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Thursday, May 10, 2012

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/22/2008 10:00:00 PM

और उसकी रक्षा के नाम पर हम यहाँ मर रहे हैं

कुर्स्क के कैप्टन की चिट्ठी 

याद हैआठ साल पहले कुर्स्क का डूबनारूस की यह पनडुब्बी 12 अगस्त2000 को डूब गयी थी,जिसमें 100 से ज्यादा लोग डूब गए। इस पनडुब्बी के कैप्टन की जेब से एक चिट्ठी मिली थीजोउसने अपनी पत्नी को लिखी थी। सिर्फ़ एक पति की अपनी पत्नी को लिखी गयी चिट्ठी भर नहीं है, इसमें कई समकालीन सवालों के संकेत भी मिलते हैं। कुर्स्क के कैप्टन द्वारा अपने जीवन के अंतिमक्षणों में लिखी गयी यह चिट्ठी  सिर्फ़ सोवियत संघ के विघटनउसके समाजवादी साम्राज्यवाद मेंबदल जाने की प्रक्रियाइसके लिए जिम्मेदार लोगों के चेहरों को एक बार फिर हमारे सामने साफ करानेकी कोशिश और सबसे बड़ी बात कि समाजवाद और मानव सभ्यता को स्तालिन के योगदानों को फिरसे याद दिलाती है। यह  सिर्फ़ यह याद दिलाती है कि सोवियत संघ के विघटन के लिएगोर्बाचेव-येल्तसिन ही जिम्मेदार नहीं थेबल्कि यह भी कि इसकी प्रक्रिया ख्रुश्चेव ने शुरू की और यहसब इसलिए हुआ कि सोवियत पार्टी मार्क्सवादलेनिनवाद के रास्तों से हट गयी और उसने स्तालिनद्वारा शुरू की गयी योजनाओं को तिलांजलि दे दी थी। हम इन सारी बातों के सूत्र इस चिट्ठी में पाते हैं,जिसे उस आदमी ने लिखा था, जिससे मौत कुछ पल दूर ही खड़ी थी। यह चिट्ठी उस वक्तगहरे पानीमेंमौत से साए में लिखी जा रही थीजब ख्रुश्चेव के संशोधान्वाद और स्तालिन को लेकर पूरी दुनियाकी कम्युनिस्ट पार्टियों में बहसें चल रही थीं। स्तालिन को तानाशाह कहा जा रहा था और ऐसे में रूसकी एक डूब चुकी पनडुब्बी में बैठा उसका कैप्टन रूस में समाजवाद के 'पतनकी ख्रुश्चेवी तिक्रम कोपहचानने की कोशिश कर रहा था और ख़ुद को स्तालिन के पक्ष में खडा पा रहा था
आइये
हम भी इसे एक बार फिर पढ़ें.

ओल्गा ! मेरी ओल्गा
सागर की तलहटी के घुप्प अंधेरे में बैठा 
मैं लिख रहा हूं ये शब्द
जिन्हें हृदय दुहरा रहा है बार-बार.
याद है ओल्गा, मेरी वह इकलौती कविता
जो मैंने तुम्हे दी थी
इस बार तुमसे जुदा होते समय?
और जब मरने का समय आता है
(हालांकि मैं दूर हटाता रहता हूं ऐसे ख्यालों को)
मैं वक्त चाहता हूं फुसफुसाने को एक बातः
मेरी जान, मैं तुम्हें प्यार करता हूं
...और आज मौत ने 
मुझे इतना समय दे दिया है कृपापूर्वक
कि कह सकूं हजारों बारः
'मेरी जान, मैं तुम्हें बेइंतहा प्यार करता हूं.'

ओल्गा, इस समय जरूर तुम कुछ बेचैनी 
महसूस कर रही होगी.
मेरे हृदय के तरंग संकेत 
पहुंच रहे होंगे तुम्हारे हृदय तक 
और तुम्हारे कानों में गूंज रही होगी
मेरी फुसफुसाहट 
और तुम सोच रही होओगी कि
दिन इतना उदास और बेचैनी भरा क्यों है.

ओल्गा! मेरी प्रियतमा!
समय बहुत कम है मेरे पास,
शायद कुछ घंटे भरमात्र,
और अभी मुमकिन नही कि मैं
तुम्हारी यादों के साथ अकेला रह सकूं
अभी मुझे निभाने हैं
मौत से पहले 
'कुर्स्क' के कैप्टन के सारे दायित्व.
इस समय हमारा जहाज
शायद जा बैठा है
वेरेंटस सागर की गाद भरी तलहटी में
अब भी रह-रह कर आ रही है
विस्फोट की आवाजें
पर ये उस पहले विस्फोट से काफी हल्की हैं
जिसने दुनिया की सबसे उन्नत आणविक 
पनडुब्बियों में,
गिने जानेवाले कुर्स्क को
मृत्यु का रास्ता दिखाया.
हमारे कुल एक सौ अठारह लोगों में से कुछ,

शायद दो दर्जन, तो तभी मारे जा चुके थे 
जब अगले हिस्से में विस्फोट हुआ.
पहले हिस्से के आपातकालीन द्वार से
बच निकलने की कोशिशें बेकार होने के बाद
हमारे बचे हुए लोग 
(नब्बे के करीब संख्या है उनकी)
अब नौवें सेक्शन में इकट्ठे बैठे हैं
घुप्प अंधेरे में.
वहां कोई शोर नहीं है,
कुछ जलती सिगरेटों की सुलगती-चुभती रोशनी,
और बीच-बीच में जल उठते लाइटरों की कौंध में
बस मौत की सरसराहट है,
बीच-बीच में कुछ आवाजें,
कुछ लंबी सांसें, कुछ सिसकियां...
लो देखो, कोई पागल गाने लगा है वहां
और अब सभी सुर मिला रहे हैं
और फिर सन्नाटा...
कोई चीख उठा है अचानक,
'हम क्यों मर रहे हैं यहां?'
हमारे लोग
पनडुब्बी के सख्त नियमों के खिलाफ
एक सेक्शन में इकट्ठे बैठे हैं.
अब वे सब भाई हैं, एक-दूसरे के
मौत के साथी.
सिर्फ मैं हूं अब भी
कैप्टन का दायित्व निभाता हुआ.
अपनी कलाई घड़ी की मद्धिम रोशनी में 
तैयार कर रहा हूं आखिरी रिपोर्ट
और थोड़ा-सा समय चुरा कर 
तुम्हें यह पत्र लिख रहा हूं.
ऐसा लग रहा है कि मैं तुम्हें
आखिरी बार याद नहीं कर रहा हूं
पहली बार प्यार कर रहा हूं.
प्यारी ओल्गा,
मुझे डर है कि यह पत्र 
कभी बरामद भी हो सही-सलामत
मेरी सड़ी-गली लाश या कंकाल की 
चिथड़ी वरदी की जेब से 
तो 'राजनीतिक रूप से संवेदनशील' होने के नाते
शायद तुम तक न पहुंचे
फिर भी यह बात तुमसे कहे बिना 
नहीं रह पा रहा हूं कि मेरा दिल भी
चीख-चीख कर पूछ रहा है इस समयः
'हम क्यों मर रहे हैं यहां
अपनी मातृभूमि से दूर 
क्यों जिंदा दफन हो रहे हैं
एक अनजान सागर की तलहटी में?
सुदूर महासागरों में
क्या हम मातृभूमि की रक्षा के लिए 
गश्त लगाते हैं?
क्या चेचेन्या में 
अपने ही लोगों का कत्लेआम किया गया है
देश की रक्षा के लिए?
कल तक समाजवाद के नाम पर
हमारी फौजें कवायद करती रहीं
चेकोस्लोवाकिया से अफ़्रीकी महाद्वीप और
अफगानिस्तान तक 
और हमारे जहाजी बेड़े
धरती का ओर-छोर नापते रहे.
आज हम क्यों बेच रहे हैं हथियार?
हम क्यों झुक रहे हैं पश्चिम के सामने?
मास्को की सड़कों पर इतना अंधेरा,
इतनी ठंड, इतना सन्नाटा क्यों है
वहां गर्म गोश्त का जो सौदा हो रहा है
विदेशी सैलानियों के हाथों
वह क्या देश का बिकना नहीं है?
सोचो तो, कितनी अजीब बात है.
देश बिक रहा है देश के भीतर
और उसकी रक्षा के नाम पर 
हम यहां मर रहे हैं
बिना किसी युद्ध के, 
बेरेंटस सागर की तलहटी में
सोचता हूं ओल्गा,
हमारा यह भारी-भरकम 'कुर्स्क'
कुछ उसी तरह डूबा
जैसे टूटा था 1990 में सोवियत संघ का ढांचा. 
जिसे प्यार करना सिखाया गया था
हमें बचपन से,
उसे नहीं, अब हमें
सिर्फ रूस से प्यार करना था.
'कुर्स्क' भी बाहरी शक्तिमता के बावजूद
अंदर-अंदर जर्जर हो रहा था
सोवियत संघ की ही तरह.
आज सोचता हूं कि क्यों मेरे पिता
अपनी मेज पर हमेशा
स्तालिन की तसवीर रखते थे
और उस दिन मास्को के जन प्रदर्शन में शामिल
कुछ रिटायर्ड फौजी बूढ़े क्यों कह रहे थे कि
समाजवाद को गोर्बाचेव-येल्तसिन ने नहीं
बल्कि ख्रुश्चेव ने ही तबाह कर डाला था
पैंतालीस वर्षों पहले
क्यों कहा करते थे पिता कि
इस समाजवाद का बेड़ा गर्क होकर रहेगा
एक दिन! -आज मैं सोच रहा हूं
सुना है, मौत से पहले अचानक 
चीजें काफी साफ दिखने लगती हैं.

ओल्गा, मेरी जान 
मैंने तुम्हें क्या दिया
इतने दिनों के साथ में
फिर सोचता हूं कितना कुछ दिया
हमने एक दूसरे को...
क्या ये स्मृतियां कभी निःशेष हो सकेंगी
तुम्हारे लिए?
मुझे तो आज भी याद है
पहले चुंबन के बाद तुम्हारे 
गरम, अधखुले, अकबकाये होंठ
वह पहली बार मेरी अंगुलियों के नीचे
थरथराती तुम्हारी नग्नता,
तुम्हारी शरारतें, तुम्हारी जिद,
तुम्हारी संजीदगी, तुम्हारे तमाम स्कार्फ और कोट,
तुम्हारे कैक्टस, नृत्य में थिरकते तुम्हारे पैर
और याद है पिछली गरमियों में
सागर तट पर तुम्हारा
दूर तक भागते चले जाना निर्वस्त्र,
एक मासूम पवित्र बच्ची की तरह...
सब कुछ ओल्गा, सब कुछ
और यह भी याद आता है मुझे
दिल पर चलते तीखे नश्तर की तरह
कि हम सोच रहे थे अभी पिछली ही बार
अपने होनेवाले बच्चे के बारे में
कि उसे अब होना ही चाहिए.
सोचो तो,
हमारा साथ कितना छोटा रहा
पर कितना छक कर जीते थे हम 
अपनी छुट्टियों को.
हमने बेहद कठिन दिनों में 
प्यार किया एक-दूसरे को इस तरह 
और हर सच्चे प्रेमी की तरह 
महसूस किया कि हम ही दुनिया में सबसे अधिक 
प्यार करते हैं एक-दूसरे को.
यहां जब मैं
अट्ठारह-उन्नीस साल के युवा नौसैनिकों को
देखता रहा हूं
तो पितृभाव-सा महसूस करता रहा हूं
और फिर सोचता रहा हूं कि हमारी जवानी 
अब दूसरे सिरे की ओर ढल रही है.
मुझे हंसी आती रही है
और आश्चर्य होता रहा है ओल्गा 
कि ऐसा भला कैसे हो सकता है
और ख्याल आता रहा है
कि अभी तक तुम्हें बहुत प्यार करना है,
बहुत-सी बातें करनी है तुमसे,
तुम्हे छूना है अभी बार-बार 
निहारना है घंटों-घंटों.
मैं सोचता था ओल्गा कि
समय दबे पांव आकर हमारा उम्र हड़प रहा है
पर सोचा भी न था कि इस तरह 
मौत आकर लील जायेगी हमारा समय.
फिर अचानक ख्याल आता है
अपने इन नौसैनिकों का, 
जिनमें ज्यादातर अभी नौजवानी की दहलीज पर
कदम ही रख रहे हैं.
इनके दिलों में प्यार की बेचैन तड़प भरी
चाहत तो होगी 
पर शायद इनमें से ज्यादातर अभागे
वंचित होंगे अभी तक 
किन्हीं होठों की गरमाहट से और 
प्यार भरी बेतुकी अंतहीन बातों से
अछूते होंगे इनके कान. 
फिलहाल मुझे ये बच्चों जैसे लग रहे हैं
और मैं सोचता हूं इनकी मांओं के बारे में
बड़ी बेचैनी के साथ.
बहरहाल, अब बीत चुका है,
हमारा समय
और मैं पूरा कर रहा हूं अपनी आखिरी चाहत
और फुसाफुसा रहा हूं: मैं तुम्हें
प्यार करता हूं मेरी जान!
मेरी ओल्गा,
तुम सुन रही हो न.

(अंतरराष्टीय राहत दल के सदस्यों को 'कुर्स्क' के कैप्टन के शव की चिथड़ी वरदी की जेब से आखिरी रिपोर्ट के साथ ही पत्नी ओल्गा के नाम एक पत्रा भी मिला. बाद में पत्नी ओल्गा ने पत्रकारों को यह जारी किया.)
यह कविता हिन्दी में हंस में छपी थी और संभवतः इसका अनुवाद कात्यायनी ने किया है।

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