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Friday, May 11, 2012

“सआदत भाई, “लाल कमरा” और फ्रॉड मंटो”

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"सआदत भाई, "लाल कमरा" और फ्रॉड मंटो"

By  | May 11, 2012 at 8:15 pm | No comments | शब्द | Tags: 

सारंग उपाध्‍याय
वह साल 2006 की सर्दियों के महीने की एक शाम थी. प्रभात किरण के पत्रकार दीपक असीम अपनी "डॉन" को ठंडी सर्दीली हवाओं जितना ही धीमा किए हुए थे और उनके मुंह से निकलती मंटो की जिंदगी हमारे दिलों को गर्म किए हुए थी. हम इंदौर की मध्‍यभारत हिन्‍दी साहित्‍य एकादमी के हॉल से एक कार्यक्रम निबटाकर आ रहे थे. दीपक भाई ने "बाइक" ओल्‍ड पलासिया में एक पान के ठिये पर टिका दी थी और सआदत भाई की चंद बातें गहराई से साझा की, फिर एक सिगरेट सुलगाते हुए "मंटो" के कई अफसाने सुना डाले थे.

कुछ दिन बाद किराए के कमरे में मंटो के साथ ही सर्दियों की दोपहर कटी. चंद अफसानों को पढने के बाद दीपक भाई से चर्चा करने की इच्‍छा नहीं हुई. कहता भी क्‍या? यही कि कम्‍बख्‍त, दीपक भाईजान, मंटो ने फ्रायड को बहुत पढा होगा, इसलिए फ्रॉड हो गया. महज रोमांच पैदा किए जा रहा है. बडी उत्‍तेजक गोली पकडाई है, इसलिए लोग पढते हैं, मजे लेते हैं इनके. हर एक अफसाने में 2400 वॉल्‍ट का करंट है, इसलिए मंटो में करंट है, अरे झटका लगेगा तो याद भी रहेगा, जिक्र तो होगा ही.

खोल दो कहानी ने पूरा दिमाग ही खोल दिया था और ठंडा गोश्‍त ने शरीर को ठंडा कर दिया था. दिमाग में सकीना को आज भी सिराजुद्दीन ढूंढ रहा है, तो ईशरसिंह अब भी कुलवंत कौर के सामने ठंडा ही पडा हुआ है.

एक दिन पता लगा कि तुम क्‍या बक-बक कर रहे हो, अरे तुम क्‍या उसे फ्रॉड कहोगे, "मंटो खुदको फ्रॉड कहता है" बोलता है "वो कहानी नहीं, कहानी उसे सोचती है." पता लगा कि मंटो अपने बारे में जो-जो डंके की चोट पर कहता है किसी के बाप में ताकत नहीं कि बोल दे. वो बताता है कि सआदत भाई के अंदर रहने वाला मंटो ही उससे सबकुछ करवाता है. सआदत भाई तो बेहद नेक, शरीफ और ईमानदार आदमी रहे, लेकिन मंटो से बच नहीं पाए, जो कम्‍बख्‍त अफसाने लिखता रहा और अदालती चक्‍कर भी काटता रहा. मंटो साफ-साफ कहता है कि जब उसके हाथ में कलम नहीं होती तो वह महज सआदत हसन होता है, सीधा-सादा आदमी.

ठंडा गोश्‍त, टोबा टेक सिंह, बू, खोल दो, नंगी आवाजें, मंटो के कई अफसाने पढे. वह एकदम सीधी बात करता है. जरा भी डिप्‍लोमट नहीं है. मंटो साहित्‍य की बौद्धिक गफलत और कभी-कभी बेवजह बोझिल रहने वाली गलियों के बीच रोमांच का नाम है. पहले वह रोमांच पैदा करता है, फिर उसके पाठक को उसके साथ तू-तडाक के मिजाज उतारता है, एक चाय पिलवाता है, उसके बाद तो उसके अफसानों में खुदको पाकर उसे इतना बडा अफसानानिगार मानने लगता है कि मानों उसने हर एक की जिंदगी जी ली हो.

मंटो के मनोविज्ञान ने सीधी बात समझा दी है कि चंद-पढे लिखे लोगों के बीच उसका नाम ले लो, थोडी बहुत जमात में जम सकती है. बडा, बडा लेखक है, रोमांच के बाद दिल में जगह बना लेता है, दिल के बेहद करीब है, इसलिए तो बात सीधी होती है, मंटो ऐसा था, मंटो का ये अफसाना पढो, मंटो ये बोलता है. सच, पढकर तो देखो जरा, ऐसा झटका देगा कच्‍ची उम्र में, कि कम्‍बख्‍त कोर्स की किताबों में माथा खपाने वाली पीढी के जिंदगी के हर पन्‍ने खोल देता है और बाकी सब बंद करवा देता है. खुदा कसम, जिंदगी के लौंडाई पायदान से जवानी की छुग्‍गन पर चढ रहे नये मशरूमों को ऐसा करंट देता है कि फिर तो उसके लिए मंटो, जो मिली, जैसी मिली है, उसी जिंदगी के नशे में पागल कर देने वाली करिश्‍मे की पुडिया हो जाता है.

चंद रोज पहले ही याद आया था, झूठ नहीं कहूंगा मंटो की कसम, अखबार के जरिए ही याद आया था और यह बात इसलिए कह रहा हूं कि मंटो नाम की यह जिंदगी यदि इस दौर में किताबों से बाहर होती तो 11 मई 2012 को सौ साल की हो जाती. वैसे सौ साल के होने वाले सआदत भाई, साथ-साथ इंदौर, भोपाल, नागपुर, औरंगाबाद और फिर मुंबई में लिए गए किराए के कमरों अपने नाम के करंट के साथ भी हमेशा बने रहे. फिर कुछ चुनिंदा लोगों के साथ अविरल बातों की नदियों में बहते रहे, फिर कभी-कभी झरना बन गए और अक्‍सर फुआरों की तरह रोमांच में भिगोते रहे.

मंटो के बारे में बहुत कुछ कहना मुनासिब नहीं है, हां, सआदत भाई के बारे में कुछ जुटाया जा सकता है और वही बताया जा सकता है जो कि गोया उसने खुदने ही कह दिया है या जो दूसरों ने ढूंढा है. अमृतसर, अलीगढ, लाहौर, मुंबई़, दिल्‍ली फिर मुंबई, फिर लाहौर. सुकून की लंबी तलाश. फिर उसने सुकून को तलाशना छोड दिया, सुकून खुद उसके पास आने लगा, अफसानों में सआदत भाई से छिपकर.

मंटो ता-उम्र अफसाने लिखता रहा और फिर उसकी अपनी ही जिंदगी एक अफसाना बन गई. उसने जिंदगी के उलझट्टों को सुलझाने और किसी तरह की झूठी शांति पाने के लिए कभी नहीं लिखा, इसलिए लिखा क्‍योंकि उसे जीना था, फिर जो जीना है उसे किया नहीं जाता. उसने कहा था कि वो महज रोटी के लिए लिखता है किसी तरह की कला-वला के चक्‍कर में नहीं है. किसी बदलाव के लिए भी कोई नया रचाव नहीं किया, जो है उसी में एक खामोश सुकून का क्रिएशन है उसकी जिंदगी, इसलिए अफसाने भी वैसे ही रहे, जाहिर था जिंदगी ही अफसाना थी.

सआदत भाई को सौवीं सालगिरह मुबारक, पर माफ करना "मंटो" ज्‍यादा याद आता है इसलिए भी कि अभी होता तो हर जगह नंग-धडंग हो रही जिंदगी की कौन सी परतों को सामने लाकर रख देता कि सब शर्म के मारे छिपते-फिरते, या फिर वह इस चकाचक चमचमाते दौर में ऐसा कोना भी तलाशता लेता कि कम्‍बख्‍त चुंधियाई रोशनी में अंधी होकर जिंदगी दर-दर भटक रही है.

मंटो "सआदत भाई" से डरने लगा था, उससे बचने के लिए वह सआदत को गुसलखाने में ले जाने लगा था, बच्‍चों को झूला झुलाने लगा था, यहां तक कि चिडियों को दाना भी खिलाने लगा था, कूडा-करकट साफ करने लगा था कि जैसे-तैसे वह अफसाना लिखे तो मंटो के साथ ही रह सके, लेकिन जैसा कि पहले कहा, सआदत भाई नेक थे, शरीफ थे इसलिए बहुत कुछ आसानं नहीं था पर फिर भी मंटो फ्रॉड था, इसलिए वह हमेशा जीता.

सआदत भाई जिंदगी को हरी कच्‍च देखना चाहते थे, उनकी जिंदगी में जिंदगी के हरे ख्‍वाब थे, हरियाली के साथ सुनहरी धूप, पर फिर भी जीता तो मंटो ही था, कम्‍बख्‍त "मंटो" के ख्‍वाब लाल थे. उसने जलियांवाले बाग में लाल खून देखा था, फिर किसी भगत सिंह नाम के लौंडे का भगत भी हो गया था. उसने अपने घर में एक लाल कमरा ही बना डाला था. उपर जन्‍नतनशीं वालिद का फोटो था तो नीचे उसी भगते की मूर्ति, नीचे तख्‍ती पर लिखा था "लाल कमरा".

सौ साल का मंटो इसी लाल कमरे से ताकत लेता रहा और मुल्‍कों के बंटवारे, बलवाई की सनक और सियासी के पत्‍ते फैंटने के खेल समझता, दुनिया के सामने लाता रहा. उसके अफसाने भी, दरअसल लाल ही थे, जो उसी लाल कमरें से निकलते थे और सआदत की नेकी और शराफत को रास नहीं आते थे. लाल अफसाने अदालत को भी आसानी से हजम नहीं हुए. सआदत ने दुनिया को हरा देखना चाहा, पर मंटो ने "लाल जिंदगी" ही जी.

सआदत भाई अब पूरे सौ साल के होते, मंटो के बारे में पता नहीं, वह फ्रॉड था इसलिए लाल कमरें में रहता था अपने अफसानों के साथ. आखिर में वह लाल कमरें में ही रह गया और उसने अपने अफसानें भी लाल ही कर लिए थे. दुनिया में एक लालचट्ट सुबह देने के लिए.  "सआदत भाई, लाल कमरा और फ्रॉड मंटो सबकुछ अफसाना है."

सारंग उपाध्‍याय, लेखक युवा पत्रकार और रचनाकार हैं

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