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Thursday, July 12, 2012

Fwd: ब्रह्मेश्वर मुखिया की हत्या के निहितार्थ



---------- Forwarded message ----------
From: reyaz-ul-haque <beingred@gmail.com>
Date: 2012/7/12
Subject: ब्रह्मेश्वर मुखिया की हत्या के निहितार्थ
To: abhinav.upadhyaya@gmail.com


20वीं शताब्दी के शुरुआत में ही दलित- पिछड़ों में जो जातिगत भावना और एकजुटता का संचार हुआ उसनें इन्हे सामाजिक – राजनीतिक रूप से स्थापित करने में मदद की। इसी कालखंड में आर्यसमाज ने हिन्दुओं के बीच सुधारवादी प्रक्रिया के तहत जनेऊ अभियान शुरू किया था जिसका दलित – पिछड़ों के बुद्धिजीवियों ने खूब समर्थन दिया और बाद में ये इस तबके के लिए श्रेष्ठता का प्रतीक बन गया। मुंगेर के लाखोचक में 26 मई, 1925 को सामूहिक जनेऊ धारण करने के लिये आयोजित यादवों के समारोह पर भूमिहारों का ने हमला कर दिया था जिसमें बताया जाता है कि 20 लोगों की हत्या हुई और 60 से ज्यादा घायल हुए थे। पिछड़ों में सामाजिक न्याय को लेकर हो रहे उभार के खिलाफ सवर्णों के प्रतिरोध की ये पहली सबसे बड़ी घटना थी। समझा जा सकता है कि इस घटना के जब 100 साल होने जा रहे हैं, सामाजिक न्याय और भागीदारी का सवाल अब भी जिंदा है जिनकी बुनियाद पर आज बिहार ही नहीं देश की राजनीतिक बिसात बिछी है और जिसे दरकिनार करना किसी आने वाले भविष्य में भी मुश्किल है।

ब्रह्मेश्वर मुखिया की हत्या के निहितार्थ



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