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Wednesday, February 8, 2012

मराठा मानुष पर दावेदारी को लेकर राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे एक बार फिर आमने-सामने


मराठा मानुष पर दावेदारी को लेकर
राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे एक बार फिर आमने-सामने

मुंबई से एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास

मराठा मानुष पर दावेदारी को लेकर ठाकरे बंधुओं में फिर ठन गयी है। इससे उत्तर
भारतीयों को लेकर शिवसेना की राजनीति फिर गरमाने लगी है।

16 फरवरी को होने वाले बीएमसी चुनाव को लेकर राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे एक बार फिर आमने-सामने आ गए हैं। बीएमसी चुनाव में शिवसेना और एमएनएस के बीच कांटे की टक्कर है। ऐसे में ठाकरे भाई एक-दूसरे पर सियासी हमले करने से नहीं चूक रहे हैं। ठाकरे भाईयों के बीच शुरू हुई जुबानी जंग से कांग्रेस-एनसीपी खुश हैं क्योंकि उन्हें इससे फायदा मिलने की उम्मीद है।महाराष्ट्र में बाल ठाकरे की शिवसेना और राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना में वर्चस्व की राजनीति का शिकार आम मुंबईवासी और खासकर उत्तर भारतीय हो रहे हैं। अलगाववाद और क्षेत्रवाद की राजनीति से देश की औद्योगिक राजधानी मुंबई की आबोहवा बिगड़ रही है, लेकिन महाराष्ट्र सरकार इस मसले पर कुछ ठोस कदम उठाने के बजाय अपना राजनीतिक उल्लू सीधा करने में लगी है।किसी जमाने में महाराष्ट्र में दक्षिण भारतीयों के खिलाफ बाल ठाकरे के अभियान पर भी कांग्रेस ने चुप्पी साधी हुई थी।

16 फरवरी को होने वाले नगर निगम चुनावों के लिये चुनाव प्रचार जोर पकड़ने लगा है और ठाकरे खानदान की तीसरी पीढ़ी ने अपनी...अपनी पार्टियों के लिये प्रचार का जिम्मा संभाल लिया है। शिवसेना के कार्यकारी अध्यक्ष उद्धव ठाकरे के 21 वर्षीय पुत्र आदित्य ने पुणे में अपने छोटे भाई तेजस और पार्टी के अन्य नेताओं के साथ एक रोड शो में हिस्सा लिया ।

युवा सेना के प्रमुख ने कहा कि लोगों को पुणे नगर निकायचुनावों में ''भ्रष्ट'' कांग्रेस...राकांपा को मतदान नहीं करना चाहिए ।

उन्होंने कहा, ''मुंबई में हमने काम करके दिखाया है और इसलिए लोगों को हमें यहां भी साबित करने के लिये मौका देना चाहिए।''
मनसे प्रमुख राज ठाकरे के पुत्र अमित आज सुबह मुंबई के पूर्वी इलाकों में पिता के रोडशो में एक अलग गाड़ी में चल रहे थे ।
उन्होंने कहा, ''मैं इस अनुभव का लुत्फ उठा रहा हूं ।''मुंबई, पुणे, ठाणे, नासिक सहित दस नगर निगमों में चुनाव होने हैं।

शिवसेना के कार्यकारी अध्यक्ष उद्धव ठाकरे अब राष्ट्र की एकता को बचाने का काम करेंगे. उन्हें राष्ट्रीय एकता मंच का सदस्य बनाया गया है. देश को बांटने वाले मुद्दों और प्रवृत्तियों से कैसे मुकाबला किया जाए, इस विषय पर चर्चा का सर्वोच्च मंच राष्ट्रीय एकता समिति है. बांटने वाले मुद्दे भाषा, क्षेत्र और धर्म से संबंधित हो सकते हैं या किसी और विषय से. यह दावा करते हुए कि मुंबई को महाराष्ट्र से अलग करने की कोशिश की जा रही है शिव सेना के कार्यकारी अध्यक्ष उद्धव ठाकरे ने आज कहा कि मेट्रोपॉलिटन शहर बिकाउ नहीं है। उद्धव ने कहा कि मुंबई को पाने के लिए हमने जो कीमत चुकाई है उसे मुख्यमंत्री और सोनिया गांधी नहीं समझेंगे।

पिछले दिनों सुश्री शबनम हाशमी ने समिति की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया. शबनम हाशमी देश की अग्रणी सांप्रदायिकता-विरोधी कार्यकर्ता हैं और 'अनहद' यानी एक्ट नाउ फॉर हार्मोनी एण्ड डेमोक्रेसी की सचिव भी हैं. यह संस्था पिछले कई वर्षों से विघटनकारी राजनीति के खिलाफ जमकर संघर्ष कर रही है. अनहद समय-समय पर धर्मनिरपेक्षता और बहुलतावाद के मूल्यों के प्रचार-प्रसार के लिए सांस्कृतिक कार्यक्रमों और राजनैतिक प्रशिक्षण शिविरों का आयोजन भी करती रही है.

राष्ट्रीय एकता समिति का गठन, पण्डित नेहरू ने सन् 1961 में जबलपुर में हुई साम्प्रदायिक हिंसा के बाद किया था. पण्डित नेहरू, जो उन दिनों देश के प्रधानमंत्री थे, जबलपुर की वहशियाना हिंसा से अत्यंत विचलित हो गए थे. उन्हें इससे गहरा धक्का पहुंचा था. इसके ही बाद उन्होंने साम्प्रदायिकता, जातिवाद और क्षेत्रवाद की बीमारियों से लड़ने के लिए राष्ट्रीय एकता समिति का गठन करने का निर्णय लिया.

वे राष्ट्रीय एकता समिति को एक ऐसा व्यापक मंच बनाना चाहते थे, जिसमें सभी राजनैतिक दलों का प्रतिनिधित्व हो. इसमें केन्द्रीय मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की नियुक्ति का भी प्रावधान रखा गया.

राष्ट्रीय एकता समिति, अब तक केवल एक या दो मौकों पर चर्चा में रही है. पहली बार तब जब उत्तरप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह-जो उस समय भाजपा में हुआ करते थे-ने समिति को यह आश्वासन दिया कि बाबरी मस्जिद की हर कीमत पर रक्षा की जायेगी. बाद में, कल्याण सिंह ने इस तथ्य को छुपाने की कोशिश तक नहीं की कि मस्जिद के ढहाए जाने में उनके योगदान पर वे गर्व महसूस करते हैं.

उद्धव ने  आरोप लगाया कि मुंबई हर साल राष्ट्रीय आय में 1.25 लाख करोड़ रुपए का योगदान करती है, लेकिन बदले में उसे बहुत कम मिलता है।

उद्धव ने मुंबई को बचाने का सेहरा अपनी पार्टी के सिर बांधते हुए कहा कि अगर शिवसेना नहीं होती तो शहर पर दाउद इब्राहिम का राज होता।

दूसरी ओर राजनीति में चाचा-भतीजों के बीच मची होड़ पर शिवसेना सुप्रीमो बाल ठाकरे ने चुटकी ली है। उन्होंने मनसे प्रमुख और अपने भतीजे राज ठाकरे पर परोक्ष वार करते हुए कहा है कि अपने चाचाओं को सफलता मिलते देखकर उन पर भी नेतृत्व का भूत सवार हो जाता है।

महाराष्ट्र के राजनीतिक परिवारों में चर्चित भतीजों में राज ठाकरे, अजीत पवार [केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार के भतीजे] और भाजपा नेता गोपीनाथ मुंडे से नाराज उनके भतीजे धनंजय हैं। इन भतीजों के उदय के बारे में ठाकरे ने कहा, 'जब वह देखते हैं कि उनके चाचाओं की जनता के बीच वाहवाही हो रही है तो उनमें गुदगुदी होती है।'


एक मराठी समाचार चैनल को दिए साक्षात्कार में शिवसेना प्रमुख ने राज ठाकरे की ओर इशारा करते हुए कहा कि वह उन लोगों में है, जो हमसे अलग हो गए। राजनीति के दावपेच उन्होंने मातोश्री [शिवसेना प्रमुख का आवास] में ही सीखे।

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यह पूछे जाने पर कि क्या राज लौट कर आएंगे? ठाकरे ने कहा, 'उनके घर वापस लौटने का मुद्दा अलग है। मगर उनमें खून तो ठाकरे परिवार का ही है।' शिवसेना प्रमुख ने याद दिलाया कि राज ने एक बार कहा था कि यदि उसके और उसके चचेरे भाई उद्धव के बीच राजनीति आई तो वह राजनीति छोड़ देंगे।


राज द्वारा छह साल पहले गठित पार्टी के बारे में उनके विचार पूछे जाने पर ठाकरे ने कहा, 'मुझे मनसे की ओर देखने की जरूरत नहीं है। मेरे पास मेरी शिवसेना है। नेतृत्व एक सस्ती चीज बन गई है। कोई भी नेता बन सकता है।'



मुंबई महानगरपालिका के आसन्न चुनावों में मराठा मानुष का  मुद्दा उभर कर सामने आया है। हालांकि यहां उद्देश्य आतंकवाद के खिलाफ लडऩे और उसके पीडि़तों को मदद पहुंचाने की बजाय आपस में घृणा फैलाने का नजर आ रहा है। महाराष्ट्र एटीएस ने मुंबई में गत वर्ष हुए धमाकों के पीछे इंडियन मुजाहिदीन के दरभंगा मॉड्यूल का हाथ उजागर किया तो उत्तर भारतीयों को किसी न किसी बहाने निशाना बनाते रहने वाले राज ठाकरे को बैठे बिठाए आग उगलने का मौका मिल गया और उन्होंने कह दिया कि उत्तर भारतीय राज्यों से आने वाले जत्थों के कारण ही मुंबई में आतंकी घटनाएं होती हैं। जिसके जवाब में जनता दल युनाइटेड के प्रमुख शरद यादव ने राज से सवाल कर डाला कि वह बताएं कि माफिया सरगना दाऊद इब्राहिम, छोटा राजन और वरदराजन कहां के हैं?

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के अध्यक्ष राज ठाकरे ने हाल में  उत्तर भारतीयों पर नए सिरे से निशाना साधते हुए कहा कि मुंबई में 13 जुलाई के सिलसिलेवार बम विस्फोटों में गिरफ्तारियों से बिहार के तार जुड़े होने की बात सामने आ गई है। राज ने कहा, 'मैं कहता आ रहा हूं कि उत्तर भारतीयों के बढऩे से आतंकवादी गतिविधियां बढ़ी हैं। 13 जुलाई विस्फोट मामले में सोमवार को ही बिहार के रहने वाले आतंकवादियों की गिरफ्तारी हुई है, जिससे मेरे दावे की पुष्टि होती है।'

उन्होंने कहा, '13 जुलाई विस्फोट मामले में बिहार के तार जुड़े होने की बात सामने आ गई है। क्या कोई इस ओर ध्यान देगा या नहीं। मुझे नहीं पता कि मेरे बयानों पर हंगामा क्यों मचाया जाता है।'

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राज ठाकरे के बयान की कड़ी निंदा करते हुए कहा है कि इस तरह के बयान से देश को आतंकवाद निपटने में दिक्कत आएगी। उन्होंने पटना में कहा, 'आतंकवादी कहीं भी हो सकते हैं। इसके लिए किसी वर्ग या प्रांत विशेष को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। साथ ही किसी खास वर्ग या प्रांत के बारे में भला-बुरा भी नहीं कहा जाना चाहिए। इस तरह की धारणा से गलत संदेश जाएगा।' मुख्यमंत्री ने कहा, 'मैंने इस बारे में अखबारों में खबर पढ़ी है। इसीलिए इस बारे में पुलिस महानिदेशक को समीक्षा करने के लिए कहा है।'

इस बीच राष्‍ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने महाराष्‍ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) प्रमुख राज ठाकरे से उत्तर भारतीयों के प्रति उत्तेजक भाषण देना बंद करने को कहा है। पटना में पत्रकारों से बातचीत करते हुए मनसे प्रमुख राज ठाकरे से उत्तर भारतीयों के प्रति उत्तेजक भाषण देना बंद करने को कहा।
मनसे प्रमुख की क्षेत्रवाद की राजनीति को गलत ठहराते हुए भागवत ने कहा कि देश सहित मुंबई और महाराष्ट्र यहां के सभी नागरिकों को है और किसी को जात, संप्रदाय और क्षेत्र के नाम पर लोगों के बीच फूट डालने अधिकार नहीं है। उन्होंने ठाकरे ने मार्गदर्शन के लिए पूर्व में उनसे संपर्क किया था और भविष्य में उनके द्वारा संपर्क साधे जाने पर वे उन्हें ऐसा करने से परहेज करने को कहेंगे।


शिवसेना के कार्यकारी अध्यक्ष उद्धव ठाकरे पूरे मुंबई मे घूमकर चुनावी रैली को संबोधित कर रहे हैं। ऐसी ही एक चुनावी रैली में उन्होंने राज ठाकरे की दुखती रग पर हाथ रख दिया। दरअसल, बॉम्बे हाई कोर्ट ने एमएनएस को शिवाजी पार्क में चुनावी सभा करने की इजाजत नहीं दी थी। इसी मुद्दे पर उद्धव चुटकी लेने से नहीं चूके।

उद्धव ठाकरे ने कहा 'मुझे यहां आने से पहले पता नहीं था कि सभा कहां हो रही है, मैदान पर या रास्ते पर, क्योंकि आजकल मैदान को लेकर विवाद शुरू है। लेकिन हमें इससे फर्क नहीं पड़ता कि सभा कहां हो रही है क्योंकि हम जहां खडे़ होते हैं वहीं से सभा शुरू हो जाती है।'

उद्धव के इस बयान के बाद एमएनएस के अध्यक्ष राज ठाकरे भड़के हुए हैं। मुंबई में रोड शो की तैयारी में जुटे राज ठाकरे ने पलटवार करते हुए आरोप लगाया कि शिवसेना और एनसीपी की साजिश की वजह से उन्हें शिवाजी पार्क में रैली की इजाजत नहीं मिल सकी।

राज ठाकरे चुनावी प्रचार शुरू करने से पहले ये ऐलान कर चुके हैं कि उनके पास ऐसे कई पटाखे हैं जिनके फूटते ही शिवसेना चुनावी मैदान से भाग खड़ी होगी। फिलहाल ठाकरे भाईयों के बीच जारी जुबानी जंग पर कांग्रेस और एनसीपी खुश हैं क्योंकि ऐसा माना जा रहा है कि इसका सीधा फायदा कांग्रेस एनसीपी को होगा।

लोगों को याद है कि राज ठाकरे की धमकी के बाद विधानसभा में हिंदी में शपथ लेने पर समाजवादी पार्टी के विधायक अबू आजमी को मनसे के एक विधायक राम कदम ने थप्पड़ मार दिया था और उनके साथ हाथापाई भी गई थी। यह बात अलग है कि प्रदेश की राजनीति में अलगाववाद की राजनीति करने वाला ठाकरे परिवार खुद पूरी तरह बिखर गया है।

मुंबई में उत्तर भारतीय ऑटो चालकों की पिटाई के बाद मुंबई कांग्रेस अध्यक्ष कृपाशंकर सिंह का कहना था कि महाराष्ट्र संतों की भूमि रही है और यहां पर छत्रपति शिवाजी जैसे लोगों ने समाज को जोड़ने का काम किया है, लेकिन आज कुछ लोग समाज में फूट डालकर अपनी राजनीति चमकाने में लगे हैं।अन्य हिस्सों की तरह महाराष्ट्र में भी बड़े पैमाने पर बेरोजगारी बढ़ी.सरकारी नौकरियां कम हो गईं .मुंबई जो मिलों के लिए जाना जाता था अब बंद मिलों के लिए जाना जाने लगा.मराठी नौकरी को प्राथमिकता देते हैं.नौकरियां रही नहीं,जो छोटी मोटी नौकरियों के अवसर रहते हैं,वहाँ भी स्पर्धा में उत्तर भारतीय; जो अपने राज्यों से नौकरी की तलाश में मुंबई आये रहते है,तैयार मिलते हैं.नौकरी नहीं मिलने के बाद मराठी छोटे मोटे व्यवसाय की ओर उत्सुक होते हैं तो वहाँ भी उत्तर भारतीय पहले से ही कब्ज़ा जमाए दीखते हैं.स्वाभाविक है उनके अंदर हताशा निर्माण होती है,जिसे मराठी के नाम पर राजनीति करनेवाले हवा देते हैं और अपना वोटबैंक बनाने या टिकाने के लिए उत्तर भारतीय विरोधी आन्दोलन चलाते हैं.

राज ठाकरे के संदर्भ में देखें तो उनकी विवादित टिप्पणियों पर बड़े राष्ट्रीय स्तर के दलों ने कभी भी कड़ी प्रतिक्रिया नहीं दी। भाजपा को लगता है कि यदि शिवसेना का साथ छूटा तो राज ठाकरे की पार्टी उनके काम आएगी। वैसे भी राज यह खुलेआम कह ही चुके हैं कि यदि उनकी पार्टी के सांसद चुने जाते हैं तो वह भाजपा नेता नरेंद्र मोदी का प्रधानमंत्री पद के लिए समर्थन करेंगे इसके अलावा राज्य में कांग्रेस भी राज ठाकरे की पार्टी का अपनी सुविधा अनुसार कई बार सहयोग ले चुकी है।कुछ दलों ने प्रतिक्रिया जताई भी तो इस तरह कि उनका अपना लाभ हो मसलन समाजवादी पार्टी ने कहा कि राज ने साबित कर दिया है कि वह मुस्लिमों के खिलाफ हैं।

गौरतलब है कि  मुंबई हाईकोर्ट ने शिवाजी पार्क में राज ठाकरे को चुनावी रैली करने की अनुमति नहीं दी। इससे चिढ़े राज ने राज्य सरकार को [परोक्ष रूप से न्यायालय को भी] चुनौती देते हुए कहा है कि अब वह सड़क पर चुनावी रैलियां करेंगे।

उन्होंने कहा कि राज्य सरकार चाहे तो मुझ पर कानूनी कार्रवाई कर सकती है । मुंबई हाईकोर्ट का उपरोक्त फैसला राज ठाकरे की पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना [मनसे] की उस अपील पर आया है, जिसमें मनसे ने मध्य मुंबई के दादर स्थित शिवाजी पार्क में आगामी 13 फरवरी को लाउडस्पीकर इस्तेमाल करने की अनुमति मांगी थी। मनसे को न्यायालय में जाने की स्थिति तब पैदा हुई जब शिवसेना के शासन वाली मुंबई महानगरपालिका ने उसे यह अनुमति देने से इंकार कर दिया था। इस मैदान की व्यवस्था मुंबई मनपा ही संभालती है, जबकि पिछले दशहरे के दिन महानगरपालिका ने शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे की रैली के लिए शिवाजी पार्क उपलब्ध कराया था।


हालांकि लाउडस्पीकर उपयोग करने की अनुमति शिवसेना को न्यायालय से लेनी पड़ी थी । न्यायालय के फैसले से चिढ़े राज ठाकरे पूछते हैं कि जब एक पार्टी [शिवसेना] को शिवाजी पार्क में रैली एवं लाउडस्पीकर इस्तेमाल की अनुमति दी जा सकती है तो दूसरे दल को क्यों नहीं? राज सवाल उठाते हैं किपहले शिवाजी पार्क, गिरगांव चौपाटी एवं आजाद मैदान में राजनीतिक रैलियों की अनुमति दी जाती रही है। अब इन सभी मैदानों को राजनीतिक रैलियों के लिए बंद कर देने से राजनीतिक पार्टियां जहां जाएंगी? उनका मानना है कि शिवाजी पार्क में राजनीतिक रैलियों की अनुमति मिलनी चाहिए और इसके लिए सभी दलों को एक स्वर से आवाज उठानी चाहिए।

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Palash Biswas
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