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Sunday, March 22, 2026

हम अपने पुरखों के कैसे वारिश हैं?

बात 2001 की है। पिताजी पुलिनबाबू मृत्यु शय्या पर थे। कैंसर से जूझ रहे थे। हम कोलकाता से घर आ गए थे। उस दौरान up और उत्तराखण्ड के विकास पुरुष और पिताजी के पुराने दोस्त नारायण दत्त तिवारी उनके साथ थे। उस वक्त दिवंगत चित्तरंजन राहा समेत बंगाली और तराई में दूसरे समुदायों के तमाम नेता,तिवारी जी के काफिले में शामिल उत्तराखण्ड के तमाम नेता मौजूद थे। तिवारी जी ने पिताजी से पूछा था- आपकी अंतिम इच्छा क्या है? पिताजी दर्द के मारे बोलने की हालत में नहीं थे। फिरभी बोले, मैने अपने लिए कभी कुछ नहीं मांगा। कैंसर हो जाने के बाद के असहनीय दर्द से मालूम हुआ कि हमारे गरीब बेबस लोग किस तरह बेमौत मारे जाते हैं। फिर उन्होंने कहा, dineshpur और तराई में सैकड़ों गांवों के लोगों के इलाज का कोई इंतजाम नहीं है। Dineshpur में १९५६ के आंदोलन से एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र है,जहाँ न डाक्टर हैं,न दवाइयां। पिताजी ने हाथ जोड़कर तिवारी से कहा था कि इस अस्पताल का उच्चीकरण करके यहां गरीबों के इलाज के लिए एक बड़ा अस्पताल बना दीजिए। मरते हुए पुलिंन बाबू से तिवारी ने सबके सामने वादा किया। फिर पिताजी की मौत के बाद वे उत्तराखंड के मुख्यमंत्री भी बने। उन्होंने सिडकुल की स्थापना किलेकिं dineshpur के लिए कुछ नहीं किया। Dineshpur के प्राथमिक शिक्षा केन्द्र का नामकरण शायद हरीश रावत जी ने पूलिन कुमार विश्वास के नाम पर के दिया। १९५६ के बाद ६५ साल बीत गए, पिताजी की मौत के बाद पूरे २०साल बीत गए। आज भी गरीबों आम लोगों के इलाज का कोई इंतजाम नहीं है। इसी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में मैंने और सविता जी ने आज करीब चार घंटे जनता के साथ कतार में खड़ा होकर कोविशिल्ड वैक्सीन लगाया। हमारा पर्चा बनाते वक्त स्टाफ ने पूछा,आप क्यों लाइन में खड़े थे? पर्चा भिजवा दिया होता। ये वे लोग है जिनके लिए मेरे पिता जिये और मरे। ये वे लोग है जिनकी लड़ाई में शामिल होने के लिए साहित्य छोड़ा, कोलकाता छोड़ा, उन्हें कतार में छोड़कर हम सिर्फ वैक्सीन लेने के लिए कतार तोड़ देते? सैकड़ों गांवों के लोग यही आते हैं। क्योंकि निजी अस्पतालों में इलाज कराने के पैसे उनके पास नहीं होते। वैक्सीन के बारे में बे कुछ नहीं जानते। लेकिन इतना जानते हैं कि कोरोना हो गया तो वे अपना इलाज नहीं करवा सकते। हमारा भी यही हाल है। सविता जी ने कहा कि वैक्सीन के लेने में हर्ज क्या है? अब तो हम शुगर के लिए इंसुलिन और दवाएं भी खरीद नहीं सकते। डॉ राजेश प्रताप सिंह कोरॉना मुक्त हो चुके हैं।उन्होंने कहा कि दोनों एहतियात के तौर पर टीका लगा ही लीजिए। कोराना ने अनेक प्रिय लोगों को छीना है। हमारे काम तो अभी शुरू ही नहीं हुए। हमें मरने की इजाजत भी नहीं है। बहुत दिनों बाद चार घंटे तक इलाके के अनेक गांवों के लोगों,बचे खुचे साथियों से गपशप हुआ। वैक्सीन से ज्यादा यह खुराक बहुत कारगर रही। वैक्सीन लगने के बाद तेज़ सरदर्द है। इसलिए प्रेरणा अंशु के ऑफिस न जाकर सीधे घर चले आए। तराई को जों लोगों ने आबाद किया,उनमें से कोई अभी ज़िंदा नहीं है। लेकिन उन्होंने जितना किया,उसके आगे समर्थ, धनबल बाहुबल शिक्षा के धनी नई पीढ़ियों के लोग और चुने हुए या दर्जा प्राप्त की जमात एक कदम भी आगे नहीं बढ़ पाई। हम अपने पुरखों के कैसे वारिस हैं?

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