्य और संस्कृति के केशरिया आधार,गढ़ों,किलों और मठों पर कोई विमर्श क्यों नहीं है,मेरा मुद्दा दरअसल यही है।अपवादों की हम चर्चा नहीं कर रहे,राजनीतिक धर्मनिरपेक्षता की बात बी हम नहीं कर रहे।समता,न्याय और सामाजिक यथार्थ की कसौटी पर जनपक्षधर साहित्य की बात हम कर रहे हैं।हमारे लिए शाखा या संघ संस्थानों से जुड़ाव भी कोई कसौटी नहीं है।मनुस्मृति बहाली के सवाल पर साहित्य में संघ परिवार के एजंडा के मुताबिक साहित्य सांस्कृतिक अखिल भारतीय परिदृश्य के अलावा हम इस उपमाद्वीप के जिओ सोशियो इकानामिक पोलिटिक्स के नजरिये से हमेशा अपनी बात रखते आये हैं।

असहमति हो सकती है।आप हमारे तर्कों को सिरे से खारिज कर सकते हैं।इस लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हम सम्मान करते हैं।हिंदुत्ववादियों के गाली गलौज का भी हम खास बुरा नहीं मानते।जगदीश्वर जी शायद मुझे कोलकाता में होने की वजह से थोड़ा बहुत जानते हैं,जिनके फेसबुक मतव्य पर हमने मंतव्य किया है औय यह मंतव्य कोई शोध पत्र नहीं है कि संदर्भ प्रसंग सहित प्रमाण फेसबुक पर पेश किया जाये।

जनविजय जी ने कह दिया कि मैंने तारा बाबू या गुरुदत्त को पढ़ा ही नहीं है।यानी उनके मुताबिक मैं अपढ़ और लापरहवा दोनों हूं।हम पलटकर यह नहीं कहेंगे कि उ्नहोंने ताराशंकर को पढ़ा नहीं है।विद्वतजन हम जैसे लोगों को अपढ़,अछूत और अयोग्य मानते हैं।जीवन में इसका नतीजा हमें हमेशा भुगतना पढ़ा है।मेरे लिखे का हिंदी जगत या बंग्ला या इंग्लिश इलिट भद्रलोक समुदाय ने कोई नोटिस नहीं लिया है और मुझे अफसोस नहीं है।

चूंकि यह बहस पब्लिक डोमैन पर हो रही है तो मुझे जनविजय जी के इस मंतव्य पर थोड़ा स्पष्टीकरण देना है।कर्मेंदु शिशिर ने यह नहीं लिखा है कि मैंने ताराबाबू को नहीं पढ़ा है,तो इस पर मुझे कुछ नहीं कहना है।जगदीश्वर जी असहमत हैं।

जनविजयजी जिस तरह हिंदी वालों का जन्मदिन याद रखते हैं,इससे लगता है कि वे हिंदी वालों को बहुत खूब जानते हैं।मैं चूंक नोटिस लेने लायक नहीं हूं ,वे मुझे नहीं जानते होंगे और जाहिर है कि मुझे कभी पढ़ा भी नहीं होगा।क्योंकि प्रिंट में मुझे कोई छापता भी नहीं है और न मैं पुस्तकें छपवाने में यकीन रखता हूं,तो यह उनका दोष भी नहीं है।

मैंने थोड़ बहुत पढ़ाई बचपन से लेकर अब तक की है।जनविजय जी को मालूम होना चाहिए कि बंगाली परिवारों में सत्तर के दशक तक रवींद्र नजरुल माइकेल विद्यासागर शरत ताराशंकर का पाठ अनिवार्य दिनचर्या रही है।सत्तर के दशक तक हमने भक्तिभाव से वह सारा साहित्यआत्मसात किया है बंगाली संस्कृति के मुताबिक।यह मेरा कृत्तित्व नहीं है।सामुदायिक,सामाजिक जीवन का अभ्यास है।बाकी सत्तर के दशक में जीवन दृष्टि सिरे से बदल जाने से वह भक्तिभाव नहीं है जो रामचरित मानस,गीता भागवत, पुराण,उपनिषद पाठ का होता है।

यही मेरा अपराध है।

जनविजय जी,क्लासिक साहित्य जनपक्षधर होता तो हिंदी में अज्ञेय से बड़ा जनपक्षधर कोई नहीं होता।मुक्तिबोध ने कहा है कि सरल होने का मतलब जनता का साहित्य नहीं होता।कबीर दास की रचनाओं को हम सरल नहीं कह सकते क्योंकि उसका दर्शन बेहद जटिल है।लेकिन उनका पक्ष जनता का पक्ष है,यह कहने में दिक्कत नहीं है।रामचरित रचने वाले गोस्वामी तुलसी दास का रामायण क्लासिक लोकसाहित्य है लेकिन उनका मर्यादा पुरुषोत्तम हिंदू राष्ट्र का अधिनायक और मनुस्मृति अनुसासन लागू करने वाला है।उनका राम स्त्री विरोधी है।इस सच का सामना करने का मतलब यह कतई नही है कि हम संतों के सामंत विरोधी आंदोलन को खारिज कर रहे हैं।

बहुत कुछ महत्वपूर्ण और क्लासिक लिखा जा रहा है।हमारे समय के दौरान उदय प्रकाश और संजीव ने बहुत कुछ रचा है।संजीव के रचनास्रोतों और उनकी पृष्ठभूमि से मैं परिचित हूं और उदयप्रकाश की रचनाओं की खूब सराहना होने के बावजूद मैंने उसे जनपक्षधर नहीं बताया है।इसी के साथ संजीव को बी मैंने बदलाव का साहित्यकार नहीं माना है।

बांग्ला में अस्सी के दशक के बाद जो कोलकाता केंद्रित साहित्य लिखा जा रहा है,उसके मुकबले हमने हमेशा बांग्लादेश के जनपद केंद्रित या असम,त्रिपुरा,बिहार में लिखे जा रहे बांग्ला साहित्य को बेहतर माना है।इसलिए सुनील गंगोपाध्याय समूह के लेखकों और कवियों के पक्ष में मैं कभी नहीं रहा हूं।

बांग्ला में माणिक बंद्योपाध्याय,महाश्वेता या नवारुण दा को भद्रलोक समाज क्लासिक नहीं मानता और वह ताराशंकर के बाद सीधे सुनील संप्रदाय का महिमामंन करता है जैसे आज भी धर्मवीर भारती अज्ञेय के वंशज हिंदी में मठों के मालिकान हैं।

सत्तर के दशक में हिंदी, बांग्ला,मराठी,पंजाबी साहित्य का जो जनप्रतिबद्ध कृषि क्रांति समर्थक धारा है,वह मुक्तबाजार में किसतरह कारपोरेटमीडिया की तर्ज पर कारपोरेट हिंदुत्व के मूल्यों के अबाध पूंजी प्रवाह में तब्दील है,मेरी मुख्य चिंता इस सांस्कृतिक सामाजिक कायाक्लप की है,जिसकी राजनीतिक अभिव्यक्ति निरंकुश रंगभेदी मनुस्मृति सत्ता है और जिसका धारक वाहक संघ परिवार है।

जरुरी नहीं है कि साहित्य और संस्कृति की यह धारा सीधे तौर पर गुरु गोलवलर और सावरकर विचारधारा से प्रेरित है।सरकारी खरीद,सरकारी अनुदान और पाठ्यक्रम के मुताबिक प्रकाशन तंत्र की वजह से हिंदी में राजबाषा होने की वजह से भारतीय भाषाओं में सबसे ज्यादा पूंजी खपने की वजह से एक अदृश्य सर्वशक्तिमान सवर्ण जातिवादी माफिया तंत्र हैं,जिसमें प्रकाशक,आलोचक और संपादक वर्ग समाहित है।पाठ्यक्रम में किताबों की खरीद तय करने वाले प्राध्यापकों का एक शक्तिशाली तबका भी हिंदी पर कंडली मारे हुए है।लघु पत्रिका आंदोलन के अवसान के बाद इसलिए सरकारी पूंजी से हिंदी में केसरियाकरण या केसरिया कायाकल्प निःशब्द रक्तहीन क्रांति है और इस सच का सामना विद्वतजन करना  नहीं चाहते।

जगदीश्वरजी ने संघ की विचारधारा से जुड़ी रचनाधर्मिता पर सवाल उठाया है,क्लासिक साहित्य पर नहीं।लोकसाहित्य और लोकसंस्कृति के मुताबिक गोस्वामी तुलसीदास बेजोड़ हैं,लेकिन उनका राम स्त्रीविरोधी,अनार्यसभ्यताविरोधी,द्रविड़ विरोध,अस्पृश्यता का समर्थक और हिंदू राष्ट्र की नस्ली विचारधारा का मूल स्रोत है,यह लिखने से आप कहेंगे कि हमने रामायण भी  है


संघी विचारधारा और एजंडे के लिए काम करनेवाले शाखाओं में निक्कर पहनकर प्रशिक्षित हों,यह जरुरी नहीं।आयातित हाइब्रिड जल जगंल जमीन से कटी प्रजाति के साहित्यकार बुद्धि्जीवी शाखाओं में गये बिना ही मुक्तबाजारी हिंदुत्व एजंडे के तहत साहित्य संस्कृति पर सवर्ण एकाधिकार वर्चस्व बनाये हुए हैं।ये लोग ही संघ परिवार के केसरिया अश्वमेध के गुप्त, घातक सिपाहसालार हैं। जो राजनेताओं से ज्यादा खतरनाक हैं क्योंकि ये ब्रेनवाशिंग रंगरेज हैं।



जनविजय जी,आप हमें साहित्य का आदमी नहीं मानते।आपको मालूम होना चाहिए कि मैंने ताराशंकर बंद्योपाध्याय का लिखा हर उपन्यास पढ़ा है और उन पर बनी फिल्में भीि देखी हैं।मैने बहुत पहले अंग्रेजी में एक लेख तारासंकर के रचनासमग्र पर लिखा था,human documentation of hatred:

http://palashbiswaslive.blogspot.in/2008/07/human-documentation-of-hatred.html

ताराशंकर की रचनाएं बंगाल में जमींदार तबके के संकट और औद्योगीकरण की वजह से उत्पादन प्रणाली में जमींदारी और जातिव्यवस्था के टूटन के विरुद्ध है।उनके सबसे मशहूर उपन्यास गणदेवता का चंडीमंडप का चौपाल मनुस्मृति व्यवस्था को बनाये रखने की कथा है क्योंकि जाति अनुशासन तोड़कर गांव के लोग शहरो में जाकर अपना पेशा बदल रहे थे।सत्यजीत राय की फिल्म जलसाघर आपने देखी होगी,जिसमें जमींदारी के पतन का विषाद मुख्यथीम है।गौरतलब है कि बंगाल में स्वराज आंदोलन जमींदारों के पतन और स्थाई बंदोबस्त के टूटने के कारण शुरु हुआ क्योंकि तब तक बंगाल में आदिवासी किसान विद्रोहों और मतुआ आंदोलन की वजह से बहुजन आईंदोलन सवर्ण वर्चस्व को तोड़ने लगा था और तीनों अंतरिम सरकारें गैर सवर्ण दलित मुस्लिम नेतृत्व में थी।

भाषा,शिल्प के मुताबिक ताराशंकर मेरे भी प्रिय कथाकार हैं।उनकी रचनाओं में चरित्रों और परिस्थितियों का जो ब्यौरेवार विश्लेषण चित्रण है,उसका मुकाबला भारतीय साहित्य मे शायद किसी के साथ नहीं हो सकता।बंगाल में सामाजिक यथार्थ उपन्यास में उन्होने ही सबसे पहले पेश किया है।उनकी रचनाएं क्लासिक है,इसमें कोई दो राय नहीं है।

हम उनके पक्ष की बात कर रहे हैं।वे गांधीवादी थे और गांधी की तरह वर्ण व्यवस्था के कट्टर समर्थक थे।उनका मानवतावाद मनुस्मृति का मानवतावाद है जो रामकृष्ण मिशन का मानवता वाद है जो भारत सेवाश्रम से हिंदुत्व से अलग है।

कहने को दर्शन नर नारायण है और आचरण अस्पृश्यता है।

रामकृष्ण मिशन के मानवतावादी हिंदुत्व और कांग्रेस की नर्म हिंदुत्व की राजनीति एक सी है,जिसे किसी भी सूरत में गुरु गोलवलकर या सावरकर की विचारधारा से जोड़ा नहीं जा सकता।यहीं उदार दर्शनीय मानवतावाद और नर्म सनातन हिंदुत्व मनुस्मृति व्यवस्था के लिए संजीवनी है,जो बंगाल के नवजागरण और ब्रह्मसमाजे के बाद रामकृष्ण और विवेकानंद के स्रवेश्वरवाद की वजह से सहनीय हो गया है।इसलिए बंगाल में वैज्ञानिक ब्राह्मणतंत्र के एकाधिकार वर्चस्व के खिलाफ बहुजनों में किसा तरह का कोई विद्रोह आजादी के बाद नहीं हुआ है।यह उत्तरभारत और दक्षिण भाऱत के दलित उत्पीड़न की प्रतिक्रिया में हो रहे दलित आंदोलन के समूचे परिप्रेक्ष्य को बंगाल में अप्रासंगिक बना देता है क्योंकि इस उदार मानवता वाद की वजह से अस्पृश्यता और बेदभाव के अन्याय और असमता के तंत्र पर किसी की नजर जाती नहीं है।यह दलित उत्पीड़न से ज्यादा खतरनाक स्थिति है।

हम आज हिंदुत्व के पुनरूत्थान के लिए गुरु गोलवलकर और सावरकर की तुलना में कांग्रेस की वंशवादी,जमींदारी,रियासती,ब्राह्मणवादी हिंदुत्व को ज्यादा जिम्मेदार मानते हैं।कांग्रेस की यह विचारधारा सबसे ज्यादा बारतीय साहित्य में ताराशंकर के रचनाकर्म में अभिव्यक्त हुई है।जिसका महिमामंडन करने में हिंदी के विद्वतजन भी पीछे नहीं है।यह हिंदुत्वकरण की वैज्ञानिक पद्धति है।जिसकी ज़ड़ें बंगाल में हैं।

यह सच है कि माणिक बंद्योपाध्याय के पुतुल नाचेर इतिकथा और पद्मा नदीर मांझी में अंत्यज जीवन के ब्यौरे की तुलना में ताराशंकर के देहात,जनपद और अंत्यज जीवन के ब्यौरे ज्यादा प्रामाणिक हैं।

इसीतरह महाश्वेता देवी के उपन्यासों की आदिवासी दुनिया के मुकाबले ताराशंकर के आदिवासी ज्यादा असल लगते हैं।लेकिन माणिक और महाश्वेता दोनों सामंती और साम्राज्यवादी मूिल्यों के विरुद्ध थे और किसान आदिवासियों के संघर्ष की कथा तो ताराशंकर के उपन्यासों में है ही नहीं।

ताराशंकर के रचनासमग्र में  सबकुछ जमींदारी प्रथा की शोकगाथा है या मनुस्मृति अनुशासन टूटने का विलाप है।

इसी तरह शरत हर हाल में स्त्री अस्मिता का पक्षधर है लेकिन उनका हर नायक ब्राह्मण है और वे ब्रह्म समाज के कट्टर विरोधी भी थे।इसके विपरीत  किसानों , आदिवासियों के सामाजिक जीवन संघर्ष के साथ उनका साहित्य नहीं है।

इसी वजह से हम उन्हें रवींद्र नाथ और प्रेमचंद के साथ नहीं रखते हैं।

कवि ताराशंकर का  बेहद लोकप्रिय उपन्यास है,जिसपर फिल्म भी बनी है।कवि जाति से डोम है।कवि नायक हैं।लोकसंस्कृति कविगान की पृष्ठभूमि में लिखे इस उपन्यास की पंक्ति दर पंक्ति दर सारी कथा भद्रलोक सवर्ण दृष्टि से है और दलितों ,अछूतों की जीवनशैली के प्रति अटूट घृणा है।

इसीतरह हांसुली बांकेर उपकथा और नागिनी कन्यार काहिनी में वे आदिवासी जीवन का सघन ब्यौरे पेश करते हैं।लेकिन औद्योगीकरण,शहरीकरण और उत्पादन प्रणाली में बदलाव की वजह से आदिवासियों की मुख्यधारा से जुड़ने के वे खिलाफ हैं और उनके पक्षधर हैं।वहां टोटेम आधारित जीवनपद्धति और परंपरागत पेशा में बने रहने पर सारा जोर है।

मजा यह है कि ताराशंकर का समूचा रचना संसार राढ़ बांग्ला की लाल माटी में रचा बसा है और जनपद का इतना प्रामाणिक साहित्य भारतीय भाषाओं में दुर्लभ है,जिसे क्लासिक माना जाता है।हिंदी के लोग भी उन्हें क्लासिक मानते हैं।वे लोग अंग्रेजी के वेसेक्स क्षेत्र केंद्रित उपन्यासों को क्लासिक मानते हैं।लेकिल शैलेश मटियानी या फणीश्वरनाथ रेणु या शानी उनके लिए सिर्फ आंचलिक उपन्यासकार हैं।यह दोहरा मानदंड बी अजब गजब का है।

क्लासिक साहित्य जनपक्षधर हो,यह कोई जरुरी नहीं है।

पूंजीवाद और मुक्तबाजार के पक्ष में क्लासिक साहित्य लिखा गया है।

जार्ज बर्नार्ड शा का एप्पल कार्ट तो सीधे तौर पर लोकतंत्र के खिलाफ राजतंत्र के पक्ष में लिखा गया नाटक है और वे भी क्लासिक हैं।शोलोखोव भी क्लासिक हैं और बोरिस पास्तरनाक भी क्लासिक है।हम गोर्की,दास्तावस्की या तालस्ताय की श्रेणी में शोलोखोव और पास्तरनाक को कहां रखेंगे,काफ्का या यूगो के मुकाबले कामू को कहां रखेंगे,मुद्दा यही है।

अज्ञेय की भाषा अद्भुत है,लेकिन उन्हें हम प्रेमचंद की श्रेणी में नहीं रखते या मुक्तिबोध के समकक्ष नहीं समझते।मोहन राकेश राजेंद्र यादव कमलेश्वर को क्या हम प्रेमचंद के साथ खड़ा पाते हैं,सवाल यही है।

सामाजिक यथार्थ के उपन्यासकार माणिक बंद्योपाध्याय या महाश्वेता देवी की रचनाओं के मुकाबले ताराशंकर ज्यादा पठनीय हैं,ज्यादा शास्त्रीय है,लेकिन वैज्ञानिक चिकित्सा पद्धति के विरुद्ध उनके आरोग्य निकेतन का विमर्श प्रतिगामी है,यह कहने में मुझे कोई हिचक नहीं है।

साठ के दशक में हमने गुरुदत्त के तमाम उपन्यास पढ़े हैं।भारत विभाजन की कथा से

लेकर आर्यसमाज की विचारधारा पर केंद्रित उपन्यास और कम्युनिस्ट,गांधी नेहरु विरोधी उपन्यास भी।

इसी तरह नरेंद्र कोहली और आचार्य चतुरसेन को भी हमने खूब पढ़ा है।

कोहली और चतुरसेन की रचनाएं साहित्यिक दृष्टि से ज्यादा समृद्ध थीं और आम जनता पर उसका कोई खास असर नहीं रहा है।गुरुदत्त लेकिन काफी असरदार थे।

क्योंकि आर्यसमाज की हिंदुत्व के पुनरूत्थान में वही भूमिका है जो बंगाल में रामकृष्ण मिशन की है या यूपी में पतंजलि योगाभ्यास की है।

उत्तर भारत के शहरों मे संघ परिवार की शाखा प्रशाखा का विस्तार सरस्वती सिशु मंदिर के साथ साथ आर्यसमाज आंदोलन के साथ हुआ है।गुरुदत्त के तमाम उपन्यासों में गांधी नेहरु की विचारधारा और कम्युनिस्टों के उग्र विरोध के साथ भारत विभा्जन से लिए मुसलमानों और गांधी को जिम्मेदार ठहराया गया है।जो साहित्य में भले ही उपेक्षित रहा हो,लेकिन हिंदी के हिंदुत्ववादी,आर्यसमाजी पाठकों में उसका असर अमिट है।शरणार्थी परिवार से होनेकी वजह से जूनियर कक्षाओं में ये उपन्यास पढ़ते हुए  हम भी कापी विचलित रहे हैं।

आपको शायद हैरत होगी कि हम पिछले चार दशकों से हिंदी,बांग्ला और दूसरी भारतीयभाषाओं के साहित्य का अध्ययन करता रहा हूं।अंग्रेजी साहित्य का विद्यार्थी होने के बावजूद मैंने रूसी,फ्रांसीसी और यूरोपीय भाषाओं का साहित्य ज्यादा पढ़ा है।


मीडिया की तरह साहित्य और संस्कृति के केसरियाकरण जो हो रहा है,अध्यापक प्राध्यापक केंद्रित साहित्य और विमर्श का जो मनुस्मृति बोध है,वह आरएसएस की विचारधारा के मुताबिक है।

मैंने बंगाल के अलावा बांग्लादेश के साहित्य पर भी लगातार अध्ययन किया है ,जो जनपद केंद्रित हैं,बोलियों में लिखा गया है।

हर किसी को आलोचकों,संपादकों और प्रकाशकों के हितों के मुताबिक या खेमाबंदी के तहत महान कह देने वाला मैं नहीं हूं।हालांकि आप सही है कि मेरे लिखे पर आप जैसे विद्वतजन कोई महत्व देना जरुरी नहीं समझते।


Sunday, July 16, 2017

उनके पास साहित्यकार नहीं हैं तो हमारे पास कितने साहित्यकार बचे हैं? शिक्षा व्यवस्था आखिर क्या है?

उनके पास साहित्यकार नहीं हैं तो हमारे पास कितने साहित्यकार बचे हैं? शिक्षा व्यवस्था आखिर क्या है?
पलाश विश्वास
हमारे आदरणीय जगदीश्वर चतुर्वेदी ने फेसबुक वाल पर सवाल किया है कि पांच ऐसे उपन्यासों के नाम बतायें,जो संघ परिवार की विचारधारा से प्रेरित है।इसकी प्रतिक्रिया में दावा यही है कि संघ परिवार के पास कोई साहित्यकार नहीं है।
लगता है कि बंकिम वंशजों को पहचानने में लोग चूक रहे हैं।गुरुदत्त का किसी आलोचक ने नोटिस नहीं लिया,लेकिन वे दर्जनों उपन्यास संघी विचारधारा के पक्ष में लिकते रहे हैं।
आचार्य चतुरसेन और नरेंद्रकोहली के मिथकीय आख्यान से लेकर उत्तर आधुनिक विमर्श का लंबा चौड़ा इतिहास है।
इलाहाबादी परिमल को लोग भूल गये।
सामंती मूल्यों के प्रबल पक्षधर ताराशंकर बंद्योपाध्याय जैसे ज्ञानपीठ,साहित्य अकादमी विजेता दर्जनों हैं।
कांग्रेस जमाने के नर्म हिंदुत्व वाले मानवतावादी साहित्यकार और संस्कृतिकर्म भी हिंदुत्व की विचारधारा को पुष्ट करते रहे हैं।
जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद आपातकाल के अवसान के बाद मीडिया के केसरियाकरण को सिरे से नजरअंदाज करने का नतीजा सामने है।
समूचा मीडिया केसरिया हो गया है।
भारतीय भाषाओं के साहित्य,माध्यमों और विधाओं, सिनेमा, संगीत,मनोरंजन,सोशल मीडिया में जो बजरंगी सुनामी जारी है,उसे नजरअंदाज करना बहुत गलता होगा।
उनके पास साहित्यकार नहीं है,यह दावा सरासर गलत है।नस्ली,सामंती,जाति वर्चस्व से मुक्त साहित्य क्या लिखा जा रहा है और ऐसा साहित्य क्या लिखा जा रहा है,जो रंगभेदी शुद्धतावादी हिंदुत्व की विचारधारा के प्रतिरोध में है,यह कहना मुश्किल है।
मानवतावादी साहित्य के नामपर सामंती मूल्यों को मजबूत करने वाले साहित्यकारों की लंबी सूची है।
बंकिम के आनंदमठ से चर्चा की शुरुआत करे तो सूची बहुत लंबी हो जायेगी।
संघ परिवार के संस्थानों,उनकी सरकारों से सम्मानित,पुरस्कृत साहित्यकारों, संपादकों,आलोचकों की पहले गिनती कर लीजिये।बहुजन विमर्श के अंबेडकरी घराने के अनेक मसीहावृंद के नाभिनाल भी संघ परिवार से जुड़े हैं।नई दिल्ली न सही, नागपुर, जयपुर, लखनऊ,गोरखपुर,भोपाल,कोलकाता,चंडीगठ से लेकर शिमला और गुवाहाटी से लेकर बेंगलूर तक तमाम रंग बिरंगे साहित्यकार संघ परिवार की संस्थाओं से नत्थी है।
हिंदी,हिंदू,हिंदुस्तान की तर्ज पर उग्र बंगाली,असमिया,तमिल सिख राष्ट्रवादी की तरह हिंदी जाति का विमर्श भी प्रगतिशील विमर्श का हिस्सा रहा है,जो संघ परिवार की नस्ली रंगभेदी विचारधारा के मुताबिक है।
हिंदी क्षेत्र के साहित्यकार संस्कृतिकर्मी हिंदी,हिंदू,हिंदुस्तान के बहुजन विरोधी विचारधारा से अपने को किस हद तक मुक्त रख पाये हैं और उनके कृतित्व में कितनी वैज्ञानिक दृष्टि,कितनी प्रतिबद्धता और कितना सामाजिक यथार्थ है,आलोचकों ने उसकी निरपेक्ष जांच कर ली है तो मुझे मालूम नहीं है।
हम नामों की चर्चा नहीं करना चाहते लेकिन बुनियादी मुद्दों, समाज,जल.जंगल,जमीन,उत्पादन प्रणाली और आम जनता के खिलाफ एकाधिकार कारपोरेट हिंदुत्व के अस्श्वमेधी नरसंहार अभियान के पक्ष में यथास्थितिवाद, आध्यात्म, मिथक, उपभोक्तावादी ,बहुजन विरोधी,स्त्री विरोधी साहित्य सही मायनों में संघ परिवार की विचारधारा से ही प्रेरित है।
असमता और अन्याय की सामंती व्यवस्था के पक्ष में  मुख्यधारा का समूचा साहित्य है, मीडिया है, माध्यम और विधाएं हैं।यह सबसे बड़ा खतरा है।
आजादी से पहले और आजादी के बाद भारतीय भाषाओं हिंदुत्व की विचारधार की जो सुनामी चल रही है,वह साहित्य और संस्कृति,माध्यमों और विधाओं के गांव,देहात,जनपद,कृषि से कटकर महाजनी सभ्यता के मुक्तबाजार हिंदू राष्ट्र में समाहित होने की कथा है।
समूची शिक्षा व्यवस्था हिंदुत्व के एजंडे के मुताबिक है,जिसका मूल स्वर सरस्वती वंदना है।जहां विविधत और सहिष्णुता जैसी कोई बात नहीं है।साहित्य के अध्यापकों और प्राध्यापकों का केसरिया कायाकल्प तो हिंदुत्व के पुनरूत्थान से पहले ही हो गया था कांग्रेसी नर्म हिंदुत्व के जमाने में,इसलिए बजरंगी अब रक्तबीज हैं।
भारतीय भाषाओं में चूंकि आलोचकों और संपादकों की भूमिका निर्णायक है और प्रकाशकों का समर्थन भी जरुरी है,उसके समीकरण अलग हैं,इसलिए संघ समर्थक साहित्य की चीरफाड़ कायदे से नहीं हुई।
अनेक प्रगतिशील धर्मनिरपेक्ष आदरणीय आदतन बहुजनविरोधी,आध्यात्मवादी,सामंती मल्यों के प्रवक्ता,सवर्ण वर्चस्ववादी नायक अधिनायक के सर्जक,सामंती प्रेतों को जगानेवाले,जाति व्यवस्था,शुद्धतावाद,पितृसत्ता,नस्ली वर्चस्व के पैरोकार हैं,जिनकी व्यक्तित्व कृतित्व की हमारे जातिसमृद्ध आलोचकों ने नहीं की है।
इनमें से ज्यादातर प्रगतिशील धर्मनिरपेक्ष लबादे में संघ परिवार के एजंडे को ही मजबूत करते रहे हैं,कर रहे हैं।
उनके पास साहित्यकार नहीं हैं तो हमारे पास कितने साहित्यकार बचे हैं?

Saturday, July 15, 2017

Anatomy of Basirhat (West Bengal) Violence Ram Puniyani

Anatomy of Basirhat (West Bengal) Violence

 

Ram Puniyani

 

In an insane act of violence two people lost their lives in Basirhat (West Bengal, 04 07 2017). From last quite some time the social media is abuzz that WB is turning Islamist, Hindus are under great threat, their condition is becoming like that of Pundits in Kashmir. The section of TV media projected the view that WB is not safe for Hindus but is a heaven for Muslims. Angry posts are also declaring that Mamata is appeasing Muslims, Islamist Radicals are growing in Bengal with support from the Mamata Government etc.

This act of violence was provoked by a facebook post. (July 04, 2017) Once it was known in the area as to who has done the posting, they surrounded the house where the 17 year old boylived. The posting was derogatory to Muslims. As the atmosphere was building up the state machinery kept silent, till the aggressive mob of Muslims surrounded the house. Police intervention was too late. While the boy was saved despite the angry mob which was demanding that boy handed over to them

BJP leaders got hyperactive and visited the area as a delegation. They tried to enter the hospital to see the dead body of Kartik Chandra Ghosh (Age 65). Muslim attackers had killed him. This attempt of the BJP leaders was to derive political mileage from the situation as BJP claimed that Ghosh was President of one of the units of BJP, while Ghosh's son denied it.

 The Governor of West Bengal, K.N. Tripathi, reprimanded Mamata Bannerjee for the violence. Seeing his attitude Mamata got upset and called him as the one belonging to BJP block level leader. Same Governor has been called as a 'dedicated soldier of Modi Vahini' by one BJP leader Rahul Sinha. The communal violence has taken a political color, BJP accusing chief minister Mamata Banerjee of appeasement of Muslims while the ruling Trinamool Congress is alleging that BJP is out for inciting communal passions to benefit electorally. Surprisingly with this violence, where two people have lost their life, BJP is demanding the President's rule in the state, while the law and order has already been restored within a week's time.

The picture in Bengal is very complex. A section of Muslim leadership is repeatedly doing violence in response to 'hurt sentiments'. Earlier also violence was unleashed by Muslims in Kaliachak, when one Kamlesh Tiwari had posted something offensive against Prophet Mohammad. The feeling of impunity enjoyed by this section of Muslim leadership is giving a big handle in the hands of Hindutva forces, for which this yet again is opportunity to polarize the society along religious lines. Here in Bengal they don't have to create the issue of 'Holy Cow' or 'Ram Temple', it is being provided by this misguided section of Muslim leadership.  

The picture is being created that Bengal is in the grip of Islamization as earlier Kaliachak violence and now this violence are being cited to show that Hindus are unsafe here. There was no loss of life in Kaliachak incident but yes there was loss of property, though. The core theme of BJP-RSS propaganda is built around Hindu victimization.

The role of government has been far from satisfactory in this violence, as it had time enough to control the situation but it did not. The law and order machinery must ensure prevention of the buildup of such incidents. By and large one can say that effective system can prevent most of the riots, irrespective of who is the offender. Here the Government should have acted in time.

Surely, Mamata's alleged appeasement of Muslims does not apply in economic matters. The fact is that the economic conditions of Muslims of Bengal are among the worst in the country. The budgetary allocation for minorities in Bengal is much less than in many other states.

At the same time the communal polarization by the BJP is coming up with the menacing speed. In a state where Ram Navami (Lord Ram's birth day celebration) was practically unheard of, this year around the Ram Navami procession was taken out with frightening swords in hands. Lord Ganesh festival is also being promoted in the state where Ma Durga had been the main deity so far.

Finally, who benefits from the violence? The studies of different scholars on communal violence in India like those by Paul Brass point out that there is an institutional riot mechanism, the core part of which is the impunity enjoyed by the offenders, the abysmal role of justice delivery system as a whole. Another significant study from Yale University tells us that in the places where communal violence takes place, in the long run at electoral level, it is BJP which stands to benefit. Those who appease the Muslim fundamentalists should note this and see to it that that, to discharge the constitutionally assigned duties are the essence of governance, irrespective of the community involved in the violence.

Let's summarize the anatomy of violence in Bashirghat. Stage one, the offensive post on face book, two fundamentalist radical sections of Muslims unleash violence, number three the approach of the state government fails in preventing the violence. Number four BJP carries on from there and worsens the atmosphere by playing out videos which showed that Muslims were attacking Hindus in Basirhat. It turned out that videos were not from Bashirhat at all. They were taken from Gujarat violence of 2002. Also clips of a Bhojpuri films showing the molestation of Hindu women were recklessly circulated, the impression being given that this is happening in Basirhat. The same was claimed by BJP's national general secretary Kailash Vijayvargiya, who said that he had news of Hindu women being raped in the affected area. And lastly drums are beaten about victimization of Hindus in Bengal. One just hopes it will not lead to polarization of communities leading in a state where so far communal violence had been reasonably under check.

Friday, July 14, 2017

खेती की तरह आईटी सेक्टर में भी खुदकशी का मौसम गोरक्षा समय में पहले करोड़ नौकरियां पैदा करने के सुनहले दिनों के ख्वाब दिखाये गये और अब जीएसटी के जरिये रोजगार सृजन की बात की जा रही है।सुनहले दिनों के ख्वाब में युवाओं का न रोजगार है और न कोई भविष्य।जीवन साथी चुनना भी मुश्किल है।फर्जी तकनीकी शिक्षा के दुश्चक्र में परंपरागत शिक्षा से वंचित इस युवा पीढ़ी के हिस्से में अंधेरा ही अंधेरा


खेती की तरह आईटी सेक्टर में भी खुदकशी का मौसम

गोरक्षा समय में पहले करोड़ नौकरियां पैदा करने के सुनहले दिनों के ख्वाब दिखाये गये और अब जीएसटी के जरिये रोजगार सृजन की बात की जा रही है।सुनहले दिनों के ख्वाब में युवाओं का न रोजगार है और न कोई भविष्य।जीवन साथी चुनना भी मुश्किल है।फर्जी तकनीकी शिक्षा के दुश्चक्र में परंपरागत शिक्षा से वंचित इस युवा पीढ़ी के हिस्से में अंधेरा ही अंधेरा है।

पलाश विश्वास

नोटबंदी और जीएसटी के निराधार आधार चमत्कारों के मध्य अब किसानों मजदूरों के अलावा इंजीनियरों की खुदकशी की सुर्खियां बनने लगी है।प्रधान सेवक अपनी अमेरिका यात्रा के दौरान महाबलि ट्रंप से हथियारों और परमाणु चूल्हों का सौदा तो कर आये लेकिन अमेरिकी नीतियों की वजह से खतरे में फंसे आईटी क्षेत्र में लगे लाखों युवाओं के लिए एक शब्द भी खर्च नही किया।अभी पिछले  गुरुवार को पुणे की एक होटल की बिल्डिंग से कूदकर एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर ने अपनी जान दे दी। कमरे में मिले सुसाइड नोट में मृतक इंजीनियर ने आईटी क्षेत्र में जॉब सिक्योरिटी नहीं होने की वजह से खुदकशी  कर ली।

यह आईटी सेक्टर में गहराते संकट के बादलों का सच है,जिससे भारत सरकार सिरे से इंकार कर रही है।

गोरक्षा समय में पहले करोड़ नौकरियां पैदा करने के सुनहले दिनों के ख्वाब दिखाये गये और अब जीएसटी के जरिये रोजगार सृजन की बात की जा रही है।सुनहले दिनों के ख्वाब में युवाओं का न रोजगार है और न कोई भविष्य।जीवन साथी चुनना भी मुश्किल है।फर्जी तकनीकी शिक्षा के दुश्चक्र में परंपरागत शिक्षा से वंचित इस युवा पीढ़ी के हिस्से में अंधेरा ही अंधेरा है।

यह सिर्फ एक आत्महत्या का मामला नहीं है कि आप राहत की सांस लें कि बारह हजार खेत मजदूरों और किसानों की खुदकशी के मुकाबले एक खुदकशी  के मामले से बदलता कुछ नहीं है।

गौरतलब है कि पिछले कई दिनों से आईटी सेक्टर में छाई मंदी को लेकर इस प्रोफेशन से जुड़े लोग अपने करियर को लेकर बेहद चिंतित हैं। आईटी प्रोफेशनल्स को कोई और रास्ता नजर नहीं आ रहा है। बीते महीनों आई एक खबर के मुताबिक, इन्फोसिस कर्मचारियों को नौकरी से निकालने वाली थी। इससे पहले भी दूसरी कंपनियां जैसे विप्रो, टीसीएस और कॉगनिजेंट भी अपने यहां कर्मियों की छंटनी कर चुकी हैं। इसी बात से चिंतित होकर गुरुप्रसाद ने आत्महत्या कर ली।


आईटी सेक्टर में भारी छंटनी के सिलसिले में कंपनियों ने कार्यदक्षता के मुताबिक नवीकरण की बात की तो भारत सरकार की ओर से कह दिया गया कि आईटी सेक्टर में कोई खतरा है ही नहीं।क्योंकि कंपनियां किसी की छंटनी नहीं कर रही है,सिर्फ कुछ लोगों के ठेके का नवीकरण नहीं किया जा रहा है।

मानव संसाधन से जुड़ी फर्म हेड हंटर्स इंडिया ने हाल में कहा है कि कि नई प्रौद्योगिकियों के अनुरूप खुद को ढालने में आधी अधूरी तैयारी के कारण भारतीय आईटी क्षेत्र में अगले तीन साल तक हर साल 1.75-2 लाख इंजीनियरों की सलाना छंटनी होगी। हेड हंटर्स इंडिया के संस्थापक अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक के लक्ष्मीकांत ने मैककिंसे एंड कंपनी द्वारा 17 फरवरी को भारतीय सॉफ्टवेयर सेवा कंपनियों के मंच नासकाम इंडिया लीडरशिप फोरम को सौंपी गई रिपोर्ट का विश्लेषण करते हुए कहा, "मीडिया में खबर आई है कि इस साल 56,000 आईटी पेशेवरों की छंटनी होगी, लेकिन नई प्रौद्योगिकियों के अनुरूप खुद को ढालने में आधी अधूरी तैयारी के चलते तीन साल तक हर साल वास्तव में 1.75-2 लाख आईटी पेशेवरों की छंटनी हो सकती है।"




श्रमकानूनों में सुधार की वजह से श्रम विभाग और लेबर कोर्ट की कोई भूमिका नहीं रह गयी है।ठेके पर नोकरियां तो मालिकान और प्रबंधकों की मर्जी है।वे अपने पैमाने खुद तय करते हैं और उसी हिसाब से कर्मचारियों की छंटनी कर सकते हैं ।कर्मचारियों की ओर से इसके संगठित विरोध की संभावना भी कम है।क्योंकि निजीकरण,विनिवेश और आटोमेशन के खिलाफ अभी तक मजदूर यूनियनों ने कोई प्रतिरोध नहीं किया है।नये आर्तिक सुधारों की वजह से ऐसे प्रतिरोध लगभग असंभव है।


डिजिटल इंडिया में सरकारी क्षेत्र में नौकरियां हैं नहीं और सरकारी क्षेत्र का तेजी से विनिवेश हो रहा है।आधार परियोजना से वर्षों से बेहिसाब मुनाफा कमाने वाली कंपनी इंफोसिस भी अब रोबोटिक्स पर फोकस कर रही है।सभी क्षेत्रों में शत प्रतिशत आटोमेशन का लक्ष्य है क्योंकि कंपनियों को कर्मचारियों पर होने वाले खर्च में कटौती करके ही ज्यादा से ज्यादा मुनाफा हो सकता है।


दूसरी ओर मार्केटिंग और आईटी सेक्टर के अलावा पढ़े लिखे युवाओं के रोजगार किसी दूसरे क्षेत्र में होना मुश्किल है।बाजार में मंदी के संकट और कारपोरेट एकाधिकार वर्चस्व,खुदरा कारोबार में विदेशी पूंजी,ईटेलिंग इत्यादि वजह से मार्केंटिंग में भी नौकरियां मिलनी मुश्किल है।


नालेज इकोनामी में ज्ञान विज्ञान की पढ़ाई,उच्च शिक्षा और शोध का कोई महत्व न होने से सारा जोर तकनीकी ज्ञान पर है और मुक्तबाजार में आईटी इंजीनियरिंग ही युवाओं की पिछले कई दशकों से सर्वोच्च प्राथमिकता बन गयी है।विदेश यात्रा और बहुत भारी वेतनमान की वजह से आईटी सेक्टर में भारतीय युवाओं का भविष्य कैद हो गया है।


मुक्तबाजार से पहले कृषि इस हद तक चौपट नहीं हुई थी।नौकरी न मिले तो खेती या कारोबार का विकल्प था।लेकिन आईटी इंजीनियरों के सामने जीएसटी के जरिये हलवाई की दुकान या किराने की दुकान में आईटी सहायक के सिवाय कोई विकल्प बचा नहीं है।ऐसी नौकरी मिल भी जाये तो वह आईटी सेक्टर के भारी भरकम पगार के मुकाबले कुछ भी नहीं है।


हालत यह है कि मीडिया के मुताबिक आईटी कर्मचारियों के लिए यूनियन बनाने की कोशिश में जुटा द फोरम फॉर आईटी एम्पलॉयीज (एफआईटीई) ने कहा है कि आईटी व अन्य बड़ी कंपनियों की तरफ से  छंटनी के खिलाफ विभिन्न राज्यों में श्रम विभाग के पास करीब 85 याचिका दाखिल की गई है। चेन्नई में संवाददाताओं से बातचीत में फोरम के महासचिव विनोद ए जे ने कहा, अगले छह हफ्तों में हमारे दिशानिर्देश के तहत अपनी-अपनी कंपनियों के खिलाफ करीब 100 कर्मचारी शिकायत दाखिल करेंगे।

फोरम का दावा है कि कॉग्निजेंट, विप्रो, वोडाफोन, सिनटेल और टेक महिंद्रा जैसे संगठनों के 47 कर्मचारियों ने श्रम विभाग पुणे में याचिका दाखिल की है, वहीं 13 याचिकाएं कॉग्निजेंट व टेक महिंद्रा के कर्मचारियों ने हैदराबाद में दाखिल की है। ये याचिकाएं औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 की धारा 2 ए के तहत दाखिल की गई है, जो वैयक्तिक याचिकाओं के लिए है। उन्होंने कहा, इस अधिनियम की धारा 2के सामूहिक याचिका के लिए है। कॉग्निजेंट व अन्य कंपनियों ने इन आरोपों का खंडन किया है और कहा है कि वे कर्मचारियों की छंटनी नहीं कर रहे हैं। फोरम का दावा है कि करीब 3,000 कर्मचारियों ने उनसे संपर्क किया है। इसकी योजना समर्थन के लिए विभिन्न राजनीतिक पार्टियों से संपर्क की भी है।


खबरों के मुताबिक पुणे में एक इंजीनियर ने केवल इसलिए आत्महत्या कर ली क्योंकि उसके फील्ड में जॉब सिक्योरिटी नहीं थी। मृतक गोपीकृष्ण गुरुप्रसाद (25) आंध्र प्रदेश का निवासी था। कुछ दिनों पहले ही मृतक ने पुणे में नई कंपनी जॉइन की थी। पुणे के विमानगर इलाके स्थित एक होटल के ऊपर वाली मंजिल से गुरुप्रसाद ने छलांग लगाकर आत्महत्या कर ली। आत्महत्या करने से पहले मृतक ने अपना हाथ काटने की  कोशिश की। गुरुप्रसाद इससे पहले दिल्ली और हैदराबाद में भी नौकरी कर चुका था। मौके से पुलिस ने एक सुसाइड नोट भी बरामद किया।


नोट में मृतक ने लिखा, 'आईटी में कोई जॉब सिक्योरिटी नहीं है। मुझे अपने परिवार को लेकर चिंता होती है।' शव को पोस्टमार्टम के बाद परिजनों को सौंप दिया गया है। पुलिस मामले की जाँच कर रही है।


खुदकशी की इस घटना को नजर्ंदाज नहीं किया जा सकता क्योंकि मैककिंसे एंड कंपनी की रिपोर्ट में कहा गया था कि आईटी सेवा कंपनियों में अगले 3-4 सालों में आधे कर्मचारी अप्रासंगिक हो जाएंगे। मैककिंसे एंड कंपनी के निदेशक नोशिर काका ने भी कहा था कि इस उद्योग के सम्मुख बड़ी चुनौती 50-60 फीसदी कर्मचारी को पुन: प्रशिक्षित करना होगा क्योंकि प्रौद्योगिकियों में बड़ा बदलाव आएगा। इस उद्योग में 39 लाख लोग कार्यरत हैं और उनमें से ज्यादातर को फिर से प्रशिक्षण देने की जरूरत होगी।


बड़ी संख्या में आईटी इंजीनियरों के बेरोजगार होने या उनकी नौकरियां असुरक्षित हो जाने की स्थिति खेतों की तरह आईटी सेक्टर के बी कब्रिस्तान में तब्दील हो जाने का खतरा है।

अमेरिका, सिंगापुर, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे देशों में वर्क वीजा पर कड़ाई की वजह से भारतीय सॉफ्टवेयर निर्यातक पर विशेष रूप से मार पड़ी है। आर्टिफिशल इंटेलिजेंस  में नई प्रौद्योगिकी, रोबोटिक प्रक्रिया ऑटोमेशन और क्लाउड कंप्यूटिंग की वजह से कंपनियों अब कोई कार्य कम श्रमबल से कर सकती हैं। इसकी वजह से सॉफ्टवेयर कंपनियों को अपनी रणनीति पर नए सिरे से विचार करना पड़ रहा है।


भारतीय आईटी सेक्टर के प्रोफेशनल्स के छंटनी की टेंशन बाद एक और समस्या का पहाड़ उन लोगों पर टूटने लगा है। आईटी प्रोफेशनल्स को पहले अपनी जॉब तो अब अपने जीवनसाथी ढ़ढने में दिक्क्तें आ रही है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, आईटी प्रोफेशनल्स से लोग शादी करने से अब कतरा रहे हैं।


मैट्रीमोनियल वेबसाइट के ट्रेंड और पारंपरिक तौर पर 'रिश्ते मिलाने वालों' को देखा जाए तो मालूम होता है कि समय बदल चुका है| 'साफ्टवेयर इंजीनियर' दूल्हों की डिमांड अब पहले के मुकाबले बहुत कम हो गई है। सूत्रों के मुताबिक सामने आया है कि इसकी मुख्य वजह है आईटी सेक्टर में अनिश्चतता और छंटनी, ऑटोमेशन से नौकरियों पर मंडराता खतरा। इसके पीछे एक बड़ी वजह मानी जा रही है अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के तहत संरक्षणवादी भावना का बढ़ना। इस वजह कई भारतीय को अमेरिका से भारत लौटना पड़ा हैं।


सॉफ्टवेयर प्रोफेशनल्स पर जो आदर्श वर का ठप्पा लगा था वह अब कम होने लग गया है, खासतौर पर जब अरेंज मैरिज की बात हो।

एक अंग्रेजी पेपर में छपी खबर के मुताबिक एक मेट्रीमोनियल एड का जिक्र है जिसमें तमिल के रहने वाले माता-पिता ने अपनी बेटी के लिए दूल्हे का ऐड छपवाया जिसके अंत में लिखा था हमें आईएएम, आईपीएस, डॉक्टर और बिजनेस मेन की तलाश है, कृपया सॉफ्टवेयर इंजीनियर कॉल न करें। शादी डॉट कॉम के सीईओ गौरव ने बताया कि, इस साल की शुरूआत से ही आईटी प्रोफेशनल्स तलाशने वाली लड़कियों की संख्या में कमी दर्ज की है।


Thursday, July 13, 2017

शैलेश, हिन्दी साहित्य के भंडार को भर कर चले गये. पर्वतीय अंचल के जनजीवन के अभावों, सुख­दुख, संघर्षों, और जिजीविषा को जीवन्त रूप में उभार कर चले गये. पर हमने, हमारी व्यवस्था ने उनके नाम से एक दो पुरस्कार घोषित कर जैसे छुट्टी पाली. ताराचंद्र त्रिपाठी

शैलेश, हिन्दी साहित्य के भंडार को भर कर चले गये. पर्वतीय अंचल के जनजीवन के अभावों, सुख­दुख, संघर्षों, और जिजीविषा को जीवन्त रूप में उभार कर चले गये. पर हमने, हमारी व्यवस्था ने उनके नाम से एक दो पुरस्कार घोषित कर जैसे छुट्टी पाली. 
ताराचंद्र त्रिपाठी

शैलेश मटियानी पर गुरुजी ताराचंद्र त्रिपाठी ने अपने फेस बुक वाल पर यह बेहद प्रासंगिक,मार्मिक और वैचारिक आलेख पोस्ट किया है।पहाड़ में बटरोही के अलावा बाकी किसी साहित्यकार ने अबतक शैलेश जी के कृतित्व पर कोई खास टिप्पणी नहीं की है।

हम जब जीआईसी में गुरुजी के छात्र थे,तभी उन्होंने हमें शैलेश जी की कहानियों और उपन्यासों के जरिये पहाड़ के सामाजिक यथार्थ को समझने के लिए कहा था।लेकिन अब तक उनका शैलेश जी पर लिखा कोई आलेख देखने को नहीं मिला,जबकि वे हमेशा शैलेश जी के जीवन संघर्ष,उनके व्यक्तित्व और कृतित्व को बहुत महत्व दिया करते थे।उन्हींके सान्निध्य में कपिलेश भोज और मुझे सबसे पहले शैलेश मटियानी की रचनाओं के मार्फत पहाड़ और बाकी दुनिया को समझने की दृष्टि मिली थी।
यह आलेख शैलेश जी के अवसान के बाद उनकी समाज और सत्ता की ओर से घोर उपेक्षा और उनकी स्मृति अवशेष के निरादर पर यह बेहद विचारोत्तेजक टिप्पणी है।बेटे की मृत्यु के बाद आजीवन प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के लड़ने वाले मटियानी जी में थोड़ा वैचारिक परिवर्तन आया,जिस अपराध में हिंदी के प्रगतिशील तत्वों ने उन्हे और उनके योगदान को सिरे सेखारिज कर दिया।लेकिन देखनेवाली बात यह है कि जो सामाजिक यथार्थ और उससे जुड़े अस्पृश्यता के दंश से लहूलुहान पहाड़ और बाकी देश का साक्षी है उनका रचनासमग्र ,वह कुलमिलाकर नस्ली फासिज्म की विचारधारा के खिलाफ ही है ,जिसका इस्तेमाल अन्याय और असमता की मनुस्मृति व्यवस्था के हित में कतई नहीं हो सकता और न सत्ता की राजनीति में शैलेश जी का दुरुपयोग संभव है।
नतीजतन वामपक्ष की तरह दक्षिणपंथी हिंदुत्ववाजियों ने भी शैलेश जी की कोई सुधि नहीं ली,जिनके साथ शैलेशजी को नत्थी कर देने की कोशिशें लगातार हो ती रही है।
शैलेश मटियानी और उनके कृतित्व को समझने के लिए हमारे हिसाब से हिंदी और भारतीय साहित्य के हर पाठक को ताराचंद्र त्रिपाठी का यह आलेख अवश्य पढ़ना चाहिए।
हम चूंकि साहित्यिक बिरादरी में नहीं हैं,इसलिए कवियों,साहित्यकारों और संपादकों और आलोचकों के लिए मेरा यह बयान नहीं है।मेरे हिमालय के लोग और मरे बारत के आम लोग शैलेश जी की भूमिका के बारे में तनिक विवेचना करें,इसके लिए गुरुजी की यह टिपप्णी शेयर कर रहा हूं।
पलाश विश्वास

आदरणीय गुरुजी ताराचंद्र त्रिपाठी के फेसबुक वाल से 

विधाता. जब किसी को भरपूर प्रतिभा देता है तो उसके साथ ऐसी विसंगतियाँ भी जोड़ देता है कि उसके लिए जीना दूभर हो जाता है. इस विसंगति के चक्रव्यूह से वही निकल पाते हैं जिनमें संघर्ष करने की अपार क्षमता होती है. इसी को चाल्र्स डार्विन ने प्राकृतिक चयन या योग्यतम की उत्तरजीविता की प्रकृतिक प्रक्रिया कहा है.
शैलेश मटियानी का जीवन भी इसका एक जीता­जागता नमूना है. वे आजादी से सोलह साल पहले एक पिछड़ेे पर्वतीय गाँव के बेहद गरीब परिवार में जन्मे और बारह वर्ष की अवस्था में अनाथ हो गये. दो जून रोटी के लिए न केवल अपने चाचा की मांस की दूकान में काम करना पड़ा, अपितु कलम संभालते ही अपने गरीब और पिछड़ेे परिवेश से उठने के प्रयास में एक बोचड़ की दूकान में काम करने वाला छोकरा इलाचन्द जोशी और सुमित्रानन्दन पन्त से टक्कर लेना चाहता है. जैसे व्यंग बाण भी सहे.
उनको तपा­तपा कर सोना बनाने की प्रक्रिया में काल भी जैसे क्रूरता की हदें पार कर गया. अपने पापी पेट की भूख को शान्त करने के लिए होटल में जूठे बरतन माँजने से लेकर अनेक छोटे­मोटे काम करने पडे. दिल्ली, मुजफ्फर नगर, फिर कुछ दिन अल्मोड़ा, और अन्ततः इलाहाबाद आ गये. इतनी भटकन और अभावों से उनके जीवन पथ को कंटकाकीर्ण बनाने के बाद भी जैसे काल संतुष्ट नहीं हुआ, और उनके मासूम छोटे पुत्र की हत्या के प्रहार ने उन्हें बुरी तरह तोड दिया. मौत भी ऐसी दी कि क्रूर से क्रूर व्यक्ति को रोना आ जाय.
इतने कठिन जीवन संघर्ष के बीच उन्होंने न केवल हिन्दी साहित्य को दर्जनों अमर कृतियों की सौगात दी अपितु अपने अंचल के जीवन को भी अपनी रचनाओं में जीवन्त रूप से उभारा. सच पूछें तो कुमाऊँ की पृष्ठभूमि, उसके सुख दुख, अभावों और संघर्ष के बीच भी जनजीवन के मुस्कुराने के पल दो पल खोजने के प्रयासों को भी उनके अलावा पर्वतीय अंचल का कोई अन्य कथाकार उतनी शिद्दत के साथ नहीं उभर पाया है.
उन्होंने अनेक उपन्यास लिखे, दर्जनों कहनियाँ लिखीं, 'पितुआ पोस्टमैन' के सामान्य धरातल से उठ कर वे 'प्रेतमुक्ति' के जाति, वर्ग, सामाजिक विडंबनाओं से मुक्त मानवत्व की महान ऊँचाइयों पर पहुँचे. जब कि उनका सहारा लेकर उठे, और लक्ष्मी के वरद्पुत्र बने तथाकथित रचनाकार समाज में सामन्ती युग के प्रेतों को जगाने में लगे हुए हैं.
शैलेश, हिन्दी साहित्य के भंडार को भर कर चले गये. पर्वतीय अंचल के जनजीवन के अभावों, सुख­दुख, संघर्षों, और जिजीविषा को जीवन्त रूप में उभार कर चले गये. पर हमने, हमारी व्यवस्था ने उनके नाम से एक दो पुरस्कार घोषित कर जैसे छुट्टी पाली. हल्द्वानी में उनके आवास को जाने वाले मार्ग का नामकरण 'शैलेश मटियानी मार्ग, का शिला पट्ट लगाकर, जैसे उन पर एहसान कर दिया. उस शिला पट्ट की हालत यह है कि, उस पर परत­दर­परत कितने व्यावसायिक विज्ञापन चिपकते जा रहे हैं इस पर ध्यान देने की किसी को फुर्सत नहीं है.
उनका आवास जीर्ण­शीर्ण हो चुका है, टपकते घर के बीच उनका परिवार जैसे­तैसे दिन काट रहा है, अपने पिता की थात को फिर से लोगों के सामने लाने के लिए उनके ज्येष्ठ पुत्र राकेश, रात­दिन अकेले लगे हुए हैं. सत्ता और पद के मद में आकंठ निमग्न, जुगाड़­धर्मी अन्धी व्यवस्था में ही नहीं अपने आप को रचनाधर्मी कहने वाले हम लोगों में भी मौखिक सहानुभूति के अलावा उनकी स्मृति को सुरक्षित करने और नयी पीढी को अभावों से लोहा लेते हुए अपने अस्तित्व को प्रमाणित करने की प्रेरणा देने के लिए कोई विचार नहीं है.
कितने कृतघ्न हैं हम लोग! यह इस देश में नहीं पता चलता, विदेशों में जाने पर पता चलता है. मुझे 2011 तथा 2013 में छः मास लन्दन में बिताने का अवसर मिला. अपनी यायावरी की आदत से लाचार मैंने लन्दन का कोना­कोना छान मारा. वैभव और उपलब्धियों से भरे इस महानगर में सबसे ध्यानाकर्षक बात लगी 'अपने कृती पुरखों के याद को बनाये रखने की प्रवृत्ति. अकेले लन्दन में कीट्स, सेमुअल जोन्सन, चाल्र्स डिकिंस, चाल्र्स डार्विन, जैसे उनसठ रचनाधर्मियों के आवासों को उनके कृतित्व का संग्रहालय बना दिया गया है. इस श्रद्धापर्व में उनके अपने लोग ही शामिल नहीं है. नाजी जर्मनी के उत्पीड़न से बचने के लिए लन्दन में शरण लेने वाले फ्रायड जैसे अनेक विदेशी मूल के कृती भी विद्यमान हैं. यही नहीं आज के रसेल स्क्वायर के जिस आवास में चाल्र्स डिकिन्स आठ वर्ष रहे और अपने कृतित्व को उभारा, आज पाँच सितारा होटल में रूपान्तरित होने पर भी, उसके मालिक अपनी दीवार पर यह लिखना नहीं भूले कि इस आवास में चाल्र्स डिकिंस आठ वर्ष रहे थे. ब्रिटिश पुस्तकालय के प्रांगण में आइजेक न्यूटन आज भी अपना परकार (कंपास) लेकर अन्वेषण में लगे हुए हैं. बैंक आफ इंग्लैंड वाले मार्ग पर 1808 मे जेलों में सुधार करने के लिए संघर्ष करने वाली महिला ऐलिजाबेथ के आवास पर, जो आज एक विशाल भवन में रूपान्तरित हो चुका है, उनके नाम और कृतित्व को सूचित करने वाली पट्टिका लगी हुई है. किसी भी सड़क पर चले जाइये, आपको अपने पूर्वजों के कृतित्व के प्रति आभार व्यक्त करने वाली पट्टिकाएँ मिल जायेंगी. और हमने अपने लोक जीवन को साहित्य के शिखर पर उत्कीर्ण करने वाले कथाकार के नाम पर एक मार्ग पट्टिका लगाई भी तो उसे अंट­शंट विज्ञापनों के तले पाताल में दफना दिया.
दो सौ साल जिनकी गुलामी में रहे, जिनकी भाषा, वेश­भूषा, बाहरी ताम­झाम को, अपनी परंपराओं को दुत्कारते हुए हमने अंगीकार किया, उनके आन्तरिक गुणों और अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता बोध को हम ग्रहण नहीं कर सके. आज भी हम वहीं पर हैं. पंजाब से आये लोगों की कर्मठता को अंगीकार करने के स्थान पर हम उनके नव धनिक वर्ग के तमाशों और तड़क­भड़क के सामने अपनी हजारों वर्ष के अन्तराल में विकसित सरल और प्राकृ्तिक रूप से अनुकूलित परंपराओं को ठुकराते जा रहे हैं.
तब और भी दुख होता है कि जहाँ प्रदेश की सत्ता के शीर्ष पर उनके ही जनपद का व्यक्ति आसीन है, उनके पुत्र को अपने कृती पिता की स्मृति को धूमिल होने और अपने बीमार घर को धराशायी होने से बचाने के लिए दर­दर भटकना पड रहा है.
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Just Hell losing in Darjeeling Hills. Ten vehicles destroyed in Teesta Bazar on Sikkim Road,minister`s convoy attacked,Power production stopped!

Just Hell losing in Darjeeling Hills.

Ten vehicles destroyed in Teesta Bazar on Sikkim Road,minister`s convoy attacked,Power production stopped!

Palash Biswas

Now it is peace time in 24 pgs as Communal agenda is exposed but the politics of racist communal violence is playing havoc in Bengal hills which also burns Sikkim herading serious strategic calamity keeping in mind Chinese threat to make a Kashmir in Sikkim and the Sikkkim stand off itself.Both  governments of Bengal and India have miserably failed to initiate peace talks in burning Darjeeling while the people of India seem to have no idea about the crisis.

The most dangerous implications of Darjeeling unrest seem to be emerging now.Ten vehicles on Sikkim Road at Teesta Bazar which connects darjeeling,have been destroyed.Power plants have stopped production and the convoy of WB minister of tourism Gatam Dev has been attcked in Panihata amidst fresh incidents of arson and violence.Bengal and Sikkim have to suffer from power deficit now while tea industry and tourims lost almost everything and every home seem to be out of ration in this rainy season.


Gorkhaland mevement seems to be beyond the control of its leaders now.State administration  and police seem to be absent and it is anarchy in full bloom while CM of west Bengal Mamata Banerjee is claiming to restore peace very soon.


From tomorrow it would be fast unto death with resignation of all political representatives from every level.It is perhaps no point of return in darjeeling Hills.Just hell losing!Mind you,July 15 will mark one month of the indefinite strike in Darjeeling as the protesters continue to demand a separate state of Gorkhaland. On this day, leaders from all parties, including the BJP and Congress, will go on an indefinite hunger strike at Chowrasta in Darjeeling. While party spokesperson Neeraj Zimba will represent GNLF in the hunger strike, GJM will be represented by assistant general secretary Binay Tamang and Akhil Bharatiya Gorkha League by Pratap Kerri. All other parties will nominate representatives over the next two days.


Meanwhile,in another incident of mob violence in Darjeeling, a group of people set fire to a Gorkhaland Territorial Administration Tourist Information office on Wednesday night. According to reports, supporters of Gorkha Janmukti Morcha (GJM), which spearheads the agitation, took out a rally at Chowkbazar in Darjeeling on Wednesday with the body of Ashok Tamang, the man who was killed in alleged police firing. The agitation then took a violent turn and the angry protesters torched the office building late at night.


Tamang, a janitor for the Darjeeling municipality, had suffered injuries in police firing during an agitation on Saturday. He succumbed to his injuries on Tuesday morning at Manipal hospital in the neighbouring Sikkim. He is survived by two children.

The National Hydroelectric Power Corporation (NHPC) has shut down its hydel power plant at Ramdi in Darjeeling hills after a mob of over 600 people began agitation outside the plant site, a NHPC official said on Thursday.


"We had shut down operations of Teesta Low Dam-III plan of 132 MW as a precaution after a mob of over 600 people gheraoed the site and began agitation," the NHPC official told PTI.

The official said the regional head of NHPC is slated to meet the West Bengal power secretary later in the day to discuss the issue.


"We had already written to state power secretary, chief secretary and district magistrate to beef up security at the NHPC installations in Darjeeling district," the official said.


NHPC will resume power generation at the Ramdi plant once it gets assurance of security of the unit, officials said. NHPC has another unit Teesta Low dam-IV of 160MW in Darjeeling hills.


Pro-Gorkhaland supporters had on Wednesday set ablaze a panchayat office and damaged a few government vehicles in Darjeeling on the 28th day of the indefinite shutdown.

ABP anad reports:

পানিহাটায় পর্যটনমন্ত্রী গৌতম দেবের গাড়িতে হামলা, পুলিশের গাড়িতেও ভাঙচুর মোর্চার

দার্জিলিং: পাহাড়ে ফের তাণ্ডব চালাল গোর্খা জনমুক্তি মোর্চা।


শিলিগুড়ির কাছে পানিঘাটায় আক্রান্ত হয়েছেন পর্যটনমন্ত্রী গৌতম দেব। নেপালি কবি ভানুভক্তের জন্মজয়ন্তী অনুষ্ঠানে যোগ দিতে পানিঘাটায় যান পর্যটনমন্ত্রী। গৌতমের অভিযোগ, পানিঘাটায় ঢুকতেই কুকরি নিয়ে হামলা চালায় মোর্চা সমর্থকরা। মন্ত্রীর গাড়ি আটকে বিক্ষোভ দেখায় তারা। চলে ইটবৃষ্টিও। কোনওক্রমে ব্যাঙডুবির সেনা ছাউনিতে আশ্রয় নেন পর্যটনমন্ত্রী। তিনি এলাকা ছাড়ার পর পুলিশের একটি গাড়িতেও ভাঙচুর চালানো হয়।


এছাড়া তিস্তা বাজারে সিকিমগামী ১০টি গাড়িতে হামলা চালিয়েছে মোর্চা। কালিম্পঙে তামাং বোর্ডের চেয়ারম্যানের বাড়িতে ভাঙচুর করে আগুন ধরিয়ে দেওয়া হয়েছে। সান্দাকফু যাওয়ার পথে দার্জিলিঙের ধত্রেয় বনবাংলো ও কালিম্পঙের তিস্তা বন বাংলোতেও আগুন লাগানো হয়।


এর আগে গতকাল মাঝ রাতে দার্জিলিং ম্যালে ট্যুরিস্ট ইনফরমেশন সেন্টার ও রাত ৮টা নাগাদ সুকনায় রেভিনিউ ইন্সপেক্টরের অফিসেও অগ্নিসংযোগ ঘটে। যদিও গোর্খা জনমুক্তি মোর্চা অস্বীকার করেছে যাবতীয় অভিযোগ। ম্যালে কাঠের তৈরি ট্যুরিস্ট ইনফরমেশন সেন্টারে আগুন লাগানোর ঘটনা নতুন নয়। পাহাড়ে যতবার আন্দোলন হয়েছে, ততবারই অশান্তির আগুনে পুড়েছে এই অফিস। গতকালের আগুনে ভস্মীভূত হয়ে যায় ট্যুরিস্ট ইনফরমেশন সেন্টার। সকালে দমকলের একটি ইঞ্জিন এসে আগুন নিয়ন্ত্রণে আনে। রাত ৮টা নাগাদ সুকনায় রেভিনিউ ইন্সপেক্টরের অফিসে আগুন লাগানো হয়। গোটা অফিস পুড়ে ছাই। পুড়ে গিয়েছে বহু গুরুত্বপূর্ণ নথি।

http://abpananda.abplive.in/state/goutam-debs-car-attacked-in-panihata-darjeeling-tense-360528

Tuesday, July 11, 2017

Bengal united for peace in Bashirhat but neither Bengal nor India seem to care for Darjeeling and Sikkim people! Sikkim CM Pawan Chamling today demanded urgent intervention of the Centre for early settlement of the Gorkhaland issue! পাহাড়ে বন্‌ধ চলবে, চাপ বাড়াতে এ বার আমরণ অনশন, ঘেরাও Palash Biswas

Bengal united for peace in Bashirhat but neither Bengal nor India seem to care for Darjeeling and Sikkim people!
Sikkim CM Pawan Chamling today demanded urgent intervention of the Centre for early settlement of the Gorkhaland issue!

পাহাড়ে বন্‌ধ চলবে, চাপ বাড়াতে এ বার আমরণ অনশন, ঘেরাও

 Palash Biswas
Darjeeling stand off takes a very serious turn as represenatives of all hill parties decided to go on fast unto death to push their demand for Gorkhaland.Mamata Banerjee`s belated call for peace and talks jejected and hithertoo no intiative fom the centre to sesolve the issue.Hills parties also decided tio gherao all SDO offices and have warned that the preople from every corner of the Hills would come down to Siliguri with bags to get ration!Particularly this decision if translated in act might create quite an anarchy as Anti Gorkhaland movement in plains has been launched whcih means economic blockade of Darjeeling as well as Sikkim.Heavy rain in hills have worsened day to day life in hills and hell losing as tea gardens might not feed the people
The chairman and vice chairman of the development boards set up by the State government has been asked to resign at 6pm on July 14.

Meanwhile, Chief Minister Mamata Banerjee who addressed a public gathering at Digha in Purba Medinipur assured people that her government would restore peace in the hills.While she urged the people in the hills to give peace a chance and not play with fire, she accused the Centre of creating tension in the Darjeeling hills.

Shamsul Haq rightly pointed out in detail in his article published in Indian Express that Baduria and Bashirhat have no history of communal clash or riots even in prepartition days.Mamata Banerjee is framing government of India alleging that the centre has been behind the riots in Bashirhat and it opened the border with Bangladesh wherefrom Bangladeshi nationals came over to Bashirhat and Baduria who were indulged in communal violence.Bashirhat is returning to normalcy and the media based in Kolkata played a very positive role to sustain peace.RSS leaders based in Bengal and rest of India misused social media to proveke hindutva with false scenes posted,copied and pasted from films,Gujarat killings and Bangladesh communal clash.
Bengal united for peace in Bashirhat but neither Bengal nor India seem to care for Darjeeling and Sikkim people!
But Darjeeling seems to be quite a different issue and media is not playing that positive role as far as Darjeeling and Sikkim are concerned.Mamata Banerjee sees RSS hand in Gorkhaland movement and lost the opportunity to resolve the problem taking peace initiative earlier.
Now as it happened ,an all-party meeting in Darjeeling on Tuesday concluded that one representative of each political party in the hills will undertake a fast unto death from July 15 to take forward the demand of Gorkhaland.Announcing the decision, Benoy Tamang, Assistant General Secretary of Gorkha Janmukti Morcha (GJM), said the ongoing indefinite strike that began on June 15 will continue.

In addition, the parties also decided to lay seige to the offices of the District Magistrate and Sub Divisional Officers with the help of Gorkhaland supporters from July 14.Keeping in mind that political parties have lost control over their supporters indulging in violence and arson,the administration would have to face tougher weather in Hills and army might be deployed in every corner of the hills without any peace initiative from either the government of India or government of West Bengal.

The Gorkhaland Movement Coordination Committee (GMCC), convened by the representatives of all the political parties in the hills, decided that all awards received from West Bengal Government would be returned on July 13.

Meanwhile ,Sikkim Chief Minister Pawan Chamling today demanded urgent intervention of the Centre for early settlement of the Gorkhaland issue to safeguard the interest of Sikkim. He said in case the issue was not addressed on priority basis, the Sikkim government might approach the top court of India. "I seek urgent intervention of Government of India and all the authorities concerned for early settlement of the situation to safeguard the interest of Sikkim from these hazards and constraints on priority," Mr Chamling said through a press statement issued by the Information and Public Relations department of the state.

Chamling already supported the demand of Gorkhaland,Moreover,Sikkim assembly passed aresolution supporting the demand.West Bengal goverment lodged a formal protest aginst Chmaling.

"In case of not addressing this issue on priority, the state government may have to approach the apex court of India in the larger interest of Sikkimese people for justice," the statement said.Stating that the inter-state ramifications of the Gorkhaland agitation and treating it "merely as a West Bengal issue" was not adequate, the chief minister noted that the present situation in Darjeeling Hills has had a direct impact on life of the people of Sikkim and that this issue must be looked into with utmost seriousness.

"Sikkim's geographical location having international boundaries with three countries - China in the North, Bhutan in the East and Nepal in the West, and the potential threat to the national security is a matter of supreme importance," the statement said.

"The only access to the rest of the country is through the state of West Bengal. Sikkim is sandwiched due to the agitation and prevailing law and order situation."

"As far as the national security is concerned, Government of India is appropriately handling the matter. We fully support Government of India's effort, which is addressing the national security in the best interest of our country," the statement said.

The Sikkim Chief Minister also said that the law and order being a matter of the government of West Bengal, the loss and misery suffered by Sikkim could have been avoided. "The Gorkhaland agitation-related anguish of Sikkim is as old as the agitation itself. Sikkim bound vehicles have been targeted by fringe groups in Siliguri," it said.


"Trucks carrying essential goods, commodities and petroleum products are being ransacked right in the presence of the West Bengal Police, and it has been learnt that in some cases, the West Bengal police itself is overseeing the situation," it said.

The statement also said that people in need of immediate advanced medical care were affected. In addition, the economic development of Sikkim has also been affected.

The CM's statement also said that due to the unrest in the neighbouring state of Bengal, "Sikkim has already borne the loss of over Rs. 60,000 crore."

"In the agitation related violence on NH10, Sikkim's only road link with the rest of the nation, over 5,000 vehicles have been vandalised and around 1,300 people (drivers and passengers) killed in the last 32 years of Gorkhaland agitation," it said.

Anand Bazar Patrika reports:

পাহাড়ে বন্‌ধ চলবে, চাপ বাড়াতে এ বার আমরণ অনশন, ঘেরাও

ভেতরে কট্টরপন্থীদের চাপ আর বাইরে কেন্দ্র ও রাজ্য সরকারের চাপের মোকাবিলায় এ বার পাল্টা চাপের রাস্তা নিল পাহাড়ের সর্বদলীয় কমিটি।

মঙ্গলবারের বৈঠকে কমিটি সিদ্ধান্ত নিল, পাহাড়ে বন্‌ধ চলবে। কোনও ভাবেই তা প্রত্যাহার করা হবে না। বিমল গুরুঙ্গ, বিনয় তামাঙ্গ, নীরজ জিম্বা সহ কমিটির প্রতিনিধিরা সিদ্ধান্ত নিয়েছেন, ১৫ জুলাই থেকে তাঁরা ম্যালে শুরু করবেন আমরণ অনশন। অনশনের পাশাপাশি থাকবে ঘেরাওয়ের কর্মসূচিও। ১৪ জুলাই শিলিগুড়ি সহ পাহাড়, তরাই ও ডুয়ার্সের এসডিও অফিসগুলিও ঘেরাও করা হবে।

কমিটির অভিযোগ, পাহাড়গামী গাড়িগুলি থেকে জিএসটি বিল আদায় করা হচ্ছে যথেচ্ছ। তা বন্ধ করতে এ দিনের বৈঠকে সিদ্ধান্ত নেওয়া হয়েছে, ২৫ জুলাই থেকে ঝোলা নিয়ে পাহাড় থেকে শিলিগুড়ি পর্যন্ত পদযাত্রা শুরু হবে।

পাহাড়ে কট্টরপন্থীরা বলতে শুরু করেছিলেন, কেন্দ্র ও রাজ্যের চাপের কাছে উত্তরোত্তর গলার সুর নরম করে ফেলছেন আন্দোলনকারীরা। সেই সুযোগে কেন্দ্র ও রাজ্য সরকারের চাপও বাড়তে শুরু করেছে।

অনেকেই মনে করছেন, 'ঘর'কে কিছুটা শান্ত রাখতে আর 'বাইরে'র চাপের বোঝাটা কাঁধ থেকে কিছুটা নামাতেই এই পাল্টা চাপের রাস্তায় হাঁটল কমিটি।


मैं नास्तिक क्यों हूं# Necessity of Atheism#!Genetics Bharat Teertha

হে মোর চিত্ত, Prey for Humanity!

मनुस्मृति नस्ली राजकाज राजनीति में OBC Trump Card और जयभीम कामरेड

Gorkhaland again?আত্মঘাতী বাঙালি আবার বিভাজন বিপর্যয়ের মুখোমুখি!

हिंदुत्व की राजनीति का मुकाबला हिंदुत्व की राजनीति से नहीं किया जा सकता।

In conversation with Palash Biswas

Palash Biswas On Unique Identity No1.mpg

Save the Universities!

RSS might replace Gandhi with Ambedkar on currency notes!

जैसे जर्मनी में सिर्फ हिटलर को बोलने की आजादी थी,आज सिर्फ मंकी बातों की आजादी है।

#BEEFGATEঅন্ধকার বৃত্তান্তঃ হত্যার রাজনীতি

अलविदा पत्रकारिता,अब कोई प्रतिक्रिया नहीं! पलाश विश्वास

ভালোবাসার মুখ,প্রতিবাদের মুখ মন্দাক্রান্তার পাশে আছি,যে মেয়েটি আজও লিখতে পারছেঃ আমাক ধর্ষণ করবে?

Palash Biswas on BAMCEF UNIFICATION!

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS ON NEPALI SENTIMENT, GORKHALAND, KUMAON AND GARHWAL ETC.and BAMCEF UNIFICATION! Published on Mar 19, 2013 The Himalayan Voice Cambridge, Massachusetts United States of America

BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE 7

Published on 10 Mar 2013 ALL INDIA BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE HELD AT Dr.B. R. AMBEDKAR BHAVAN,DADAR,MUMBAI ON 2ND AND 3RD MARCH 2013. Mr.PALASH BISWAS (JOURNALIST -KOLKATA) DELIVERING HER SPEECH. http://www.youtube.com/watch?v=oLL-n6MrcoM http://youtu.be/oLL-n6MrcoM

Imminent Massive earthquake in the Himalayas

Palash Biswas on Citizenship Amendment Act

Mr. PALASH BISWAS DELIVERING SPEECH AT BAMCEF PROGRAM AT NAGPUR ON 17 & 18 SEPTEMBER 2003 Sub:- CITIZENSHIP AMENDMENT ACT 2003 http://youtu.be/zGDfsLzxTXo

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