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Sunday, March 4, 2012

चीन के साथ छायायुद्ध बजट की तैयारी में सबसे पेचिदा मुद्दा

​चीन के साथ छायायुद्ध बजट की तैयारी में सबसे पेचिदा मुद्दा

भारतीय सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह ने चीनी रक्षा बजट में दोगुणा इजाफा की खबरों के बीच यह कहकर सनसनी फैला दी कि युद्ध के हालात में भारत के गोला बारुद महज दो दिन में ख्तम हो जाएंगे।

मुंबई से एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास
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​ चीन के रक्षा बजट के मद्देनजर अगले वित्तमंत्री प्रमव मुखर्जी पर रक्षा बजट बढ़ाने का दबाव है। खुला बाजार में रक्षा बजट में लगातार इजाफा हो रहा है, पर राजकोषीय घाटे में इसकी चर्चा तक नहीं होती क्योंकि यह राष्ट्रीय सुरक्षा और अखंडता ही नहीं बल्कि देशभक्ति से जुड़ा मामला बन​ ​ गया है। चीन के साथ छायायुद्ध में पिछले दिनों खासकर भारत अमेरिकी परमाणु समझौते के बाद रक्षा सौदों की बाढ़ आ गयी है, पर न तो रक्षा विशेषज्ञ और न ही भारतीय सेना प्रतिरक्षा तैयारियों को पर्याप्त मानते हैं। राजकोषीय घाटा, ईंधन संकट और राजनीतिक मजबूरियों के मध्य अगले बजट के लिए चीन के साथ छायायुद्ध पेचीदा मुद्दा बन गया है। भारत में हथियारों का कारोबार लाभदायक धंधा बन जाने से बाजार और कारपोरेट हित भी सीध सीधे जुड़े हुए हैं। रक्षा क्षेत्र में बजट आवंटन बढ़ाने का दबाव रहता है। लेकिन सरकार सीमित रूप से ही बजट बढ़ा सकती है।अब वह सीमा टूटने की आपात स्थिति बनने लगी है। इससे नीति निर्धारकों के कान खड़े हो गये हैं। किसी भी हाल में रक्षा तैयारियों में ​​खामी का मसला आगे बड़ा तो सरकार के लिए जन भावनाओं के नियंत्रित करने की समस्या उठ खड़े होने की आशंका है।

भारतीय सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह ने चीनी रक्षा बजट में दोगुणा इजाफा की खबरों के बीच यह कहकर सनसनी फैला दी कि युद्ध के हालात में भारत के गोला बारुद महज दो दिन में ख्तम हो जाएंगे। हाल की रक्षा तैयारियों के मद्देनजर जनरल का बयानबाजी टीवी पर प्रसारित होते ही हड़कंप मच गया है।दरअसल एक अंग्रेजी दैनिक में रक्षा मंत्री एके एंटोनी को लिखे पत्र के कुछ अंश छाप जाने के बाद टीवी चैनल ने यह समाचार प्रसारित करके रक्षा बजट के सवाल को आगामी बजट का फोकस बना दिया है।बताया जाता है कि जनरल ने रक्षामंत्री को आगाह किया है कि रक्षा बजट में कटौती होने की हालत में देश की सैनिक तैयारियों को भारी धक्का लग जायेगा। जाहिर हे कि इस खुली चेतावनी के बाद वित्तमंत्री के हाथ बंध गये हैं। ऐसे में बजट से राहत की उद्योग जगत की उम्मीदों के रंग बेरंग होने ही थे।हालांकि पहले ही रक्षा मंत्री प्रणव मुखर्जी ने कहा है कि केन्द्र सरकार देश की रक्षा तैयारियों में प्राइवेट सेक्टर की भूमिका को सुनिश्चित करने की योजनाएं बना रही है।

रक्षा मंत्री एके एंटनी ने हाल में पड़ोसी देश चीन की सैन्य तैयारियों को लेकर गंभीर चिंता जताई थी। । एंटनी ने कहा कि भारत को भी अपनी रक्षा तैयारियों की व्यापक समीक्षा करने और सुरक्षा चुनौतियों के प्रति चौकस रहने की जरूरत है।

एशिया सुरक्षा सम्मेलन से इतर संवाददाताओं से मुखातिब एंटनी ने कहा, चीन की सेनाओं का आधुनिकीकरण और उसका अब तक का सबसे बड़ा सैन्य बजट गंभीर चिंता का विषय है। लेकिन, हम अनावश्यक रूप से चिंतित नहीं हैं क्योंकि हम भी अपनी सशस्त्र सेनाओं को आधुनिक और मजबूत बनाएंगे। चीन की बढ़ती सैन्य ताकत के बारे में पूछे गए एक सवाल पर एंटनी ने कहा, किसी भी चुनौती से निपटने के लिए हम भी अपनी क्षमताएं बढ़ाएंगे और बुनियादी ढांचा मजबूत करेंगे। हम ऐसा कर भी रहे हैं।

पिछले दिनों खबरें आई थीं कि चीन ने भारत से लगे इलाकों में मिसाइलों की तैनाती की है और वहां अपना सैन्य ढांचा मजबूत कर रहा है। इसके बाद भारत ने भी सीमावर्ती इलाकों में सड़क व हवाई पट्टियां दुरुस्त कीं। चीन से लगे सीमावर्ती राज्यों में भारत लड़ाकू विमान सुखोई-30 एमकेआइ की चार स्क्वाड्रन भी तैनात करने जा रहा है।

रक्षा मंत्री ने कहा, सशस्त्र सेनाओं की क्षमताओं की समीक्षा निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। रक्षा तैयारियों की समीक्षा नियमित तौर पर की जा रही है और यदि कहीं कोई कमी नजर आती है तो उसे तत्काल दूर किया जाएगा।

चीन ने इस बार अपने रक्षा बजट में जबर्दस्त इजाफा किया है। उसने रविवार को ऐलान किया कि वह इस साल डिफेंस सेक्टर में 106.4 अरब डॉलर की बड़ी रकम खर्च करेगा। रक्षा बजट में 11.2 फीसदी का यह इजाफा पड़ोसी देशों समेत बाकी देशों के बीच एशिया-पसिफिक रीजन में उसकी बढ़ती सैन्य ताकत और दबदबे को लेकर चिंता पैदा कर सकती है। एक वैश्विक शोध समूह की मानें तो 2015 तक चीन का कुल रक्षा बजट भारत, जापान और एशिया-प्रशांत क्षेत्र के अन्य 10 देशों के समुचित रक्षा बजट से ज्यादा हो जाएगा। चीन 2015 तक अपनी सुरक्षा योजनाओं पर 238.2 ब‌िलियन डॉलर खर्च करने लगेगा, यानी उसका रक्षा बजट 11,687 अरब 92 करोड़ 90 लाख रूपए का होगा।

देश का रक्षा बजट इस बार दो लाख करोड़ रुपये के आसपास पहुंच सकता है,ऐसी संभावना बतायी जा रही थी। पर अब बदले हुए हालात में यह रकम नाकाफी है। रक्षा बजट पर व्यय बढ़ने का सीधा असर सामाजिक ​​क्षेत्र की योजनाओं पड़ने की आशंका है। शिक्षा और कृषि पर भी गाज गिर सकती है। उम्मीद थी कि तकरीबन 80 हजार करोड़ रुपये सेनाओं के आधुनिकीकरण और हथियारों की खरीद के लिये आवंटित हो सकते हैं। रक्षा मंत्रालय के आधिकारिक सूत्रों ने बताया कि वित्तीय वर्ष 2012-13 के लिए सरकार रक्षा बजट के मद में दो लाख रुपये आवंटित कर सकती है. यह राशि निवर्तमान रक्षा बजट (164415 करोड़ रुपये) की तुलना में तकरीबन 36 हजार करोड़ रुपये अधिक है।इसका मतलब यह हुआ कि रक्षा बजट में इस बार 20 फीसद से अधिक वृद्धि होगी, जो कि अभूतपूर्व कही जाएगी. नए रक्षा बजट में प्राप्त राशि में से तकरीबन 80 हजार करोड़ रुपये सेनाओं के लिए नए साजोसामान, अस्त्र-शस्त्र और रक्षा उपकरणों की खरीद पर खर्च किए जाएंगे।वर्ष 2011-12 यानी कि बीत रहे वित्तीय वर्ष में देश का रक्षा बजट 164,415 करोड़ रुपये का था, जो कि वित्तीय वर्ष 2010-11 में प्राप्त रक्षा बजट 147344 करोड़ रुपये के मुकाबले लगभग 17 हजार करोड़ अधिक रहा. यह वृद्धि पिछले के मुकाबले महज लगभग 10 फीसद ही थी। इस बजट (2011-12) में 69 हजार करोड़ रुपये नए हथियार, रक्षा उपकरण और साजोसामान खरीदने के लिए मिले थे।

गौरतलब है कि दुनिया भर में गहराई आर्थिक मंदी से दुनिया का शायद ही कोई उद्योग बचा हो। आर्थिक मंदी की मार से वहां का यह उद्योग बुरी तरह प्रभावित हुआ है और उसका संकट और भी गहरा गया है। इसलिए इस उद्योग को नए बाजार की तलाश थी और भारत में यह संभावना उसे सबसे ज्यादा दिख रही थी। सारी दुनिया जानती है कि हथियार और पुनर्निर्माण का खेल अमेरिका का सबसे बड़ा व्यापार है। इसके लिए वह अमेरिका ऐसी परिस्थितियां तैयार करता है कि उसके रक्षा उद्योग के उत्पादों की खपत बढ़े और उसके यहां कि हथियार उत्पादक कंपनियां जमकर चांदी काटें। अभी तो वैसे भी मंदी चल रही है और अमेरिका के रक्षा उद्योग को भारत जैसे बड़े बाजार की और भी ज्यादा जरूरत है।

एसोचैम के एक अनुमान के मुताबिक 2012 तक भारत तकरीबन तीस बिलियन डाॅलर के हथियारों का आयात करेगा। इसमें लड़ाकु विमान, हेलीकाप्टर, मिसाइल के अलावा कई तरह के आधुनिक हथियार शामिल हैं। इसमें से भी बड़ा हिस्सा वायु सेना पर खर्च होने वाला है। एसोचैम का यह अध्ययन बताता है कि 2012 तक वायु सेना के लिए 126 लड़ाकु विमान खरीदे जाने वाले हैं। इसके लिए तकरीबन 42 हजार करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है। जाहिर है, ऐसे में दुनिया के बडे़ हथियार निर्माता इसमें से ज्यादा से ज्यादा हिस्सा हर हथियार निर्माता देश अपने खाते में डालना चाहता है। कुछ दिनों पहले तक रूस भारत में सबसे ज्यादा हथियारों की आपूर्ति करता था लेकिन अब भारत को सबसे ज्यादा हथियार निर्यात करने वाला देश इजरायल बन गया है।

एशिया प्रशान्त में सैन्य मौजूदगी बढ़ाने की अमेरिका की रणनीति के मद्देनजर चीन ने इस वर्ष अपने रक्षा बजट में 11.2 फीसदी की बढोतरी का ऐलान किया है। चीन के रक्षा बजट में बढोतरी को भारत के लिए भी चिंता का विषय माना जा रहा है।

चीन की संसद के प्रवक्ता ली झाओशिंग ने प्रेस कांफ्रेंस में यह घोषणा करते हुए कहा कि उनका देश 11.2 प्रतिशत की बढ़ोतरी के साथ वर्ष 2012 में अपनी सेना पीपुल्स लिबरेशन आर्मी पर 110 अरब डालर का खर्च करेगा। हालांकि पिछले वर्ष उसने अपने रक्षा बजट में 12.7 प्रतिशत की वृद्धि की थी।


कल देश की संसद नेशनल पीपुल्स कांग्रेस के वार्षिक सत्र में इस बजट को मंजूरी दी जाएगी।

झाओशिंग ने कहा 'चीन की 1.3 अरब की आबादी,विशाल क्षेत्रफल और व्यापक तटवर्ती क्षेत्र को देखते हुए अन्य प्रमुख देशों के मुकाबले हमारा रक्षा बजट बहुत कम है।


हालांकि अमेरिका और चीन के पड़ोसी देशों का मानना है कि चीन का असली रक्षा खर्च घोषित बजट से बहुत ज्यादा है। अमेरिका ने कई बार चीन से कहा है कि उसे अपने सैन्य इरादों को अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ साझा करना चाहिए लेकिन अमेरिका का खुद का रक्षा बजट चीन से कहीं ज्यादा है।

झाओशिंग ने कहा कि वर्ष 2011 में चीन का कुल रक्षा व्यय सकल घरेलू उत्पाद का मात्र 1.28 था जबकि अमेरिका,ब्रिटेन और अन्य प्रमुख देशो का यह अनुपात दो प्रतिशत से भी ज्यादा है। उन्होने कहा कि चीन की सीमित सैन्य क्षमता का मकसद देश की संप्रभुता,राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय अखंडता को सुरक्षित रखना है। यह अपने पड़ोसी के लिए किसी तरह का भी खतरा नहीं है।

उन्होंने कहा 'चीन शांतिपूर्ण विकास और आत्मरक्षात्मक राष्ट्रीय रक्षा नीति के मार्ग पर चलने के लिए प्रतिबद्ध है। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने एशिया प्रशान्त क्षेत्न में अपने सहयोगी देशों को आश्वस्त किया है अमेरिका इस क्षेत्र मे शक्ति संतुलन स्थापित करने के लिए प्रमुख भूमिका में रहेगा।'

हालांकि चीन लाख सफाई दे कि उसकी सेना से पड़ोसी को कोई खतरा नहीं है लेकिन पिछले कुछ महीनों से ड्रैगन की गतिविधियां चिंता में डालने वाली हैं। भारत से लगती वास्‍तविक नियंत्रण रेखा (एलओएसी) पर चीनी सैनिकों के अतिक्रमण की खबरें बार बार मीडिया में आती रहती हैं।  
 

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Palash Biswas
Pl Read:
http://nandigramunited-banga.blogspot.com/

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