| Wednesday, 18 September 2013 09:29 |
रुचिरा गुप्ता पुलिस अत्याचार के सबसे ज्यादा वाकये दूरदराज के इलाकों, छोटे कस्बों और गांवों में होते हैं, जहां लोगों को कानूनी प्रक्रियाओं की बुनियादी जानकारी तक नहीं होती और न ही उनके पास किसी ताकतवर पुलिस अधिकारी के खिलाफ दृढ़तापूर्वक मुकदमा लड़ पाने के लिए धन या दूसरे संसाधन होते हैं। दलित महिलाओं के विरुद्ध होने वाले अपराधों के मामलों में यह हकीकत खासतौर से देखी जा सकती है। हाल ही में हरियाणा के जींद में एक बीस साल की दलित लड़की के बलात्कारी और हत्यारे को केवल इसलिए नहीं पकड़ा जा सका, क्योंकि जब तक पुलिस उसकी तलाश के लिए राजी हुई, तब तक उस लड़की शव बुरी तरह से सड़ चुका था और प्रथम शव-परीक्षण में तो उसका गर्भाशय ही गायब कर दिया गया था। देह-व्यापार विरोधी संगठन 'अपने आप' की संस्थापक के रूप में अपने काम के दौरान मुझे यह बार-बार देखने को मिला है कि पुलिस को चुनौती देने और यहां तक कि बच्चों के विरुद्ध होने वाले अपराधों के मामले में भी उन्हें जिम्मेवार ठहराने में कितनी कठिनाइयां सामने आती हैं। बीस सालों के दौरान मैंने कई बार मुंबई, दिल्ली, कोलकाता और बिहार के रेडलाइट एरिया में गश्त कर रहे पुलिस अधिकारियों से देह-व्यापारियों को गिरफ्तार करवाने और खरीद कर लाई गई महिलाओं और लड़कियों को संरक्षण दिलवाने का प्रयास किया है। लेकिन सच यह है कि उन्होंने हर बार इसके बिल्कुल उलट काम किया है। यानी उन्होंने देह-व्यापारियों को संरक्षण दिया है और उलटे औरतों को ही गिरफ्तार किया। सन 1861 के औपनिवेशिक पुलिस अधिनियम में सुधार के लिए पद्मनाभैया आयोग से लेकर सोली सोराबजी समिति तक कई आयोग बनाए गए, कई समितियों का गठन हुआ। पिछले साल दिल्ली में हुए सामूहिक बलात्कार कांड के बाद गठित न्यायमूर्ति जेएस वर्मा समिति ने बलात्कार के मामलों के मद््देनजर पुलिस और न्यायपालिका की कार्य-प्रणाली में सुधार की सिफारिश की। हालांकि सजा की गंभीरता की दृष्टि से कानून को सख्त बना दिया गया है, लेकिन पुलिस और न्याय-प्रणाली में सुधार का तकाजा अब भी जहां का तहां है। पुलिस और न्यायपालिका के बीच एक विचित्र तरह की समझदारी या तालमेल के चलते दंड नहीं दिए जाने की प्रवृत्ति जन्म लेती है और फलस्वरूप भारत में बलात्कार की संस्कृति फल-फूल रही है। यह बेवजह नहीं है कि कड़े कानून होने के बावजूद स्त्रियों के खिलाफ यौनहिंसा की घटनाएं बदस्तूर जारी हैं। कुछ समय पहले पश्चिम बंगाल के एक गांव में एक महिला से उसके घर में उसके बच्चों के सामने ही बलात्कार किया गया। ऐसे मामले रोजाना सामने आ रहे हैं। उनमें से कुछ को मुख्यधारा के मीडिया में जगह मिल जाती है और बाकी दबे या अनसुने रह जाते हैं। बहरहाल, एक तरीका है जो बलात्कार के मामलों में कमी लाने की दिशा में कारगर साबित हो सकता है और वह है पुलिस बल में व्यापक सुधार। इसके तहत यह भी व्यवस्था हो कि अधीनस्थ अधिकारी द्वारा किए गए अपराध के मामले में उसके खिलाफ कार्रवाई न किए जाने की सूरत में उसके वरिष्ठ अधिकारी को भी उस अपराध में सहभागी मान कर उसे भी कठघरे में खड़ा किया जाए। बहरहाल, महिला आंदोलनों से जुड़े लोगों में अधिकतर सजा-ए-मौत के खिलाफ हैं। क्योंकि हम नहीं मानते कि सजा की कठोरता बलात्कारी को बलात्कार करने से रोक सकती है। बल्कि समय से और निश्चित तौर पर सजा मिलने का डर ही इस अपराध पर काबू पाने में अधिक कारगर साबित होगा। पुलिस महकमे और न्यायपालिका में सुधार के बगैर, बलात्कारियों को समय से सजा मिलना अपवादस्वरूप ही हो पाएगा, जैसा कि सोलह दिसंबर के मामले में हुआ।
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Wednesday, September 18, 2013
न्याय का नखलिस्तान
न्याय का नखलिस्तान
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