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Tuesday, June 25, 2013

ये कैसा ‘तंजीम-ए-इंसाफ’

ये कैसा 'तंजीम-ए-इंसाफ'


मुस्लिम समुदाय पर केन्द्रित दो आयोजन


-इरफान इंजीनियर

 

इरफान इंजीनियर, लेखक इंस्टीट्यूट फॉर स्टडीज़ एण्ड कंफ्लिक्ट रिसॉल्यूशन (Institute for Peace Studies & Conflict Resolution) के निदेशक हैं।

इरफान इंजीनियर, लेखक इंस्टीट्यूट फॉर स्टडीज़ एण्ड कंफ्लिक्ट रिसॉल्यूशन (Institute for Peace Studies & Conflict Resolution) के निदेशक हैं।

इस साल मई और जून में मैंने दो सम्मेलनों में भाग लिया। दोनों का आयोजन ऐसी संस्थाओं द्वारा किया गया था, जिनका नेतृत्व मुसलमानों के हाथों में है और जिनकी स्थापना का उद्देश्य मुसलमानों से जुड़े मुद्दों पर विचार-विनिमय करना है। मैं जान बूझकर इन्हें मुस्लिम संगठन कहने से बच रहा हूँ क्योंकि इन दोनों ही संगठनों से हिन्दू भी जुड़े हुये हैं।

इनमें से पहला था 29-30 मई को आयोजित'मौलाना आजाद विचार मंच' का अधिवेशन और दूसरा, 15-16 जून को आयोजित 'तंजीम-ए-इंसाफ' का सम्मेलन। इन दोनों संगठनों के एजेण्डा में कई समानताएँ भी हैं और महत्वपूर्ण अन्तर भी। उनकी रणनीतियाँ भी अलग-अलग हैं। सबसे पहले मैं दोनों सम्मेलनों का संक्षिप्त विवरण देना चाहूँगा।

''मौलाना आजाद विचार मंच'' ने मुम्बई में मुसलमानों में शिक्षा पर केन्द्रित सम्मेलन का आयोजन किया। सम्मेलन का उद्घाटन भारत के उपराष्ट्रपति श्री हामिद अंसारी ने किया। सम्मेलन को सम्बोधित करने वालों में अल्पसंख्यक मामलों के मन्त्री श्री के. रहमान खान,महाराष्ट्र के मुख्यमन्त्री श्री पृथ्वीराज चव्हाण व कई अन्य केन्द्रीय और महाराष्ट्र सरकार के मन्त्री शामिल थे। उद्घाटन व समापन सत्रों में लगभग चार हजार लोग उपस्थित थे जबकि अन्य सत्रों में उपस्थिति अलग-अलग रही। संसद सदस्य हुसैन दलवईमौलाना आजाद विचार मंच के अध्यक्ष हैं और उन्होंने इस संगठन की स्थापना शायद इसलिये की होगी कि वे अपने समर्थक मुसलमानों को एकजुट कर सकें और उनकी मूल समस्याओं को हल करने की दिशा में आगे बढ़ सकें। यद्यपि दलवई हर उस व्यक्ति का काम करते हैं, जो उन तक पहुँचता है- फिर चाहे वह किसी भी धर्म, जाति या वर्ग का क्यों न हो और वे समाज के अन्य वंचित वर्गों जैसे दलितों की बेहतरी के प्रयासों में भी हिस्सेदारी करते हैं परन्तु उनकी ऊर्जा और समय मुख्यतः विचार मंच के जरिए मुस्लिम समुदाय की समस्याओं को दूर करने में व्यय होती है। विचारमंच की कार्यकारिणी के सदस्य, महाराष्ट्र के विभिन्न जिलों में से आते हैं परन्तु उनमें बहुसंख्या मुस्लिम बिरादरियों के पिछड़े वर्गों की है। दलवई की टीम में हिन्दू भी शामिल हैं जो कार्यक्रमों के आयोजन आदि में उनकी मदद करते हैं। उनका मुख्य लक्ष्य मुसलमानों के पिछड़े वर्गों का सामाजिक-आर्थिक उन्नयन है और वे सबको साथ लेकर चलने और समानता पर आधारित विकास के हामी हैं। अपने लक्ष्यो की प्राप्ति के लिये उनकी रणनीति में शामिल हैं अल्पसंख्यकों के लिये बनायी गयीं विशेष योजनाओं की जानकारी मुस्लिम समुदाय तक पहुँचाना और समुदाय के सदस्यों की इन योजनाओं से लाभ लेने में मदद करना। वे इन योजनाओं की कमियों, उनको लागू करने में नौकरशाही द्वारा अटकाये जा रहे रोड़ों और उनके लिये आवश्यकता से कम धन के आवंटन आदि जैसे मुद्दों पर भी समाज और सरकार का ध्यान आकर्षित करते रहते हैं।

मुस्लिम शिक्षा सम्मेलन के आयोजन के दो उद्देश्य थेः पहला, मुस्लिम समुदाय को शिक्षा के महत्व से परिचित करवाना और समुदाय के सदस्यों को सरकार द्वारा दिये जा रहे वजीफों व अन्य सरकारी योजनाओं की जानकारी देना। दूसरा उद्देश्य था अपनी पार्टी के नेताओं को नीतियों में सुधार और योजनाओं के लिये अधिक धन के आवंटन की आवश्यकता से परिचित करवाना। केन्द्र और राज्य सरकारों के मन्त्रियों ने उपस्थितजनों को सम्बोधित करते हुये वर्तमान में चल रही योजनाओं का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया, उनके लिये आवंटित धनराशि के बारे में बताया और जोर देकर कहा कि जो कुछ किया जा सकता था, वह सब किया जा चुका है। मंच से किये जा रहे इन दावों पर श्रोताओं की प्रतिक्रिया स्पष्ट थी। ज्यादातर को नौकरशाहों के अड़ियल रवैये के कारण योजनाओं का लाभ नहीं मिल सका था तो कुछ का कहना था कि योजनाओं में नीतिगत कमियों के कारण वे उनसे लाभान्वित नहीं हो सके। ये सब बातें श्रोतागण आपसी बातचीत में कह रहे थे और इन पंक्तियों का लेखक इसका गवाह था।

उर्दू मीडिया ने सम्मेलन को व्यापक कवरेज दिया जबकि अँग्रेजी मीडिया ने इसे लगभग नज़रअंदाज़ किया। शायद अँग्रेजी मीडिया को लगा होगा कि सम्मेलन, मुस्लिम समुदाय के आन्तरिक मसलों से सम्बंधित है और उसका देश के लिये कोई महत्व नहीं है – तब भी नहीं, जब उसका उद्घाटन भारतीय गणराज्य के उपराष्ट्रपति, जो संयोगवश मुस्लिम हैं,  कर रहे हों। एक उर्दू अखबार में एक कॉलम लेखक ने लिखा कि मुस्लिम समुदाय 'अब' यह सीख गया है कि प्रजातान्त्रिक ढाँचे के अन्दर रहते हुये और बिना हिंसा के इस्तेमाल के, अपनी माँगों को कैसे मनवाया जाये।

सम्मेलन के दूसरे उद्देश्य – नीति निर्माताओं को फीडबैक देना – की पूर्ति के लिये सम्मेलन में अबू सालेह शरीफ जैसे बुद्धिजीवियों को भी बुलाया गया था। सच्चर समिति के इस पूर्व सदस्य-सचिव ने मंच से मन्त्रियों की उपस्थिति में यह कहा कि यद्यपि सरकार ने अल्पसंख्यकों के विकास के लिये कुछ नीतियाँ और योजनायें बनायी हैं परन्तु वे पर्याप्त नहीं है और केवल औपचारिकता बनकर रह गयी हैं। शरीफ का कहना था कि मुस्लिम समुदाय में बाल श्रमिकों की समस्या बहुत बड़ी है परन्तु इससे मुकाबला करने के लिये योजनाओं में कोई प्रावधान नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक कौशल, पूँजी या शिक्षा के हस्तान्तरण को सम्भव बनाने के लिये योजनाओं में कुछ भी नहीं है। ऐसे हस्तान्तरण से ही हर नई पीढ़ी की सामाजिक-आर्थिक स्थिति, अपनी पिछली पीढ़ी से बेहतर हो जाती है। अल्पसंख्यकों के लिये विशेष योजनायें बनाकर और उनके लिये बजट के एक बहुत छोटे से हिस्से का आवंटन करने की बजाये सरकार को सभी पिछड़े सामाजिक-धार्मिक समुदायों के लिये एक एक समन्वित योजना बनानी चाहिये और यह सुनिश्चित करना चाहिये कि ऐसे सभी तबकों को आगे बढ़ने के समान अवसर मिलें।

बाद में जब मीडिया के लोग वहाँ से जा चुके थे, कैमरे हट गये थे, मन्त्री चले गये थे और श्रोताओं की उपस्थिति कम थी तब तीस्ता सीतलवाडफरीदा लेम्बेशमा दलवई,संध्या म्हात्रे आदि ने सरकारी नीतियों और सरकार की सोच की कड़े शब्दों में निन्दा की।

विचारमंच के अधिवेशन में समुदाय की अन्य समस्याओं जैसे जाँच एजेन्सियों द्वारा मुस्लिम युवकों को आपराधिक मामलों में जबरन फँसाया जाना, फर्जी मुठभेड़ें, साम्प्रदायिक हिंसा आदि पर कोई चर्चा नहीं हुयी।

तंजीम-ए-इंसाफ

दूसरी ओर, महराष्ट्र के नांदेड़ में आयोजित तंजीम-ए-इंसाफ के सम्मेलन का उद्देश्य, मुस्लिम समुदाय की सुरक्षा से जुड़े मुद्दों को उठाना था। तंजीम का नेतृत्व भारतीय कम्युनिस्ट पार्टीसे जुड़ा हुआ है। यह सम्मेलन कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा शुरू किये गये 'पीपुल्स केम्पेन अगेन्स्ट पालिटिक्स ऑफ टेरर' (आतंक की राजनीति के विरूद्ध जनअभियान) के अन्तर्गत आयोजित था। एक धार्मिक समुदाय विशेष द्वारा की गयी पहल, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के ढाँचे और उसकी नीतियों में कैसे फिट बैठती है, यह देखना पार्टी के नेताओं का काम है। ए.बी. बर्धन ने सम्मेलन का उद्घाटन किया और जन अभियान समिति के राष्ट्रीय संयोजक मोहम्मद अदीब (सांसद) व उसकी कार्यसमिति के सदस्य अतुल अंजान भी उपस्थित थे। सिने कलाकार रजा मुराद सम्मेलन का एक अतिरिक्त आकर्षण थे। जन अभियान का पहला सम्मेलन हैदराबाद में हुआ था, जहाँ मक्का मस्जिद में हुये धमाकों के बाद बड़ी संख्या में निर्दोष मुस्लिम युवकों को गिरफ्तार किया गया था। बाद में पता यह चला कि यह धमाकेहिन्दुत्व की विचारधारा से प्रेरित आतंकियों द्वारा किये गये थे। तंजीम के राष्ट्रीय संयोजकअजीज पाशा हैदराबाद से हैं। तंजीम की शाखायें देश के लगभग 12 राज्यों में हैं। नांदेड़ जैसे छोटे से शहर में सम्मेलन में 1200 से अधिक लोगों की उपस्थिति, सम्मेलन के आयोजकों व विशेषकर उसके राज्य महासचिव फारूक अहमद की बड़ी सफलता थी। विभिन्न वक्ताओं ने अपने सम्बोधनों में जाँच व गुप्तचर एजेन्सियों द्वारा मुस्लिम समुदाय के दानवीकरण की घोर निन्दा की। उन्होंने कहा कि इस दानवीकरण के कारण मुसलमानों को नौकरियाँ मुश्किल से मिल रही हैं, उन्हें स्वयम् का व्यवसाय करने के लिये बैंक कर्ज नहीं दे रहे हैं और उन्हें सरकारी ठेके व अन्य काम हासिल करने में भारी मुश्किलातों का सामना करना पड़ रहा है। इसके साथ ही, देश की साझा सांस्कृतिक विरासत और मुस्लिम समुदाय के भीतर की विविधता पर भी जोर दिया गया। यह जोर देकर कहा गया कि हमारे देश की जनसंस्कृति धर्मनिरपेक्ष है और साम्प्रदायिक तत्वों ने अपने लक्ष्यों की प्राप्ति के लिये जानबूझकर इस्लाम व मुसलमानों के खिलाफ घृणा का वातावरण पैदा किया है। इस्लाम को डरावने राक्षस के रूप में प्रस्तुत करने से अमरीका के साम्राज्यवादी हित भी पूरे होते हैं।

क्या हैं उपाय

सम्मेलन में वक्ताओं ने समस्याओं का विवरण तो दिया परन्तु उन्हें सुलझाने का कोई रास्ता नहीं बताया। सम्मेलन का प्रसंशनीय पक्ष यह था कि इसमें 'मुख्यधाराकी पार्टियों द्वाराजाँच व गुप्तचर एजेन्सियों के हाथों निर्दोष मुसलमान युवकों के निशाना बनाने और उन पर आतंकवादी होने का लेबल चस्पा करने के सम्बंध में बारे में,समाज की चुप्पी को तोड़ा। एक के बाद एक वक्ताओं ने कहा कि मुख्यधारा की पार्टियों, गुप्तचर एजेन्सियाँ और समाज की सोच यही है कि भले ही सभी मुसलमान आतंकवादी न हों परन्तु सभी आतंकवादी, मुसलमान हैं। इस सिलसिले में आशीष खेतान को वक्ता बतौर आमन्त्रित किया जाना महत्वपूर्ण था। इस तरह के मुद्दों पर सार्वजनिक मंचों में चर्चा मात्र से गुप्तचर व जाँच एजेन्सियों की मनमानी पर कुछ रोक लगती है। विचार मंच के अधिवेशन में इस विषय पर चुप्पी साध ली गयी यद्यपि वक्ताओं ने अप्रत्यक्ष रूप से कहा कि हिन्दू साम्प्रदायिक ताकतें, मुसलमानों के बारे में इस तरह का दुष्प्रचार कर रही हैं। काँग्रेस या अन्य किसी भी राजनैतिक दल ने इस निहायत बेवकूफाना मान्यता का खण्डन करने की कभी कोशिश नहीं की। इस धारणा के खण्डन की जिम्मेदारी मुस्लिम वक्ताओं पर ही थोप दी गयी। नतीजा यह कि जो मुस्लिम इस मान्यता का विरोध करते थे, उन्हें ही आतंकवादियों के प्रति सहानुभूति रखने वाला घोषित कर दिया जाता था। दोनों ही सम्मेलनों में आतंकवाद के बारे में व्याप्त मिथकों का खण्डन करने के अतिरिक्त समाज में बराबरी लाने और मुस्लिम समुदाय के साथ हो रहे अन्याय को रोकने के लिये कोई अन्य सुझाव नहीं दिया गया।

विचार मंच के अधिवेशन में अप्रत्यक्ष रूप से यह सलाह दी गयी कि समुदाय को इस मुद्दे पर शांत रहना चाहिये और फँसाये गये निर्दोष युवकों को व्यक्तिगत स्तर पर अपने साथ हो रहे अन्याय का मुकाबला करने देना चाहिये। यह सुझाव भी सामने आया कि काँग्रेस सरकार द्वारा अल्पसंख्यकों के लिये शुरू की गयी योजनाओं का लाभ उठाकर, मुसलमानों को ज्यादा से ज्यादा शिक्षा हासिल करने की कोशिश करनी चाहिये। विचार मंच में दबी जुबान से यह सुझाव भी दिया गया कि मुसलमानों को काँग्रेस को वोट देना चाहिये ताकि उनके लिये चलाई जा रही विशेष योजनायें निर्बाध चलती रहें। यहाँ यह महत्वपूर्ण है कि सम्मेलन में काँग्रेस को वोट देने की खुले शब्दों में सिफारिश किसी भी वक्ता ने नहीं की। कुछ वक्ताओं का कहना था कि योजनाओं में कुछ छोटे-मोटे परिवर्तनों की जरूरत है। परन्तु इन योजनाओं के अतिरिक्त, समुदाय की बेहतरी और उसे हाशिए पर पटके जाने से रोकने के लिये कोई अन्य विकल्प सामने नहीं आया। किसी ने यह प्रश्न नहीं पूछा कि अगर ये सभी योजनायें पूरी ईमानदारी और प्रतिबद्धता से लागू कर दी जायें, उनके लिये आवंटित एक एक पैसे का सदुपयोग हो और इन योजनाओं से लाभ पाना, समुदाय के सदस्यों के लिये बहुत आसान बना दिया जाये तब भी क्या ये योजनायें देश के 15 करोड़ मुसलमानों को रोटी, कपड़ा और मकान उपलब्ध करवाने में सक्षम हो सकेंगी? क्या मुसलमाओं को शिक्षा, जीविका के साधन और सम्मान व गरिमा का जीवन मिल सकेगा?

तंजीम के सम्मेलन के दूसरे दिन भी अल्पसंख्यकों के लिये विशेष योजनाओं को ठीक से लागू करने पर जोर दिया गया और पूरे समुदाय पर चस्पा किये गये आतंकवादी के लेबल को हटाने के लिये हर सम्भव कोशिश करने की बात कही गयी।

निष्कर्ष

दोनों ही सम्मेलनों में महिलाओं को कोई महत्व नहीं दिया गया। किसी ने इस प्रश्न पर चर्चा नहीं की कि इन योजनाओं को लागू करने से महिलाओं पर क्या असर पड़ेगा। क्या उनकी हालत में कोई सुधार आयेगा? मुस्लिम समुदाय के  पितृसत्तात्मक ढाँचे की भी चर्चा नहीं की गयी। तंजीम के सम्मेलन में उपस्थित 1200 लोगों में से केवल 10 महिलाएं थीं। ऐसा लग रहा था मानो पितृसत्तात्मक ढांचे (जो मेरे विचार से गैर इस्लामिक भी है) को चुनौती देना, समुदाय के अस्तित्व को ही खतरे में डालना हो। विचार मंच के अधिवेशन में महिलाओं की संख्या खासी थी। लगभग एक चौथाई प्रतिभागी महिलाएं थीं और वहाँ लड़कियों की शिक्षा पर चर्चा की गयी। परन्तु समुदाय में व्याप्त पितृसत्तात्मक व्यवस्था पर वहाँ भी किसी ने प्रश्नचिन्ह नहीं लगाया।

दोनों ही सम्मेलनों में भारतीय राज्य की भूमिका की समालोचना नहीं की गयी। यद्यपि विचार मंच के सम्मेलन में ऐसी अपेक्षा भी नहीं थी परन्तु तंजीम के सम्मेलन में ऐसा न होना थोड़ा अजीब प्रतीत हुआ। राज्य न केवल अल्पसंख्यकों के साथ वरन दलितों,आदिवासियोंमहिलाओंश्रमिकों और उत्तर पूर्व व उत्तर की अल्पसंख्यक नस्लों के सदस्यों के साथ भी भेदभाव करता है। मार्क्सवाद-लेनिनवाद के इस सिंद्धात का कोई हवाला नहीं दिया गया कि राज्य, बलपूर्वक एक वर्ग की दूसरे वर्ग पर प्रभुसत्ता कायम रखता है। धर्म के आधार पर लोगों को एक मंच पर लाना काँग्रेस के लिये कोई अजीब बात नहीं है। परन्तु कम्युनिस्ट पार्टी को भी ऐसा करना पड़ रहा है यह इस बात का सुबूत है कि हमारे समाज का साम्प्रदायिकीकरण किस स्तर तक पहुँच गया है। इसका दूसरा अर्थ यह भी है कि अगर अल्पसंख्यक, बहुसंख्यक समुदाय के हाथों साम्प्रदायिकता और भेदभाव के शिकार बन रहे हैं तो इन प्रवृत्तियों के खिलाफ लड़ने की जिम्मेदारी अल्पसंख्यकों की ही है।हो सकता है कि मेरी सोच गलत होहो सकता है कि कम्युनिस्ट पार्टियाँमुसलमानों की समस्याओं के हल के लिये अन्य धर्मनिरपेक्ष मंचों का इस्तेमाल भी कर रही हों।परन्तु इस सम्मेलन में हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच की खाई को पाटने की कोई कोशिश नहीं हुयी। बल्कि दोनों समुदायों के बीच एक अपारदर्शी साम्प्रदायिक दीवार खड़ी कर दी गयी, जिसके एक ओर थे अल्पसंख्यक, जिनके नेता बढ़-चढ़ कर बहुसंख्यक साम्प्रदायिक ताकतों की जम कर आलोचना कर रहे थे क्योंकि उन्हें मालूम था कि वे अपने ही लोगों के बीच बोल रहे हैं। अगर मुसलमानों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे हिन्दुत्व की विचारधारा और साम्प्रदायिक ताकतों से लड़ें तो वे इसके लिये सबसे आसान राह चुनते हैं- और वह है अपने समुदाय के आस पास दीवारें खड़ी कर देना और साम्प्रदायिक-कट्टरवादी विचारधारा का अपना संस्करण विकसित कर लेना। सच्चर समिति की सिफारिशों और अल्पसंख्यकों के लिये योजनाओं का दोनों ही सम्मेलनों के आयोजकों ने इस्तेमाल किया, यद्यपि दोनों के उद्देश्य अलग-अलग थे। सबसे अच्छी खबर यह थी कि कम्युनिस्ट पार्टी, धर्म-आधारित आयोजन कर रही थी और एक धर्म विशेष के लोग भी, कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़ने में किसी संकोच का अनुभव नहीं कर रहे थे।

(मूल अँग्रेजी से अमरीश हरदेनिया द्वारा अनुदित)

 

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