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Saturday, June 9, 2012

पूंजी की निरंकुश सत्ता

पूंजी की निरंकुश सत्ता


Saturday, 09 June 2012 10:36

सत्येंद्र रंजन 
जनसत्ता 9 जून, 2012: प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जब अपनी सरकार की उपलब्धियों के रूप में महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी कानून या प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा कानून की गिनती करते हैं (जैसा कि उन्होंने चार जून को कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में किया), तो यह एक विरोधाभास लगता है। दूरगामी प्रभाव वाले ये सारे विधायी कदम उनकी सरकार ने ही उठाए हैं। लेकिन यह भी सच है कि प्रधानमंत्री और उनके निकट सहयोगी इन कानूनों को लेकर बहुत उत्साहित नहीं रहे हैं। बल्कि इनमें जो कानून बन गए, उनके पर कुतरने की कोशिश से भी यूपीए सरकार कभी बाज नहीं आई। प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा कानून अब भी क्यों लटका हुआ है, इसके पीछे किसकी अनिच्छा है, यह बताने की जरूरत नहीं है।  
दरअसल, मनमोहन सिंह जिस नव-उदारवादी और राजकोषीय रूढ़िवाद (फिस्कल कंजरवेटिज्म) की विचारधारा के भारत में सबसे बडेÞ प्रतीक हैं, उसके नजरिए से ये सारे कदम (संभवत: सूचना अधिकार कानून को छोड़ कर) सबसिडी पर आधारित हैं, जो अर्थव्यवस्था में असंतुलन पैदा करते हैं। इस विचारधारा के नजरिए से मनमोहन सिंह सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि भारतीय अर्थव्यवस्था को ऊंची विकास दर के राजपथ पर ले जाना था। लेकिन यह 'विकास-कथा' अब खतरे में नहीं, तो कम से कम भारी दबाव में जरूर है। 
यह निश्चित रूप से हमारी आज की सार्वजनिक स्थिति पर एक प्रतिकूल टिप्पणी है कि राजनीतिक विचारधारा और आर्थिक दिशा के इस व्यापक परिप्रेक्ष्य में मनमोहन सिंह सरकार को प्रश्नों के कठघरे में खड़ा करने की कोई कोशिश नहीं होती। इसके विपरीत भ्रष्टाचार के निराकार सवालों से उसे घेरने की कोशिश पिछले एक-सवा साल से जोरों पर है। चूंकि उनकी व्यक्तिगत ईमानदारी की छवि अतीत में यूपीए सरकार की एक ढाल रही है, इसलिए अब उनके विरोधियों ने सीधे इस छवि पर हमला बोल दिया है। लेकिन विचारधारा-विहीन माहौल में ईमानदारी को जिस संकुचित रूप में परिभाषित किया जाता है, उसमें मनमोहन सिंह की छवि इन हमलों से बहुत प्रभावित होगी, ऐसा नहीं लगता। 
इसलिए कि उन संकुचित अर्थों में उन्होंने बेईमानी की होगी- यानी उन्होंने अपने या अपने लोगों के लिए पैसा बनाया होगा- यह उनके लंबे करियर के बारे में जानने वाले किसी विवेकशील व्यक्ति के गले उतरना कठिन है। 
जिसे कोयला घोटाले का नाम दिया गया है, वह असल में घोटाला है, यह भी साबित नहीं किया जा सकता। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की अंतरिम रिपोर्ट में सरकारी खजाने को नुकसान का जो जायजा लगाया गया, वह इस पूर्व-अनुमान पर आधारित था कि अगर कोयला खदानों की नीलामी होती, तो कितना पैसा राजकोष में आता। लेकिन भारत में कोयला खदानों की कभी नीलामी नहीं हुई। 1973 में कोयला खदानों के राष्ट्रीयकरण के बाद से इन्हें लौह और इस्पात, बिजली और सीमेंट कंपनियों को आबंटित करने की नीति व्यवहार में रही है। 
यह नीति सही है या गलत- इस पर बहस हो सकती है, लेकिन अगर उस नीति को मनमोहन सिंह सरकार ने जारी रखा, और जब कोयला मंत्रालय मनमोहन सिंह के पास था, तब खदानों का आबंटन हुआ, तो उसके पीछे बेईमानी सिर्फ वे लोग देख सकते हैं, जिनका मकसद भ्रष्टाचार का ऐसा धुंधलका पैदा करना है जिसमें तर्क और विवेक की बातें कहीं खो जाएं।  
बहरहाल, अगर ईमानदारी को सिर्फ गलत ढंग से पैसा बनाने के संकुचित अर्थ में न समझा जाए, तो मनमोहन सिंह की साख पर कई कठिन प्रश्न खडेÞ किए जा सकते हैं। और उनका संबंध सिर्फ उन तरीकों से नहीं है जिनके जरिए उन्होंने 2008 में वाम मोर्चे के समर्थन वापस लेने के बाद अपनी सरकार बचाई थी। दरअसल, इनका कहीं अधिक संबंध लोकतांत्रिक जवाबदेही से है, जिसकी यूपीए सरकार लगातार- खासकर अपने दूसरे कार्यकाल में- अनदेखी करती रही है। इसकी एक मिसाल संसद से बचने की कोशिशों में देखने को मिली है। 
इसकी दूसरी मिसाल मनमोहन सिंह की वह कार्यशैली है जिसमें उन दलों की राय या विचारों की भी कोई कीमत नहीं समझी जाती, जिनके समर्थन के बिना कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार एक दिन भी सत्ता में नहीं रह सकती। अभी कुछ महीने पहले तक मनमोहन सिंह की कार्यशैली कुछ ऐसी थी कि सहयोगी दलों को सत्ता-सुख भोगने दो और नीतियों के मामले में अपनी मर्जी चलाते जाओ। ममता बनर्जी की आक्रामकता ने फिलहाल इस अंदाज पर कुछ रोक लगाई है, लेकिन अगर अभी वैसे कदम नहीं उठाए जा रहे हैं तो यह लोकतांत्रिक परंपरा में किसी आस्था के कारण नहीं है। 
मनमोहन सिंह को जानने वाले लोग बताते हैं कि निजी रूप से वे एक सज्जन और शिष्ट व्यक्तिहैं। इसीलिए जब उन्होंने अमेरिका से असैनिक परमाणु समझौते के मुद्दे पर अडिग रुख अपनाया, तो उससे बहुत-से लोगों को आश्चर्य हुआ। उनके उस रुख ने एक खास सामाजिक दायरे में उनका रुतबा बढ़ाया। आज भी वह दायरा यही चाहता है कि कथित आर्थिक सुधारों के मामले में प्रधानमंत्री वही 2008 वाला रूप धारण करें। प्रधानमंत्री भी यह करना चाहते हैं, लेकिन उनके हाथ कुछ उन गठबंधन सहयोगियों के कारण बंधे हुए हैं, जो सिर्फ केंद्रीय सत्ता का सुख भोग कर संतुष्ट नहीं हैं। 
बहरहाल, यहां सवाल यह है कि सामान्य तौर पर तार्किक और बौद्धिक रूप में पेश आने वाले मनमोहन सिंह में कुछ नीतियों के मामले में अपनी चलाने की जिद क्यों पैदा हो जाती है? अगर हम अपनी इस चर्चा को आज   के अंतरराष्ट्रीय संदर्भ में ले जाएं, तो इसे समझना आसान हो सकता है। यूनान और इटली के हाल के उदाहरण इसमें हमारे लिए काफी मददगार हो सकते हैं। पिछले वर्ष इन दोनों देशों में निर्वाचित सरकारों को हटा कर वहां टेक्नोक्रेट सरकारें बनवाई गर्इं। प्रधानमंत्री कौन बने, यह एथेंस या रोम में नहीं, बल्कि ब्रसेल्स (यूरोपीय संघ के मुख्यालय) में तय हुआ। 

उसे तय करने में उन दोनों देशों की राजनीतिक शक्तियों की कोई भूमिका नहीं थी। बल्कि सबसे प्रमुख भूमिका जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल और फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी की थी। टेक्नोक्रेट प्रधानमंत्रियों ने अपने देश में किफायत की नीतियां लागू करने का यूरोजोन के बैंकरों और वित्तीय संस्थानों का एजेंडा बिना किसी तर्क-वितर्क के स्वीकार कर लिया। उन नीतियों से वित्तीय पूंजी के हितों की रक्षा की तो उम्मीद थी, लेकिन उनकी मार आम मेहनतकश जनता पर पड़ी। 
यूनान के हाल के संसदीय चुनाव में इन्हीं नीतियों के प्रति आम जनता की बगावत का इजहार हुआ, जब धुर वाम और उग्र दक्षिणपंथी पार्टियों ने अप्रत्याशित सफलता पाई। उधर फ्रांस की जनता ने इन नीतियों को पूरे यूरोप पर थोपने पर आमादा सरकोजी को सिर्फ एक कार्यकाल के बाद एलिजे पैलेस (राष्ट्रपति निवास) से बाहर कर दिया। आज नीदरलैंड से लेकर स्पेन और खुद किफायत की नीतियों की सबसे मुखर प्रवक्ता एंजेला मर्केल के देश जर्मनी तक में वित्तीय पूंजी के खिलाफ जन विद्रोह के संकेत साफ देखे जा सकते हैं। 
दरअसल, यूरोप में ब्रसेल्स बनाम राष्ट्रीय राजधानियों में खडे हो रहे अंतर्विरोध ने नव-उदारवाद की पूंजीपरस्त राज्य-व्यवस्था के लिए कड़ी चुनौती पैदा कर दी है। इस संदर्भ में आज अगर देश में एक मजबूत वाम विकल्प होता- या कम से कम सार्वजनिक बहसों में उसकी प्रभावशाली उपस्थिति होती- तो मनमोहन सिंह सरकार जिन नीतियों पर देश को ले गई है और आज भी जिनका पालन करना चाहती है, उनकी उपयोगिता पर न सिर्फ तार्किक प्रश्न खडेÞ किए जाते, बल्कि उनके परिणाम के संदर्भ में यूपीए सरकार की राजनीतिक जवाबदेही भी तय की जाती। 
यह हैरतअंगेज है कि अब भी अर्थव्यवस्था की गिरावट रोकने के लिए जो नुस्खे सुझाए रहे हैं, उनका सारतत्त्व यह है कि तमाम संसदीय प्रक्रियाओं और रुकावटों को दरकिनार कर सरकार नव-उदारवादी सुधारों पर तेजी से अमल करे। इस सिलसिले में मनमोहन सिंह, उनके वित्तमंत्री और कांग्रेस नेतृत्व को इस बात का आभास तक होने का संकेत नहीं मिलता कि उनकी विकास दर की बेसब्री और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के बीच अंतर्विरोध लगातार गहराता जा रहा है। इस परिघटना का संदेश यह है कि अब न सिर्फ भारत, बल्कि पूरी दुनिया में नव-उदारवाद और लोकतंत्र के बीच अंतर्विरोध उस अवस्था में पहुंच गया है, जब दोनों के बीच किसी तरह का सामंजस्य या समन्वय होना निरंतर कठिन होता जाएगा। 
पूंजी की निरंकुश सत्ता और विभिन्न समाजों के उत्तरोत्तर लोकतंत्रीकरण की परिघटनाएं अब परस्पर विरोधी होने की स्थिति में पहुंच गई हैं। यूरोप में यह तस्वीर ज्यादा साफ है, तो इसका कारण यह है कि वहां औपनिवेशिक या नव-औपनिवेशिक शोषण से आने वाली समृद्धि के स्रोत अब सूख गए हैं और उसके बिना कल्याणकारी राज्य को चलाना वहां की नव-उदारवादी पूंजी के लिए मुश्किल हो गया है। इसकी सीधी मार आम मेहनतकश जन-समूहों पर पड़ी है। आम जन में बैंकरों, वित्तीय संस्थानों और उनसे नियंत्रित राजनेताओं के प्रति आक्रोश उबल रहा है। 
भारत में विचारधारा और व्यवस्था के रूप में मुक्त बाजार की नीतियों को ऐसी चुनौती मिलती नहीं दिखती, तो इसके कारण ऐतिहासिक और सामाजिक परिस्थितियों में छिपे हैं। भारत में संवैधानिक व्यवस्था का उदय- जो हमारे लोकतंत्र का आधार है- जातीय समुदायों और धार्मिक संप्रदायों की आपसी सौदेबाजी और आधुनिकता से उनके समस्याग्रस्त अंतरसंबंधों से तय हुआ। इसलिए आज भी आम जन की चर्चाओं में आर्थिक व्यवस्था से जुडेÞ मुद्दे गौण ही रहते हैं, जबकि जातीय या सांप्रदायिक अस्मिता के मुद्दे चुनावों में निर्णायक हो जाते हैं। इन्हीं सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों के कारण अनुकूल आर्थिक हालात के बावजूद देश में माकूल वाम विकल्प का उदय नहीं हो पाया है। 
यूरोप और यहां तक कि अमेरिका में भी नव-उदारवाद और मुक्त बाजार की व्यवस्था पर बुनियादी सवाल खडेÞ किए जा रहे हैं, मगर भारत में यह बात राजनीतिक बहस में हाशिये पर है। नतीजतन न सिर्फ सत्तापक्ष, बल्कि मुख्य विपक्ष भी इस व्यवस्था का पैरोकार बना हुआ है। खुद को सिविल सोसायटी कहने वाले संगठन भी इस बुनियादी बहस में गए बिना समाज में प्रतिष्ठा पाने में सफल हो गए हैं। चूंकि इस व्यवस्था में इन सबके हित हैं, इसलिए उन्होंने राजनीति में प्रासंगिकता बनाने के लिए भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे पर विवेकहीनता की हद तक शोर मचा रखा है। 
यह स्पष्ट देखा जा सकता है कि यह सारी बहस और यह सारा राजनीतिक संघर्ष समाज के कुछ खास तबकों को लुभाने वाले एक मुद्दे तक सीमित है। वह तबका संख्या में भले छोटा हो, लेकिन उसका प्रभाव निर्विवाद है। चूंकि उस तबके का हित भी इसी में है कि राजनीतिक बहस पूंजी की लोकतंत्र-विरोधी निरंकुशता पर केंद्रित न हो जाए, इसलिए उससे जीवन-स्रोत पाने वाले दल और संगठन बहस को उस बिंदु पर नहीं ले जाएंगे।
इसीलिए मुख्यधारा मीडिया से लेकर संसद तक में भ्रष्टाचार का मुद्दा छाया हुआ है। इस क्रम में मनमोहन सिंह की छवि धूमिल   करने की कोशिशें एक नया उपक्रम हैं, जो अगर सफल हो जाएं तो उसका सर्वाधिक लाभ मुख्य विपक्षी दल यानी भारतीय जनता पार्टी को मिलेगा। लेकिन उससे उस नीतिगत निरंकुशता से देश को मुक्ति नहीं मिलेगी, जिसके पीछे असल में नव-उदारवादी पूंजीवाद की ताकत है। बहरहाल, देश में लोकतंत्र को अगर सुरक्षित होना है, तो इस निरंकुशता पर लगाम लगानी ही होगी। लेकिन दुर्भाग्य से अभी इसके लिए कोई मजबूत राजनीतिक विकल्प उपलब्ध नहीं है।

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