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Wednesday, May 9, 2012

संदेश महत्‍वपूर्ण है, संदेशवाहक नहीं! #SatyamevJayate

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संदेश महत्‍वपूर्ण है, संदेशवाहक नहीं! #SatyamevJayate

9 MAY 2012 2 COMMENTS

♦ डॉ अनुराग आर्य

कुछ लोग भ्रूण हत्या विरोध या किसी तरह के भी सामाजिक सरोकारों पर बात करना सिर्फ अपनी "इंटेलेक्‍चुअल प्रोपर्टी" मानते हैं। वे सिरे से खारिज कर देते हैं, अगर एक फिल्मी स्टार, वो भी मेनस्ट्रीम सिनेमा का स्टार अगर ऐसे सरोकारी प्रोग्राम लेकर आता है। वे चाहते हैं, "अमर्त्‍य सेन" जैसा कोई गंभीर आदमी वहां बात करे। उनका "इगो" हर्ट होता है कि अब एक स्टार हमें बतलाएगा कैसे हमें भ्रूण हत्या को रोकना है। उनका मानना है कि बरसों पुरानी ये दिक्कत जब इतने सालों से खत्म नहीं हुई, तो एक स्टार पॉवर से खत्म हो जाएगी? दिक्कत ये है कि इस देश में बुद्धिमानों की एक बड़ी भीड़ इकठ्ठी हो गयी है और "सबको स्वीकार्य" हो ऐसा शख्स अगले कई दशकों तक मिलने वाला नहीं है। मैं बुद्धिमानों से सिर्फ ये अपील करता हूं कि आपको तो इन समस्याओं के बारे में मालूम है ही, तो ये शो आपके लिए नहीं है, ये इस देश की आम जनता के लिए है। महत्वपूर्ण क्या है? संदेश या संदेश वाहक? कंटेंट या प्रोग्राम की एंकरिंग करने वाला? कुछ लोग कहते हैं, आमिर इस शो के इतने पैसे ले रहे है? आप बताइए "प्यासा" से गुरुदत्त ने पैसे नहीं कमाये थे? अगर कमाये थे तो क्या प्यासा बुरी फिल्‍म हो गयी? तीसरी कसम अगर सुपर हिट हो जाती तो बुरी हो जाती? एक बात बताइए, कोई पत्रकार लेखक संपादक पैसे नहीं लेता क्या? तेहलका क्या स्टिंग ऑपरेशन बेचता नहीं चैनल को? सात साल पहले उन दोनों पत्रकारों ने स्टिंग किया था, क्या हुआ उसका?

लोकसभा चैनल पर समीना एक प्रोग्राम करती है, बहुत गंभीर। अच्छी प्रस्तुति है। कई विषय उठाये जाते है। कई प्रोग्राम मैंने देखे हैं। अजीब बात है कि फेसबुक या ब्‍लॉगों पर इतनी बहसें कभी उन पर नहीं हुईं? ये भी अजीब इत्तफाक है कि जिस वक्त ये प्रोग्राम टीवी पर लाइव हो रहा था, सोनी के क्राइम पेट्रोल पर इसी विषय पर एक केस की रिपोर्टिंग आ रही थी। आज सुबह ही बीबीसी के एक ब्लॉग पर ऐसी ही नकारात्मक टोन देख कर दुःख हुआ। मृणाल पांडे जी ने राजस्थान के दूरदराज ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी बातों पर गहरी पड़ताल करके ओ अबीरी किताब में कई चीजों का जिक्र किया है।

आइए अब कुछ जमीनी बातों पर बात की जाए। देखा जाए तो आमिर ने कुछ भी ऐसा नहीं कहा है, जो हमारे मेडिकल पेशे के लिए नया है। मेरे शहर में प्रैक्टिस करने वाले मेरे कई पीडियाट्रिशियन दोस्तों ने अपने कई अनुभव आपसी बातचीत में बांटे हैं। पैदा होने के तुरंत बाद यदि किसी नवजात शिशु को किसी मेडिकल चिकित्सा की आवश्यकता होती है और उसमें कई दिनों तक हॉस्पिटल में एडमिशन रखने की जरूरत भी होती है। जाहिर है थोड़ा खर्चा भी होता है। ऐसे में एक वर्ग विशेष के लोग उस वक्त इंटरेस्ट कम दिखाते हैं, जब नवजात शिशु "लड़की" हो। यदि किसी ने सामाजिक दबाव या दूसरे कारणों से एक दो दिन एडमिट भी कर लिया, तो वे जल्दी डिस्चार्ज करने की जिद करते हैं या ले जाते हैं। इन्‍हीं लोगो का बिहेवियर इसके ठीक विपरीत होता है, जब शिशु" लड़का" होता है। बिहार में WHO के तहत ऐसे कई कार्यक्रमों को संचालित करने वाले मेरे दोस्त जो एक काफी बड़ी पोस्ट पर हैं, का मानना इन बुद्धिजीवियों के ठीक विपरीत है। वे कहते हैं, जब ऐसे स्टार इस तरह के कार्यक्रम से जुड़ते हैं, तो चीजों की "रीच" बढ़ जाती है। लोग इसके बारे में ज्यादा बात करते हैं। और ऐसी बातों को बार बार, कई कई बार कहना चाहिए ताकि उनके खिलाफ एक माहौल पैदा हो सके। वे कहते हैं कि इस माध्यम की बहुत बड़ी ताकत है। जो चीजें आंगनवाड़ी वर्कर या एनजीओ प्रभावकारी ढंग से नहीं समझा पाती वो काम ये माध्यम पूरे परिवार के लिए आराम से एक मिनट में कर देता है। वास्तव में इस देश में इस माध्यम का "इस्तेमाल" ही नहीं हो रहा है। यानी लोगों के लिए आसान करके बतलाना पड़ता है। मैंने खुद सूरत की सेक्स वर्कर के बीच काम किया है। लोगों के बीच ट्रस्ट बिल्डिंग प्रोसेस में सालों लग जाते हैं।

मेरे एक पढ़े लिखे दोस्त कहते हैं, इन सबसे कुछ नहीं बदलने वाला? मैंने कहा अगर वाकई इस यथार्थ में इतना यकीन रखते हो तो छोड़ दो कविताएं लिखना, किताबें पढ़ना? आखिर तुम भी क्रांतियों वाली कविताएं लिखते हो? मैं कहता हूं नहीं बदले कुछ, नहीं होती क्रांति इस प्रोग्राम से, पर एक दो या चार आदमी की सोच भी बदले तो बुरा क्या है? अगर इस प्रोग्राम से चैनलों में सरोकारी प्रोग्राम की भी होड़ लगे तो भी बुरा क्या है? बचपन के दूरदर्शन की कई कविताएं "एक चिड़िया अनेक चिड़िया", "पढ़ना लिखना सीखो ओ मेहनत करने वालो" इतने साल बाद भी हमें याद है। हो सकता है आपको इसके लिखने वाले का नाम याद न हो। वो जरूरी भी नहीं। संदेश महत्वपूर्ण है। क्यूंकि वो बार-बार हमारे बचपन में दोहरायी गयी। यही है इस माध्यम का असर। हमारे स्कूल के टीचर कहा करते थे, "अच्छी चीज जहां से सीखने को मिले, सीख लेते हैं"!

(डॉ अनुराग आर्य। पेशे से डरमेटोलोजिस्ट। मशहूर ब्‍लॉगर, ब्‍लॉग दिल की बात। सिनेमा पर पैनी नजर रखते हैं। काव्‍यमय गद्य लिखते हैं। उनसे aryaa0@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)


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