Welcome

Website counter
website hit counter
website hit counters

Wednesday, July 18, 2012

हमारी दुनिया को कई गांधी चाहिए : मानवता पर फ्रांस में विमर्श

http://hastakshep.com/?p=22357

हमारी दुनिया को कई गांधी चाहिए : मानवता पर फ्रांस में विमर्श

हमारी दुनिया को कई गांधी चाहिए : मानवता पर फ्रांस में विमर्श

By  | July 17, 2012 at 5:38 pm | No comments | दुनिया

-डाॅ. असगर अली इंजीनियर

 

  • तुम भगवान को मंदिरों में क्यों ढू़ढ़ते हो। मुझे तो मई की तपती दुपहरी में सड़क किनारे पत्थर तोड़ते मजदूरों में भगवान दिखते हैं
  • किसी से घृणा करना, उसे नुकसान पहुंचाना, उसे मार डालना बहुत आसान है। कठिन है किसी से प्रेम करना और मानवता की रक्षा के लिए दृढ़ता से खड़े रहना

हर साल गर्मियों में, फ्रांस और अन्य (अधिकांशतः फ्रेंच भाषा-भाषी) देशों के लेखकों, कवियों, बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का एक अनौपचारिक सम्मिलन, फ्रांस के लियोन शहर में होता है। इस बैठक में मानवता के समक्ष उपस्थित विभिन्न मुद्दों पर शुक्रवार से रविवार तक तीन दिन का गहन संवाद होता है। इस संवाद का आयोजन जुलाई के पहले सप्ताह में किया जाता है। मुझे पिछले दो वर्षों से लगातार इस कार्यक्रम में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया जाता रहा परन्तु अपनी अन्य व्यस्तताओं के चलते मैं वहां नहीं जा सका। इस साल मुझे लियोन आने का निमंत्रण काफी पहले से दे दिया गया था और मैंने यह तय किया कि इस बार मैं वहां जरूर जाऊंगा।
फ्रांस और दुनिया के फ्रेंच-भाषी हिस्सों के प्रमुख बुद्धिजीवियों, लेखकों और कवियों से मिलना और बातचीत करना सचमुच एक शानदार बौद्धिक अनुभव था। वहां उत्तरी अफ्रीका अर्थात अल्जीरिया, ट्यूनीशिया, मोरक्को, माली, मिस्त्र व कई अन्य देशों के प्रतिनिधि मौजूद थे। इन देशों के जो नागरिक फ्रांस में रह रहे हैं, वे भी वहां थे। अधिकांश प्रतिभागी फ्रांस और फ्रंेच-भाषी विश्व के जानेमाने व्यक्तित्व थे। कुछ प्रतिभागी ब्राजील से भी आए थे। मानवता के भविष्य के प्रति पूरी गंभीरता से चिंतित इन लोगों से विचार-विनिमय सचमुच एक बहुत अच्छा अनुभव था।
लियोन एक मझोले आकार का शहर है। शहर के बीच से दो नदियां बहती हैं और इस कारण यह शहर लगभग एक टापू है। लियोन का इतिहास रोमन काल तक जाता है और आज भी वहां रोमन युग के अवशेष मौजूद हंै। शहर के ठीक बीच, 700 एकड़ में फैला एक बहुत बड़ा पार्क है। जिस होटल में मैं और कुछ अन्य प्रतिभागी ठहरे थे, उससे यह पार्क कुछ ही मिनटों के फासले पर था। लियोन की सुंदरता देखने लायक थी। सम्मिलन पूरी तरह अनौपचारिक था और इसका आयोजन इस पार्क मंे ही, विशालकाय पुराने पेड़ों की छाया तले किया गया था। इसे देखकर मुझे टैगोर के शांतिनिकेतन की याद आ गई। दिलचस्प बात यह है कि वहां टैगोर, पाब्लो नेरूदा व उनके यूनिवर्सलिज्म भी चर्चा का विषय थे। एक सत्र में टैगोर और नेरूदा दोनों पर एक साथ चर्चा हुई।
प्रतिभागियों में से केवल मैं फ्रेंच नही जानता था। अन्य सभी धाराप्रवाह फ्रेंच बोल रहे थे परन्तु इससे कोई समस्या नहीं हुई। मेरी बातों का अनुवाद करने के लिए कई लोग तैयार थे। मैं 5 जुलाई की सुबह जब लियोन पहुँचा तो हवाई अड्डे पर मुझे लेने के लिए सिमोन कुनेगेल नामक महिला आईं हुईं थीं। मुझे लगा कि वे मात्र स्वयंसेवक हैं और मुझे होटल तक छोड़कर चली जावेंगीं।
परन्तु मैं गलत था और मुझे इस बात की प्रसन्नता है कि सुश्री सिमोन के बारे में मेरा अंदाजा गलत निकला। वे धाराप्रवाह अंगे्रजी बोलती थीं और मुंबई स्थित फ्रेंच राजनयिक मिशन मेें कई वर्षों तक पदस्थ रही थीं। वे कोलाबा में रहती थीं। भारत में अपनी पदस्थापना के दौरान उन्होंने कई भारतीय व्यंजन बनाना सीख लिया था। उन्होंने जोर देकर कहा कि मैं उनके घर आऊं ताकि वे मुझे भारतीय व्यंजन बनाकर खिला सकें। उनका कहना था कि इससे मुझे ऐसा लगेगा मानो मैं अपने घर पर ही हूं। मेरी यात्रा के पहले ही दिन उन्हांेने मुझे पूरे लियोन शहर में घुमाया। शहर के पुराने हिस्से को देखकर मैं चकित रह गया। उसमें रोमन काल की खुशबू अब भी बाकी थी।
जब मैं सुश्री सिमोन के घर पहुँचा तब मेरे आश्चर्य का ठिकाना न रहा। वहां दो अन्य मेहमान भी थे। एक थे मिस्त्र मूल के मोहम्मद, जो संगीतविज्ञानी हैं और अपने साथ ढेर सारी बांसुरियाँ लाये थे। उन्होंने बांसुरी बजाई भी और इससे मुझे न केवल अपने देश भारत वरन् मौलाना रूमी की "मथनवी रूमी" की भी याद आई। मथनवी का अर्थ होता है महाकाव्य। मौलाना रूमी की मथनवी, जो कि फारसी की कुरान कही जाती है, की शुरूआत में ही बांसुरी का जिक्र है। मौलाना रूमी कहते हैं कि बांसुरी के दिल में घाव (छेद) हैं और इनसे अपने ईश्वर से जुदा होने का उसका करूण क्रंदन निकलता है। मैने मोहम्मद को भगवान कृष्ण और उनकी बांसुरी के बारे में बताया और यह भी कि भगवान कृष्ण हमारे सूफी संतों के अत्यंत प्रिय थे। मोहम्मद की पत्नी जे़नब, जो कि जर्मन हैं, भी वहां थीं। वे भी अपने पति की तरह संगीतविज्ञानी हंै। मोहम्मद का बांसुरी वादन सचमुच मन को प्रसन्नता से भर देने वाला था। हमने उस दिन सुबह और शाम का खाना साथ ही खाया क्योंकि सिमोन का आग्रह था कि हम रात का भोजन भी उनके साथ लें। उन्होंने खाने में दाल पकाई थी जिसका स्वाद लगभग वैसा ही था जैसा हमारे देश में होता है। यद्यपि मैं सिमोन और उनके पति से पहली बार मिला था परन्तु जब मैंने उनसे विदा ली तो मुझे लगा कि मैं अपने बरसांे पुराने दोस्तों से बिछुड़ रहा हूँ। यह मेरे लिये सम्मिलन की बहुत सुंदर शुरूआत थी।
दोपहर के भोजन के बाद वे मुझे फिर शहर में घुमाने ले गईं और मैने लियोन के कुछ अन्य हिस्से देखे। मेरे पास शहर देखने के लिए सिर्फ वही एक दिन था क्योंकि अगले तीन दिनों तक तो मैं संवाद में व्यस्त रहने वाला था। स्पष्टतः, एक दिन में हम लोगों के लिए सब कुछ देखना संभव नहीं था। हम लोग उस पहाड़ को भी नहीं देख पाये, जिस पर एक जमाने में लियोन के मजदूर रहते थे और वहीं से उन्होंने अन्याय के विरूद्ध अपना संघर्ष किया था। ऐसा कहा जाता है कि कार्ल माक्र्स ने भी उनसे प्रेरणा ली थी। मैं केवल उतना ही देख सका जितना कि एक दिन में संभव था। मैंने लियोन का सिनेमा पर केन्द्रित संग्रहालय भी देखा, किन्तु केवल बाहर से। ल्यूमियर ब्रदर्स लियोन के हैं और उनके घर को संग्रहालय बना दिया गया है।
संवाद के सत्र 6 जुलाई की सुबह से शुरू हुए। ये संवाद काफी अनौपचारिक थे। किसी विषय विशेष में रूचि रखने वाले लोग पेड़ों की शाखाओं या जमीन पर समूह बनाकर बैठ जाते और चर्चा शुरू कर देते। सभी संवाद केन्द्रित थे मानवता और आधुनिक दुनिया मंे उसे पेश आ रही समस्याओं पर। मैं जिस समूह के साथ बैठा, उसमें हालिया रिओ सम्मेलन, अन्यायपूर्ण वैश्विक आर्थिक व्यवस्था और अरब देशों में हुई क्रांति पर चर्चा हो रही थी।
मुझसे अरब क्रांति पर अपने विचार रखने के लिए कहा गया।  मैंने बैंगलोर के फायर फ्लाईज आश्रम के सिद्धार्थ की ओर नजर घुमाई। वे पेरिस में पढे हैं और फ्रेंच भाषा का अच्छा ज्ञान रखते हैं। उन्होंने अपने आश्रम में भी इस तरह के संवादों का आयोजन किया था। मुझे सिद्धार्थ की मदद की जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि मैं वहां चर्चा शुरू होने के कुछ समय बाद पहुँचा था और मुझे यह मालूम नही था कि बातचीत किस विषय पर हो रही है। सिद्धार्थ ने मुझे संक्षेप में पहले हुई चर्चा के बारे में बताया और यह कहा कि मैं अरब देशों में हुई प्रजातांत्रिक क्रांति के बारे मंे अपने विचार सामने रखूं।
मैने कहा कि अरब क्रांति मूलतः राजनैतिक थी न कि सामाजिक और सांस्कृतिक। इस क्रांति का क्या भविष्य होगा, इसका अंदाजा लगा पाना मुश्किल है क्योंकि राजनीति केवल विचारधारा पर आधारित नहीं होती बल्कि कई अन्य कारक भी उसे प्रभावित करते हैं। यह क्रांति विशुद्ध रूप से राजनैतिक थी और उसमे कोई सामाजिक-सांस्कृतिक-धार्मिक मुद्दा शामिल नही था। अभी तो मिस्त्र और ट्यूनीशिया में धार्मिक पार्टियों ने जीत हासिल कर ली है और धर्मनिरपेक्ष दलों को केवल कुछ सीटों पर संतोष करना पड़ा है। परन्तु इससे निराश होने की जरूरत नही है क्योंकि जै़मूल अबिदिन और हुस्नी मुबारक – दोनों  ने धार्मिक ताकतों का दमन किया था। ये दोनांे शासक अमेरिका के पिट्ठू माने जाते थे।
आशा की एक किरण  यह है कि इखवानूल मुसलमीन और अनेहदा-दोनांे ने लोगों से यह वायदा किया है कि धार्मिक मामलों में उनकी नीतियां मध्यमार्गी होंगी और वे देश को धार्मिक कट्टरता की ओर नहीं ले जायेंगे। आश्चर्यजनक रूप से, लीबिया में भी धार्मिक अतिवाद पर कबीलाई और पारिवारिक वफादारियां भारी पड़ीं। अरब देशों में धर्मनिरपेक्षता और आधुनिकता की जड़ें बहुत गहरी नही हैं और इनको वहां जमने में कुछ वक्त लगेगा। इन परिस्थितियों में मध्यमार्गी इस्लाम ही सबसे अच्छा विकल्प मालूम होता है। शहर के एक टीवी चैनल ने भी इसी मुद्दे पर मुझसे बातचीत की और मैंने वहां भी यही बातें कहीं।
दोपहर के सत्र में मुझसे "मानवता और सार्वभौमिक मूल्य" विषय पर बोलने के लिए कहा गया। जैसा कि मैं पहले भी कह चुका हूं इस सम्मिलन में औपचारिक भाषण नहीं हुए वरन् यह एक तरह का गोलमेज विमर्श था जिसमें गोलमेज नहीं थी! इस सत्र का फोकस टैगोर पर था और मुझसे अपेक्षा थी कि मैं टैगोर पर कुछ बोलूं। यद्यपि मुझे केवल उन तक सीमित रहने की जरूरत नहीं थी। निःसंदेह, टैगोर एक महान कवि, लघुकथा लेखक, चित्रकार, संगीतकार और प्रतिभाशाली बुद्धिजीवी थे। उनकी संगीत रचनाओं को रबीन्द्र संगीत कहा जाता है और बांग्लादेश रेडियो से तक रोज इस संगीत का प्रसारण होता है।
टैगोर सार्वभौमिक मूल्यों में विश्वास रखते थे और अपनी रचनाओं के जरिए उन्होंने इन मूल्यों को बढ़ावा दिया। वे धार्मिक संकीर्णता से कोसों दूर थे। उनकी प्रसिद्ध पुस्तक "गीतांजलि" जिस पर उन्हें नोबेल पुरस्कार मिला, में वे पूछते हैं, "तुम भगवान को मंदिरों में क्यों ढू़ढ़ते हो। मुझे तो मई की तपती दुपहरी में सड़क किनारे पत्थर तोड़ते मजदूरों में भगवान दिखते हैं। उनमें समाए ईश्वर को तुम आसानी से देख सकते हो"। यह थी उनकी गरीबों और वंचितों के प्रति सहानुभूति की भावना। यह था उनका मानव श्रम की गरिमा पर विश्वास।
टैगोर ने ही गांधीजी को "महात्मा" का दर्जा दिया था। महात्मा एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ होता है महान आत्मा। टैगोर ने गांधी को महान आत्मा क्यों कहा? उन्होंने पाया कि गांधी उनके आदर्शों को उनसे भी कहीं अधिक प्रतिबिंबित करते हैं। गांधी के अहिंसा और मानव प्रेम के दर्शन ने हमारी दुनिया की कई विभूतियांे को प्रेरणा दी। इनमें शामिल हैं मार्टिन लूथर किंग जूनियर जिन्होंने गांधी की राह पर चलकर अफ्रीकी-अमेरिकियों के अधिकारों की लंबी लड़ाई लड़ी।
गांधीजी ने अपनी पुस्तक "हिन्द स्वराज" में लिखा है, "मैं ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ लड़ता हूं पर मैं अंग्रेजों से घृणा नहीं करता। अपने दुश्मन से बेशक लड़ो परंतु एक मानव के रूप में उससे घृणा मत करो। तुम जब किसी व्यक्ति से लड़ते हो, तब, दरअसल, तुम जो बुराईयां उसमें हैं, उनसे लड़ते हो न कि उसकी मानवता से"। गांधीजी ब्रिटिश श्रमिक वर्ग के परम हितैषी थे। गांधी का दर्शन गहरी आंतरिक आस्था पर आधारित था। ऐसी आस्था के बगैर आपके मुंह से ऐसे शब्द निकल ही नहीं सकते।
आज हममें से शायद ही किसी में अपने विचारों के प्रति इतनी आस्था और दृढ़ता हो। इसके बिना हम दुनिया को नहीं बदल सकते। गांधीजी ने संकुचित धार्मिक सोच और साम्प्रदायिकता के खिलाफ जीवन भर संघर्ष किया और अल्पसंख्यकों, विशेषकर मुसलमानों, को अपना मानने के कारण ही उन्हें अपनी जान गंवानी पड़ी। मुसलमानों के प्रति उनके दृष्टिकोण से नाराज एक हिन्दू कट्टरवादी ने उन्हें गोली मार दी। जिस समय पूरे देश में मुसलमानों के प्रति गहरी घृणा का वातावरण हो, उनके गले काटने की प्रतिस्पर्धा चल रही हो, ऐसे समय उनके अधिकारों के लिए लड़ने का काम गांधी जैसे असाधारण रूप से साहसी और दृढ़ विचार वाले मनुष्य ही कर सकते थे। वे निःसंदेह महान थे।
मैंने नरेन्द्र मोदी के गुजरात की बात भी की जहां गांधी की धरती पर 2000 निर्दोष मुसलमानों को मौत के घाट उतार दिया गया। किसी से घृणा करना, उसे नुकसान पहुंचाना, उसे मार डालना बहुत आसान है। कठिन है किसी से प्रेम करना और मानवता की रक्षा के लिए दृढ़ता से खड़े रहना। वहां मौजूद सभी लोगों को मेरी बातें बहुत मर्मस्पर्शी लगीं। दक्षिण अफ्रीका से आई एक महिला ने कहा कि गांधी निःसंदेह महान थे और उन्हें महात्मा कहने वाले टैगोर भी उतने ही महान थे।
आधुनिक दुनिया में हमें जरूरत है ऐसे लोगों की जो सभी को और विशेषकर अल्पसंख्यकों को खुले दिल से गले लगाएं। आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था हर देश में प्रवासियों की संख्या बढ़ रही है और राजनैतिक दमन भी बढ़ रहा है। इस कारण कई अलग-अलग तरह के अल्पसंख्यक समूह बन गए हैं। हमारी दुनिया को कई गांधी चाहिए।
दूसरे समूहों में अन्य विषयों पर चर्चा हुई जिनमें मुख्यतः समाज के हाशिए पर रहने वाले तबकों से जुड़े मुद्दे शामिल थे जैसे, शिक्षा व्यवस्था, सड़क पर रहने वाले बच्चों की समस्या, मीडिया और आर्थिक असमानताएं।
इस तरह के संवादों के आयोजन की जरूरत दुनिया के हर कोने में है। फ्रांस के एक एनजीओ ने इस सिलसिले में जो पहल की है वैसी ही पहल अन्य स्थानों पर भी की जानी चाहिए। इस एनजीओ के कार्यकर्ता अत्यंत उत्साही और मेहनती थे और उन्होंने बड़े अच्छे ढंग से सारी व्यवस्थाएं संभालीं। सबसे अच्छी बात यह थी कि पूरी चर्चा अनौपचारिक वातावरण में हुई। वहां किसी राजनेता या विशिष्ट व्यक्ति को आमंत्रित नहीं किया गया और न ही कोई उद्घाटन या समापन सत्र हुआ। हर व्यक्ति अपनी बात रखने के लिए स्वतंत्र था। मैं सम्मेलन में महिलाओं की बड़ी संख्या में उपस्थिति से भी बहुत प्रभावित हुआ। उन्होंने गंभीरता और बौद्धिकता से अपने विचार प्रतिभागियों के समक्ष रखे।

(मूल अंग्रेजी से अमरीष हरदेनिया द्वारा अनुदित। लेखक मुंबई स्थित सेंटर फाॅर स्टडी आॅफ सोसायटी एंड सेक्युलरिज्म के संयोजक हैं, जाने-माने इस्लामिक विद्वान हैं अंौर कई दशकों से साम्प्रदायिकता व संकीर्णता के खिलाफ संघर्ष करते रहे हैं। )

डॉ. असगर अली इंजीनियर (लेखक मुंबई स्थित सेंटर फॉर स्टडी ऑफ सोसायटी एंड सेक्युलरिज्म के संयोजक हैं, जाने-माने इस्लामिक विद्वान हैं और कई दशकों से साम्प्रदायिकता व संकीर्णता के खिलाफ संघर्ष करते रहे हैं। बकौल असगर साहब- "I was told by my father who was a priest that it was the basic duty of a Muslim to establish peace on earth. … I soon came to the conclusion that it was not religion but misuse of religion and politicising of religion, which was the main cause of communal violence.")

No comments:

मैं नास्तिक क्यों हूं# Necessity of Atheism#!Genetics Bharat Teertha

হে মোর চিত্ত, Prey for Humanity!

मनुस्मृति नस्ली राजकाज राजनीति में OBC Trump Card और जयभीम कामरेड

Gorkhaland again?আত্মঘাতী বাঙালি আবার বিভাজন বিপর্যয়ের মুখোমুখি!

हिंदुत्व की राजनीति का मुकाबला हिंदुत्व की राजनीति से नहीं किया जा सकता।

In conversation with Palash Biswas

Palash Biswas On Unique Identity No1.mpg

Save the Universities!

RSS might replace Gandhi with Ambedkar on currency notes!

जैसे जर्मनी में सिर्फ हिटलर को बोलने की आजादी थी,आज सिर्फ मंकी बातों की आजादी है।

#BEEFGATEঅন্ধকার বৃত্তান্তঃ হত্যার রাজনীতি

अलविदा पत्रकारिता,अब कोई प्रतिक्रिया नहीं! पलाश विश्वास

ভালোবাসার মুখ,প্রতিবাদের মুখ মন্দাক্রান্তার পাশে আছি,যে মেয়েটি আজও লিখতে পারছেঃ আমাক ধর্ষণ করবে?

Palash Biswas on BAMCEF UNIFICATION!

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS ON NEPALI SENTIMENT, GORKHALAND, KUMAON AND GARHWAL ETC.and BAMCEF UNIFICATION! Published on Mar 19, 2013 The Himalayan Voice Cambridge, Massachusetts United States of America

BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE 7

Published on 10 Mar 2013 ALL INDIA BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE HELD AT Dr.B. R. AMBEDKAR BHAVAN,DADAR,MUMBAI ON 2ND AND 3RD MARCH 2013. Mr.PALASH BISWAS (JOURNALIST -KOLKATA) DELIVERING HER SPEECH. http://www.youtube.com/watch?v=oLL-n6MrcoM http://youtu.be/oLL-n6MrcoM

Imminent Massive earthquake in the Himalayas

Palash Biswas on Citizenship Amendment Act

Mr. PALASH BISWAS DELIVERING SPEECH AT BAMCEF PROGRAM AT NAGPUR ON 17 & 18 SEPTEMBER 2003 Sub:- CITIZENSHIP AMENDMENT ACT 2003 http://youtu.be/zGDfsLzxTXo

Tweet Please

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS BLASTS INDIANS THAT CLAIM BUDDHA WAS BORN IN INDIA

THE HIMALAYAN TALK: INDIAN GOVERNMENT FOOD SECURITY PROGRAM RISKIER

http://youtu.be/NrcmNEjaN8c The government of India has announced food security program ahead of elections in 2014. We discussed the issue with Palash Biswas in Kolkata today. http://youtu.be/NrcmNEjaN8c Ahead of Elections, India's Cabinet Approves Food Security Program ______________________________________________________ By JIM YARDLEY http://india.blogs.nytimes.com/2013/07/04/indias-cabinet-passes-food-security-law/

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS TALKS AGAINST CASTEIST HEGEMONY IN SOUTH ASIA

THE HIMALAYAN VOICE: PALASH BISWAS DISCUSSES RAM MANDIR

Published on 10 Apr 2013 Palash Biswas spoke to us from Kolkota and shared his views on Visho Hindu Parashid's programme from tomorrow ( April 11, 2013) to build Ram Mandir in disputed Ayodhya. http://www.youtube.com/watch?v=77cZuBunAGk

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS LASHES OUT KATHMANDU INT'L 'MULVASI' CONFERENCE

अहिले भर्खर कोलकता भारतमा हामीले पलाश विश्वाससंग काठमाडौँमा आज भै रहेको अन्तर्राष्ट्रिय मूलवासी सम्मेलनको बारेमा कुराकानी गर्यौ । उहाले भन्नु भयो सो सम्मेलन 'नेपालको आदिवासी जनजातिहरुको आन्दोलनलाई कम्जोर बनाउने षडयन्त्र हो।' http://youtu.be/j8GXlmSBbbk

THE HIMALAYAN DISASTER: TRANSNATIONAL DISASTER MANAGEMENT MECHANISM A MUST

We talked with Palash Biswas, an editor for Indian Express in Kolkata today also. He urged that there must a transnational disaster management mechanism to avert such scale disaster in the Himalayas. http://youtu.be/7IzWUpRECJM

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS CRITICAL OF BAMCEF LEADERSHIP

[Palash Biswas, one of the BAMCEF leaders and editors for Indian Express spoke to us from Kolkata today and criticized BAMCEF leadership in New Delhi, which according to him, is messing up with Nepalese indigenous peoples also. He also flayed MP Jay Narayan Prasad Nishad, who recently offered a Puja in his New Delhi home for Narendra Modi's victory in 2014.]

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS CRITICIZES GOVT FOR WORLD`S BIGGEST BLACK OUT

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS CRITICIZES GOVT FOR WORLD`S BIGGEST BLACK OUT

THE HIMALAYAN TALK: PALSH BISWAS FLAYS SOUTH ASIAN GOVERNM

Palash Biswas, lashed out those 1% people in the government in New Delhi for failure of delivery and creating hosts of problems everywhere in South Asia. http://youtu.be/lD2_V7CB2Is

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS LASHES OUT KATHMANDU INT'L 'MULVASI' CONFERENCE

अहिले भर्खर कोलकता भारतमा हामीले पलाश विश्वाससंग काठमाडौँमा आज भै रहेको अन्तर्राष्ट्रिय मूलवासी सम्मेलनको बारेमा कुराकानी गर्यौ । उहाले भन्नु भयो सो सम्मेलन 'नेपालको आदिवासी जनजातिहरुको आन्दोलनलाई कम्जोर बनाउने षडयन्त्र हो।' http://youtu.be/j8GXlmSBbbk