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Saturday, July 14, 2012

भूमि सुधार के बिना अधिग्रहण कानून

http://bahujanindia.in/index.php?option=com_content&view=article&id=7229:2012-07-14-11-43-44&catid=138:2011-11-30-09-53-31&Itemid=543

भूमि सुधार के बिना अधिग्रहण कानून

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राजनीतिक दल और राजनेता खुले बाजार की अर्थ व्यवस्था में मालामाल है और एक फीसद सत्ता वर्ग के हाथों में सिमटते जा रहे हैं संसाधन। कारपोरेट राजनीति और कारपोरेट सरकार लोकतंत्र और संविधान दोनों की हत्या रोज कर रहा है। हम बाकी निनानब्वे प्रतिशत लोग नरसंहार संस्कृति में जीने के इतने अभ्यस्त हो गये हैं कि हमें मौत की आहट में भी आइटम नम्बर का मजा आता है। ऐसे में एकाधिकारवादी वर्चस्ववादी साम्राज्यवादी कारपोरेट हमलों के प्रेतिरोध की हर संभावना को मिसाइली तिरंदाजी से खत्म करने के लिए एक के बाद एक कानून बदले जा रहे हैं। संविदान के बुनियादी ढांचे के प्रतिकूल ये कानून बनाये जा रहे हैं और इसके लिए जन सुनवाई तो रही दूर की कौड़ी, संसदीय बहस तक नहीं होती। alt

इसी सिलसिले में आज कल देर सवेर भूमि अधिग्रहण कानून भी बदला जाना है।देश में शहरीकरण के विस्तार, नए उद्योगों की स्थापना और व्यापक बुनियादी सुविधाओं के विकास के बीच यह बड़ा राजनीतिक मसला बन चुका है।निजी स्वामित्व वाली कृषि भूमि का अधिग्रहण करके विनिर्माण और बुनियादी ढांचा संबंधी निवेश आकर्षित करने के लिए समुचित कानून बनाने का काम राज्य सरकारों का है। लोगों को मीडिया की ओर से बांधी जा रही हवा के मुताबिक गलतफहमी है कि यह जमीन के हक हकूक के हक में किया जा रहा है।जमीन का हक हकूक के लिए बुनियादी पैमाना तो भूमि सुधार का है, जिसके बारे में अब कहीं चरचा तक नहीं होती। पर भूमि अधिग्रहण कानून से ओत प्रोत जुड़े हुए हैं खनन अधिनियम,चकबंदी कानून,भूमि हदबंदी कानून,वन कानून,समुद्रतट सुरक्षा कानून, नागरिकता और संपत्ति से जुड़े तमाम कानून,अभयारण्य, पर्यावरण कानून, पंचायती राज और स्वायत्त निकाय कानून, शहरीव ग्रामीण विकास, सेज, संपत्ति के कानून , संविधान की पांचवी और छठी अनुसूचियों से जुड़े कानून, आरक्षण के प्रावधान, इत्यादि।इन तमाम कानूनों के प्रावधानों, अनुसूचियों में प्रदत्त अधिकारों और संविधान के बुनियादी ढांचे से सामंजस्य रखकर ही भूमि अधिग्रहण कानून में संशोदन होना चाहिए। क्या ऐसा हो रहा है?

आप इस सवाल का जवाब खोजते रहिये।इससे भी बड़े सवाल ये हैं कि सत्ता वर्ग को भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन की जरुरत क्यों पड़ी क्यों नागरिकता कानून , खनन अधिनियम बदले गये?फिर निजी जमीन के अधिग्रहण पर कानून बनाने की बात हो रही है, लेकिन जो जमीन सरकारी कब्जे में है, उसका क्या उत्तराखंड और गुजरात में विश्वविद्यालयों की जमीन कारपोरेट को तोहफे में दे दी गयी। वनाधिकार २००६ अधिनियम का खुल्ला उल्लंघन करते हुए वनक्षेत्र पर आदिवासियों के जन्मजात अधिकारों को खारिज करते हुए और चूंकि जंगलात में बसे ज्यादातर आदिवासी गांव राजस्व गांव के तौर पर पंजीकृत नहीं है, क्योंकि इन क्षेत्रों में बसे शरणार्थी गांवों की जमीन भी अनेक मामलों में राजस्व विभाग को स्थानांतरित नहीं हुई है, बड़े पैमाने पर जमीन का हस्तांतरण कारपोरेट कंपनियों को किया जाता रहा है और आदिवासी और दूसरे कमजोर वर्ग के लोगों को अकारण गैरकानूनी ढंग से जेल में ठूंसा जाता रहा है। अघौरा, कैमूर की ताजा घटना इसीकी मिसाल है। फिर इसी के तहत खनन और अवैध खनन वासेपुर गैंगवार का खेल चलता है। अनुसूचित क्षेत्रों में विकास के नाम पर विस्थापन का खुला खेल चलता है। महाजनी कारोबार विविध रुपों में खेती और किसानों पर अब भी हावी है। तमाम कायदा कानून खेती के खिलाफ है। फारवर्ड ट्रेडिंग कानून बनाकर कृषि उपज पर बाजार का वर्चस्व कायम हो रहा है। न्यूनतम मजदूरी हो या न्यूनतम मूल्य, सबकुछ बाजार के नियम हित मुताबिक, खेती बंधुआ, मल्टू ब्रांड रीटेल एफडीआई लागू होने ही वाला है। उर्वरक पर सब्सिडी कत्म, पेट्रोल डीजल, बिजली सबकुछ महंगा, किसानों को बेदखल करने के हजार बहाने और  अधिकांश मामलों में उसकी हैसियत खेतिहर मजदूर की। भूमिधारी हक भी नहीं। ऐसे में बिना भूमिधारी हक के महज पुनर्वास और मुआवजा बढ़ाकर तमाम दूसरे कानूनों के जरिये बलि का बकरा बनाया जा रहा है किसानों को। किसानों के पास अपनी जमीन बचाने का कोई रास्ता न छोढ़कर बेदखली का सरकारी इंतजाम है यह। जमीन पर किसानों की मिल्कियत सुरक्षित करने के लिए जो भूमि सुधार होने चाहिए, वह तो प्रथमिकता पर कहीं है ही नहीं। जमीन अधिग्रहण के मुआवजे के तौरपर लाखों, करोड़ों रूपयों को हासिल करने वाले परिवारों की आज क्या स्थिति है? जमीन के बदले लाखों-करोड़ों रूपयों की चकाचौंध का शिकार हुए ज्यादातर परिवार अपने पथ से ही भटक गए और भटककर विनाश की कगार पर पहुंच गए या पहुंच रहे हैं। बहुत से लोगों ने इस बेशुमार दौलत से बड़ी-बड़ी कोठियां बना लीं, नवाबों वाले शराब-शबाब-कबाब के शौक पाल लिए, महंगी-महंगी गाड़ियां ले लीं, आधुनिकतम हथियार खरीद लिये, पैसे के मद में चूर होकर अनाप-शनाप धन्धों में धन फंसा दिया, उस धन की उगाही में गैर-कानूनी गतिविधियों को आमंत्रित कर लिया। कुल मिलाकर मुआवजे के नाम पर मिले रूपयों ने ज्यादातर लोगों की जिन्दगी को उजाड़ कर रख दिया है, या फिर उजड़ने की कगार पर ला खड़ा किया है। माना कि मौजूदा लुभावनी नीतियों से इस पीढ़ी की पांचों उंगलियां घी में और सिर कड़ाही में हो सकता है, लेकिन इससे अगली पीढ़ियों का क्या हाल होगा, क्या यह किसी ने कभी सोचा है? अगली पीढ़ियां बेरोजगारी व बेकारी से त्रस्त होकर आपराधिक मार्ग का अनुसरण करने के लिए बाध्य होंगी, दस रूपये के लिए किसी का भी खून बहाने के लिए तत्पर होंगी और वो अपनी ही जमीन पर गुलामी का जीवन जीने के लिए बाध्य होंगी।

हमने अपने गृह जिला उधम सिंह नगर, उत्तराखंड में देखा है कि साठ के दशक में महाजनी सभ्यता की चपेट में कैसे भूमिधारी हक मिलते ही गांव के गांव किसान खेती से बेदखल हो गये। फिर सिडकुल बनते ही छोटे किसानों की जमीन कैसे हस्तांतरित होती रही। बड़े फार्मों और बड़े किसानों का रकबा तो निरंतर बढ़ता ही रहा।दरअसल पहले से ही जीवन यापन की दुस्वारियों में पंसे बहिष्कृत समाज के बहुजनों की जमीन की बेदखली ही भूमि अधिग्रहण कानून का वास्तविक लक्ष्य है, जिसके तहत वनाधिकार अधिनियम, पर्यावरण अधिनियम, अभयारण्य संरक्षण,पांचवीं और छठीं अनुसूचयों, समुद्रतट सुरक्षा अधिनियम पंचाती राज और स्थानीय निकाय कानून. खनन अधिनियम के दायरे को लचीला बनाकर जमीन का कारोबार वैश्विक बनाने के कारपोरेट हित साधने के लिए इस लालीपाप का इंतजाम है।

आधार कार्ड परियोजना, नागरिकता संशोधन अधिनियम, शहरी विकास और ग्रामीण विकास योजनाएं जैसे कारगर हथियार तो सकरका के पास हैं ही, अब संपत्ति पंजीकरण नये सिरे से कराने की योजना है, जिसके तहत आपको अपनी चल अचल संपत्ति की मिल्कियत के दसतावेजी सबूत देने होंगे, जो बारत के मूलनिवासी बहुजनों के पास अमूमन होते ही नहीं हैं, क्योकि वो हजारों सालों से एक तो अपढ़ हैं , इस पर तुर्रा यह कि दस्तावेज रखने का उनके वहां कोई इंतजाम ही नहीं रहता। इसके अलावा प्राकृतिक संसाधन के दोहन की खुली प्रतियोगिता के लिए भी एक और कानून लाने की तैयारी है।यह सबकुछ गुपचुप बिना शोर शराबे, बिना प्रतिरोध हो इसलिए रहा है कि सत्ता वर्ग, मीडिया, सामाजिक संगठनों, राजनीतिक दलों और विचारधाराओं का अब ग्रामीण भारत या कृषि से कोई लेना देना ही नहीं है। सब लोग हरित क्रांति और दूसरी हरित क्रांति का वृंद गान गाते हुए जूसरे तीसरे चऱण के आर्थिक सुधार को लागू करके सेवा क्षेत्र में अव्वल कृषि मुक्त संस्कृति मुक्त अमेरिका बनाने, जिसे इमरजिंग मार्केट कहा जाता है, की आपाधापी में हैं।

बिजनेस स्टैडर्ड में १३ जुलाई २०१२ को प्रकाशित इस खबर पर जरा गौर कीजियेः

जब हम शहर से गांव की ओर बढ़ते हैं, तो सामान्यतया जमीन सस्ती मिलती है। लेकिन अगर ग्रामीण विकास मंत्रालय की राय मानी गई तो स्थिति कुछ अलग होगी। मंत्रालय ने भूमि अधिग्रहण विधेयक के संशोधन में प्रस्ताव किया है कि शहरी इलाकों से दूर जाने पर मुआवजे में बढ़ोतरी होती जाएगी और शहरी इलाकों के आसपास की जमीनों का मुआवजा कम होगा।शहरी इलाकों में मुआवजा (एकमुश्त राशि सहित) बाजार भाव का दोगुना होगा, जबकि ग्रामीण इलाकों में यह बाजार भाव का दो से चार गुना होगा। ग्रामीण इलाकों के लिए इसका आकलन मंत्रालय द्वारा तैयार किए गए स्लाइडिंग पैमाने के आधार पर होगा। यह पैमाना शहरी इलाके से परियोजना की दूरी के आधार पर होगा। इस विधेयक में जमीन का कोई मूल्य नहीं तय किया जाएगा, बल्कि इसे राज्य सरकारों या राज्य भूमि कीमत आयोग या प्राधिकरण पर छोड़ दिया जाएगा।

मंत्रालय के सूत्रों ने कहा कि यह योजना आयोग का विचार है और एनएसी सदस्य मिहिर शाह और मंत्री का का भी मानना है कि ऐसा पाया गया है कि सस्ती जमीन पाने के लिए दूर दराज के ग्रामीण इलाकों का रुख किया जाता है। इससे ग्रामीण इलाकों में शोषण होता है और ग्रामीणों को विस्थापन की स्थिति का सामना करना पड़ता है। सूत्रों का कहना है कि इसी के चलते यह तरीका अपनाया गया है कि गांवों के नजदीक जमीन के अधिग्रहण का मुआवजा ज्यादा हो।

भूमि अधिग्रहण विधेयक के नए स्वरूप में क्षतिपूर्ति के साथ ही अधिग्रहण में पारदर्शिता का भी ध्यान रखा गया है। इसे अगले महीने संसद के मॉनसून सत्र में पेश किया जाना है। मंत्रालय ने इस प्रस्तावित विधेयक का नाम 'भूमि अधिग्रहण विधेयक 2011 में उचित मुआवजा, पुनर्वास, पुनस्र्थापन और पारदर्शिता का अधिकार' रखा है।
मंत्रालय ने सार्वजनिक उद्देश्य के लिए जमीन अधिग्रहण के लिए आठ श्रेणियों का प्रस्ताव किया है। इसके अलावा मंत्रालय ने सार्वजनिक-निजी हिस्सेदारी (पीपीपी) और निजी कंपनियों के लिए भूमि अधिग्रहण के मामले में परियोजना से प्रभावित होने वाले लोगों में 80 प्रतिशत की सहमति की शर्त रखी है। इन मामलों में भी मुआवजे के अन्य सभी प्रावधान लागू होंगे।

स्थायी समिति ने अपनी सिफारिशों में कहा था कि विधेयक में उन 16 केंद्रीय अधिनियमों को भी शामिल किया जाना चाहिए, जिन्हें विधेयक से बाहर रखा गया है। मंत्रालय ने इसे आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया है। अब वह चाहता है कि सेज अधिनियम, वक्र्स ऐंड डिफेंस ऐक्ट और कैंटोमेंट ऐक्ट को छूट वाले अधिनियमों से बाहर रखा जाए। मंत्रालय समिति की उस सिफारिश से भी सहमत है, जिसमें राहत एवं पुनर्वास पैकेज को उपभोक्ता मूल्य सूचकांक से जोड़े जाने की बात कही गई है, जिसका हर 3 साल पर पुनरीक्षण होगा। दोहरे विस्थापन पर दोहरे मुआवजे के प्रावधान पर भी सहमति जताई गई है। साथ ही शहरीकरण के मामले में विकसित भूमि का 20 प्रतिशत जमीन, जमीन के मालिकों को दिए जाने पर भी सहमति बनी है। मंत्रालय ने समिति की उस सिफारिश पर भी सहमति जताई है, जिसमें कहा गया है कि अगर खरीदार जमीन का उपयोग 5 साल तक नहीं करता है तो उसे जमीन वापस करनी होगी। मूल विधेयक में 10 साल इस्तेमाल न होने पर जमीन वापसी का प्रावधान था।

सरकार ऐसे कानून बनाने की कोशिश कर रही है, जिससे किसान आत्महत्या करने को मजबूर हैं।पिछले दो दशक में देशभर में अढ़ाई लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं। किसानों को अपनी जमीन और खेती बचाना ही मुश्किल नहीं हो रहा है, बल्कि वह आत्महत्या जैसा बड़ा कदम उठाने के लिए मजबूर हो रहे हैं। कृषि भूमि का अधिग्रहण कर रियल-एस्टेट और उद्योगों के लिए किया जा रहा है। सरकार जिस भूमि का अधिग्रहण कर रही है उससे उजडे़ किसानों और ग्रामीणों का पुनर्वास नहीं किया जा रहा।कर्ज के बोझ से दबे किसानों की मुसीबत घटने के बजाए बढ़ती जा रही है। क्योंकि खाद के दाम फिर से बढ़ गये हैं।रुपये में गिरावट और डालर की मजबूती को आधार बनाकर डीएपी के दामों में प्रति बोरी 300 रुपये की बढ़ोतरी हुई है। उर्वरक का मूल्य नियंत्रण मुक्त होने से अप्रैल 2011 से जून 2012 के बीच दामों में करीब तीन गुना वृद्धि हुई है।गौरतलब है कि बीत नवंबर माह में डीएपी प्रति बोरी का मूल्य 765 रुपया था। उसे बढ़ाकर 910 से 1000 रुपया प्रति बोरी कर दिया गया है। सरकार द्वारा फास्फेटिक खादों को नियंत्रण मुक्त कर दिये जाने के बाद से अप्रैल 2011 से कंपनियों को दाम तय करने की आजादी हो गयी है। तब से डीएपी व एनपीके जैसे फास्फेटिक उर्वरकों के दाम बढ़ने लगे है। पहली बार अप्रैल में डीएपी के दाम बढ़े थे। जब 480 से बढ़कर 765 रुपया कर दिया गया था।जानकारों का कहना है कि फास्फेटिक उर्वरक तैयार करने में जो कच्चा माल लगता है उनमें से 80 फीसदी विदेशों से आयात किया जाता है। बहरहाल डीएपी के दाम 13 माह में चौथी बार बढ़े है।डीएपी की बोरी 1200 रुपये के पर मिलेगी।मानसून बुधवार को पूरे देश पर छा गया। लेकिन सामान्य से 23 प्रतिशत बारिश कम होने से चिंताएं बढ़ गई हैं। कर्नाटक और महाराष्ट्र में पीने के पानी की उपलब्धता तथा मोटे अनाज (ज्वार, बाजरा और मक्का) का उत्पादन प्रभावित हो सकता है।देश में कुल बारिश में जहां मॉनसून का 75 फीसदी योगदान है, वहीं सिंचाई के लिए कुल पानी की जरूरत का आधा इसी से हासिल होता है। भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर डी सुब्बाराव ने अपने एक व्याख्यान में कहा था कि हम सब मॉनसून का पीछा करते हैं। उन्होंने बताया कि यदि बारिश होती है, तो मौद्रिक नीति काम करती है। सब कुछ अच्छा रहता है। यदि बारिश नहीं होती है, तो चिंता की बात है। इसलिए मैं आपको यह महसूस कराना चाहता हूं कि हम सभी मॉनसून का पीछा करते हैं। मॉनसून इतना महत्वपूर्ण है कि यूपीए की ओर से राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव के उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी ने मॉनसून को देश का 'वास्तविक वित्त मंत्री' कहा था।देश में सालाना लगभग 4000 अरब घन मीटर बारिश होती है। इसका तीन चौथाई हिस्सा दक्षिणी-पश्चिमी मॉनसून से मिलता है। लेकिन दुखद यह है कि इसमें से भी सिर्फ 1,100 अरब घन मीटर का ही उपयोग हो पाता है बाकि पानी बह जाता है। किसी तरह यदि इस जल को रोक कर इसका उपयोग कर लिया जाए, तो मॉनसून पर देश की निर्भरता कुछ कम हो सकती है।इसी बीच आरबीआई के गवर्नर डी सुब्बाराव ने कृषि क्षेत्र के डूबते कर्ज पर चिंता जताई है। पिछले 8 सालों में कृषि क्षेत्र में बैंकों के कर्ज गैर-कृषि क्षेत्र से ज्यादा डूबे हैं।डी सुब्बाराव के मुताबिक वित्त वर्ष 2012 में कृषि क्षेत्र में एनपीए करीब 50 फीसदी बढ़े। जबकि, गैर-कृषि क्षेत्र के एनपीए 40 फीसदी बढ़े।आरबीआई का कहना है कि कृषि कर्ज पर ब्याज दरों में छूट के असर की जांच की जाने चाहिए। सस्ता कृषि कर्ज का पैसा दूसरे इस्तेमाल में लाया जा रहा है।आरबीआई के मुताबिक कृषि कर्ज के इस्तेमाल पर नजर रखे जाने की जरूरत है। साथ ही, किसानों को सस्ता कर्ज देने की प्रणाली में बदलाव करने पर विचार करना चाहिए।

फिलहाल दो विधेयक काफी चर्चा में हैं, 1894 के भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन करने वाला विधेयक और पुनर्स्थापन और पुनर्वास विधेयक। दोनों की मियाद खत्म हो चुकी है और उन्हें फिर से संसद के पटल पर रखा जाना है। राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की वेबसाइट से हमें ये पता चलता है कि सलाहकार परिषद में इस बात को लेकर एक राय नहीं है कि भूमि अधिग्रहण कानून संशोधन विधेयक में क्या-क्या रखा जाए। हालांकि एनएसी इस बात पर सहमत है कि दोनों विधेयक अलग-अलग न हो कर एकीकृत रूप में बनाए जाएं। मीडिया में आ रही खबरों के मुताबिक इस तरह का एकीकृत विधेयक अब ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा बनाया जाएगा।दो विधेयकों को एक किए जाने के पीछे वाजिब कारण हैं। हालांकि यह देखना होगा कि दोनों ही विधेयकों में 'मुआवजा' के अर्थ और दायरे को लेकर क्या कोई सैद्धांतिक भेद है? साधारण समझ से लगता है कि यह भेद हो सकता है। भूमि अधिग्रहण संशोधन विधेयक में 'अधिग्रहण' शब्द का इस्तेमाल क्यों किया गया है? इससे ऐसा लगता है कि जमीन जबरदस्ती ली जानी है। दो पक्षों के आपसी लेन-देन में इस शब्द के लिए जगह नहीं होनी चाहिए, बशर्ते इकरारनामे में कोई धांधली न हो।निजी बाजार अपना काम करता है, लेकिन जब निजी बाजार की कार्यप्रणाली में कोई समस्या आती है, तब राज्य इसमें दखल देता है और निजी व सार्वजनिक इस्तेमाल के लिए जमीन का अधिग्रहण करता है। इसलिए इसका मुआवजा दिया जाता है। कानूनी तौर पर मुआवजे का हकदार केवल वही शख्स है, जिसका कोई कानूनी अधिकार है। पुनर्वास और पुनर्स्थापना विधेयक के प्रावधान से इसकी तुलना कीजिए। इस विधेयक में कानूनी अधिकार रखने वाले (पट्टेदार, किराएदार, लीज धारक, मालिक) के साथ ही उन लोगों के हितों का सवाल भी उठाया गया है, जिनका कोई कानूनी दावा नहीं बनता लेकिन जिनकी आजीविका प्रभावित होती है।

मणिपुर और नगालैंड से लेकर गुजरात, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ समेंत समूचे मध्य भारत, समूचे हिमालयी क्षेत्र, उत्तर प्रदेश , पंजाब हरियाणा, राजधानी नई दिल्ली, बिहार, बंगाल, ओड़ीशा, झारखंड और पूरे दक्षिण भारत में जो तनाव और हिंसा का माहौल है भूमि विवाद के लिए उसके मूल में भूमि सुधार के लिए कोई  पहल न होना और संविधान की पांचवीं और छठी अनुसूचियों का उल्लंघन प्रमुख है। पांचवी और छठीं अनुसूचियों के तहत आदिवासियों को जल, जंगल और जमीन के हक हकूक मिल जाये और उनके अनुसूचित इलाकों में कोल्हाण अंचल की तरह स्वायत्तता दे दी जाये, तो माओवादी या नक्सल आंदोलन के लिए कोई जमीन ही नहीं बचती। पर इल अधिकारों को कुचलने के लिए राष्ट्र के जरिये अंध हिंदू राष्ट्रवाद के आधार पर सत्ता वर्ग सैन्य शकित के हर विकल्प का का इस्तेमाल कर रहा है और मीडिया इसके लिए अनुकूल माहौल बना रहा है मिथ्या अभियान और घृणा और दुष्प्रचार के जरिये ताकि अकूत प्राकृतिक संसाधनों पर उनका वर्चस्व कायम रहे। कारपोरेट हितों के मद्देनजर कानून बदलना तो इन्ही हथियारों में से सबसे कारगर ब्रह्मास्त्र है। जब बड़े बड़े बांध, इस्पात कारखाने, बिजली परियोजनाएं बनाकर विस्थापितों के पुनर्वास बिना भूमि अधिग्रहण बिना प्रतिवाद संपन्न हो गया, तब किसी को इस कानून की याद तक नहीं आयी।

खानों के राष्ट्रीयकरण के बाद  भी लोगों को न भूमि अधिग्रहण और न खनन अधिनियम की सुधि आयी। क्योंकि सबकुछ बोरोकटोक चल रहा था। सेज कानून पास होने के बाद, औद्योगीकरण और शहरीकरण, इंफ्रस्ट्र्क्चर और परमाणु संयंत्रों, सरदार सरोवर,पोलावरम,टिहरी, नर्मदा बांध परियोजनाओं, नियमागिरि में खनन के लिए भूमि अधिग्रहण के खिलाफ हो रहे तीव्र जनप्रतिरोध से निपटने के लिए ही मौजूदा भूमि अधिग्रहण कानून का मसविदा है। इसमें मुआवजा, पुनर्वास और मुनाफे में शेयर मछली फंसाने के लिए चारे का प्रयोग जैसा है।118 साल पुराने भूमि अधिग्रहण  कानून, 1894 के अनुसार  सार्वजनिक उद्देश्य के तहत किसी भी जमीन को बगैर बाजार मूल्य के मुआवजा चुकाए सरकार को अधिग्रहण  करने का अधिकार है। इसमें 'सार्वजनिक उद्देश्य' की परिभाषा   के तहत शैक्षणिक संस्थानों का निर्माण, आवासीय या ग्र्रामीण परियोजनाओं का विकास शामिल है। इसके लिए एक अधिसूचना पर्याप्त होती है।इस कानून में दो प्रमुख बातें स्पष्ट नहीं की गई है। एक तो अधिग्रहण  की जाने वाली जमीन की वाजिब कीमत क्या होनी चाहिए? दूसरी बात क्या सार्वजनिक मकसद के तहत टाउनशिप या विशेष आर्थिक क्षेत्रों (एसईजेड) को जमीन उपलब्ध कराना जायज है? क्या निजी कारखानों के लिए जमीन ली जा सकती है? कई मामलों में सुप्रीमकोर्ट से भी यह बातें साफ नहीं हुईं।आखिर क्यों वर्ष 1894 में अंग्रेजों द्वारा अपने व्यापार और साम्राज्य के हित में थोपे गए इस भूमि अधिग्रहण कानून को आजादी के छह दशक बाद भी विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र ढ़ोता चला जा रहा है? आखिर क्यों सरकारें अंग्रेजों की तरह इस काले कानून के माध्यम से किसानों का शोषण करती चली आ रही हैं? आखिर क्यों गौरे अंगे्रजों का प्रतिनिधित्व, स्वतंत्र देश के जनप्रतिनिधि बेहिचक करते चले आ रहे हैं? क्या किसी के दिलो-दिमाग में आज तक इस काले कानून के कारण देश के किसानों पर हो रहे कठोर प्रहारों का मुद्दा नहीं आया? क्या किसानों की निरन्तर बिगड़ती आर्थिक स्थिति, उन पर बढ़ते कर्ज और बढ़ती आत्महत्याओं के ग्राफ ने किसी भी जन प्रतिनिधि को इस बारे में तनिक भी सोचने के लिए बाध्य नहीं किया?चूंकि नंदीग्राम, सिंगुर, अरनाथ श्राइन बोर्ड, दादरी, नर्मदा घाटी परियोजना, भट्टा पारसौल, गे्रटर नोएडा, बलिया, फतेहाबाद, अलीगढ़, आगरा, बुन्देलखण्ड, गुड़गांव, सोनीपत, गाजियाबाद, मेरठ, धारूहेड़ा, मानेसर, मथुरा आदि के किसानों की राष्ट्रीय स्तर पर चल रही अनवरत जमीनी जंग सन् 1894 के भूमि अधिग्रहण के काले कानून में बदलाव का आधार बन चुकी है तो अब सवालों का सवाल यही है कि आखिर आदर्श भूमि अधिग्रहण कानून का आधार क्या हो? इस कानून में ऐसी कौन-कौन सी शर्तें जोड़ी जानीं चाहिएं, जिससे कि किसानों के हितों को भी चोट न पहुंचे और सार्वजनिक विकास में भी बाधा न आए?

इस बीच अर्जुन मुंडा ने नगड़ी भूमि अधिग्रहण विवाद के हल के लिए पांच सदस्यीय समिति का गठन किया है,यह ताजा मामला है , जिससे भूमि अधिग्रहण कानून के संदर्भ को समझा जा सकें।मालूम हो कि रांची में आईआईटी आईआईएम और राष्ट्रीय विधि विविद्यालय की स्थापना के लिए 227 एकड भूमि नगडी इलाके में राज्य सरकार ने उपलब्ध करायी है। इसे 1957 में ही अधिगृहीत किया गया था, लेकिन अब किसान इस आदिवासी भूमि को किसी भी कीमत पर राज्य सरकार को देने को तैयार नही है और इसके विरोध में आन्दोलनरत है।आंदोलनकारी आदिवासियों से पुलिस की मुठभेड में अब तक अनेक लोग घायल हो चुके हैं। अर्जुन मुंडा ने गुरुवार को नगडी भूमि अधिग्रहण विवाद के हल के लिए भूराजस्व मंत्री मथुरा प्रसाद महतो की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय उच्चस्तरीय समिति का गठन किया और उससे समस्या के समाधान के लिए शीघ उचित सलाह देने को कहा।मुख्यमंत्री ने इस मामले में उच्च न्यायालय के आदेश पर किया ऐसा है।समिति में मंत्री महतो के अलावा भूराजस्व सचिव एन एन पांडेय वित्त सचिव सुखदेव सिंह, रांची के आयुक्त सुरेंद्र सिंह और रांची के उपायुक्त विनय कुमार चौबे को शामिल किया गया है।समिति में शामिल एक सदस्य ने बताया कि समिति 1957 के इस भूमि अधिग्रहण की कानूनी स्थिति को ध्यान में रखते हुए किसानों की उचित समस्याओं के समाधान का प्रयास करेगी।  

नगड़ी में भूमि का अधिग्रहण पूरी तरह कानून सम्मत है, इसलिए सर्वोच्च न्यायालय ने भी सरकार के पक्ष में फैसला दिया। यह कहना है रांची जिला के पूर्व भू-अर्जन पदाधिकारी कमल शंकर श्रीवास्तव का।श्रीवास्तव नगड़ी भूमि अधिग्रहण को ले ग्रामीणों के साथ हुए लगभग बीस बैठकों में शामिल रहे हैं। श्रीवास्तव कहते हैं कि एक्ट के 3 एफ के तहत सार्वजनिक कार्य के लिए सरकार को किसी भी रैयती भूमि के अधिग्रहण का पूरा अधिकार है।

मूल भू-अधिग्रहण कानून 1894 में अंग्रेजों के समय बना था, जिसमें राजीव गांधी सरकार ने 1984 में संशोधन किया। इसके तहत एक्ट की धारा 4,6,11 व 12 के तहत सरकार किसी भी रैयती जमीन का सार्वजनिक कार्य के लिए अधिग्रहण कर सकती है। सरकार के चाहने पर रैयत भूमि देने से मना नहीं कर सकते। साथ ही वर्तमान कानून में भूमि अधिग्रहण के बाद नौकरी देने जैसी कोई बाध्यता भी नहीं है। वैसे सिंगुर, नंदीग्राम व नोयडा भूमि विवाद के बाद कानून में भू अधिग्रहण के बाद नौकरी का प्रावधान जोड़ा जा रहा है, लेकिन अभी यह प्रस्ताव के ही स्तर पर है, कानून नहीं बना है। इसी कानून की धारा 22(2) में साफ कहा गया है कि भू अधिग्रहण के बाद रैयत यदि पैसा नहीं लेते तो अधिग्रहण की वैधता पर सवाल नहीं उठ सकता। कोई पैसा ले या नहीं सरकार द्वारा ट्रेजरी में पैसा जमा करा देने के बाद उसे पैसा दे दिया गया माना जाता है। अब यह रैयत पर है कि वह कब पैसा ले, कितने समय बाद भी रैयतों द्वारा पैसा लेने पर उसपर कोई ब्याज नहीं मिलता। उन्होंने बताया कि यह भ्रम है कि जिस उद्देश्य के लिए भूमि ली जाती है, उसका उपयोग उसउद्देश्य के लिए नहीं होने पर भूमि रैयतों को वापस किया जाना चाहिए। इस स्थिति में भूमि सरकार की होती है। कहा, भूमि बीएयू के लिए अधिग्रहित की गई थी, संसाधन की कमी के कारण बीएयू ने फिजिकल कब्जा नहीं लिया, बल्कि कागज पर कब्जा लिया।

न्यायपालिका के निर्णयों से भी बिल्डर प्रोमोटर राज को खास तकलीफ हो रही है, जिससे निजात दिलाना भूमि अधिग्रहण संशोधन कानून का ध्येय है। मसलन यूपी के ग्रेटर नोएडा में फ्लैट बुक कराने वालों के लिए बुरी खबर है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ग्रेटर नोएडा के एक और गांव में जमीन के अधिग्रहण को रद्द कर दिया है। इस फैसले से इस गांव में बन रही आवासीय व अन्य परियोजनाओं को पलीता लग गया है। गांव का नाम गुलिस्तानपुर है। ग्रेटर नोएडा के गुलिस्तानपुर की 170 हेक्टेयर जमीन का सरकार ने अधिग्रहण किया था। इसमें सौ से ज्यादा किसानों की जमीन ली गई थी। किसान इसके खिलाफ हाईकोर्ट की शरण में गए और 90 से ज्यादा रिट याचिकाएं इसके खिलाफ दायर कीं। हाईकोर्ट ने इस मामले में किसानों के पक्ष में फैसला सुनाते हुए जमीन अधिग्रहण को रद्द कर दिया। इससे पहले इसी महीने के पहले पखवाड़े में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नोएडा एक्सटेंशन यानी ग्रेटर नोएडा के शाहबेरी गांव में 156 हेक्टेअर जमीन के अधिग्रहण को रद्द कर दिया। इसके अगले ही दिन हाईकोर्ट ने दादरी तहसील के सूरजपुर गांव में 73 हेक्टेयर जमीन के अधिग्रहण को भी अवैध करार दे दिया। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने नोएडा एक्सटेंशन के लिए अधिग्रहित की गई 159 हेक्टेयर जमीन की अधिग्रहण प्रक्रिया निरस्त कर दी  साथ ही प्रशासन से पूछा है कि आखिर ऐसी क्या जल्दी थी, जो किसानों का पक्ष सुने बगैर ही जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया पूरी कर ली गई। इससे बिल्डर्स में हड़कंप मच गया है। इस जमीन पर कई नामी बिल्डर्स के प्रोजेक्ट हैं। इसमें हजारों लोगों ने फ्लैट बुक कराया हुआ है। बिल्डर्स ने यहां 8वीं मंजिल तक निर्माण भी करा लिया है। ग्रेटर नोएडा सेक्टर-1 के बिसरख एरिया में 28 गांवों की जमीन का अधिग्रहण किया गया था। इन पर बिल्डर्स के कई प्रोजेक्ट्स चल रहे हैं। जानकारी के मुताबिक कोर्ट ने साहबेरी गांव के जमीन का ही अधिग्रहण रद्द किया है। किसानों की याचिका पर इलाहाबाद हाई कोर्ट के इस आदेश से ग्रेटर नोएडा अथॉरिटी को जोरदार झटका लगा है। ग्रेटर नोएडा अथॉरिटी ने बिसरख एरिया के आसपास बिल्डर्स स्कीम लॉन्च की थी। जमीन अधिग्रहण के लिए 13 जून 2009 को धारा-4 की कार्रवाई की गई थी। नियम के अनुसार धारा-4 के बाद धारा-5 ए की कार्रवाई की जाती है। इसमें किसानों का पक्ष सुना जाता है। किसान अगर अधिग्रहण के खिलाफ आपत्ति लगाते हैं तो उसका समाधान करने के बाद ही अधिग्रहण प्रक्रिया आगे बढ़ती है। आरोप है कि प्रशासन की रिपोर्ट पर शासन ने धारा-5 ए के बजाय 13 नवंबर 2009 को सीधे धारा-6 की कार्रवाई कर डाली।किसानों ने इसका स्थानीय प्रशासन से विरोध किया, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। उसके बाद साहबेरी गांव के किसान देवेंद्र वर्मा, आले नदी समेत करीब डेढ़ सौ किसानों ने 28 मार्च 2010 को हाईकोर्ट में गुहार लगाई। कोर्ट में किसानों ने आरोप लगाया कि औद्योगिक विकास के नाम पर अधिग्रहण के लिए नोटिफिकेशन किया गया, जबकि जमीन को बिल्डर्स को बेचा गया। इसके लिए लैंडयूज भी चेंज नहीं किया गया। साथ ही किसानों को 850 रुपये प्रति वर्ग मीटर की दर मुआवजा दिया गया, जबकि बिल्डर्स को करीब साढे़ दस हजार रुपये प्रति वर्ग मीटर की दर से बेचा गया। इससे बिल्डर्स में हडकंप मच गया है। जिस जमीन की अधिग्रहण प्रक्रिया निरस्त की गई है, उस पर महागुन बिल्डर्स, आम्रपाली, सुपरटेक और पंचशील बिल्डर्स के प्रोजेक्ट हैं। इन बिल्डरों ने लोगों के फ्लैट बुक भी कर लिए हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने ग्रेटर नोएडा के ग्रामीण किसानों की उस याचिका पर यूपी सरकार से जवाब मांगा है जिसमें राष्ट्रीय राजधानी से लोग नोएडा एक्सटेंशन को विकसित करने के लिए उनकी जमीन के अधिग्रहण को एक याचिका के जरिए चुनौती दी गई है।जस्टिस आरएम लोढ़ा और एचएल गोखले की एक बेंच ने बिसरख गांव के किसानों की ओर से दायर याचिका पर राज्य सरकार और ग्रेटर नोएडा अथॉरिटी  को नोटिस भेजा है। याचिका में किसानों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी गई है जिसके तहत गांव में आपात धारा के तहत उनकी जमीन के अधिग्रहण को रद्द करने से इनकार कर दिया गया था।

नोएडा और गाजियाबाद में एनएच-24 से लगे ग्रेटर नोएडा के बिसरख गांव में करीब 15 रिहायशी प्रोजेक्टों के लिए 608 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया गया था। बिसरख गांव वाली जमीन में पैरामाउंट, अर्थ इंफ्रास्ट्रक्चर, रुद्रा हाइट, अरिहंत आदि के रिहायशी प्रोजेक्ट आने थे।इस गांव की जमीन पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के 21 अक्टूबर 2011 के फैसले को गांव के नौ किसानों ने शीर्ष कोर्ट में चुनौती दी है। यह नोटिस जारी करने के साथ ही बेंच ने उनकी याचिकाएं ऐसे ही दूसरे मामलों के साथ जोड़ दी गईं जो बीते कुछ महीनों में शीर्ष कोर्ट तक पहुंच गए।इसके पहले शीर्ष कोर्ट ने शाहबेरी गांव में 158 हेक्टेयर जमीन का अधिग्रहण रद्द कर दिया था और इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भी बीते साल जुलाई में पटवारी गांव में 589 हेक्टेयर जमीन का अधिग्रहण खत्म कर दिया। इन फैसलों से नोएडा एक्सटेंशन में बहुत सारे रियल एस्टेट प्रोजेक्ट अधर में लटके हुए हैं।

बिसरख के किसानों की नई याचिका से संबंधित रियल एस्टेट कंपनियों की धड़कनें तेज हो गई हैं। इस इलाके में बहुत सारी रियल्टी कंपनियां एनसीआर प्लानिंग बोर्ड के प्लान मंजूरी का इंतजार कर रही हैं ताकि यहां महीनों से अटके सैकड़ों अपार्टमेंट के निर्माण का कार्य शुरू किया जा सके।

अंग्रेजों ने यह कानून अपनी अंग्रेजी हुकुमत को फायदा पहुँचाने के लिए बनाया था। दुर्भाग्यवश आजादी के वक्त हमने अंग्रेजों द्वारा बनाए गये इस किस्म के दमनकारी कानूनों को रद्द नहीं किया। आजादी के पहले इस तरह के कानून अंग्रेजी हुकुमत को दमनकारी शक्तियाँ प्रदान कर फायदा पहुँचाते थे, आजादी के बाद ये कानून सत्ताधारी नेताओं और अफसरों को फायदा पहुँचाते हैं। जनता आजादी के पहले भी पिसती थी, जनता आजादी के बाद भी पिस रही है !उपजाऊ और सिंचित कृषि योग्य जमीन का गैर-कृषि कार्यों में इस्तेमाल नहीं किया जाए, इस तर्क का आखिर क्या मतलब है? कुछ जमीन मूल्यवान हैं और कुछ नहीं। अगर हमने सिंचाई के बेहतर इंतजाम किए होते तो कृषि योग्य जमीन का और ज्यादा बड़ा हिस्सा ज्यादा मूल्यवान हो सकता था। जमीन चाहे कृषि योग्य हो या फिर गैर-कृषि इस्तेमाल के लिए, हर कोई वो जमीन चाहेगा, जिसका मूल्य ज्यादा हो न कि जिसका मूल्य कम हो।आजकल हर राज्य सरकार से लेकर, केन्द्र सरकार तक एक आदर्श भूमि अधिग्रहण नीति बनाने व लागू करने का श्रेय का सेहरा अपने सिर बांधने के लिए अति उतावली दिखाई दे रही है। हरियाणा व उत्तर प्रदेश सरकारों में तो एक दूसरे से बढ़कर आदर्श भूमि अधिग्रहण नीति लागू करने के नाम पर चल रही भारी प्रतिस्पद्र्धात्मक बहसबाजी भी राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन चुकी है। कांग्रेस पार्टी के दिग्गज नेता, यहां तक सोनिया गांधी और राहुल गांधी देशभर में हरियाणा सरकार की भूमि अधिग्रहण नीति को आदर्श बनाकर बहुत बड़े प्रचारक बने हुए हैं और मुख्यमन्त्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा की मौके-बेमौके पीठ थपथपा रहे हैं। उत्तर प्रदेश की मुख्यमन्त्री मायावती, किसानों के उग्र प्रदर्शनों व तेवरों के भावी चुनावी परिकल्पनाओं और न्यायालयों के संज्ञानों व सख्त टिप्पणियों से घबराकर हरियाणा की तर्ज पर भूमि अधिग्रहण नीति में संशोधन करके, मौजूदा दोषपूर्ण भूमि अधिग्रहण कानून का ठीकरा भी सत्तारूढ़ कांगे्रस के सिर फोड़ चुकी हैं। एकाएक बदली हुई परिस्थितियों के बीच खिसकते वोट बैंक को रोकने के लिए केन्द्र सरकार ने भी अपनी मजबूत चाल चलते हुए भरोसा दिलाया है कि वह आगामी मानसून संसद सत्र में एक आदर्श भूमि अधिग्रहण कानून लाएगी और उसे पास करके लागू करेगी। इसके लिए कानून मंत्रालय के तत्वाधान में एक कमेटी भी गठित की जा चुकी है और कमेटी देश भर से आदर्श भूमि अधिग्रहण कानून के सन्दर्भ में सुझाव भी आमंत्रित कर चुकी है। सियासी नेता एवं समाजसेवी लोग अपने सुझाव भेज भी रहे हैं।

हरियाणा सरकार ने जमीन अधिग्रहण के बदले, जगह की स्थितिनुसार 8 से 20 लाख रूपये, 33 वर्ष तक प्रति एकड़ 15000 रूपये वार्षिक भत्ता, जिसमें 500 रूपये प्रतिवर्ष की बढ़ौतरी भी शामिल, अधिकतम 350 वर्ग गज का आवासीय प्लाट देने जैसी लुभावनी मुआवजा नीतियां बनाकर देशभर में आदर्शवादी नीति बनाने की भरसक कोशिश की है। हरियाणा के पड़ौसी राज्य उत्तर प्रदेश ने यमुना एक्सप्रेसवे, गंगा-एक्सप्रेसवे, गे्रटर नोएडा आदि के मामलों में बुरी गत और बुराई झेलने के बाद 2 जून, 2011 को अपनी नई नीति के तहत बड़ी रकम के अलावा, 33 साल तक 23000 रूपये प्रतिवर्ष भत्ता देने के साथ-साथ कई अन्य लुभावनी मुआवजा नीतियां लागू करके किसानी वोट बैंक को लुभाने की कोशिश की है। पंजाब ने भी चण्डीगढ़ में अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा और एयरोसिटी के लिए किसानों को १.५ करोड़ रूपये प्रति एकड़ मुआवजा देकर जमीन अधिग्रहण मुआवजा नीतियों की सुर्खियों में अपना नाम दर्ज करवाया है। गुजरात की कोशिश भी लगभग इसी तर्ज पर दिखाई दे रही है। कुल मिलाकर हर राज्य सरकार जमीन के बदले भारी भरकम राशि की चकाचौंध पैदा करके किसानों की आंखों में चमक लाने की कोशिशों में लगी हुई हैं।

कानूनी तौर पर भूमि अधिग्रहण का कानून शहरी जमीन पर भी लागू होता है लेकिन व्यावहारिक तौर पर इसे सिर्फ ग्रामीण जमीन पर ही लागू किया जाता है। जब भी अधिग्रहण की बात आती है, तो ग्रामीण इलाकों की जमीन ही अधिग्रहित की जाती है। और सरकार अपनी मर्जी से इस जमीन का गैर कृषि कार्यों में इस्तमाल कर लेती है। इसी तरह राजनीतिक तंत्र इससे फायदा कमाता है। इस तरह से परिवर्तित जमीन की कीमत गैर-परिवर्तित जमीन की तुलना में काफी ज्यादा होती है। उच्च स्टाम्प शुल्क और आय के अवैध स्रोतों को छिपाने और टैक्स चोरी के लिए जमीन का पंजीकरण काफी कम मूल्य पर किया जाता है। अनुसूचित जनजाति श्रेणी में आने वाली जमीन को बेचे जाने पर कड़े प्रतिबंध हैं। इससे अनुसूचित जनजाति जमीन को खरीददार नहीं मिलते, जबकि सामान्य जमीन की मांग काफी बढ़ जाती है।

सामान्य जमीन की कीमत बढ़ने के अलावा अनुसूचित जनजाति जमीन के स्वामित्व पर सवाल उठाया जा सकता है या गुपचुप खरीददारी की जा सकती है। जमीन के स्वामित्व संबंधी सही जानकारी हमारे पास नहीं है। भूमि सर्वेक्षण काफी पुराने हैं। भूमि स्वामित्व का बीमा नहीं है। कारोबारी कम्पनियां जमीन अधिग्रहण के मामले में सरकार को हस्तक्षेप करने के लिए क्यों कहती हैं? इसलिए नहीं कि हो सकता है कि पूरी जमीन के बीच कोई एक व्यक्ति किसी भी कीमत पर अपनी जमीन बेचने के लिए तैयार नहीं हो, बल्कि वे इसलिए सरकारी हस्तक्षेप चाहती हैं कि जमीन के स्वामित्व को लेकर कोई स्पष्टता नहीं है। इसलिए जब तक भूमि स्वामित्व विधेयक पर काम नहीं होगा, तब तक भूमि अधिग्रहण संशोधन विधेयक और पुनर्वास विधेयक पारित करने का कोई औचित्य नहीं। कुछ जगहों पर पट्टेदारी अवैध है, जिसकी वजह से इसे गुपचुप तरीके से अंजाम दिया जाता है। इसके कारण दूसरी कई समस्याएं खड़ी होने के साथ ही पट्टेदारों के लिए अपने अधिकारों को साबित कर पाना काफी मुश्किल हो जाता है।

आज भी भूमि अधिग्रहण एक साथ एकमुश्त नहीं होता, ये क्रमिक तौर पर किया जाता है। जाहिर है जो जमीन पहले अधिग्रहित की जाती है, उसकी कीमत कम होती है और जिस जमीन का अधिग्रहण बाद में किया जाता है, उसकी कीमत अधिक होती है, इससे अधिग्रहण की नीयत पर सवाल उठने लगते हैं। 70/30 नियम की वजह से क्रमिक खरीद की ये समस्या और बढ़ जाती है। यह निजी बाजार की स्वायत्त कार्यप्रणाली को और बाधित करता है। हम एक भावुक की तरह ऐसे सुझाव नहीं दे सकते, जो आर्थिक समझ-बूझ की विरोधी हो। हमें बाजार के सामने आने वाली बाधाओं को हटाना है न कि बढ़ाना है।भूमि अधिग्रहण अधिनियम, १८९४ (The Land Acquisition Act of 1894) भारत और पाकिस्तान दोनों का एक कानून है जिसका उपयोग करके सरकारें निजी भूमि का अधिग्रहण कर सकतीं हैं। इसके लिये सरकार द्वारा भूमिमालिकों को क्षतिपूर्ति (मुआवजा) देना आवश्यक है।

शायद भट्टा पारसौल के बाद जमीन अधिग्रहण के खिलाफ राहुल गांधी की मुहिम रंग लाने लगी है। संसद की स्थाई समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि सरकार को किसी भी निजी परियोजनाओं या कंपनी के लिए जमीन का अधिग्रहण नहीं करना चाहिये। रिपोर्ट में जनहित की परिभाषा को भी साफ किया गया है।जनहित में जमीन केवल बुनियादी विकास, सिंचाई योजनाओं और बांध परियोजनाओं के लिए ही जमीन का अधिग्रहण करना चाहिए। इसके अलावा सामाजिक सरोकार जैसे स्कूल, अस्पताल, पेयजल तथा स्वच्छता जैसे सरकारी परियोजनाओं के लिए ही जमीन ली जानी चाहिए।सभी अधिग्रहण पर्याप्त मुआवजे, पुनर्वास और अन्य सुविधाओं के विकास के बाद ही ली जाये यदि कोई परियोजना जमीन अधिग्रहण के पांच साल तक शुरू न हो तो जमीन वापस लौटा दी जाये।

प्रस्तावित विधेयक में प्रावधान

भूमि अधिग्रहण कानून, 1894 में संशोधन के लिए 2007 में एक विधेयक संसद में पेश किया था। हालांकि यह विधेयक लैप्स हो चुका है। मौजूदा भूमि अधिग्रहण  कानून की खामियों को दुरुस्त करने के लिए  फिर से इस तरह के संशोधन बिल पेश किए जाने की बात की जा रही है। 2007 के संशोधन बिल में मौजूदा कानून में कई परिवर्तनों का प्रस्ताव पेश किया गया था:उद्देश्य : सेनाओं की रणनीतिक जरूरतों के लिए भूमि अधिग्रहण संभव, सावर्जनिक हित के किसी भी मकसद के लिए।


मुआवजा : यदि कृषि योग्य जमीन को किसी औद्योगिक प्रोजेक्ट के लिए अधिग्रहित किया जाता है तो उसको औद्योगिक जमीन माना जाएगा और इस तरह की जमीन को निर्धारित दरों पर ही खरीदा जा सकेगा।
प्रक्रिया : कई बदलावों के प्रस्ताव में सामाजिक प्रभाव का आकलन (एसआइए) खास है। 400 से अधिक परिवारों के विस्थापन की स्थिति में अधिग्रहण के पहले एसआइए होगा।उपयोग : अधिग्रहित की गई जमीन का इस्तेमाल पांच वर्षों के भीतर करना होगा। अन्यथा जमीन सरकार के पास चली जाएगी। इसके अलावा यदि किसी अधिग्रहीत जमीन को किसी अन्य पार्टी को हस्तांतरित किया जाता है तो उसमें होने वाले कुल लाभ के 80 प्रतिशत हिस्से में से भूमि के वास्तविक मालिक और उसके कानूनी वारिसों को भी हिस्सा देना होगा।

रेवाड़ी,हरियाणा में भूमि अधिग्रहण विरोध संघर्ष समिति के आह्वान पर बुधवार को जिला सचिवालय के सामने जिले में भूमि अधिग्रहण के विरोध में अनिश्चितकालीन धरना शुरू किया गया। धरने को इनेलो सहित विभिन्न राजनीतिक दलों ने भी अपना समर्थन दिया है।जमीन अधिग्रहण के विरोध में मंगलवार को गाव आसलवास के पास महापंचायत आयोजित की गई थी, जिसमें भाकियू के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत ने भी हिस्सा लिया था। पंचायत में रखी गई किसानों की मागों को न मानने तक जिला सचिवालय के समक्ष अनिश्चितकालीन धरने का निर्णय लिया गया था। धरने पर बैठे वक्ताओं ने कहा कि बुधवार को हुई पंचायत में ग्रामीणों पर दर्ज किए गए मुकदमे रद करने, नया कानून बनने तक भूमि अधिग्रहण न करने, सेक्शन 4 से पहले बने मकानों को तोड़ने के लिए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने की माग सरकार के समक्ष रखी गई थी। उन्होंने कहा कि सरकार किसानों के हितों को अनदेखा कर पूंजीपतियो को लाभ पहुचाने के लिए उपजाऊ भूमि का अधिग्रहण कर रही है। किसानों के खेतों में बने मकानों को तोड़ा जा रहा है। उन्होंने कहा कि जब तक सरकार किसानों की मागों को नहीं मानती है तथा जमीन अधिग्रहण की नई नीति का प्रस्ताव संसद में पारित नहीं होता है तब तक उनका धरना जारी रहेगा।

इनेलो विधायक रामेश्वर दयाल ने कहा कि सरकार का किसान हित से कोई लेना-देना नहीं है। सरकार दक्षिणी हरियाणा में जमीन अधिग्रहण कर रही है, जबकि विकास के नाम पर यह क्षेत्र प्रदेश के अन्य हिस्सों से पिछड़ चुका है। उन्होंने कहा कि इनेलो किसानों के साथ अन्याय नहीं होने देगी। उन्होंने कहा कि बावल क्षेत्र में सरकार द्वारा विकास के नाम पर कुछ भी नहीं दिया तथा अब उपजाऊ जमीन का अधिग्रहण कर यहा के किसानों को बर्बाद करना चाहती है। इनेलो जिला अध्यक्ष सुनील चौधरी ने कहा कि इस लड़ाई में इनेलो किसानों के साथ है। काग्रेस के पूर्व प्रवक्ता वेद प्रकाश विद्रोही ने भी धरने को समर्थन दिया। विद्रोही ने कहा कि किसानों के संघर्ष में वे उनके साथ है। सोशलिस्ट यूनिटी सेंटर आफ इडिया (कम्युनिस्ट) के जिला सचिव एडवोकेट राजेंद्र सिंह ने किसानों के धरने को समर्थन देते हुए कहा कि यदि किसानों की जमीन अधिग्रहण कर ली जाती है तो वह भुखमरी की कगार पर पहुच जाएंगे। ऑल इडिया कृषक खेत मजदूर संगठन ने भी किसानों के धरने को समर्थन दिया। इस अवसर पर चौ. रामकिशन महलावत, गुरदयाल नंबरदार, बने सिंह, इंद्राज सरपंच संगवाड़ी, श्योलाल, कर्नल जीआर चौकन, चौधरी माड़ाराम, चौधरी देवदत्त, महेद्र पाल, रामचंद्र टिकला, जग्गी पहलवान, पप्पू, लीलाराम, भजन लाल, स्वामी सुखानंद, चौधरी हरी सिंह, रामकुमार, जयनारायण, राजबीर, विजय कुमार सहित अन्य किसान मौजूद थे।

सुप्रीम कोर्ट भी विभिन्न राज्य सरकार की भूमि अधिग्रहण नीतियों की असलियत पहचान चुका है। जिस तरह रिहायशी और औद्योगिक क्षेत्रों के विकास के नाम पर किसानों से उनकी जमीनों को जबरन कानून की आड़ में छीना जा रहा है उससे नाराज सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मौजूदा भूमि अधिग्रहण कानून एक धोखा है। इन कानूनों को कुछ मानसिक रूप से बीमार लोगों ने बनाया है। इन कानून को खत्म कर दिया जाना चाहिए। अदालत ने यह टिप्पणी उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले के हापुड़ में चमड़ा उद्योग विकसित करने के नाम पर राज्य सरकार की ओर से किए गए 82 हेक्टेयर भूमि के अधिग्रहण के मामले में फैसला सुरक्षित करते हुए की।

न्यायाधीश जीएस सिंघवी और न्यायाधीश एचएल दत्तू की पीठ ने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि सुधार के लिए जल्द कदम नहीं उठाए गए तो अगले पांच सालों में निजी जमीनों पर बाहुबली लोगों का कब्जा होगा। इसी अराजकता के चलते हर जगह जमीन के दाम भी आसमान छू रहे हैं। अब यह अधिनियम एक धोखा बन चुका है। ऐसा लगता है कि यह उन मानसिक रूप से बीमार लोगों ने तैयार किया है जिनका आम आदमी के कल्याण और हितों से कोई लेना-देना नहीं है।

गुजरात के भूमि अधिग्रहण कानून की तारीफ
पीठ ने हापुड़ के किसानों की ओर से दायर याचिकाओं पर राज्य सरकारों को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि हमारे पास देश भर से बहुत से ऐसे मामले आए हैं जिनमें जमीन का अधिग्रहण अर्जेंसी क्लॉज और सार्वजनिक हित के नाम पर किया गया। बेचारे किसान को उसकी जमीन से हटाया जा रहा है, जबकि वह उसकी रोजी रोटी का एकमात्र जरिया है। सर्वोच्च अदालत ने गुजरात में नरेंद्र मोदी सरकार की भूमि अधिग्रहण नीति की सराहना करते हुए कहा कि सिर्फ एक ही राज्य है जहां से हमें अधिग्रहण मामले में कोई शिकायत नहीं मिली है। अदालत ने कहा कि अहमदाबाद को देखिए, जहां विकास हो रहा है। लेकिन वहां से कोई शिकायत नहीं आ रही है। उनके पास भी वही अधिकारी हैं जो देश के अन्य हिस्सों में हैं। अन्य राज्य के अधिकारियों को गुजरात में इसके लिए प्रशिक्षण लेना चाहिए। पीठ ने एक याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता पल्लभ सिसौदिया से कहा कि प्राधिकरणों की ओर से अर्जेंसी क्लॉज का प्रयोग कर अधिग्रहण किया जाना अनुचित है। यदि किसी के पास जीवकोपार्जन के लिए जमीन ही एकमात्र साधन है तो ऐसे लोगों का यह साधन छीनते वक्त राज्य सरकार को उनकी रोजी रोटी की वैकल्पिक व्यवस्था भी करनी चाहिए।
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Palash Biswas

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THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS ON NEPALI SENTIMENT, GORKHALAND, KUMAON AND GARHWAL ETC.and BAMCEF UNIFICATION! Published on Mar 19, 2013 The Himalayan Voice Cambridge, Massachusetts United States of America

BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE 7

Published on 10 Mar 2013 ALL INDIA BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE HELD AT Dr.B. R. AMBEDKAR BHAVAN,DADAR,MUMBAI ON 2ND AND 3RD MARCH 2013. Mr.PALASH BISWAS (JOURNALIST -KOLKATA) DELIVERING HER SPEECH. http://www.youtube.com/watch?v=oLL-n6MrcoM http://youtu.be/oLL-n6MrcoM

Imminent Massive earthquake in the Himalayas

Palash Biswas on Citizenship Amendment Act

Mr. PALASH BISWAS DELIVERING SPEECH AT BAMCEF PROGRAM AT NAGPUR ON 17 & 18 SEPTEMBER 2003 Sub:- CITIZENSHIP AMENDMENT ACT 2003 http://youtu.be/zGDfsLzxTXo

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We talked with Palash Biswas, an editor for Indian Express in Kolkata today also. He urged that there must a transnational disaster management mechanism to avert such scale disaster in the Himalayas. http://youtu.be/7IzWUpRECJM

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS CRITICAL OF BAMCEF LEADERSHIP

[Palash Biswas, one of the BAMCEF leaders and editors for Indian Express spoke to us from Kolkata today and criticized BAMCEF leadership in New Delhi, which according to him, is messing up with Nepalese indigenous peoples also. He also flayed MP Jay Narayan Prasad Nishad, who recently offered a Puja in his New Delhi home for Narendra Modi's victory in 2014.]

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS CRITICIZES GOVT FOR WORLD`S BIGGEST BLACK OUT

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS CRITICIZES GOVT FOR WORLD`S BIGGEST BLACK OUT

THE HIMALAYAN TALK: PALSH BISWAS FLAYS SOUTH ASIAN GOVERNM

Palash Biswas, lashed out those 1% people in the government in New Delhi for failure of delivery and creating hosts of problems everywhere in South Asia. http://youtu.be/lD2_V7CB2Is

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS LASHES OUT KATHMANDU INT'L 'MULVASI' CONFERENCE

अहिले भर्खर कोलकता भारतमा हामीले पलाश विश्वाससंग काठमाडौँमा आज भै रहेको अन्तर्राष्ट्रिय मूलवासी सम्मेलनको बारेमा कुराकानी गर्यौ । उहाले भन्नु भयो सो सम्मेलन 'नेपालको आदिवासी जनजातिहरुको आन्दोलनलाई कम्जोर बनाउने षडयन्त्र हो।' http://youtu.be/j8GXlmSBbbk