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Friday, February 10, 2012

मुख्यधारा बने साहित्य की बहुजन अवधारणा

मुख्यधारा बने साहित्य की बहुजन अवधारणा


Forward Pressअसहमतिनज़रिया

मुख्यधारा बने साहित्य की बहुजन अवधारणा

13 DECEMBER 2011 6 COMMENTS
फारवर्ड प्रेस के नवंबर, 2011 अंक में हमने बहुजन साहित्य की अवधारणा  पर दो लेख प्रकाशित किये हैं। एक प्रेमकुमार मणि का और दूसरा कंवल भारती का।  विमर्श की इस नयी कडी को मोहल्ला लाइव से साझा कर रहा हूं। पहले पढें कंवल भारती का लेख। -प्रमोद रंजन


  • कंवल भारती

जिस तरह दलित साहित्य की एक पहचान है — उसके मूल में जोतिबा फुले, डा. आंबेडकर, बुद्ध और कबीर–रैदास का दर्शन है, वर्ण व्यवस्था और अस्पृश्यता का खंडन उसकी मुख्य वैचारिकी है, उस प्रकार ओबीसी साहित्य का दर्शन क्या होगा? दलित साहित्य ने दलित वर्गों के नायकों को अपनाया है, जिनमें पिछड़ी जातियों के नायक भी शामिल हैं। क्या ओबीसी साहित्य ऐसा करेगा? क्या वह आंबेडकर से दूरी बनाएगा और फुले-बुद्ध को अपनाएगा?

 

लित साहित्य की अवधारणा को हिंदी साहित्य में जितने तीखे विरोध का सामना करना पड़ा, उसे देखते हुए ओबीसी साहित्य की अवधारणा भी शायद ही आसानी से स्वीकार की जाए। लेकिन दलित साहित्य ओबीसी साहित्य का स्वागत करेगा। इसके दो कारण हैं, पहला यह कि यह दलित साहित्य की बहुत बड़ी उपलब्धि होगी, खास तौर से दलित आंदोलन की, कि वह पिछड़ों में भी अपनी अस्मिता की चेतना विकसित करने में सफल हुआ है। आखिर इस सच्चाई को कैसे झुठलाया जा सकता है कि पिछड़ी जातियों के लिए मंडल कमीशन लागू करने की लड़ाई मुख्यत: दलितों ने ही लड़ी है। दूसरा कारण यह है कि हिंदी साहित्य में मुख्यधारा का निर्माण करने में ओबीसी साहित्य से बहुत बड़ी मदद मिलेगी। लेकिन यह होगा तब, जब ओबीसी साहित्य अपनी अवधारणा सिद्धांत और वैचारिकी के साथ स्पष्ट करेगा। यह बात मैं इसलिए कह रहा हूं कि ओबीसी साहित्य की अवधारणा पर जो विचार गत दिनों पढऩे को मिले हैं, उसमें सिद्धांत और वैचारिकी स्पष्ट नहीं है, उसमें एक भावुक परिकल्पना कारूर है, जो विचारोत्तेजक है। ओबीसी साहित्य की पहचान कैसे होगी, अभी यह स्पष्ट नहीं है।
ओबीसी साहित्य को दलित साहित्य से काफी पहले आ जाना चाहिए था। यदि वह अब आ रहा है, तो यह अवश्य ही दलित साहित्य के विस्फोट का प्रतिफलन है। वह जब भी अस्तित्व में आएगा, तो मुख्यत: उसका टकराव दलित साहित्य से होगा। उसकी तुलना भी दलित साहित्य से की जाएगी। दलित लेखक भी उसका एक तुलनात्मक मूल्यांकन कारूर करेंगे। और इस मूल्यांकन में सबसे बड़ी समस्या उसकी पहचान की होगी। अर्थात्, उसे पहचाना किस आधार पर जाएगा? उसके दर्शन के मूल सिद्धांत क्या होंगे? जिस तरह दलित साहित्य की एक पहचान है — उसके मूल में जोतिबा फुले, डा. आंबेडकर, बुद्ध और कबीर–रैदास का दर्शन है, वर्ण व्यवस्था और अस्पृश्यता का खंडन उसकी मुख्य वैचारिकी है, उस प्रकार ओबीसी साहित्य का दर्शन क्या होगा? दलित साहित्य ने दलित वर्गों के नायकों को अपनाया है, जिनमें पिछड़ी जातियों के नायक भी शामिल हैं। क्या ओबीसी साहित्य ऐसा करेगा? क्या वह आंबेडकर से दूरी बनाएगा और फुले-बुद्ध को अपनाएगा? पिछड़ी जातियाँ शूद्र हैं, वो वर्ण-व्यवस्था के अंर्तगत आती हैं। इस दृष्टि से वे सवर्ण जातियाँ भी हैं। संभवत: यही कारण है कि वे स्वयं को दलितों से उच्च मानती हैं और उनके प्रति अस्पृश्यता का व्यवहार भी करती हैं। यह भी गौरतलब है कि जाति की पीड़ा की जैसी कटु अनुभूतियाँ दलितों को है, पिछड़ी जातियों को बिलकुल नहीं है। दलित साहित्य अपनी इन्हीं अनुभूतियों के बल पर हिंदी साहित्य में सबसे विशिष्ट साहित्य बना हुआ है। ओबीसी साहित्य की विशिष्टता क्या होगी? ओबीसी अभी तक कोई राजनीति नहीं विकसित कर सका है, वह साहित्य क्या विकसित करेगा? साहित्य और राजनीति का विकास होता है।

सामाजिक आंदोलन से किंतु दलित आंदोलन की तरह यह उसके समानांतर पिछड़े वर्गों का कोई आंदोलन देशव्यापी नहीं हो सका। मंडल आन्दोलन भी दलित आंदोलन का ही हिस्सा था। ओबीसी ने इस आंदोलन में भाग तक नहीं लिया था, कुछ अपवादों को छोड़ दें, तो जिस समय दलित आंदोलन मंडल के पक्ष में पिछड़ों को लामबंद कर रहा था, पिछड़े लोग कमंडल के साथ बाबरी मस्जिद ढाने में लगे हुए थे। दलित और ओबीसी में जो मूल अंतर है, वह यह है कि दलित अपने को हिंदू नहीं मानते, जबकि पिछड़ी जातियाँ स्वयंको हिंदू मानती हैं। दलित साहित्य 'ना हिंदू' (या अहिंदू) वैचारिकी का साहित्य है। ओबीसी साहित्य की वैचारिकी क्या होगी — एक हिंदू की या 'ना हिंदू' की?

ओबीसी साहित्य की अवधारणा पर अपनी विस्तृत चर्चा में (देखें, 'ओबीसी साहित्य की अवधारणा', फॉरवर्ड प्रेस, जुलाई 2011) राजेंद्र प्रसाद सिंह ने भी कई सवाल खड़े किए हैं उनके इस तर्क से बिलकुल भी इनकार नहीं है कि यदि दलित साहित्य हो सकता है, तो ओबीसी साहित्य क्यों नहीं? पर सवाल यह है कि वह है कहाँ? सिद्धों से लेकर जयशंकर प्रसाद और राजेंद्र प्रसाद और राजेंद्र यादव से प्रेमकुमार मणि तक नाम गिनाने से ओबीसी साहित्य नहीं बनता। निस्संदेह, सिद्धों में बहुत-से सिद्ध दलित-पिछड़ी जातियों से थे, जिनकी संख्या तीस तक जाती है, पर वे सभी सिद्ध परम्परा के कवि हैं, किसी पृथक धारा के नहीं, जिन्हें हम ओबीसी साहित्य से जोड़ दें। इसमें भी संदेह नहीं कि मध्यकाल में, भक्त कवि हुए हैं, दक्षिण में भी और हिन्दी क्षेत्र में भी, पर क्या उनके काव्य को दलित-पिछड़े के आधार पर रेखांकित किया जा सकता है? यदि किया जा सकता है तो कबीर, रैदास और नामदेव को अलग करके राजेंद्र प्रसाद जी क्यों नहीं दिखाते? उनकी यह सूचना सचमुच महत्त्वपूर्ण है कि 18वीं सदी में कोई सरभंग संप्रदाय था, जिसके सभी कवि ओबीसी के थे और छतर बाबा उसके आदि कवि माने जाते हैं। इस संप्रमुदाय पर उन्हें काम करना चाहिए और उनकी रचनाएँ प्रकाश में आनी चाहिए। वे ओबीसी साहित्य का सचमुच ही आदि आधार बन सकती हैं। पर, यदि जैसा कि वे कहते हैं, सरभंगी कवि जाति-पांति, तीर्थ-व्रत आदि ब्राह्मचार को पाखंड मानते थे और मनुष्य को छुआछूत के नियंत्रणों से परे, तो मैं नहीं समझता कि वे इस मायने में रैदास से भिन्न हैै? या अपनी अवधारणा में वह किस अर्थ में ओबीसी साहित्य है, दलित साहित्य से पृथक या उसके समानान्तर? और आधुनिक हिंदी साहित्य में जिस जयशंकर प्रसाद को वह ओबीसी का मान कर अत्यंत तेजस्वी रचनाकार कह रहे हैं, वह ब्राह्मणवाद के भी अत्यंत तेजस्वी प्रवक्ता थे। यदि इसी आधार पर ओबीसी साहित्य की अवधारणा तय की जा रही है, जिसमें जाति प्रमुख है, विचारधारा नहीं, तो मुझे नहीं लगता की वह साहित्य क्रांतिधर्मी होगा।
मेरी दृष्टि में, ओबीसी साहित्य भी स्वतंत्रता, समता और बंधुता-मूलक ही होगा और ऐसी स्थिति में कोई विभाजन रेखा दलित और ओबीसी साहित्य के बीच कैसे खींची जा सकती है? यहाँ राजेन्द्र प्रसाद सिंह बिलकुल ठीक कहते हैं कि दलित और ओबीसी धारा के सिद्धांत और व्यवहार पक्ष समान हैं और इसका कारण भी वे सही बताते है कि दोनों का ही लक्ष्य जातिविहीन समाज की स्थापना करना है। उनकी इस बात से भी पूरी सहमति व्यक्त की जा सकती है कि ओबीसी साहित्य अत्यंत दमदार है और विपुल मात्रा में उपलब्ध भी है। पर, जैसा कि वे खुद भी मानते हैं, यह विपुल मात्रा कोई अर्थ नहीं रखती, अगर उसे पिछड़ा-विमर्श के रूप में कायदे से रेखांकित नहीं किया जाएगा। जब यह काम हुआ ही नहीं है और कोई भी पिछड़ी जाति का लेखक, चाहे राजेंद्र यादव हों, प्रेमकुमार मणि हों, मधुकर सिंह हों, संजीव हों, शिवमूर्ति हों, दिनेश कुशवाहा या वीरेंद्र सारंग हों, ओबीसी साहित्य की अवधारणा के साथ न लिख रहा है और न उस रूप में अपने को खुलकर व्यक्त कर रहा है, तो आप यह आरोप कैसे लगा सकते हैं कि ''ओबीसी साहित्य सवर्ण साहित्य और दलित साहित्य के बीच कराहता हुआ साहित्य है?'' यह एक ऐसा आरोप है, जिस का आधार ही नहीं है। कोई चीज़ जब है ही नहीं तो दो पाटों के बीच उसके पिसने की बात कोरी कल्पना ही है। पहले ओबीसी साहित्य अपनी अवधारणा के साथ अस्तित्व में तो आए; उसकी दिशा और दशा तो उसके बाद ही तय होगी।

लगभग एक दशक पहले बिहार में कुछ ओबीसी के लोगों ने 'अवर्ण साहित्य' का अलख जगाया था, एक सम्मेलन भी उसका पटना में हुआ था और उस अवसर पर एक स्मारिका भी निकाली गई थी, जिसमें मैंने भी लिखा था। पटना से ही रवीन्द्र लड्डू ने संभत: इसी अवधारणा को लेकर शम्बूक नाम से एक पत्रिका का प्रकाशन भी आरंभ किया था। सत्तर के दशक में रामस्वरूप वर्मा ने लखनऊ में अर्जक संघ बनाकर अर्जक साहित्य की भी बुनियाद रखी थी, जिसे हम ओबीसी साहित्य की अवधारणा से जोड़ सकते हैं। इस पूरे आंदोलन को दलितों ने भरपूर समर्थन दिया था। यह पूरा आंदोलन ब्राह्मणवाद के खिला$फ था, जिसने दलितों और पिछड़ों दोनों को उद्वेलित किया था। आगे चलकर यह आंदोलन राजनीति का शिकार हो गया और ओबीसी साहित्य की जो अवधारणा उसने बनाई थी, उसमें ओबीसी लेखकों ने ही कोई रुचि नहीं ली। इतिहास के ये पृष्ठ राजेंद्र प्रसाद सिंह और हमारी पीढ़ी के समय के ही हैं और ये वे सच्चाईयाँ है, जिन्हें झुठलाया नहीं जा सकता। फिर, जातियों की संख्या गिनाकर दलित साहित्य को ओबीसी साहित्य को दबाने का दोष देना बुद्धिमत्ता का काम नहीं है।

और क्या ही अच्छा हो दलित साहित्य भी न रहे और ओबीसी साहित्य भी! हम साहित्य में बहुजन अवधारणा को मुख्य धारा के रूप में स्थापित करें!

(चिंतक एवं आलोचक कंवल भारती दलित विमर्श पर विचारोत्‍तेजक लेख लिखने के लिए जाने जाते हैं। उनकी पुस्‍तक 'दलित विमर्श' की भूमिका खासी चर्चित रही है। ) 

मोहल्‍ला लाइव पर इससे संबंधित अन्‍य लेख देखें -

  1. फारवर्ड प्रेस ने लॉन्‍च की ओबीसी साहित्‍य की कैटगरी
  2. फॉरवर्ड प्रेस : आइए, इसके नये कलेवर का स्‍वागत करें

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Palash Biswas on BAMCEF UNIFICATION!

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS ON NEPALI SENTIMENT, GORKHALAND, KUMAON AND GARHWAL ETC.and BAMCEF UNIFICATION! Published on Mar 19, 2013 The Himalayan Voice Cambridge, Massachusetts United States of America

BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE 7

Published on 10 Mar 2013 ALL INDIA BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE HELD AT Dr.B. R. AMBEDKAR BHAVAN,DADAR,MUMBAI ON 2ND AND 3RD MARCH 2013. Mr.PALASH BISWAS (JOURNALIST -KOLKATA) DELIVERING HER SPEECH. http://www.youtube.com/watch?v=oLL-n6MrcoM http://youtu.be/oLL-n6MrcoM

Imminent Massive earthquake in the Himalayas

Palash Biswas on Citizenship Amendment Act

Mr. PALASH BISWAS DELIVERING SPEECH AT BAMCEF PROGRAM AT NAGPUR ON 17 & 18 SEPTEMBER 2003 Sub:- CITIZENSHIP AMENDMENT ACT 2003 http://youtu.be/zGDfsLzxTXo

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